अन्ना हज़ारे की मुहिम उत्तर प्रदेश में
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की तोप का मुंह अब उत्तर प्रदेश की ओर है. वे इसी शुक्रवार को बनारस से अपनी मुहिम शुरू करेंगे. अन्ना हजारे का काफिला बनारस से सुल्तानपुर होते हुए रविवार पहली मई को लखनऊ में सभा करेगा.
मायावती ने अन्ना हजारे से सीधे मोर्चा लेते हुए प्रस्तावित जन लोक पाल विधेयक की मसौदा समिति में दलित प्रतिनिधि न होने के लिए उन्हें गुनहगार बता दिया है. साथ ही समिति के संदिग्ध सदस्यों से दूरी बनाने की सलाह भी दी है.
मायावती की आपत्ति और सलाह अपनी जगह. लेकिन इस बात से कौन इनकार करेगा कि उत्तर प्रदेश पिछले कई सालों से लगातार भ्रष्टाचार में डूबता जा रहा है. मायावती ने स्वयं हाल ही में अपने दो मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया है.
हर जुबान पर चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में सरकारी विभागों से अवैध वसूली के आरोप लगते रहे हैं. और यह भी किस तरह दो बिजनेस परिवार यहाँ हर सरकारी ठेका पा रहे हैं.
इससे पहले जो सरकार थी उस पर भी दो चार बिजनेस घरानों को ही फायदा पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं. पूर्ववर्ती सरकार के साथ कम कर चुके दो पूर्व मुख्य सचिवों को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना पड़ा.
सीबीआई सुप्रीम कोर्ट में कई बार कह चुकी है कि वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में उसकी चार्ज शीट तैयार है.
सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश पर सी बी आई इनसे पहले वाले मुख्यमंत्री के खिलाफ भी आय से अधिक मामले की जांच कई साल से कर रही है.
सरकार जनता के पैसे से चलती है. सरकारी सेवक और जन प्रतिनिधि जनता के टैक्स के पैसे से वेतन और तमाम सुख सुविधाएँ पाते हैं. लेकिन वही नागरिक जब किसी काम से, मसलन राशन कार्ड , जाति प्रमाणपत्र, जन्म- मृत्यु प्रमाणपत्र , पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस आदि के लिए सरकारी दफ़्तर जाता है तो उसे परेशानी का सामना करना पड़ता है.
कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की जनता भी भ्रष्टाचार से आजिज है. लोगों को अन्ना हजारे से बहुत उम्मीदें भी हैं. लेकिन अब अन्ना हजारे की अपनी टीम के कई सदस्य जिस तरह संदेह के घेरे में आ गए हैं, उससे उनके आंदोलन में वह धार नहीं रही जो जंतर मंतर से उठी है.

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सर अन्ना हजारे की यह यात्रा मायावती जी को जवाब देने के लिए तैयार की हुई हो सकती है. अन्ना का इस प्रकार उत्तर प्रदेश आना और बीजेपी का मात्र कुछ समय पहले मायावती के ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना यह दोनों एक दुसरे के पूरक हो सकते हैं. अन्ना पर यह भी कहा जाता है की वह आरएसएस. के इशारों पर काम करते हैं यह कितना सही है या गलत यह तो नहीं कह सकते हैं.
अन्ना की टीम पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. जिसमे शान्ति भूषण जी पर जो भी आरोप लगे हैं उनकी पृष्ठभूमि भी उत्तर प्रदेश रहा है. अब देखना यही हैं की कहीं ऐसा तो नहीं इसी बात का कोई सम्बन्ध इस यात्रा में हो. कुल मिलाकर हमारे हिसाब से अन्ना अपनी प्रासंगिकता को चुके हैं. अब आगे क्या होगा यह देखना भी रोचक होगा.
वाह रामदत्त जी, आपने पूरा नक़्शा खींच कर रख दिया. अच्छा होता अगर आप उत्तर प्रदेश की बजाय पूरे भारत की बात करते.
