अब तो बड़े हो जाओ
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले हफ़्ते बजट पारित करवाने की कोशिश में कांग्रेस के सदस्यों को कुछ कड़े शब्द कहे जिन में से एक था 'ग्रो अप'.
स्कूली बच्चों की तरह दोनों पक्ष के कांग्रेस के सदस्यों के बीच लड़ाई देख कर राष्ट्रपति की बात सही लगी.
मैं बिल्कुल यही वाशिंगटन में रह रहे भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों और राजनयिकों से भी कहूंगा - 'ग्रो अप'.
ये लोग एक दूसरे से मिलते तक नहीं. एक दूसरे के बारे में वही ग़लतफ़हमियां रखते हैं जो कम पढ़े लोग रखते हैं.
एक दूसरे से उसी तरह से रूठ कर रहते हैं जिस तरह से स्कूल के बच्चे रहते हैं.
अगले महीने मुझे पत्रकार बने 23 साल हो जाएंगे. पत्रकारिता की पढ़ाई के समय हमें बताया गया था की एक पत्रकार निष्पक्ष होता है. वो पहले पत्रकार होता है फिर एक मुसलमान या हिन्दू, भारतीय या पाकिस्तानी.
मैं तो अब तक इस पाठ को नहीं भूला हूँ, लेकिन अपने इर्द-गिर्द इसकी धज्जियां उड़ते ज़रूर देखी हैं. अफ़सोस होता है, मन को दुख पहुँचता है.
मुझे मुंबई से वाशिंगटन आये लगभग एक साल हुआ है. यहाँ पहली बार मैं भी लड़खड़ाने के कगार पर खड़ा हूँ.
दरअसल भारत और पाकिस्तान से आकर यहां रह रहे पत्रकार इतने बड़े देश भक्त हो गए हैं (कम से कम वो तो यही समझते हैं) जितना वो अपने देशों में रहते समय कभी नहीं थे.
मैं दोनों तरफ के पत्रकारों से मिला तो एक दूसरे की बुराई सुनी और एक दूसरे के देश के बारे में ग़लतफ़हमियाँ महसूस कीं.
और तो और ये देखकर और भी हैरान हो गया की दोनों देशों के दूतावास एक दूसरे के पत्रकारों को प्रेसवार्ता में नहीं बुलाते.
यह बचकाना हरकतें दोनों तरफ से खुल कर होती हैं.
हाँ, मेरी ओर एक बीबीसी पत्रकार की हैसियत से दोनों तरफ़ के लोगों ने दोस्ती का हाथ बढाया.
मैंने सोचा मौका अच्छा है, दोनों तरफ़ को मिलाने की कोशिश कर डालो. ख़ुद अपने घर पर मैंने दूसरे विदेशी पत्रकारों के साथ भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों को घर पर दावत दे डाली.
नर्वस भी था की कहीं आपस में झगड़ा न हो जाए. कश्मीर से लेकर हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता पर गर्मागर्म बहस हुई, लेकिन एक और मुलाक़ात के बाद दोस्तियां भी बनीं और कुछ हद तक ग़लतफ़हमियाँ भी दूर हुईं.
लेकिन आपसी अविश्वास अब भी है.

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यह जुमला अक्सर सुनने में आता है कि पत्रकार निष्पक्ष होता है, इसे आपने भी उसी तरह दोहराया है जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति का कथन दोहराते हुए भारत और पाकिस्तान के पत्रकारों से आपने कहा है कि ग्रो अप यानि कि समझदार बनो. ये तय है कि जो समझदार होगा वही पत्रकार भी होगा अगर कोई फिर भी बचकानी हरकतें कर रहा है तो उसे पत्रकार समझकर घर बुलाने में आपने कोई समझदारी का काम किया हो ऐसा नहीं लगता है. आज जिस तरह नेता फर्जी हैं, धार्मिक नेता फर्जी हैं और भी बहुत से लोग फर्जीबाडे का धंधा कर रहे हैं, तो पत्रकार फर्जी नहीं हो सकते हैं ऐसा मानने के पीछे आपकी क्या मजबूरी है? जिनको आप नादान मानते हैं उनको ही घर बुलाकर आपने जो जोखिम उठाया उससे तो इस बार आप बच गये अगली बार इस मुद्दे पर और विचार कर लिजिएगा. इनका धंधा ही इस बात पर टिका होता है कि इनको नफ़रत फैलाने में महारत हासिल है. कोई इसे देशभक्ति के नाम पर फैलाता है तो कोई धर्म के नाम पर, कोई खेल के नाम पर ,कोई व्यापार और राजनीति के नाम पर केवल पत्रकार का चोगा पहनने से इनकी आत्मा स्वच्छ नहीं हो जाऐगी. आपने लिखा है कि हिन्दु, मुसलमान साम्प्रदायिकता के मुददे पर गर्मागर्म बहस हुई. ये कोई बहस का विषय है? ये तो एक अनुभूति जैसा है जो मुसलमान या हिन्दू हो गया तो वह किसी को क्या बताएगा? वह अपने आनंद में इतना सराबोर होता है , जैसे सूफी कि मस्ती हो या संत की समाधि. जो भी हिन्दू या मुसलमान या फिर किसी भी धर्म के नाम पर बहस करता है उससे बचने की जरूरत है घर बुलाने की कतई नहीं.
