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लेकिन हमें तो हीरो चाहिए

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 19 अप्रैल 2011, 02:09 IST

मेरा दिल टूट गया है. शायद बहुत से लोगों का टूट गया हो.

क्यों न टूटे जब राहुल गांधी कह दें कि वे हीरो नहीं बनना चाहते.

भारत का मीडिया ज़्यादातर उन्हें भारत के अगले प्रधानमंत्री के रुप में देखता है. कांग्रेस का इतिहास और वर्तमान राजनीतिक समीकरण बताते हैं कि इस राह में कोई बाधा भी नहीं है.

नेहरु-गांधी परिवार ने आज़ादी के बाद सबसे लंबे समय तक भारत की कमान संभाली है. उसी विरासत के स्वाभाविक उत्तराधिकारी कह रहे हैं कि भारत की व्यवस्था में बहुत कुछ सड़ गया है, जीर्ण-शीर्ण हो गया है और वे उसे ठीक करना चाहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्णा अय्यर ने उनसे पूछा था कि अन्ना हज़ारे का मामला इतना क्यों बढ़ा और वे क्यों ख़ामोश हैं? एक अच्छे राजनीतिक की तरह राहुल गांधी ने उन्हें चुप करवा दिया है और कहा है कि वे एक विचारशील भारतीय की तरह मनन कर रहे हैं और वे (जस्टिस अय्यर की तरह) पत्र लिखकर मुक्त नहीं हो सकते.

अभी-अभी भारतीय समाज को अपना नया हीरो मिला है. अन्ना हज़ारे के रूप में. बहुत से विवादों के बीच भी वह अन्ना हज़ारे से अभिभूत है.

भारतीय मिथक और इतिहास दोनों में प्रमाण मौजूद हैं कि भारत अनिवार्य रुप से एक व्यक्ति पूजक समाज है. वह रास्ते से पहले रास्ता दिखाने वाले की तलाश करता है. वह किसी प्रतीक पुरुष (और यदाकदा नारी भी) के साए में अपने को सुरक्षित महसूस करता है. वह अपने लिए एक हीरो चाहता है.

ऐसे में राहुल गांधी कह रहे हैं कि वे हीरो नहीं बनना चाहते. ख़ामोशी से काम करना चाहते हैं.

राहुल गांधी इससे पहले क्या करते रहे हैं? वे किसी दलित के घर खाना खाने गए तो ये सुनिश्चित कर लिया कि मीडिया इस ख़बर को प्रकाशित ज़रुर करे. उन्होंने सर पर दो धमेला मिट्टी ढोई तो पहले सुनिश्चित कर लिया गया कि टेलीविज़न वाले इसे देश को दिखा ज़रुर दें. यहाँ तक कि ट्रेन में सफर किया तो उनके मैनेजरों ने ये ख़बर मीडिया को पहुँचाने का पूरा इंतज़ाम किया. वे किसी खेल के आयोजन में पहुँचे तो आम दर्शकों के बीच बैठकर लोगों को यह दिखाने की कोशिश ज़रुर की कि वे आम लोगों के भी क़रीब हैं. विपक्षी दलों को लगा कि यह सब हीरो बनने की कोशिश है.

लेकिन अब उन्होंने साफ़ कर दिया है कि वे हीरो नहीं बनना चाहते. लोगों को जवाब मिल गया होगा कि राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले पर, 2जी स्पेक्ट्रम के घोटाले पर, सीवीसी की नियुक्ति पर और अन्ना हज़ारे के अनशन पर वे चुप क्यों रहते हैं.

अब लोगों को शक करना चाहिए कि अन्ना हज़ारे और उनके साथ जुड़े नागरिक समाज के लोग क्या सचमुच इस देश से भ्रष्टाचार को ख़त्म करना चाहते हैं या फिर उनकी मंशा हीरो बनने की है.

शायद वो कहावत ठीक हो कि जो गरजते हैं वो बरसते नहीं. इसलिए राहुल गांधी गरजते नहीं. शायद किसी दिन एक साथ बरसें, घनघोर घटा के साथ बरसें. सीधे प्रधानमंत्री बनकर इस देश का उद्धार करें.

राहत की बात सिर्फ़ इतनी है कि राहुल गांधी ने ये नहीं कहा है कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते. मनमोहन सिंह इस बात का गवाह हैं कि अब भारत का प्रधानमंत्री ज़रुरी नहीं कि देश का हीरो भी हो.

तो देशवासियो अगर आपको सड़ी गली या बदबूदार या जीर्ण शीर्ण व्यवस्था को ठीक करने के लिए किसी हीरो की तलाश है तो माफ़ कीजिए राहुल गांधी उपलब्ध नहीं हैं. कोई और दरवाज़ा देखिए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 07:54 IST, 19 अप्रैल 2011 naval joshi, Haldwani,Uttrakhand:

    सवाल यह नहीं है कि कौन इस देश का प्रधानमंत्री बनना चाहता है और कौन नहीं, लेकिन वह मानसिकता ख़तरनाक है जो लोगों पर हुकूमत करना चाहती है. इस देश ने देवगौड़ा, गुजराल और चन्द्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाया जिनके पास लगभग 60 सदस्यों का ही समर्थन था, लेकिन इससे किसी को कोई एतराज़ नहीं था. जब कोई इरादतन इस देश का प्रधानमंत्री बनकर राज करना चाहेगा तो इसे देश के नेता का कृत्य नहीं कहा जा सकता है. हो सकता है कि कल को अन्ना भी हीरो बने न रह सकें, अब तक वे इसलिए हीरो हैं कि उन्होने कुछ बनना नहीं चाहा है. यदि वे भी इस स्थिति का आनन्द लेने लगें और अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए जोड़-तोड़ करने लगें, तो वे भी हीरो नहीं रहेगें. हमारे लिए हीरो या प्रधानमंत्री का मतलब है, जिसकी योग्यता पर सब भरोसा करते हों लेकिन वह अपनी योग्यता से अपरिचित हो!


  • 2. 08:35 IST, 19 अप्रैल 2011 vikas kushwaha kanpur:

    बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है आपने विनोद जी.

  • 3. 08:35 IST, 19 अप्रैल 2011 amit:

    बहुत ही विचारोत्तेजक लेख है. साधुवाद.