अन्ना हजारे हुवे बेचारे, कहते मिटाऊंगा मैं भ्रष्टाचार.
लेकर साथी ऐसे चले, जिनकी दौलत अपरम्पार.
जाते वहां नहीं, जहाँ भ्रष्ट हज़ार.
जाऊँगा उप, दिवा लेकर ढूँढूँगा.
नहीं छोडूंगा उप के भ्रष्टों को.
मुझे क्या मतलब मेरे साथी की दौलत से.
जीने तो उसे भी शानो शौकत से.
पर नहीं छोडूंगा उप के भ्रष्टों को.
अन्ना पहुंचे उप में, देख उप की काया
निकला मुह से अन्ना के, वाह री माया
आप माया हैं की अशोक सम्राट
दलितों के हैं यहाँ कितने ठाठ बाट.
बुद्ध्मय कर दिया सारा उप
कर दो उद्धार शेष भारत का भी.
देखा जो रज्जू भैया जेल में, बोले अन्ना
कैद किया गुंडों को माया ने, खेल खेल में
कहीं मेरे साथी न जाए जेल में
भैया जल्दी चलो दिल्ली रेल में.
अब आएगा असली मज़ा. एक तरफ़ प्रशांत भूषण, शांति भूषण जैसे भूमि वीरों के साथ अन्ना हज़ारे तो दूसरी तरफ़ दलित की बेटी(बेहतर होगा दौलत की बेटी कहा जाए) और उसके मंत्री बेचारे.मगर जनता ग़रीब क्या करेगी, उसके ज़ख़्मों पर मरहम कौन लगाएगा.हाल ये है कि 'ना माया मिले ना राम, कुछ बोले तो काम तमाम'
मेरा यह मानना है कि जिस रफ़्तार से पहले यह आन्दोलन चला था अब वर्तमान में यह बात नही आ पाएगी.लोग यह समझेंगे कि अन्ना जी का तो आन्दोलन करना ही काम रह गया है
अन्ना हजारे ने तो एक जंग जीत ही लिया है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को मध्य एवं उच्च वर्गीय परिवार का दिल जीत लिया है आज लाखो लोग उनके साथ है और साथ मै भी हूँ.
लेकिन एक बात मेरे मन में जो बार बार कचोट रही है कि भ्रष्टाचार से सबसे जयादा जिसको नुकसान हुआ है वो है दलित एवं गरीब परिवार, मजदूर वर्ग, अनपढ़ लोग, इसको हम अपने दैनिक जीवन में इस प्रकार देख सकते है किसका शोषण किया जाता है, किसकी इज्जत लूटी जाति है, कौन सड़क पर मर खा रहा है.
और मेरे अनुसार भ्रष्टाचार खत्म करके सबसे ज्यादा अगर किसी को फायदा पहुँचाया जा सकता है तो वो भी है दलित एवं गरीब परिवार, मजदूर वर्ग, अनपढ़ लोग, इनके गरीबी, सेहत, तालीम के मुद्दे पर काम करके ही किया जा सकता है.
भारत मिलेनियम डेवलपमेंट गोल प्रगति रिपोर्ट २०१० में यह बात साफ तौर पर किया गया है लक्ष्य पाने में सबसे बड़ी बाधा यह है की अनुसूचित जाति, जन जाति , अल्पसंख्यक परिवारों में अपेक्षा कृत प्रगित कम है. यह सोचनीय विषय है कि इन परिवारों में लक्ष्य क्यों कम है.
अगर हम यह कहें की इनके विरुद्ध भेद भाव पूर्ण रवैया अपनाया जाता है तो शायद आप माने नहीं इनको जो फायदा पहुँचाना चाहिए वो किसी और के जेब में चला जाता है कभी बेवकूफ बनाकर तो कभी कुछ लालच देकर
मुद्दे की बात यह है की अगर मायावती जी यह बात कह दी की समिति में दलितो को भागीदारी होनी चाहिए तो इसमें बुराई क्या है इसका तो स्वागत किया जाना चाहिए और मेरे समझ से ज्यादातर सिविल सोसाइटी / संगठन इस बात से सहमत होंगे क्या ४०-४५ % दलित, अल्पसंख्यक समुदाय के एक भी सदस्य को समित में शामिल नहीं किया जा सकता. क्या जिनको भ्रष्टाचार से सबसे जयादा नुकसान हुआ है और भ्रष्टाचार रुकने पर सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है क्या उनको समित में शामिल करने से कुछ नुकसान होगा.