ज़ुबैर भाई मैं आपको राय तो नहीं दे सकता लेकिन प्रार्थना कर सकता हूं कि आप इस बीमारी से दूर रहें तो बेहतर होगा क्योंकि ये सच है कि आप अपने पड़ोसी भाईयों के लिए कितना भी...यहां तक की अपनी गर्दन भी कटा दें ...तो भी आप उनका दिल अंदर से नहीं जीत पाएंगे. यही फ़र्क है हममें और पड़ोसी देश के भाईयों में.
काश आपकी ही तरह हर इंसान सोचने लगे तो इन नेताओं और कट्टरपंथियों से दोनों देश आज़ाद हो जाएंगे. और अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा माहौल दे सकेंगे जहां केवल अमन और शांति होगी ना कि आतंकवादी.
ये दोनों देशों के कूटनीतिज्ञों और नेताओं पर निर्भर करता कि वो कैसे दोनों देशों के लोगों के विश्वास को जीत कर उपमहाद्वीप में स्थाई और दीर्घकालीन शांति स्थापित करें.
जब पत्रकार ही ऐसी बातों को शह देंगे तो जनता तो इन बातों में विश्वास तो करेगी. देखिए ज़ुबैर साहब जब तक बड़े लोग किसी बात को बढ़ाना नहीं देती, कोई बात बड़ी बनती नहीं.
बढ़िया काम.
जुबैर अहमद जी, आप किस पत्रकार तथा पत्रकारिता को संकुचित और भेद -भाव पूर्ण कह रहे हैं? सबसे बड़ी समस्या तो ये है की अधिकांश पत्रकारों को पत्रकारिता का वसूल, इसके मकसद, समाज और मानवता के प्रति कर्तव्यों का मतलब ही नहीं पता, उनसे कैसी आशा और उम्मीद. जहाँ तक भारतीय तथा पाकिस्तानी मिडिया का सवाल है, मानसिकता जग - जाहिर है. दिखाने के लिए चाहे जो हो लेकिन, "हमाम में सभी नंगे है" टीवी चैनलों पर रिपोर्ट दिखाना ही सिर्फ पत्रकारिता नहीं है. जिस पत्रकार के पास कलम की शक्ति नहीं, वह कैमरा से फोटो दिखाकर अपना पेट तो भर सकता है परन्तु समाज नहीं बदल सकता, यह मेरा दावा है.
जुबैर भाई पत्रकार भी तो एक इंसान होता है, जहां तक भारतीय पत्रकार की बात है तो वो भी अच्छे इंसान के साथ साथ एक निष्पक्ष पत्रकार होते है, निष्पक्षता का मतलब ये तो नहीं की अच्छे और बुरे दोनों को एक ही जैसे समझे. जहाँ तक बीबीसी और पश्चिमी मीडिया का सवाल है तो भारत और पाकिस्तान को एक ही आईने से देखने की इनकी पुरानी आदत है .
पता नहीं ये धारणा भारत में कब ख़त्म होगी जहां वड़े और छोटे पत्रकार के बीच एक बहुत खाई है.
ज़ुबैर भाई इस मामले में हम लोग जो ख़ाड़ी के देशों में रहते हैं अच्छा तजुर्बा रखते हैं.दोनों देशों के आपसी रिश्तों की खटास का असर हम लोगों के आपसी रिश्तों पर भी पड़ता है.यहां तक कि सगे मामू, चचा और फूफी के बच्चों के साथ भी. विभाजन के 64 साल बाद एक ऐसी पीढ़ी आ गई है जो एक दूसरे को सिर्फ़ समाचार माध्यम, फ़िल्मों या क्रिकेट से ही समझती है . आपसी अविश्वास की खाई हर दिन बढ़ती जा रही है.पहले .बाहर वाले हमें एक समझते थे लेकिन अब वो बहुत आसानी से फ़र्क़ महसूस कर लेते हैं .लेकिन मुझे इस बात का फ़क़्र है कि व्यापार, शिक्षा ,क़ानून पालन आदि मामलों में भारत कहीं आगे है.
ज़ुबैर भाई क्या करें मजबूरी है, पर सच का सामना करने के लिए बड़ी साहस और हिम्मत चाहिए . वास्तव में पत्रकार लोग भविष्य के राजनीतिक नेतृत्व का उम्मीद्वार समझते हैं ख़ुद को. लेकिन ये बात भी सच है कि भारत-पाक के पत्रकार और बुद्धिजिवी मिल जुल कर सौहार्द का परिवेश बनाएं तो भारत-पाक नम्बर वन बन सकते हैं.क्या इस सपने को साकार करने में चांदी के टुकडे़ बाधा हैं.