  • 4. 10:19 IST, 19 अप्रैल 2011 rajesh kumar:

    सही बात है! परनाना, दादी, पापा सबने हीरो बनके व्यवस्था खराब कर दी और राहुल को पता भी नहीं चला. राहुल साहब को ये तो पता चल गया की सब सड़ा हुआ है. बाकी जनता जानती है किसने सड़ाया है. राहुल को सड़ने से समस्या नहीं है. अन्ना जी के अड़ने से है. इस सड़न को अन्ना साहब का या यूँ कहें जनता का अड़ना ही बचाएगा. राहुल जी को सब चुपचाप करने की आदत है. जैसे दलित के यहाँ जाना, इत्यादि इत्यादि. मेरा प्रश्न है कि राहुल गांधी एक सांसद होने के अलावा ऐसा क्या कर रहे हैं कि व्यवस्था ठीक हो. क्या वो ऐसा चुपके चुपके कर रहे हैं उस सिस्टम को ठीक करने के लिए जिसे प्रधानमंत्री तक सुधार नहीं पा रहे हैं. क्या उन्हें अपने प्रधानमंत्री पर भरोसा नहीं रह गया है.

  • 5. 10:28 IST, 19 अप्रैल 2011 lalit shakya Auriya UP:

    राहुल गांधी न तो हीरो और न ही प्रधानमंत्री के लिए उपयुक्त है. राहुल कांग्रेस में नेहरू परिवार की निरंकुशता जारी रख सकते हैं.यह देश मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी से उम्मीद कर रहा हैं राहुल गांधी से नहीं

  • 6. 11:13 IST, 19 अप्रैल 2011 Gurpreet:

    सिर्फ कांग्रेस ही उन्हें हीरो या प्रधानमंत्री की तरह देखती है. आम लोगों की अन्ना के बारे में कोई हो राय नहीं. उन्होंने गांधी का अनुसरण किया और हमारे हीरो बन गए. राहुल को जो करना है वो करते रहें. उन्हें या मीडिया को यह बताने की ज़रूरत नहीं कि कौन हीरो है कौन नहीं.

  • 7. 11:32 IST, 19 अप्रैल 2011 Balwan Fauji, Rohtak:

    विनोद वर्मा जी अच्छा विषय चुना आपने. सर्वप्रथम तो मैं बता दूं कि जो वास्तव में हीरो होता है उसे तख्ती दिखा कर नहीं बताना पड़ता कि वो हीरो है. कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों से हीरो बनता है. मीडिया में प्रमुखता पाने से न तो राहुल और न अन्ना हज़ारे हीरो बने. अन्ना हज़ारे जिस उद्देश्य से अनशन पर बैठे थे उसके कारण ही वे थोड़ा हीरो जैसे बने हैं. परन्तु राहुल तो पहले मीडिया में अपनी मौजूदगी सुनिश्चित करते हैं फिर वे किसी दलित के घर खाना खाते हैं, मिट्टी ढोते हैं. क्या राहुल को कोई ये बताने वाला नहीं है कि वे इस प्रकार हीरो नहीं बन सकते? और अगर वे हीरो नहीं बनना चाहते तो ये सब करने से राहुल क्या करना चाहते हैं, इसके पीछे उनके क्या उद्देश्य हैं. कोई राहुल से यह भी नहीं पूछता कि क्या उन्हें केवल उत्तर प्रदेश में ही दलित दिखाई देता है? जब मीडिया लिखता है कि राहुल ने टूटी हुई चारपाई पर बैठकर खाना खाया, कोई ये क्यों नहीं विचार करता कि 63 वर्षो कि आज़ादी के पश्चात भी भारतीय राष्ट्र में ये टूटी हुई चारपाई अभी तक क्यों बची हुई है, जबकि राहुल गाँधी के ही परिवार ने सबसे ज़्यादा इस राष्ट्र पर शासन किया. राहुल को तो लज्जा आनी चाहिए की उनके परिवार ने (या यूं कहें की कांग्रेस ने) इस राष्ट्र की ऐसी स्थिति बना रखी है. विनोद जी, इसमें राहुल या कांग्रेस का दोष नहीं है, दोष तो आम नागरिक का है, मीडिया का है जो राहुल को बिना किसी कारण के हीरो मान बैठी है. राहुल कह भी रहे हैं कि वो हीरो नहीं हैं (लेकिन वो प्रधानमंत्री अवश्य बनना चाहते हैं ) फिर भी सभी उनसे कहते हैं कि हीरो हो तुम और तुम्हीं इस राष्ट्र के भावी प्रधानमंत्री हो. तभी तो हम मनमोहन जैसे व्यक्ति को राष्ट्र का सर्वोच्च पद दे बैठते हैं. फिर वही सर्वोच्च न्यायालय को कह देता है कि हमें न समझाओ कि राष्ट्र के अनाज को सड़ाने से बेहतर गरीबों में बांटना है. अक्सर किसी बड़े सवाल का ज़वाब यही देते हैं कि सोनिया जी वार्तालाप करके बताऊंगा. इतने बड़े राष्ट्र में एक अकेले हीरो से काम नहीं बनने वाला, क्योंकि पूरा का पूरा तंत्र ही सड़ चुका है. यहाँ तो एक ऐसी राजनीतिक पार्टी की आवश्यकता है जिसमें हीरो ही हीरो हों. हमें अपनी एक आदर्श पार्टी निर्धारित करनी होगी, और जो उसमें राष्ट्र हित में नहीं सोचता उसे पूर्ण रूप से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए. इस प्रकार का सफाई अभियान चलाने से लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों का वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा. जो पार्टी इस राष्ट्र के हित में नहीं उसका वजूद मिट जाना चाहिए. रहेंगी तो सिर्फ और सिर्फ वो पार्टियां जो खरा सोना हैं.

  • 8. 11:59 IST, 19 अप्रैल 2011 Alok Jha:

    उम्दा लेख. एक निकम्मे आदमी के बारे में अच्छा लेख. भ्रष्टाचार नेहरु गांधी परिवार की ही देन है और राहुल हमेशा कहते हैं कि मैं गांधी परिवार के विचारों पर ही चलता हूं. वो न कोई ज़िम्मेदारी लेना चाहते हैं न ही कुछ करना चाहते हैं. फिर भी एक दिन हम किताबों में पढ़ेंगे कि राहुल हमारे प्रधानमंत्री हैं.