मेरे अनुसार भारत जैसे लोकतंत्र देश में जहाँ एक ओर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जिसका प्रयास समिति के माध्यम से चल रहा है वहीँ एक बड़े पैमाने पर लोगो को जागरूक करना होगा व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्टाचार का हिस्सा न बनने का सामूहिक कसमे खाने पड़ेगे.
और सबसे बड़ी बात यह है की भ्रष्टाचार को खत्म करने हेतु हमें अपने व्यक्तिगत हित छोड़ने होंगे मेरे अनुसार ९०% लोग अपने छोटे छोटे व्यक्तिगत हित के लिए भ्रष्टाचार का हिस्सा बने होंगे, कभी कुछ समय बचाने के लिए कभी कुछ पैसे बचाने के लिए तो कभी कुछ मेहनत कम करने के लिए.
जब यह मामला जन समुदाय का है तो समित में दलित एवं अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व होना चाहिए
जब समझदार नेता किसी प्रदेश का भ्रमण कर रहे हों तो नामसझ नेताओं को चुप रहना चाहिए.
बोया पेड़ बबूल का -आम कहाँ से खाय |
अन्ना जी का उत्तर प्रदेश जाना अभी जल्दबाजी का काम है, बहन जी का उत्तर प्रदेश पर राज्य करना देश की पहली दलित प्रयोगशाला है, इसमे 'भ्रष्टाचार की बात भी बेमानी लगती है क्योंकि बेईमानों को हटाकर बिना बेईमानी के कैसे राज करेंगी' भ्रष्टाचार के आगोश में पूरा देश डूबा हो तो बहन जी का भ्रष्टाचार समुद्र में बूंद जैसी ही है.पर आज जिस तरह से 'भ्रष्ट' समाज पैदा हो गया है उसका क्या होगा ? उसका ठीकरा प्रदेश के जन जन तक फोड़ा जा रहा उसका इलाज कैसे होगा. यदि उत्तर प्रदेश में इनका यही हाल रहा तो प्रदेश का क्या हश्र होगा. त्रिपाठी जी ने इशारे इशारे में ही उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व और वर्तमान पर इशारा किया पर अभूतपूर्व दलों की ओर इशारा तक नहीं किया है. पूरे प्रदेश नाम पर बहु बेटियों तथा स्वजातियों को बैठाये हुए है जिसका अदृश्य रूप जब सामने आता है तो दिखाई देता है की घोर अत्याचार में लम्बे समय से डूबा है. लेकिन पुलिस की भर्ती में धांधली की आवाज़ तो हाई कोर्ट तक जाती है, पर सारी भर्तियों में - जातीय निक्कमों की फौज की फौज - सारे सरकारी दफ्तरों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों में थोक में है पर उनपर न तो मीडिया नज़र उठाता है और न अन्ना हजारे निकलते हैं सुधार के लिए "दलित राज्य की उपलब्धियों को नकारने का मतलब तो समझ में आता ही होगा" पर सारी उपलब्धियों का श्रेय "द्विज" शक्तियों को देना बहुत बड़ी साजिश है.
अतः अन्ना का आना "शुभ नहीं है".
अन्ना ने शुरुआत के लिए एकदम सही राज्य का चुनाव किया है. इस समय उत्तर प्रदेश की सत्ता जितनी भ्रष्ट है पहले कभी नहीं थी.वअन्ना के दो सहयोगियों पर आरोप लगने मात्र से यह आन्दोलन कमजोर नहीं पड़नेवाला. देश की जनता को अन्ना पर पूरा भरोसा है और रहेगा. हाँ,यह भी सच है कि कभी-कभी अन्ना भी झुकते हुए से प्रतीत होते हैं और तब बड़ा दुःख होता है.