ज़ुबैर साहब, निश्चिंत रुप से आप निष्पक्ष रिपोर्टिंग करते हैं पर सभी पत्रकार ऐसे नहीं है. बीबीसी के भी सभी पत्रकार ऐसे नहीं है. कश्मीर से अकसर एक तरफा रिपोर्टिंग देखने को मिलती है.
अमेरिका का पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) को आतंकवादी संगठन करार देकर अल कायदा और तालिबान के बराबर खड़ा करने और विश्व के 36 बड़े आतंकवादी संगठन की लिस्ट में आईएसआई को रखने की बात से आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं, एक बात तो यह जिसे बहुत पहले करना चाहिए अमेरिका आज कर रहा है क्यों? भारत जिस बात को एक दशक से भी अधिक समय से कहता रह है वही बात आज अमेरिका काहने पर विवश है या हाल के दिनों में पाकिस्तान ने अमेरिका की इच्छा के विरुद्ध जब कुछ काम करना शुरू कर दिया तो अमेरिका को एशिया के हर देश में आतंकवाद दिखाई देने लगा है, सच्चाई तो यह है वही पाकिस्तान कभी अफगान के कथाकथित आतंवाद युद्ध में पाकिस्तान अमेरिका का सबसे विश्वसनीय साथी रहा है और इस साथ देने के बदले में उसने पाकिस्तान को रूपये आपसी लेकर हथियार तक देता रहा है जिसका भारत के खिलाफ जम कर प्रयोग किया गया, अमेरिका के बल पर पाकिस्तान ने भी खूब अमेरिका को उल्लू बनाया, अफगान युद्ध में पराजय से बेचैन और विश्व भर में अपनी पोल खुल जाने के डर अमेरिका अफगान में तालिबान से बातचीत करके समझौते की बात कर रहा है लेकिन सफलता मिलने की कोई गारंटी नहीं है, दसूरी ओर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने देश में शान्ति स्थापित करने के लिए तालिबान से समझौते की बात की और फिर करजई ने तालिबान समस्या के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए अपने पडोसी देश पाकिस्तान से परमर्श करने को प्राथमिकता दी. इस मामले में करज़ई ने अमेरिका को अलग थलग रखते हुए गिलानी को अपने यहाँ आने का न्योता दिया बस फिर किया था अमेरिकी प्रशासन और पश्चिमी देशों के समाचार पत्रों को पाकिस्तान की आईएसआई एक आतंकवादी संगठन से भी अधिक घातक नजर आने लगी, यही नहीं कुछ मामलों के घटने के बाद अमेरिका का पाकिस्तान से मोह भंग होगया है, पहला जब पाकिस्तान ने अमेरिकी जासूस रेमंड को दो नागरिकों के हत्या के लिए ग्रिफ्तार क्र जेल में डाल दिया, दूसरा पाकिस्तान ने अपने देश से 500 अमेरिकी जासूसों को वापस अमेरिका बुलाने पर मजबूर कर दिया, तीसरा ड्रोन हमले पर कड़ा विरोध जताया, चौथा पाकिस्तान ने शाहबाज़ एक क्रिस्चियन मंत्री शहबाज़ भट्टी की हत्या के बाद भी ईशनिंदा कानून को न तो निरस्त किया और उसमें में कोई बदलाओं ही किया, इराक, अफगान, मिस्र, लीबिया के साथ जिस तरह का वयवहार अमेरिका ने किया और कर रहा है वैसा ही वयवहार पाकिस्तान के साथ जल्दी में नहीं करना चाहता, उसका असल कारण पाकिस्तान चीन का पक्का मित्र है और लाख शत्रुता के बाद भी भारत, रूस और चीन कभी नहीं चाहेगा कि अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई करे जिस से एशिया का सब कुछ दो पर लग जाये, इसलिए अमेरिका पाकिस्तान के विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई करने से पहले भारत और दुसरे पड़ोसी देशों को ऐसी खबरों का प्रचार करके विश्वास दिलाना चाहता है कि वह पाकिस्तान के किलाफ जो कह रहा है वह शतप्रतिशत सच है, इसलिए पहले से भूमिका बाँध रहा है, हालाँकि अगर अमेरिका पाकिस्तान के हवाले से एशिया में कुछ भी करता है उसका सीधा प्रभाव भारत पर भी पड़ेगा जैसे कि अफगान युद्ध के कुप्रभाव से पाकिस्तान ग्रस्त है, उसमें पाकिस्तान का अपना भी कसूर है, कल जो उसने बोया न चाहते हुए भी उसकी फसल आज काटने पर विवश है,
नवल जोशी की प्रतिक्रिया साधुवाद की हक़दार है. लेकिन ज़ुबैर साहब की कोशिश पर यही कहना चाहूँगा कि 'आपका प्रयास विफल हो सकता है लेकिन प्रयास करने में कभी विफल मत रहिए'.