  • 9. 13:13 IST, 19 अप्रैल 2011 Ram Maurya:

    राहुल और अन्ना को हीरो बनाने के इरादे अलग हैं. एक को वोट चाहिए, दूसरे को देश. तो जिसको वोट चाहिए उसको बहुत कुछ करना पड़ता है. अन्ना की तरह देश के बारे में सोचने वालों को कौन याद रखता है.


  • 10. 14:00 IST, 19 अप्रैल 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी, आज तक जितने भी बीबीसी पर लेख पढ़े, उनको पसंद किया. लेकिन इस लेख में आपने ये कहा कि राहुल गांधी ही देश का उद्धार कर सकते हैं....ये देखकर ऐसा लगता है कि आपका झुकाव कांग्रेस की तरफ चला गया है. मेरा मानना है कि मौजूदा समय में देश में कोई भी नेता नहीं है जो देश का उद्धार कर सकता है. आप ऐसी पैरवी इन नेताओं की न करें, यहां सब चोर और चोर के मौसेरे भाई हैं.

  • 11. 14:13 IST, 19 अप्रैल 2011 MUSLIM BHAGAWAT:

    हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान और दूसरे घोटालों के दौरान वे क्या कर रहे थे. क्या वे अंधे, बहरे और गूंगे हैं? उन्हें सिर्फ इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहिए क्योंकि वे राजीव गांधी के बेटे हैं. उन्हें लोक सभा में चुना जाना चाहिए और बहुमत मिलने पर ही उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए.

  • 12. 14:31 IST, 19 अप्रैल 2011 BHEEM SINGH:

    विनोद जी, शायद मैं एक सपना देख रहा था, या शायद अब सपना देख रहा हूं. कुछ 1-2 दशक पहले एक पत्रकार-संपादक था जो अपनी कलम का फोकस सिर्फ प्रधानमंत्री को या गांधी परिवार को बना रखा था, जैसे कि कीचड़ उछालना ही उसका पवित्र धर्म हो. कीचड़ को साफ करने के बहाने वो कीचड़ फैलाता रहा. बाद में कीचड़ ने अपना गुल खिलाया. सत्ता पलटी और पत्रकार जी मंत्री हो गए. विनिवेष के बहाने घुमा फिरा के अच्छी माल मलाई मारी....और बस...
    विनोद भाई आपके लेख का फोकस कुछ इतिहास का दोहराने जैसा लगता है. ये मेरा भ्रम भी हो सकता है. पूरा विश्व एक सपने में जी रहा है. संक्षेप में, मुद्दे का कीचड़ उछालते रहो और मग्न रहो. दुनिया को लूटो चक्कर से, रोटी खाओ शक्कर से!

  • 13. 15:39 IST, 19 अप्रैल 2011 gunjan,gorakhpur:

    विनोद जी आपने सही कहा. भारतीयों को रास्ता मिलने के बावजूद हीरो चाहिए जैसे कहावत है कि एक अगुआ बिना नौ सौ जोलहा डूब के मर गए लेकिन अन्ना हजारे,अटल बिहारी ,जय प्रकश नारायण ,ने ये सिद्ध किया है की ये भारत नेहरु परिवार के बिना भी रास्ते पर दौड सकता है. लेकिन हमारा मीडिया राहुल गाँधी के बिना नहीं दौड सकती या यूं कहिये कि कांग्रेस इस परिवार के बिना नहीं दौड सकती. मीडिया को क्या जरूरी है उनसे जुड़ी हर खबर को दिखने की? जो महत्वपूर्ण नहीं होती बिहार का नतीजा तो देखा वहां क्या हश्र हुआ, इन राहुल जी का वैसा ही हश्र यूपी में भी होने वाला है. हमारे देश में इनसे भी अच्छा अगुआ नव्यु़क है लेकिन उसका खानदान बड़ा नहीं है और वो रोजी रोटी के चक्कर में और कुछ सोच ही नहीं पाता. राहुल गाँधी का बायोडाटा मैंने संसद की वेबसाइट पर देखा उसमे उनोहने अपने व्यवसाय में किसान डलवा रखा है. जिस शख़्स को ये नहीं पता होगा की आलू कब बोया जाता हैं, वो ख़ुद को किसान लिखता है! देश के साथ धोखा है ये.

  • 14. 16:09 IST, 19 अप्रैल 2011 Satya:

    विनोद जी, तो क्या राहुल जी पूरे देश बर्बाद होने तक मनन ही करते रहेंगें या कुछ करेंगें भी. अच्छा बहाना है अपनी सरकार की कमियों को छिपाने का.

  • 15. 16:47 IST, 19 अप्रैल 2011 farhat farooqi:

    बहुत अच्छा है. अरे जिस देश में लोग करोड़ो रुपय लेकर तथाकथित मनोरंजन करने वालों के मंदर मना कर पूजते हैं, वहां राहुल को हीरो बना कर पेश किया जाना कोई बड़ी बात नहीं है. राहुत का दोष सिर्फ इतना है कि वो नेहरु गांधी परिवार के वारिस हैं और उनका छोटे से छोटा कार्य भी लोगों को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने में मज़ा आता है. बल्कि यूं कहें कि चातुकारों को उसमें भी अपना स्वार्थ दिखता है. लोग तो धर्म कर्म और दान पुन्य का काम भी मीडिया बुला कर करते हैं. कि फलाने ने इस मंदिर में इतना दान दिया, इतने भिखारियों को खाना खिलाया. जबकि ऐसे काम तो जितना छिपा कर करो उतना ही ईश्वर को पसंद आता है. किंतु क्या करें? वही जनता के बीच हीरो बन जाने की चाह...

  • 16. 19:14 IST, 19 अप्रैल 2011 Raghvendra Singh:

    राहुल गांधी का ये कहना कि वो हीरो नहीं बनना चाहते हैं काबिले गौर है. इस विष्य पर विनोद जी की टिप्पणी एक दम सही है. उन्होंने कम शब्दों में कुछ सब कुछ कह दिया है.