अन्ना हजारे पर टिप्पणी करने से आज कोई चूकना नहीं चाहता है। और उनके सहयोगियों पर टिप्पणी करना तो आज जैसे लोगों का प्रिय विषय होता जा रहा है। एक खेमे की अगुआयी अमर सिेह और दिग्विजय सिंह जैसे लोग कर रहे हैं तो दूसरा खेमा अन्ना हजारे का है जिसे आम लोगों का समर्थन हासिल है,लेकिन रामदत्त जी पहले खेमे के साथ खडे होकर अन्ना के सहयोगियों पर सवाल उठायेगें इसकी तो कतई उम्मीद ही नहीं थी। राम दत्त जी ने उस तरह तो सवाल नहीं उठाये जैसे अमर सिेह और दिग्विजय उठा रहे हैं,लेकिन इस वक्त अन्ना के साथ खडे लोगों के अतीत पर सवाल किस मंशा से उठाये जा रहे हैं यह किसी से छुप नहीं सकता है।यह मान भी लिया जाए कि अन्ना के सहयोगियों ने कुछ गडबड की होगी तो इसका यह मतलब कैसे निकलता है कि उन्हें अब अच्छे काम करने का कोई हक नहीं है। यह तो हिन्दी फिल्मों के उस संवाद की तरह हो गया है कि अपराध की दुनियां में आने के बाद बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं होता है। अमर सिेह और दिग्विजय यदि भले इंसान न बनना चाहें तो यह उनका विशेषाधिकार है लेकिन ये लोग किसी दूसरे को कैसे रोक सकते हैं, और दुनियां में ऐसा कौन सा इंसान हो सकता है जिसने कुछ भी गडबड न की हो, ये शुद्धतावादी अभियान इसलिए नहीं चलाया जा रहा है कि इन लोगों को अन्ना के अभियान को लेकर कोई वास्तविक चिता है बल्कि ये लोग चाहते हैं कि हर व्यक्ति इस बात से डरा रहे कि उसने जाने अनजाने कुछ न कुछ जो भी गडबड की है यदि आंदोलन में वह शामिल हुआ तो उसकी पोल खुल जाऐगी। हकीकत यह है कि अन्ना का यह अभियान हर व्यक्ति के लिए अपनी किसी भी की गयी जानी अनजानी गडबड को धो डालने का अवसर है।
एक बात यह भी गलत प्रचारित की जाती है कि भ्रष्टाचार का मतलब केवल अवैध रूप से पैसा कमाना होता है, भ्रष्टाचार का वास्तविक मतलब भ्रष्ट आचरण करने की शक्ति हासिल कर लेना ,और उसका निर्लज्ज प्रदर्शन करना है। यह केवल पैसै से हासिल नहीं की जा सकती है इसके लिए सत्ता हासिल करना बुनियादी शर्त है,तभी व्यक्ति को पूर्ण अराजक होने की क्षमता हासिल होती है,इसलिए बुनियादी भ्रष्टाचार केवल अवैध पैसा इकठ्ठा करना नहीं है, बल्कि सत्ता है, जो लोग आज सत्ता में हैं उन्हें बताना होगा कि वे किसलिए सत्ता में आये हैं देश को उनकी जरूरत है या उनको सत्ता की प्यास है?
अन्ना हज़ारे का राजनीति से प्रेरित बयान देना...उस पर अपनी टीम में दाग़दार लोगों को लेना...उनके आंदोलन को कमज़ोर करता जा रहा है. आख़िर छेद वाली नाव से समंदर कैसे पार हो सकता है.
क्या... रामदत्त जी, क्या यह किसी बीबीसी पत्रकार का ब्लॉग है..?
इससे ज्यादा दुर्भाग्यजनक और क्या हो सकता है कि अन्ना हजारे और उनके साथी छह ऐसे लोग भी नहीं चुन सके जो विवादों से परे हो...अन्ना को अब इस बारे में तो सोचना ही होगा...पद नहीं छोड़ेंगे की थेथरई तो सियासी दलों की फितरत है...अन्ना और उनके साथी भी यही रास्ता अख्तियार करेंगे तो दिक्कत बढ़ेगी...एक भरोसा टूटा है, निश्चित टूटा है सबका नहीं तो कुछ लोगों का ...अन्ना को सोचना होगा..
अन्ना हजारे की यह यात्रा राजनीति से प्रेरित है भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन में भारत एक हस्ताक्षरकर्ता देश है. संयुक्त राष्ट्र का यह कन्वेंशन 2003 में आया था सरकार पिछले 7 साल से इस जानकारी को छिपा रही है दोनों पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को भ्रष्टाचार के बारे में नहीं कहना चाहिए . क्योंकि दोनों केंद्र में इस अवधि के दौरान शासन किया है अगर दोनों पार्टियों को भ्रष्टाचार खत्म करने के इच्छुक थे तो लोकपाल विधेयक 2003 से अब तक लागू क्यों नहीं किया गया दोनों पार्टी और अन्ना बिना किसी कारण के मायावती सरकार को दोष दे रहे हैं. सही तथ्य यह है कि भाजपा और कांग्रेस दुनिया में सबसे भ्रष्ट पार्टियाँ हैं.
आप कोई भी टिप्पणी रिव्यू करने के नाम पर छांट देते हैं. जो आपको पसंद हैं वही छप सकती हैं बाक़ी रद्दी की टोकरी में. फिर आप पाठकों से टिप्पणियाँ मंगाते ही क्यों है. यह जगज़ाहिर है कि रामदत्त जी कॉंग्रेस समर्थक हैं और मायावती से बैर रखते हैं. आप यह टिप्पणी छापेंगे तो नहीं लेकिन यह कम से कम आप तक तो पहुँच ही जाएगी. शायद आप अंधकार से बाहर आ जाएँ.
रामदत्त त्रिपाठी जी आपके ब्लॉग में संपूर्ण भारत की तस्वीर नहीं खीची गई है.जहाँ एक तरफ राज्य की कुछ अन्य अच्छाइयो की भी उपेक्षा की गई है वहीँ दूसरे राज्यों के भ्रष्टाचार और उसके बड़े भाई 'पक्षपात' के कारण करोड़ों ग़रीबों,वंचितों पर जाति, भाषा,धर्म आदि के नाम पर आज भी तथाकथित सरकारी और गैरसरकारी 'दबंगों' द्वारा अमानवीय अत्याचारों से उत्पन्न भय, भूख की भयाभयता की अनदेखी की गई है. अन्ना हजारे का आन्दोलन भी अगर लोगों को परस्पर विरोधी राजनेताओं के हाथो की कठपुतली बनकर काम करता हुआ नजर आएगा,तो यह भी अपने मकसद से भटककर बिखर जाएगा.
रामदत्त जी अन्ना के न तो आंदोलन में कोई कमी रहेगी और न कोई धार कम हुई है. जनता परिवर्तन चाह रही है बस अन्ना का इंतज़ार है. अब जो तूफ़ान यूपी से शुरू होगा उसकी गूँज सारे देश में होगी और आप मीडिया वाले इसमें बहुत बड़ा रोल अदा करने वाले हैं.