  • 17. 21:10 IST, 19 अप्रैल 2011 sujaskeenus:

    विनोदजी आपके विचार काफी अच्छे हैं और यह भी सही है की जब सारा देश 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले या राष्ट्रमंडल मंडल खेल घोटाले की बात कर रहा था तो राहुल गाँधी की चुप्पी तब भी थी और आज जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूरा देश अन्ना हजारे के साथ है तो उनकी ख़ामोशी अभी भी है . हमें यह क्यों नहीं समझ में आता है की क्या सभी मुद्दों पर राहुल गाँधी की राय जरुरी है ? राहुलजी को अब तक जिन मुद्दों पर भी लोकप्रियता मिली उसमे समस्याओं की और मीडिया की कितनी भूमिका रही है वह किसी से छुपी हुई नहीं है.अब शायद वह समय आ गया है की हमें अपने हीरो की तलाश के लिए और विकल्पों पर विचार करनी चाहिए . जब राहुल बिहार के युवाओं को प्रभावित नहीं कर सके तो देश के अन्य लोगों की उम्मीद पर वह कितने खड़े उतर पाएंगे. .

  • 18. 21:45 IST, 19 अप्रैल 2011 Saptarshi:

    अंगूर खट्टे हैं.

  • 19. 22:09 IST, 19 अप्रैल 2011 vinay shankar:

    इन्सान कभी भी हीरो नहीं बन सकता है. हालत इन्सान को हीरो बनाते है. भारत को हीरो की ज़रुरत नहीं है भारत को नेता की जरुरत है. अन्ना जी को हालात ने हीरो बाना दिया.

  • 20. 22:25 IST, 19 अप्रैल 2011 Maharaj Baniya:

    शायद कठपुतली जैसा प्रधानमंत्री ढूंढना कांग्रेस पार्टी की पहली कोशिश रहती है, जिसकी डोर कुछ चुनिंदा लोगों के हाथ में हो. इसी लकीर पर राहुल गांधी भी चल रहे हैं. पर हमें उन चंद हाथों को ढूंढना चाहिए जो कठपुतली जैसा प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं.

  • 21. 23:03 IST, 19 अप्रैल 2011 ankit:

    मुझे नहीं लगता की लोगों का महात्मा गाँधी या अन्ना हज़ारे को किसी सुरक्षा की वज़ह से समर्थन मिला.उनका उद्देश्य,लक्ष्य और तरीका सही था.ये बात नहेरु-गाँधी परिवार के लिए नहीं कही जा सकती पर उसके लिए उस वक़्त की वैश्विक राजनीति पर नज़र दौड़ानी होगी. उस वक़्त की भारत सरकार ज़्यादातर सोवियत राष्ट्र के प्रति झुकाव रखती थी.जंहा सर्वोच्च नेता किसी महानायक से कम नहीं होता था लेकिन आज का गाँधी परिवार अपने शक्तिशाली पड़ोसी और कथित साम्यवादी देश का अनुसरण करता दिखाई पड़ता है.

  • 22. 23:21 IST, 19 अप्रैल 2011 Sandesh Jain:

    विनोद भाई, देश का हर आदमी प्रधानमंत्री तो बन नहीं सकता. लेकिन किसी एक को तो बनना ही है. तो फिर मैं क्यों नहीं. एक और प्रतिद्वंदी कम हुआ. मुझे भी कोशिश करने दीजिए.


  • 23. 02:20 IST, 20 अप्रैल 2011 VIPUL SETH, UKRAINE:

    अरे भाई आप का दिल टूटा है तो इसका मतलब ये तो नहीं है कि क्या सारा भारत टूट गया? कृपया अपने दिल को, अपनी भावनाओं को अपने तक ही रखें. आप पत्रकार हैं इसका मतलब ये नहीं कि आप समाचार पत्रों को अपने मन की भावनाओं, अपने घर की कला आदि के लिए उपयोग करें. राहुल गांधी एक बहुत ही कम अनुभवी इनसान हैं. उन्हें नेता नहीं कहा जा सकता. क्या आप भारत को बिलकुल ही बर्बाद होते देखना चाहतें हैं जो राहुल को प्रधानमंत्री बनाने जैसी बातें लिखते हैं? अभी तक की बर्बादी से भी आप जैसे लोगों का पेट नहीं भरा? राहुल जी की चुप्पी से कहना चाहूंगा कि जिसे कुछ करना आता है, कुछ बोलना आता है, वो करता बोलता है. जिसे कुछ करना ही नहीं आता, वो चुप ही रहे तो बेहतर है. उन्हें सिर्फ मीडिया में, टेलिविज़न में दलित के साथ फोटो खिंचवाना आता है. और आप अन्ना हज़ारे जैसे निस्सवार्थ व्यक्ति पर शक़ करने को कह रहे हैं.

  • 24. 02:34 IST, 20 अप्रैल 2011 VIPUL SETH:

    मैं ये बात पूरे दावें से कह सकता हूं कि ये लेख विनोदजी द्धारा लिखे होने की बजाय किसी कांग्रेस नेता या ख़ुद राहुल गांधी का लिखा हुआ है.

  • 25. 12:20 IST, 20 अप्रैल 2011 PRAVEEN SINGH:


    मैं ये मानता हूँ कि जो चालू नेता होता है वही हीरो कहलाता है.अमिताभ बच्चन ने कुछ किया या नहीं लेकिन वह हीरो बन गए है.नेता लोग भी पत्रकार की कलम से ही अपनी चाल चलते है.इन चालू नेताओं को हीरों बनाने वाली मीडिया ही है.

  • 26. 12:21 IST, 20 अप्रैल 2011 anand:

    विनोदजी आपने राहुल गांधी का नाम लेकर कुछ लोगों को ज़हर उगलने का मौका दे दिया है.वैसे आपका शायद ये मक़सद नहीं है.अन्ना हज़ारे का आंदोलन व्यवस्था के ख़िलाफ़ है.ये किसी व्यक्ति या पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं है.

  • 27. 12:48 IST, 20 अप्रैल 2011 ZIA JAFRI:

    विनोदजी आपकी बात में बहुत दम है कि हमें एक हीरो चाहिए और हमारा समाज व्यक्तिपूजक समाज है.आज भी एक महात्मा गांधी और शहीद भगत सिंह की तलाश है.सब को पता है कि प्रधानमंत्री पद राहुल गांधी से कितना दूर है.और इसको त्याग ही कहा जा सकता है कि उनके हाथ में सत्ता हाथ में होने के बावजूद वह उससे दूरी बनाए हुए है.राजीव गांधी जब विदेशी प्रसाधनों का इस्तेमाल करते थे तब भी मीडिया और विपक्ष को उससे आपत्ति होती थी.तब किसने सुनिश्चित किया था कि मीडिया मौजुद रहे और आज जब वह दलित के घर खाना खाते है या फिर मिट्टी ढोते है या आम जनता के बीच मैच देखते है तो भी लोगों को दिक्कतें होने लगती है.लेकिन मज़े की बात ये है कि जो लोग ये सवाल उठाते है उनमें से कम ही लोग वोट डालते हैं.

  • 28. 14:38 IST, 20 अप्रैल 2011 ghanshyam swarnkar:

    राहुल जी से देश हीरो बनने की अपेक्षा रख रहा था किन्तु जब राहुल जनता की आवाज़ नहीं सुन सके तो अन्ना हज़ारे और उनके साथियों को आगे आना पड़ा. अब राहुल जी और प्रतीक्षारत प्रधानमंत्रियों को मिर्ची क्यों लग रही है. जनता की पीड़ा समझ न सके देश की जनता का नेतृत्व क्या करेंगे.

  • 29. 15:08 IST, 20 अप्रैल 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    विनोद जी मुझे नहीं लगता कि कोई मसीहा या हीरो भारत का उद्धार कर सकता है क्योंकि बेईमानी हम भारतीयों के खून में पैठ गई है. राहुल या कोई और अगर कुछ कर सकता है तो अवश्य करना चाहिए. राहुल जिस तरह की पलायनवादी बातें कर रहे हैं वह देश के लोगों की आंखें खोलनेवाली हैं जो कि गाँधी परिवार से अनगिनत उम्मीदें पाले बैठे हैं. हमें सुधार की शुरुआत अपने-आप से करनी होगी तभी स्थितियां बदलेंगी, नहीं तो हम अवश्यंभावी महाविनाश की ओर तो बढ़ ही रहे हैं.

  • 30. 15:46 IST, 20 अप्रैल 2011 kavindra kumar:

    अपराध को चुपचाप होते देखते रहना भी अपराध होता है और अगर आप मौन होकर उस तंत्र का हिस्सा बने रहें जो उस अपराध के लिए ज़िम्मेदार है तो आप कतई क्षमा के अधिकारी नहीं हो सकते हैं. दबावों का सामना हर ज़िम्मेदार व्यक्ति को करना पड़ता है लेकिन अगर किसी प्रधानमन्त्री को इस हद तक समझौते करने पड़ें जिससे राष्ट्र की मर्यादा को हानि होने लगे तो यह कोई अच्छी बात नहीं है. निश्चय ही विनोद जी आपका अहिंसात्मक तरीके से किया गया यह प्रहार प्रशंसनीय है...

  • 31. 16:46 IST, 20 अप्रैल 2011 VIJAY RAJAK:

    मेरी दुआएं आपके साथ हैं विनोद भाई
    लगे रहिए विनोद भाई
    आप जैसे कूटनीतिक मीडिया के लोग की लेखनी में बहुत पावर है
    मुझे यक़ीन है मीडिया के सहयोग से राहुलजी नेता, अभिनेता,
    हीरो-वीरो सब बन जाएंगे.
    अभी तक आपकी दुआ से सब ठीक-ठाक ही चल रहा है.
    भाई मनी है तो हनी है.


  • 32. 00:20 IST, 21 अप्रैल 2011 Shashi Bhushan Singh, Rawal Tola, Sitab Diara, Saran, Bihar:

    विनोद जी, मैं आपकी इस बात से कदापि सहमत नहीं कि "भारत अनिवार्य रूप से एक व्यक्तिपूजक समाज है". इतिहास गवाह है कि यहां अनेक धर्म और संप्रदाय के महापुरुष हुए और लाखों-लाख उनके समर्थक . विश्व में सिर्फ हिंदुस्तान ही ऐसा देश है जहां अनेकता में एकता है. हमारा ऐसा अटूट विश्वास कि पत्थर को देव और नदियों को तारणहार मानते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि यहां का अवाम समझविहीन है. रहा सवाल नेतृत्वकर्ता का तो अपनी समझ, क्षमता और संस्कार के मुताबिक लोगों ने इस देश को अपना योगदान दिया और उसके मुताबिक गुणगान पाया. जहां तक राहुल गांधी कि बात है, निश्चित रूप से वे ऊर्जावान, धीरजवान, साहसी, शिक्षित, उत्साहित युवा हैं, परन्तु वर्तमान भारतीय राजनीति में सम्पूर्ण नहीं हैं. उनके मन में गरीबों के लिए दर्द तो है लेकिन समाधान नहीं, बेरोज़गारों के लिए सुझाव तो है लेकिन संसाधन नहीं, भ्रष्टाचार का उन्मूलन तो चाहते हैं लेकिन मजबूरी है. ये तमाम मुश्किलें राहुल गांधी के लिए आज हैं और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी रहेंगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. अन्ना हज़ारे अंतिम गांधीवादी नहीं हो सकते. महात्मा गांधी, लोकनायक जयप्रकाश और अन्ना हज़ारे ने यह साबित कर दिखाया है कि हीरो बनने के लिए किसी पद कि आवश्यकता नहीं. मौक़ा है हमारे लिए, आप के लिए, राहुल गांधी के लिए 73 वर्षीय बुज़ुर्ग की चुनौती स्वीकार करने और असली हीरो बनने का.

  • 33. 08:31 IST, 21 अप्रैल 2011 ACHINTYA KUMAR (KORBA):

    राहुल गांधी में एक क्लर्क बनने की भी योग्यता नहीं है. दुर्भाग्य है इस देश का कि हम जैसे लोगों को उन जैसे लोगों पर बात करनी पड़ती है.

  • 34. 09:02 IST, 21 अप्रैल 2011 Dr.Lal Ratnakar-Ghaziabad/Jaunpur:

    विनोद जी, आपकी चिंता भी उसी 'व्यक्ति पूजक' परंपरा को हवा दे रही है. ब्लॉग के ज़रिये आपने वह सब कुछ कहा है जो राहुल की बिसात है. सामंतवादी सोच और नाटकीय समाजवाद तो इस देश के भाग्य में लिखा है. इस देश का भाग्य विधाता बाकायदा चयनित किया जाता है. मीडिया में, सार्वजनिक सेवाओं में, राजनीति में और धार्मिक संस्थानों में. वहीं से 'हीरो' और 'ज़ीरो' बनाने की साजिशें होती हैं. किसी दिन यही चुपचाप बनाकर परोस दिए जाएंगे और तब नव व्यक्ति,शक्ति और सत्ता की कमान संभाले किसी नाट्य शास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप प्रधानमंत्री भी बन जाएँगे और वही होगा जिसके लिए वे तैयार किए जा रहे हैं . पर तब भी ये हीरो नहीं होंगे रहेंगे ज़ीरो ही. क्योंकि ये नेता नहीं ट्रेनी नेता हैं और जितनी ट्रेनिंग दी जाएगी उतना ही करेंगे. अब सवाल है कि ट्रेनिंग कैसी दी जा रही है.

  • 35. 13:56 IST, 21 अप्रैल 2011 BHEEMAL LEADER:

    मछलियों को क्या पता होता है कि कौन जाल फैलाता है, कौन चारा डालता है, कौन मछली मारने की योजना बनाता है और आख़िर में उसका क्या होने वाला है. जाल में फँसना उसकी नियति है. एक बार मछली जाल में फँसी और मछुवारों और उनके परिजनों के भोजन-सब्ज़ी का इंतज़ाम पूरा. इस मछली मारने के खेल में भारत एक महासागर. भारतीय लोग मछलियाँ. राजकुमार और राजा रानी के पास कूटनीतिक जाल और सांसद होते हैं मछलीमार के रोल में. मुझे इस खेल का कुछ-कुछ पता है. मैं ईश्वर की शपथ लेकर कहता हूँ कि एक बार मेरे पास पैसा आ जाए तो फिर मैं मीडिया कम्युनिटी को हलवा पूरी खिलवाता रहूँगा और राज करता रहूंगा. मेरे लिए दुआ कीजिए.

  • 36. 14:18 IST, 21 अप्रैल 2011 Md Zaki Iqbal:

    विनोद वर्मा जी आपको मालूम होना चाहिए कि भारत एक लोकतंत्र देश है और जनता ने अपना समर्थन दिया तभी नेहरु-गांधी परिवार ने आज़ादी के बाद सबसे लंबे समय तक भारत की कमान संभाली. उसने ज़बरदस्ती, निरंकुश तरीक़े से फूट डाल कर तो ऐसा नहीं किया. भारतीयों ने उन्हें चाहा तो उन्होंने भी अपना भरपूर योगदान दिया, और भारत को एक ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां आज हम लोग हिन्दुस्तानी होने पर फख्र महसूस करते हैं. वैसे भारत एकता में अनेकता का देश रहा है, और इस महान देश में जहां विभिन्न मतावलंबियों के लोग रहते हैं, ऐसे में सभी मतों के लोगों के ख्याल मेल खाएं ज़रूरी नहीं है. देश की प्रगति एवं विकास के लिए नेहरू-गांधी परिवार ने जितनी कुर्बानियां दी हैं, शायद ही किसी ने अब तक दी होगी. जिसको हम और आप भली-भांति जानते हैं. नेहरू-गांधी परिवार को इसलिए टार्गेट किया जाता है और जाता रहेगा क्योंकि दबे-कुचले लोगों को आगे बढ़ने और अपने जीवन में कुछ करने की जो ललक, चाहे प्रत्यक्ष रूप में या अप्रत्यक्ष रूप में ही क्यों ना हो, तो दी ही है, जिसे कारण आज यह वर्ग भी कदम से कदम मिलाकर भारत की प्रगति में अपना योगदान दे रहा है. जिसका परिणाम आप देख रहे हैं कि देशवासियों के इन लगन व मेहनत की बदौलत भारत एक उभरते हुए ताकत के रूप में चाहे वह सैन्य शक्ति हो या आर्थिक शक्ति हो, शिक्षा क्षेत्र हो या कोई अन्य क्षेत्र हो, विश्व मंच पर अपना दावा पेश करने में सफलता प्राप्त कर चुका है. विश्व में अब भारत की स्थिति स्पष्ट है, इस स्थिति में भारतीय नेतृत्व से ज़रूरी नहीं कि हर सवाल का जवाब आप इतनी आसानी से पा लेंगे और सब कुछ, एक दिन में बदल जाएगा. भारत में कुछ ताकतें ऐसी भी हैं जो कि देशवासियों को भ्रमित करने में आगे रहता है, अगर अपनी बात कहनी है तो भारतीय संविधान के तहत करनी चाहिए ना की असंविधानिक तरीक़े से. आजकल भारतीय राजनीति भी इसी ओर अग्रसर है. हमारा मानना है कि राहुल गांधी को अभी हीरो नहीं बनना चाहिए, बल्कि ख़ामोशी से काम करते रहना चाहिए, और कर भी रहे हैं. इसीका परिणाम है कि लोकपाल विधेयक पर और उसके बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आगे बढ़े और अन्ना हज़ारे को अपना समर्थन दिया. हमें उम्मीद है कि आगे भी खामोशी से अपना काम करते रहेंगे. यह एक परिपक्व सोच को ज़ाहिर करता है. अभी भारत पूरी तरह से लोकतांत्रिक देश नहीं बन सका है. बहुतरे लोग गांधी जी को अब भी अपमानित करने से नहीं हिचकते, और बेलगाम उन पर फब्तियां कसते और मज़ाक उड़ाते हैं. जब इस महान सपूत को भारत में आदर नहीं किया जा सकता तो यह भी संभव नहीं है कि नेहरू-परिवार को सभी भारतीय आदर भाव और सम्मान से देखे. बहुत से लोगों का अब भी सोच यह है कि भारतिय समाज वही पुरानी विचारधारा पर चल रही है, जहां शूद्र को हीन भावना से देखा जाता है, अब भी इन भारतीयों की आवाज़ को ऊपर उठाने से रोकने की कोशिश जारी है. पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह से किसी पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया. अमरीकी प्रसिडेंट बराक ओबामा भी तो अफ़्रीकी मूल के थे, लेकिन वहां इस तरह का विरोध नहीं हुआ, लोगों ने इसे अपना समर्थन दिया, और वह अमेरीका के राष्ट्रपति बने, लेकिन हमारे यहां यह मानसिकता अभी नहीं है, इसके लिए हम एक दूसरे पर अश्लील भाषा का प्रयोग करने से नहीं हिचकते. रहा राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का प्रश्न, अगर जनता उन्हें अपना समर्थन देगी तो ज़रूर बनेंगे. लेकिन हमें नहीं लगता कि वह प्रधानमंत्री की कुर्सी की चाह रखते हैं. हमें दोनों मां-बेटे को अपना समर्थन अच्छे कार्यों के लिए अवश्य देनी चाहिए. जिसने भारतीय इतिहास को उस मुकाम पर पहुंचा दिया जिसको हम भारतीय भली-भांति जानते व समझते हैं. नेहरु-गांधी परिवार का इतिहास भारतीय इतिहास में हमेशा स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा, जिसने देश के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी. भारत एक लोकतांत्रिक देश है, कोई भी नेता या पार्टी बगैर आम जनता के समर्थन के वोट आसानी से प्राप्त नहीं कर सकता. अगर कांग्रेस पार्टी को जनता चुनती है तो इसमें उसका क़सूर क्या है, अगर ग़लत हैं तो उसे लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता से बेदखल कर दें जैसा कि कई राज्य में कांग्रेस सत्ता में नहीं है.

  • 37. 15:39 IST, 21 अप्रैल 2011 Tahir khan:

    आपका लेख बहुत अच्छा है. धन्यवाद.

  • 38. 21:09 IST, 21 अप्रैल 2011 राजकुमार:

    राहुल भइया ने कहा और आपने मान लिया, हम (पढ़ें -कांग्रेसी) गांधी टोपी उनके चरणों में रख कर जब बताएंगे कि उनका 'अवतार' ही हीरो बनने के लिए हुआ है तो मान लेंगे, वैसे भी राजनीति का पहला सबक है जो कहो, करो उसके उलट. फिर भी तंज़ और उससे भी ज़्यादा हालते हाजरा बयान करने वाले लेख के लिए बधाई.

  • 39. 21:51 IST, 21 अप्रैल 2011 himmat singh bhati:

    विनोद जी, अब न तो हमें कोई नेता चाहिए और न हमें किसी हीरो की ज़रुरत है. अब हम जनता को जनता की बात खरी-खरी ढंग से उठाने वाला चाहिए. ऐसा व्यक्ति चाहिए जो जनता को भेड़ बकरी न समझे, जैसा कि हमारे नेता समझते रहे हैं. अब किसी के कहने से किसी को हीरो मानने वाली जनता नहीं रही. अब वह अपना हीरो ख़ुद चुनेगी. जो जनता का ख़याल रखेगा और जनहित में काम करेगा वही हीरो बनेगा. बहुत सह लिया जनता ने. अब अगर नेता नहीं सुधरे तो सत्याग्रह तय है.

  • 40. 13:25 IST, 22 अप्रैल 2011 praveen pinno-mumbai:

    भारत के रण क्षेत्र में शिकारियों की भीड़,
    पत्रकार चंदन घीसें, तिलक देते गांधीवीर
    ये प्रश्न अच्छा है राहुल जी को नकारात्मक किंतु भारी प्रचार मिलेगा.काफ़ी चिंतन मनन और गहन विचार के बाद कुछ लिख गया है.यदि कोई सर्वक्षण करे को स्पष्ट हो जाएगा कि 80 प्रतिशत वोट विजेता के ख़िलाफ़ भी डाले जाएं फिर भी धन-बल, छल-बल, बाहु-बल के आधार पर चालू लोग चुनाव जीत सकते हैं और किसी भी कुर्सी पर बैठ सकते हैं. मधु कौड़ा,चंद्रशेख़र,देव गौड़ा ,चरण सिंह इसके उदाहरण हैं.यह एक शतरंज का खेल है. कौन किसको मात देगा ये चाल के ऊपर है.


  • 41. 18:11 IST, 22 अप्रैल 2011 Balwan Fauji, Rohtak:

    विनोद जी, मैं आपके हीरो राहुल और हज़ारे जी से पूछना चाहूँगा कि क्या इन्हें नरेन्द्र मोदी के बारे में नहीं मालूम. एक वरिष्ठ पुलिस ऑफिसर कह रहा है कि गोधरा के बाद जो मुस्लिमों पर अत्याचार हुए वे नरेन्द्र मोदी ने ही करवाए. फिर हज़ारे जी इस मामले में चुप क्यों हैं. अगर वे एक सच्चे समाज सेवक हैं तो उन्हें मोदी के ख़िलाफ़ भी जनमोर्चा खड़ा करना चाहिए. अगर नहीं तो देश के वही नागरिक जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उनके पीछे पीछे आ गए थे वे ही कहेंगे कि हजारे जी को तो बस लोकपाल बिल समिति में अपने सदस्य शामिल करवाने थे. और सदस्य भी कौन से जिनके नाम अरबों की संपत्ति है और बाप और बेटे को लेने का कौन सा तुक है जबकि हज़ारे जी के पास अनेकों बेहतर व्यक्ति थे. इन्हीं सदस्यों में से एक हेगड़े जी कहते हैं कि जनता को इससे कोई मतलब नहीं रखना चाहिए कि सदस्यों का चरित्र कैसा है उन्हें तो सिर्फ़ लोकपाल बिल से मतलब रखना चाहिए. है न हस्यास्पद टिप्पणी?

  • 42. 21:10 IST, 22 अप्रैल 2011 arun kalwani:

    मुझे लगता है कि राहुल गांधी सही कह रहे हैं और हमें किसी हीरो की ज़रुरत नहीं है. हमारे पास कई राष्ट्रीय हीरो हैं. अब हमें देश को ठीक से चलाने के लिए एक व्यवस्था की ज़रुरत है. एक या सौ हीरो मिलकर भी व्यवस्था को ठीक नहीं कर सकते जबकि अगर व्यवस्था ठीक हो जाए तो हममें से हर कोई अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार हीरो बन सकता है. हमें हीरो नहीं चाहिए बल्कि अपने देश को एक बेहतर देश बनाना है.

  • 43. 00:59 IST, 23 अप्रैल 2011 rahul:

    अभी राहुल गांधी को शायद थोड़ा और समय चाहिए.

  • 44. 11:38 IST, 23 अप्रैल 2011 manoj barmola:

    ये क्या आप गांधी परिवार की बात कर रहे हैं. क्या ये ज़रुरी है कि जो नेहरु ने किया वही सही है. आप लोग कह रहे हैं कि नेहरू-गांधी परिवार ने देश के लिए क़ुर्बानी दी तो उन लोगों का क्या जो हर दिन सीमा पर अपनी जान दे देते हैं और जो आतंकवादियों का सामना करते हैं. सोचिए कि गांधी परिवार ने आज तक देश को दिया ही क्या है, ग़रीबी और भ्रष्टाचार के अलावा. आप क्यों सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह को क्यों भूल जाते हैं. ये चमचागिरी छोड़ो तभी कुछ हो सकता है.

  • 45. 16:30 IST, 23 अप्रैल 2011 vijay rajak:

    भैया,
    बाप बड़ा न भैया
    सबसे बड़ा रूपैया.

    पत्रकार, नेता, भाजप, बीएसपी, सीपीएम, एआईसीसी
    अब मिलजुल के खाना.

    एक बारी हमारी बारी - एक बारी तुम्हारी बारी
    आओ भाई बारी-बारी
    चोर चोर मौसेरे भाई.

    जय हिंद


  • 46. 08:26 IST, 24 अप्रैल 2011 raju:

    जब वो किसी दलित के घर जाकर खाना खाते हैं तो क्या वो हीरो बनने की कोशिश नहीं करते? राहुल वाक़ई बच्चे हैं.


  • 47. 15:39 IST, 24 अप्रैल 2011 Manish Singh:

    राहुल जैसे लोगों की वक्तव्य को किसी भी तरह से बहस का मुद्दा बनाना उनको बड़ा करने में सहायक होगा. ज़रुरी नहीं था इस विषय पर कुछ बोलना. बोलने से वो लोग कुछ बन जाते हैं जो कुछ नहीं है. और यही उनकी तमन्ना होती है.

  • 48. 19:33 IST, 24 अप्रैल 2011 himmat singh bhati:

    विनोद जी भारत में एक हीरो से काम चलने वाला नहीं है. जनता से जुड़े हर विभाग की कमियों को दूर करने के लिए और वहाँ चल रही नीतियों को बदलने के लिए कोई न कोई हीरो की ज़रुरत है. ज़रुरत थी कि हमारे देश के नेता समाज को बदलते लेकिन इन नेताओं ने समाज का ठेकेदार बनकर समाज में फूट डालकर राज किया. अब समय की मांग है कि समाज अपने ठेकेदारों को बदल डालेगा. अब लोहा गरम हो चुका है और सिर्फ़ चोट करने की ज़रुरत है. यही मौक़े की नज़ाकत है.

  • 49. 23:57 IST, 24 अप्रैल 2011 Bansi Butta:

    यहां सब चोर और चोर के मौसेरे भाई हैं.

  • 50. 18:25 IST, 25 अप्रैल 2011 तेजपाल सिंह हंसपाल:

    यह तो देखने और समझने का नजरिया है जैसे कि गिलासा आधा है और आधा भरा हुआ है. राजनीति और विकास के बारे में मीडिया शब्दों के भंवर में लोगों को ऐसा उलझा देता है कि लगता है कि हर काम और बात शोध के बाद की जाए.जो लोग प्रबंधन को अच्छे से समझते हैं वे जानते हैं कि सही और पुख्ता काम कितना मुश्किल और जटिल है. कौन क्या बोले और क्या करे और दूसरा उसे किन अर्थों में लें यह आज की सबसे बड़ी समस्या है.बोलो तो लोग पीछे लग जाते है और ना बोलों तो भी लोग पीछे लगे रहते है. मुझे तो लगता है कि कई विषय ऐसे होते है जिन पर अनावश्यक ही लिखा जाता है.कई बार लोग बोलना ही नहीं चाहते लेकिन फिर भी उनसे जबरदस्ती उगलवाने की कोशिश की जाती है और फिर बात का बतंगड़ हो जाता है.

  • 51. 00:02 IST, 26 अप्रैल 2011 Balwan Fauji, Rohtak:

    राहुल जी कांग्रेस से ये पूछें की सविधान निर्माता डॉ आंबेडकर ने कांग्रेस का साथ क्यों छोड़ा. मैं राहुल को और पाठक जनों को भी कहता हूँ अगर भारत एक संपन्न राष्ट्र बनाना है तो डॉ आंबेडकर की रचनाओं को ध्यानपूर्वक पढ़ें. अगर १९३२ में गाँधी डॉ आंबेडकर की बात मान लेते तो आज भारत जाति विहीन और संपन्न राष्ट्र होता.
    विनोद जी आप टिप्पणियों को कांग्रेस की छलनी से छाने तो मैं आपको एक कांग्रेस भक्त न समझकर एक सच्चा राष्ट्र भक्त समझूंगा.
    नहीं तो आप भी इन नेताओं की तरह ढीठ हैं.

  • 52. 12:04 IST, 26 अप्रैल 2011 Guddu Kumar:

    किसी और को वास्‍तविक हीरो बना के देखिए या तो फिर कोई भय है नफरत है भ्रम है, अंधविश्‍वास है तो इन सब बातों का कोई माईने नहीं है लोगों की बुद्धि भ्रष्‍ट हो गई है लोंगो में इस तरह से मानसिक स्थिति खराब है कि अच्‍छी बातें समझ में आती नहीं है हर कोई अपना ऐशोआराम करने में लगाने लगे हैं अब कोई मरीज नहीं है जिसे की दवा पिलाकर उसका तबीयत ठीक किया जा सके लेकिन आदमी को कौन सा दवा पिलाया जाय कि लोगों की तबीयत ठीक हो जाए. खोजें असली हीरो कहां है कहीं मिल जायें तो बात आगे बढेगी बस और क्‍या कहेंगे ज्‍यादा कहने से कोई फायदा नहीं है क्‍यों की हम कुछ समक्ष में नहीं आता

  • 53. 18:43 IST, 26 अप्रैल 2011 RAJESH KUMAR JHA:

    मुझे लगता है राहुल गांधी ने हीरो के रोल को लगातार अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करने का सोचा है.

  • 54. 18:11 IST, 27 अप्रैल 2011 ishwar Dost:

    अच्छे व्यंग्य लेखन के लिए बधाई, जो धारदार इसलिए है कि सहजता के साथ विसंगति को सामने लाता है।

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