अन्ना का विरोध क्यों. भ्रष्टाचार का पानी अब नाक के ऊपर से बह रहा है। देशवासियों के लिए इसे झेल पाना अब काफी मुश्किल है। आखिर लोग किस पर विश्वास करे। सभी तो चोर ही नजर आते हैं। नेता, नौकरशाह, उद्योगपति सभी कोई भ्रष्टïाचार के दलदल में फंसा हुआ मालूम पड़ता है। इन तीनों के गठजोड़ ने पूरे देश की व्यवस्था को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। अब तो कुछ पत्रकारों के भी इस जंगलराज में शामिल होने की खबर ने काफी धक्का पहुंचाया है। आम आदमी जो पहले से काफी कमजोर और असहाय है और बेबस नजर आ रहा है। इस डूबती नैया के बीच अन्ना हजारे नाम का तिनका सामने आ गया है। लोग इस उम्मीद में है कि यह गांधीवादी शायद देश को भ्रष्टïाचार रूपी दलदल से बाहर निकालने में सक्षम हो। लेकिन अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता। फिर हम जैसे थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे लोगों में हर चीज का विरोध करने की जन्मजात आदत रही है। देखिए न, बेचारे अन्ना बाबा का भी विरोध शुरू हो गया है। आखिर जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन समाज के कल्याण और भ्रष्टï लोगों के खिलाफ लड़ाई में बीता दिए उस व्यक्ति का विरोध करने का क्या औचित्य है। हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ इस महासंग्राम में अन्ना का समर्थन करना चाहिए। जबकि कुछ लोग तो हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गए है। ऐसे में गाहे बगाहे हम भ्रष्टïचार का समर्थन ही कर रहे हैं।
कुछ दिन और फिर बेचारे अन्ना हज़ारे भी थक कर चुप हो कर बैठ जाएंगे, इस देश को पूरे पूरे 100 करोड़ अन्ना हज़ारे चाहिए तब ही कुछ होगा, एक दो का तो पता भी नहीं चलेगा किधर गए।
मैं सोच रहा था की जब अन्ना हज़ारे लौट के घर वापस आएंगे तो वो क्या सोच रहे होंगे, अपने आंदोलन और इस पूरे देश की मजबूर लाचार जनता के बारे में।
मेरी कविता “बेचारे अन्ना हज़ारे”
न तो दानव मरे न दुष्टता का नाश हुआ।
मैं दधीचि हूँ मेरी हड्डियाँ बेकार गईं।
ये सौ करोड़ से ज़्यादा हैं फिर भी डरते हैं।
इनके जीवन को रोंद दर्जनो सरकार गईं।
पहले गोरों की दासता अब रँगीले आक़ा।
इनके सपनों पे डालते हैं ये ऐसे डाका।
जैसे ये क़ौम हो एक सौ करोड़ मुरदों की।
और हुकूमत हो जहां कुछ दबंग गुर्गों की।
यहाँ हैं भ्रष्ट राजनेता भूत लातों के।
और वॉटर हैं पहलवान सिर्फ बातों के।
कुछ ने बेचा है मतदान एक अदधि पर।
कुछ ने वादों की हज़ारों हज़ार रद्दी पर।
इन्हे जगाना भी चाहूँ तो जगाऊँ कैसे।
हाँ इनकी चेतना कब की स्वर्ग सिधार गई।
न तो दानव मरे न दुष्टता का नाश हुआ।
मैं दधीचि हूँ मेरी हड्डियाँ बेकार गईं।
वैसे मेरी दिली ख़्वाहिश है की अन्ना की कोशिशें बेकार न जाएँ और इस देश के हर भ्रष्ट नेता को इस देश के हर भूके नंगे और टेक्स देने वाले नागरिक के सवालों का जवाब देना पड़े, देखते हैं क्या होता है।
अन्ना को अपनी मुहिम सबसे पहले महाराष्ट्र से शुरू करनी चाहिए, जहाँ देश में सबसे अधिक भ्रष्टाचार के मामले आए हैं.
अन्ना जी का हम सबको सम्मान करना चाहिए. यह उनकी लड़ाई नहीं है सबकी लड़ाई है. आप सब से विनती है सभी अपनी-अपनी पार्टी छोड़ कर इस आंदोलन में शामिल हों. अगर आप अपने बच्चों का भविष्य उज्जवल देखना चाहते हैं.
रामदत्त जी, पहले यूपी से चुने गए लोगों से भारत की सरकार चलती थी और ये बातें अतीत बन कर रह गई हैं. यूपी भी अब शेष भारत से अलगथलग पड़ गया है. रही बात मायावती की तो मायावती जब पहली बार चुनाव जीतीं तो अपराध में कुछ कमी आई. उसी को ध्यान में रख कर यूपी की जनता ने उन्हें बहुमत दिया. पर वह बहुमत मिलने के कारण मदहोश हो कर यूपी की जनता को भी भूल चुकी हैं. वह हर बात की क़ीमत वसूल कर रही हैं दोनों हाथों से. अब रही अन्ना हज़ारे की तो वह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चल पड़े हैं. पहले मुक़ाम पर उन्हें जनता से मिले सहयोग के कारण सफलता मिल चुकी है. अब मायावती हो या कोई और पार्टी इस गुमान में न रहे भ्रष्टाचार का घड़ा भर चुका है वह तो फूटेगा ही चाहे कोई कुछ कर ले.
प्रियवर रामदत्त जी, सतही लेखन! आपने ख़ुद को क़ैद कर लिया है सिर्फ़ यूपी में. त्रिपाठी जी समस्त भारत ही आप का है. आप महाराजाधिराज हैं मीडिया वर्ल्ड के. मुझे एक साज़िश सी लगती है सारे प्रकरण में. कॉंग्रेस के लोगों ने सोचा बहुत हो गया भाजपा का हल्लागुल्ला, संसद को ठप्प भी करवाया. अब हटो एक साइड में, हम सरकार भी चला लेंगे और एक साफ़ छवि वाले नेता से हल्ला भी करवा लेंगे. संदेश....भाजपा परे हटो.
काफ़ी ऊँचा चिंतन है. जय हिंद.
उत्तर प्रदेश भी अन्य राज्यों की तरह भ्रष्टाचार में डूबा है और जनता परेशान हो चुकी है, लेकिन अन्ना हज़ारे के आंदोलन से भ्रष्टाचार नहीं मिटने वाला, ये केवल दिखावा है और टीवी वालों के लिए ख़बर का स्रोत है. आप देख लीजिएगा इस मुहिम से १ % भी भ्रष्टाचार नहीं मिटने वाला.
त्रिपाठी जी , हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार को परिभाषित करना अत्यंत ही कठिन काम है. जहाँ संकुचित मानसिकता, संकीर्ण सोच, राष्ट्र के प्रति उदासीनता, कर्तव्यों से विमुख, धर्म, जाति, समुदाय, गोत्र, अगरा - पिछरा आदि में खंड - खंड बिभाजित समाज हो, वहां सिर्फ अन्ना हजारे से यह उम्मीद करना कि समाज और देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का उन्मूलन करेगें शायद बेईमानी होगा. परन्तु, मै जंतर- मंतर पर अन्ना के आमरण अनशन के वक्त मौजूद था. मैंने अन्ना के आग में नौजवानों को आहुति की अंगराई लेते देखा है. मैंने उन नौजवानों में शान और सम्मान से जीवन जीने का ललक देखा है. मैंने जंतर- मंतर पर धर्म, जाति, समुदाय, गोत्र, अगरा - पिछरा जैसे संकीर्णता को तार तार होते देखा है. मैंने लोगो में बदलाव देखा है. शायद देर नहीं जब घर घर में एक चिंगारी जलेगी जिससे भ्रष्टाचार का होलिका दहन होगा. आज भी अन्ना के आंदोलन में वही धार है जो जंतर मंतर से उठी थी. निराश होने की जरूरत नहीं, क्योकि अन्ना के आन्दोलन का अंश हमारे, आपके और उनके घरों तक पहुँच चुका है. कहीं हमारा अंश हमें न टोक दे, जरुरत है समय रहते हम सबको अपने- आप में बदलव की.
हाय राम, ये आपने क्या लिख डाला. सारा ध्यान सिर्फ यूपी में? रामजी स्वयं को भारतीय मनाएं और सामिष्ट का ख्याल रखें.
एक एक्सपर्ट शिकारी नारी ने भाजपा के दिग्गजों को परास्त किया. आगे वो सरकार भी चला लेगी तथा हल्ला भी करवा लेगी. दिग्गज लोग बस राम राम जपने के काबिल हैं. राम लला के नाम पर खूब खा लिया माल. अब परे हटो.
अन्ना हज़ारे बेशक यूपी में आ जाएं, लेकिन भ्रष्टाचार का यहां सबसे ज़्यादा बोलबाला है.
त्रिपाठी जी , हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार को परिभाषित करना अत्यंत ही कठीन काम है. जहाँ संकुचित मानसिकता, संकीर्ण सोच, राष्ट्र के प्रति उदासीनता, कर्तव्यों से विमुख, धर्म, जाति, समुदाय, गोत्र, अगरा - पिछरा आदि में खंड - खंड बिभाजित समाज हो, वहां सिर्फ अन्ना हजारे से यह उम्मीद करना कि समाज और देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का उन्मूलन करेगें, शायद बेईमानी होगा. परन्तु, मै जंतर- मंतर पर अन्ना के आमरण अनशन के वक्त मौजूद था. मैंने अन्ना के आग में नौजवानों को आहुति की अंगराई लेते देखा है. मैंने उन नौजवानों में शान और सम्मान से जीवन जीने का ललक देखा है. मैंने जंतर- मंतर पर धर्म, जाति, समुदाय, गोत्र, अगरा - पिछरा जैसे संकीर्णता को तार तार होते देखा है. मैंने लोगो में बदलाव देखा है. शायद देर नहीं जब घर घर में एक चिंगारी जलेगी जिससे भ्रष्टाचार का होलिका दहन होगा. आज भी अन्ना के आंदोलन में वही धार है जो जंतर मंतर से उठी थी. निराश होने की जरूरत नहीं, क्योकि अन्ना के आन्दोलन का अंश हमारे, आपके और उनके घरों तक पहुँच चूका है. कहीं हमारा अंश हमें न टोक दे, जरुरत है समय रहते हम सबको अपने- आप में बदलव की.
मुझे एक बात समझ में नहीं आती. अगर कोई आदमी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए निकला है तो उसका विरोध क्यों कर रहे हैं ये नेता? विरोध कहां से हो इसलिए भी आपस में टिप्पणी करने में अपने आप को कम नहीं समझ रहे हैं. जैसे दलित का व्यक्ति होगा, तो भ्रष्टाचार कम होगा. यूपी में जाने का मतलब है मायावती का विरोध करना. महाराष्ट्र में ज़्यादा भ्रष्टाचार है फिर भी यूपी से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बोलना शायद एक राजनीति है. अगर संविधान बनाते समय ऐसे ही हर जाति, जनजाति या उप-जाति के लोगों को लिया होता, तो आज तक संविधान नहीं बनता.
रामदत्त जी, आपका लेख दित की व्याकुलता को 100 गुना तेज़ कर देता है. पाठकों की टिप्पणी व्याकुल दिल को चिन्न भिन्न कर देती है.
अब तो है आ रही चारों दिशाओं से एक ही पुकार,
भ्रष्टाचार सिर्फ़ भ्रष्टाचार और बस भ्रष्टाचार.
मुझे तो समन नहीं आया है कि जो काम किसी तरह से नहीं हो सके, घूस दे कर हो सकता है. एक नई आशआ जागी है मेरे मन में. पण्डित लोगों से विनती है कि जैसे लाखों या कोटी कोटी देवता बना कर पूरा कर रहे हो, वैसे एक मंदिर घूस देवता के भी बनाओ...आरती में काफी भीड़ होगी और चढ़ावा भी मोटा आएगा.
जो काम कहीं न हो, तो घूस देवता की शरण में जाओ, हो जाएगा,
एक बार इस्तेमाल कर के देखिए मान जाओगे, घूस देवता जी, घूस देवता.
जय हिंद
यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख पढ़ें अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन