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मां बाप और सुख दुख

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 12 अप्रैल 2011, 17:03 IST

ज़िंदगी मां के आँचल की गांठों जैसी है. गांठें खुलती जाती हैं. किसी में से दुःख और किसी में से सुख निकलता है.

हम अपने दुःख में और सुख में खोए रहते हैं. न तो मां का आँचल याद रहता है और न ही उन गांठों को खोलकर मां का वो चवन्नी अठन्नी देना.

याद नहीं रहती तो वो मां की थपकियां. चोट लगने पर मां की आंखों से झर झर बहते आंसू. शहर से लौटने पर बिना पूछे वही बनाना जो पसंद हो. जाते समय लाई, चूड़ा, बादाम और न जाने कितनी पोटलियों में अपनी यादें निचोड़ कर डाल देना.

याद रहता है तो बस बूढे मां बाप का चिड़चिड़ाना. उनकी दवाईयों के बिल, उनकी खांसी, उनकी झिड़कियां और हर बात पर उनकी बेजा सी लगने वाली सलाह.

आखिरी बार याद नहीं कब मां को फोन किया था. ऑफिस में यह कहते हुए काट दिया था कि बिज़ी हूं बाद में करता हूं. उसे फोन करना नहीं आता. बस एक बटन पता है जिसे दबा कर वो फोन रिसीव कर लेती है. पैसे चाहिए थे. पैसे थे, बैंक में जमा करने की फुर्सत नहीं थी.

भूल गया था दसेक साल पहले ही हर पहली तारीख को पापा नियम से बैंक में पैसे डाल देते थे. शायद ही कभी फोन पर कहना पडा हो मां पैसे नहीं आए.

शादी हो गई है. बच्चे हो गए हैं. नई गाड़ी और नया फ्लैट लेने की चिंता है. बॉस को खुश करना है. दोस्तों को गार्डेन पार्टी देनी है. बीवी को छुट्टियों पर गोवा लेकर जाना है.

मां बाप बद्रीनाथ जाने के लिए कई बार कह चुके हैं लेकिन फुर्सत कहां है. ऑफिस बहाना है. समय है लेकिन कौन मां के साथ सर खपाए. बुढ़िया बोर कर देती है नसीहत दे देकर.

पापा ऑफिस के बारे में इतने सवाल करते हैं कि पूछो मत. कौन इतने जवाब दे. शाम को व्हिस्की का एक गिलास लगाना मुहाल हो जाता है. अपने घर में ही छुपते रहो पीने के लिए.

भूल गया पापा अपनी सिगरेट हम लोगों से छुपा कर घर से बाहर ही पीकर आते थे. न जाने हमने कितने सवाल पूछे होंगे मां-बाप से लेकिन शायद ही कभी डांट भरा जवाब मिला हो.

लेकिन हमारे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं है. हमारे बटुओं में सिर्फ़ झूठ है. गुस्सा है...अवसाद है... अपना बनावटी चिड़चिडापन है. उनकी गांठों में आज भी सुख है दुःख है और हम खोलने जाएं तो हमारे लिए आशीर्वाद के अलावा और कुछ नहीं.

अगले महीने मदर्स डे है....साल में एक बार मदर्स डे के नाम पर ही एक बार मां के आंचल की गांठें खोलने की ज़रुरत सभी को होनी चाहिए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:45 IST, 12 अप्रैल 2011 anmol ratan:

    बहुत अच्छा लिखा है. मैं जल्द ही अपने मां बाप को फोन करुंगा

  • 2. 19:42 IST, 12 अप्रैल 2011 ALTAF HUSAIN, SIKANDERPUR, AKBARPUR, AMBEDKAR NAGAR, UP:

    बस आंखों से आंसू आ गए. और कुछ नही कह सकता बस यही कहूंगा कि हम कैसे हो गए हैं.

  • 3. 19:42 IST, 12 अप्रैल 2011 I.Hussain:

    सुशील जी, आपका लिखा अच्छा लगा. आपने खूब कहा अगले महीने मदर्स डे है और इस दिन मां के आंचल की गांठ खोलने का मौका मिल जाएगा लेकिन हम और आप भूल गए हैं कि मां के आंचल में न कोई बड़ा हुआ है न होगा.मैं सभी से अनुरोध करता हूं कि मां बाप को हर दिन हमारी ज़रुरत है जैसे हम सभी को बचपन में उनकी ज़रुरत थी.हमने न जाने कैसे कैसे सवाल किए होंगे लेकिन आज हमें उनके सवाल बुरे क्यों लगते हैं. मदर्स डे क्या हर दिन मां बाप का ख्याल रखना चाहिए.

  • 4. 20:36 IST, 12 अप्रैल 2011 Raghvendra:

    इस ब्लॉग ने रुला दिया

  • 5. 21:15 IST, 12 अप्रैल 2011 vikram verma:

    आपने रुला दिया....कई सालों के बाद मेरी आंखों में आंसू आ गए..

  • 6. 22:39 IST, 12 अप्रैल 2011 Shiv Dubey:

    वाह साहब, बहुत ही मार्मिक, जीवन की सच्चाई बयां करता हुआ ब्लॉग लिखने के लिए आपको साधुवाद.

  • 7. 22:51 IST, 12 अप्रैल 2011 puspak gupta:

    बहुत अच्छा है .. आपने सच का अहसास करा दिया.

  • 8. 23:25 IST, 12 अप्रैल 2011 Prashant kumar,Buxar bihar:

    सचमुच इस ब्लॉग ने ये सोचने को मज़बूर कर दिया कि हम अपने इस भाग दौड़ भरी ज़िंदगी में अपने मां बाप को लगभग भूला चुके हैं. अब तक का सबसे बेहतरीन ब्लॉग जिसमें हमारे समाज के अनछुए पहलुओं को उजागर कर दिया.

  • 9. 23:37 IST, 12 अप्रैल 2011 Samrat Ashok:

    मित्रों आँखों में आंसू न लाओ. जो भी इस ब्लॉग को पढ़े उन सब से मेरा नम्र निवेदन है कि कृपा करके अपने बूढ़े माँ बाप कि किसी भी बात से बोर न होवें. अगर वे वृद्ध अवस्था के कारण किसी बात को दोहरा रहे हों फिर भी आप उन्हें सुनिए. वृद्ध अवस्था के कारण अगर वो गुस्सा हों तो कोई बात नहीं, यही सोचिये कि वे आपके माँ बाप हैं.
    मैं आप सबसे से निवेदन करता हूँ कि अपने बुजुर्गों के लिए समय अवश्य निकले. इससे आपको आतंरिक संतुस्टी मिलेगी और तत्पश्चात आपको अपना काम करने के लिए भी एक अजीब सी ताक़त मिलेगी. और आपका परिवार भी खुश होगा.

  • 10. 23:54 IST, 12 अप्रैल 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    सुशील भाई इस मामले में मैं बड़ा धनवान हूँ.अपने माँ-बाप के साथ घर पर रहता हूँ.मैं जानता हूँ कि वे घर से बाहर नहीं रह पाएँगे इसलिए मैं ही घर पर रहने लगा हूँ.मैं जानता हूँ कि कैरियर भी महत्वपूर्ण है लेकिन इतना भी नहीं कि उसके लिए माँ-बाप को ही छोड़ दिया जाए.आगे ईश्वर की मर्जी.

  • 11. 00:00 IST, 13 अप्रैल 2011 Rakesh Kumar Verma, Mount Abu:

    क्या झा जी..मज़ा आ गया. आपने तो बचपन में वापस घुमा दिया. आज भी मां से बातें करता हूं जब भी याद आती है. लेकिन फोन रखने को मन नहीं करता. हालांकि मां की बातें वही होती हैं.खाना खाया कि नहीं. शुगर कैसा है. कब चेक कराया था. उनको भी शुगर की दिक्कत है. उनको न पूछो तो वो अपनी दिक्कत बताते भी नहीं. वो ही सलाह देना चाहते हैं एक ही सलाह रोज़ रोज़. पर अच्छा लगता है. अभी भी वो वैसे हीसमस्याओं और चिंताओं को सोख लेते हैं जैसे पहले करते थे. बिना कुछ जाने वो हमारी समस्या खत्म कर देते हैं. सच है कि मां ही भगवान का रुप होता है धरती पर. धन्यवाद सुशील जी

  • 12. 00:07 IST, 13 अप्रैल 2011 Syma:

    सुशील जी आपके लेख ने दिल को छू लिया. पिछले साल ही मेरी मां का देहांत हुआ है. मैंने भगवान को नहीं देखा लेकिन अगर होता तो मेरी मां से अलग नहीं होता. अब मां को देख और छू नहीं सकता लेकिन याद करता हूं.

  • 13. 01:32 IST, 13 अप्रैल 2011 Dinesh singh:

    आपने बिलकुल सही लिखा है सुशील जी. आजकल के लोग अपना परिवार का मतलब सिर्फ अपने बीवी और बच्चे समझते हैं. मां, बाप उसमें कहीं आते ही नहीं. ये क्यों भूल जाते हैं की जिन्होंने उनको जन्म दिया, पाल पोसकर बड़ा किया. जब वो कुछ भी करने की स्थिति में नहीं थे, तब सब कुछ किया उनके लिए और जब उनको जरूरत है तो कैसे कन्नी काट लेते हैं लोग. इससे बड़ा एहसानफरामोश, कर्तव्य से बिमुखता, कुछ हो ही नहीं सकता. जो अपने माँ बाप के प्रति अपने कर्तब्य और प्रेम का पालन नहीं कर सकता उससे और किसी भी चीज की उम्मीद ही नहीं की जा सकती. लेकिन मेरे लिए मेरे बाप सबसे अमूल्य हैं. वो हैं तभी मैं हूँ. इस बात को मैं कभी नहीं भूलता हूँ . मेरी अपने माँ से लगभग रोज़ ही बात होती है.और मैं उनको सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ.

  • 14. 02:30 IST, 13 अप्रैल 2011 Rohit kumar,chhote sasaran ,bhojpur,bihar:

    सुशील जी आपकी बात बहुत हद तक सही है. अगर हम शहरी अंदाज़ में देखें तो .हां लेकिन गांव को देखें तो आपका ब्लॉग उचित नहीं लगता. ये बात सही है कि आज के जमाने में मां बाप की जगह पैसे ने ले ली है लेकिन श्रवण कुमारों की भी कमी नहीं है.

  • 15. 10:02 IST, 13 अप्रैल 2011 susheel mishra:

    सुशील जी नम आंखों से आपको साधुवाद

  • 16. 10:04 IST, 13 अप्रैल 2011 panchanan mishra:

    कहा ही जाता है कि मां के दिल जैसा दुनिया में कोई दिल नहीं..वो सुकून, अल्हड़पन, बेफिक्री आज तक नही मिल पाई जो मां-बाप के साए में मिली...बिल्कुल ठीक कहा सुशील भाई आपने हमें याद रहता है मां-बाप की बीमारी के बिल, उनकी अपेक्षाएं...ये नहीं याद रहता कि बच्चे के लिए अपना सुख चैन, जीवनसब कुछ पीछे छोड़ देने वाली मां भला कैसे अपेक्षा कर सकती है...कितना दुर्भाग्य है...

  • 17. 11:54 IST, 13 अप्रैल 2011 Owais Bulkhi:

    वाकई आंखों में आंसू आ गए. अल्लाह हमें अच्छी अक्ल, समझ और सोच से नवाजे. हमें भरपूर ख़िदमत और नरमदिल से पेश आने का हरपल मौका इनायत करे.

  • 18. 12:05 IST, 13 अप्रैल 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह सुशील झी, शब्द नहीं है आपके इस दर्दनाक ब्लॉग के लिए. आपने बिल्कुल सच लिखा है लेकिन याद रहे कि नरक और स्वर्ग मां बाप के पैरों तले ही है. शायद आपने वो फ़िल्म देखी होगी. बीबीसी पर आपके द्वारा पहली बार ऐसा दर्दनाक लेख पढ़ने को मिला है.दुनिया में वो खुशकिस्मत हैं जो अपने मां बाप का ख्याल रख रहे हैं. 99 प्रतिशत मेरी तरह बदकिस्मत हैं.

  • 19. 12:29 IST, 13 अप्रैल 2011 Nagendra:

    मुझे कुछ ज्यादा नहीं कहना एक गज़ल है जो नीचे लिख रहा हूं. नाम याद नहीं आ रहा है पर नाम आते ही अपडेट ज़रुर कर दूंगा.

    इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
    माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

    किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
    मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

    कुछ नहीं होगा तो आँचल में छुपा लेगी मुझे
    माँ कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी

    बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
    माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है

    खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से
    बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही

  • 20. 12:59 IST, 13 अप्रैल 2011 Sarfaraz Hajipur,Bihar:

    हम लोग दुनिया के बनावटी चीज़ों में ऐसे गुम हो गए हैं क मां बाप की हर चीज़ बुरी लगने लगी है. हम भूल गए हैं कि हम पहले एक इंसान हैं. जिसने हमें पैदा किया उसके साथ हम इंसानियत से पेश नहीं आते. उनकी फितरत हमें घटिया लगती है. हम सिर्फ़ आदमी हो गए हैं इंसान नहीं रहे...

  • 21. 14:33 IST, 13 अप्रैल 2011 Indresh Kumar Srivastava:

    अरे आपने तो रुला दिया.

  • 22. 16:43 IST, 13 अप्रैल 2011 deepak mishra:

    वाकई आंखों में आंसू आ गए. गला भर गया.एक मिनट के लिए मैं खो गया. मेरी मां नही है. दादा दादी ने मुझे पाला है. मेरे लिए मेरी दादी ही मेरी मां है. दादा जी हाल ही में गुज़र गए. उन्हें गंभीर बीमारी थी इसलिए पत्नी को उनके साथ रख छोड़ा था कि देखभाल होती रहे. इधर कई दिनों से बात नहीं की थी. आपका ब्लॉग पढ़ते ही फोन किया. धन्यवाद सुशील जी.

  • 23. 16:48 IST, 13 अप्रैल 2011 पद्मनाभ मिश्र:

    अपने पिताजी के जमाने की प्रथा का अनुसरण नहीं करने के कारण मैं "आधुनिक" हो गया हूँ. मेरा बेटा मेरे जमाने को झूठलाएगा तो अपने जमाने का वह आधुनिक होगा. यह दो पीढ़ी का अंतराल है जो हमेशा से चली आ रही है. यह सार्वभौम सत्य है. मुद्दे की बात तो ये है की संस्कृति के बदलने में पीढी अंतराल के साथ समुंदर पार की प्रथा भी शामिल हो रहा है. जहां पर आदमी महज एक रिसोर्स है जो की replacable है. ज्यादातर बातें obvious है. इसमे एक लेखक की सृजनात्मकता ढूँढने पर भी नहीं मिलाती. इसीलिए यह ब्लॉग बीबीसी के मानदंड पर कहीं खरा नहीं उतरता.

  • 24. 18:46 IST, 13 अप्रैल 2011 manoj kaushik:

    आपका लेख अच्छा है और मैं इसकी सराहना करना चाहूंगा कि आपने ऐसा मुद्दा चुना. इस देश में बूढ़े मां बाप के लिए कोई प्रावधान नहीं है. मां हमारी बातें बिना बोले समझ जाती है. लेकिन विडंबना है कि हम बोलने पर भी उनकी बात समझना नहीं चाहते हैं. उनके अहसानों को भूल जाते है.

  • 25. 18:57 IST, 13 अप्रैल 2011 prithvi:

    कुछ बातों पे मौन सहमति की परम्परा है. आपके इस आलेख से भी है .. सच्ची सच्ची बात!

  • 26. 19:23 IST, 13 अप्रैल 2011 Ghalib Ayaz:

    सुशील भाई. आप ने बहुत प्यारा ब्लॉग लिखा है. सच है कि आज कि इस भाग दौड़ में हम उन्हें भूल जाते हें जो हमारे लिए सब कुछ करते हें. एक शेर याद आगया मां के बरे में :-
    एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोयी ताबिश
    मैं ने एक बार कहा था मुझे डर लगता है

  • 27. 19:25 IST, 13 अप्रैल 2011 aditya:

    बहुत सही कहा आपने

  • 28. 19:57 IST, 13 अप्रैल 2011 Prashant kumar,Mitralokcolony,buxar,bihar:

    सुशील जी, आपका ब्लॉग मर्मवेदनी है. इस संदर्भ में कहा गया है. मां न होगी तो वफ़ा कौन करेगा. ममता का हक अदा कौन करेगा. या रब हर एक मां को सदा सलामत रखना वर्ना हमारी सलामती की दुआ कौन करेगा.
    बेहतरीन ब्लॉग लिखने के लिए शुक्रिया.

  • 29. 21:56 IST, 13 अप्रैल 2011 शांता सिंह :

    रिश्ते अपनी शर्तों पर चाहते हैं हम.....हकीकत से ज्यादा ख्वाबों में रहना चाहते हैं हम. प्यार करते हैं लेकिन इस प्यार को वक्त पर जताना नहीं जानते हम और यही सबसे बड़ी कमी है हमारी. वक्त नहीं है, शायद इसलिए अपने मां-पिता के सुख-दुख बांटना तो दूर शायद जान भी नहीं पाते..बहाना वही महानगर की जिंदगी, दफ्तर का तनाव....घर के काम काज....लेकिन खुद से पूछ कर देखिए क्या वाकई यही वजहे हैं जिनकी वजह से हम उन्हीं से दूर हो गए हैं जिनकी जिंदगी हमारे आस पास ही घूमती है. शायद नहीं क्योंकि हमारे पास मॉल जाने का वक्त है, फिल्म देखने का वक्त है, गॉसिप करने की फुरसत है...अगर नहीं है तो फोन उठाकर उनसे बात करने की जो टकटकी लगाए दरवाजे पर या फोन की ओर देखते हैं कि शायद कहीं से कोई आवाज़ आए। खैर....रिश्ते सिर्फ बातों या अपने गुनाह मान लेने से नहीं चलते....उन्हें वक्त देने की जरुरत होती है और वो भी सही समय पर....

  • 30. 00:34 IST, 14 अप्रैल 2011 dr sudhakar hathi:

    आपने मेरी मां की याद ताजा कर दी

  • 31. 01:17 IST, 14 अप्रैल 2011 deepu :

    दिल पर तीर की तरह लगा. मेरी सोच बदलने के लिए आपका धन्यवाद.

  • 32. 07:53 IST, 14 अप्रैल 2011 subhash bhadu:

    बिल्कुल सही. बहुत अच्छा. जब ऐसी बातें हम सुनते हैं या पढ़ते हैं तो सब अच्छा लगता है और अहसास होता है.जब ये सुनने में अच्छी लगती है तो सोचिए करने में कितना आनन्द आएगा.एक बार मां बाप की सेवा करके देखो कितना मज़ा आता है. मां बाप की दुआएं हमेशा साथ रहती हैं. सुशील जी को धन्यवाद आपने आज दिल को स्पर्श किया.

  • 33. 11:54 IST, 14 अप्रैल 2011 ram kumar:

    गनीमत है कि सब एक जैसे नहीं होते. कुछ लोग आज भी रोज़ फोन किए बिना सोते नहीं हैं.

  • 34. 12:41 IST, 14 अप्रैल 2011 Athar:

    बिल्कुल सही लिखा है आपने सुशील जी. हम कहां जा रहे हैं. याद रहे बोएंगे जो वही तो काटेंगे.

  • 35. 13:16 IST, 14 अप्रैल 2011 Gaurav Shrivastava:

    मदर्स डे और फादर्स डे मनाना पश्चिमी परंपरा है. हमारे लिए हर दिन मां बाप के लिए. हम पागल हो रहे हैं और पश्चिमी सभ्यता के पीछे भाग रहे हैं. अपनी सभ्यता की खूबसूरती को मान नहीं रहे हैं. लाइफस्टाइल बदला ज़रुर है लेकिन मैं जब अमरीका में था तो दो बार फोन करता था अपनी मां को. अब भारत में हूं तो एक बार ज़रुर बात करता हूं हर दिन.


  • 36. 14:47 IST, 14 अप्रैल 2011 Abdul Rashid:

    सुशील जी आप ने तो लेखनी के ऐसे नायाब जौहर को लोगों के सामने रख दिया के इस पे क्या प्रतिक्रीया दिया जाए.पढ़ते पढ़ते आंख भर आई.जिन्दगी की हकीकत और लफ़जो कि सादगी बनावटी दुनिया पर भारी पर गया.
    अब्दुल रशीद्
    सिंगरौली मध्या प्रदेश

  • 37. 16:25 IST, 14 अप्रैल 2011 Surjeet rajput:

    एक ही सत्य है और वो है मां. मैं आज की भावी पीढ़ी से कहना चाहता हूं कि अगर आपने मां बाप को दुखी किया तो आप कभी भी सुखी नहीं रह सकते क्योंकि मां बाप की बददुआ से भगवान भी नहीं बच सकते हैं. मां बाप ईश्वर स्वरुप होते हैं.

  • 38. 20:10 IST, 14 अप्रैल 2011 drsusharma:

    आपने बहुत अच्छा लिखा है. इसके लिए धन्यवाद.

  • 39. 20:32 IST, 14 अप्रैल 2011 z:

    सुशील जी आंखे नम हैं और बस आंसू बहे जा रहे हैं. मां के लिए सिर्फ यही कह सकते हैं कि लबों पर उसके कभी बद्दुआ नहीं होती बस एक मां है जो कभी खफ़ा नहीं होती.

  • 40. 20:34 IST, 14 अप्रैल 2011 Mr. Singh:

    इस दुनिया की सारी दौलत मां की गोद नहीं खरीद सकती, मां का हाथ सिर पर हो तो बड़ी मुसीबत भी छोटा लगती है. मां बाप की जो सेवा नहीं कर सकते उनका दुनिया में जन्म लेना बेकार है. आज भी मां से बात करके दिन की शुरुआत और दिन का अंत करता हूं. मां की बात दिल को सुकून देती है. माता और पिता के रुप में भगवान मेरे साथ है.

  • 41. 20:49 IST, 14 अप्रैल 2011 shripal sharma:

    इस युग में भी आपकी यह सोच है इसके लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूं.

  • 42. 22:22 IST, 14 अप्रैल 2011 Rubi singh:

    बहुत खूब लिखा है सुशील जी. एक बार फिर बचपन की चादर मां ने सिर पर उढ़ा दी. गांव की छांव महसूस होने लगी. वाकई मां के आंचल की गांठ खोलकर जो आनन्द आता है वो कहीं नहीं है.

  • 43. 23:23 IST, 14 अप्रैल 2011 samim khan:

    सुशील जी आपने मेरी आंखें खोल दीं. वादा करता हूं आज से रोज़ मां को फोन किया करूंगा. आपका ब्लॉग पढ़ने के बाद मां से बात किए बिना रह न सका.

  • 44. 23:58 IST, 14 अप्रैल 2011 anshal:

    सुशील जा बहुत अच्छा लिखा है आपने. पढ़कर थोड़ा रोना भी आया, लेकिन खुद पर या अपने माता-पिता पर नहीं उन लोगों पर जो ऐसा करते हैं. अपने लिए तो मैं ऊपर लिखी सभी बातों का पुरज़ोर विरोध कर सकता हूं लेकिन जिन लोगों के लिए ये बात सही है उनसे निवेदन करता हूं कि इस सोच को बदलें. रिश्ते अनमोल होते हैं और पैसे का उनके लिए कोई मोल नहीं.

  • 45. 00:31 IST, 15 अप्रैल 2011 sunandan kumar,vill+post- kahua, via-benipur,darbhanga,bihar.:

    बहुत अच्छा लिखा है सुशील जी. शुक्रिया

  • 46. 10:22 IST, 15 अप्रैल 2011 dkmahto:

    लगता है आप अभी तक आंचलिक मानसिकता से निकल कर अंग्रेज़ी के रंग में खुद को ढाल नहीं पाए हैं.

  • 47. 11:03 IST, 15 अप्रैल 2011 Ganesh Mishra:

    आपने वाकई आज का काला सच हमारे सामने रखा है.

  • 48. 11:27 IST, 15 अप्रैल 2011 ashish yadav:

    मैं तो अपने घर से दूर हूं लेकिन अपने माता-पिता की याद आती रहती है. सुशील जी आपकी लेखनी आँखें नम कर दीं. आपने बचपन की शरारत और मां के दुलार की पूरी तस्वीर खींच दी. आज भौतिकता की अंधी दौड़ में हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि मां-बाप को कहीं पीछे छोड़ आए हैं. माता-पिता को शत-शत नमन.

  • 49. 13:31 IST, 15 अप्रैल 2011 c l das:

    आपका हर शब्द कहीं ज़्यादा वज़नदार है. पढ़ने के बाद सांसे थम गईं. भूख मर सी गई. आंखों के सामने सिर्फ और सिर्फ माता-पिता चेहरा दिख रहा है.

  • 50. 14:32 IST, 15 अप्रैल 2011 रामलाल :

    आपने एक ही पक्ष उजागर किया अपने बचपन का. क्‍या आपको पता है आज की दुनिया में डाक्‍टर साक्षात डकैत हो गए है. जो बूढ़े लोग लाचार हैं अथवा अपनों से ठुकराए इस युग में तरह तरह की बीमारियों से ग्रस्‍त हो कर प्राइवेट चिकित्‍सकों के चंगुल में फंस जाते है उन्हें ये अत्‍याधुनिक चिकित्‍सालय ऐसा निचोड़ डालते हैं कि आपके शरीर पर तन ढंकने को एक कपडा भी नहीं रहने देते. जब ये बूढ़े बिल्‍कुल मरने की कगार पर होंगे तब कहेंगे कि इतनी राशि का बिल चुकाओ अन्‍यथा इस बूढ़े को यहीं छोड जाओ यह नज़ारा भारत जैसे शहरों में आम है इसके पीछे हो सकता है सरकार का भी हाथ हो.

  • 51. 14:47 IST, 15 अप्रैल 2011 RAJENDRA SONI:

    बिलकुलसही कहा आपने. भगवान को तो देखा नहीं है लेकिन माता-पिता भगवान के समान ही हैं. भगवान को हम हमेशा आदर के साथ देखते हैं उसी तरह हमें माता-पिता का निरादर भी नहीं करना चाहिए.

  • 52. 15:39 IST, 15 अप्रैल 2011 firdous alamm:

    आपने तो रुला दिया. आंखों से आंसू आ गए. कुछ नहीं कह सकता बस यही कहूंगा कि हम कैसे हो गए हैं.

  • 53. 15:42 IST, 15 अप्रैल 2011 Dev Jha:

    ये तो सच है कि समय ने मनुष्य मे बदलाव कर दिया है लेकिन मनुष्य को ये सोचना चाहिए कि जिस दिन उसके कारण उसके मां बाप की आंखों में आंसू आ जाए उस दिन उसका सारा पुण्य बह जाता है. आपने जोलिखा है वो अमल करने की बात है लिखने की नहीं.

  • 54. 17:21 IST, 15 अप्रैल 2011 gayatri:

    आपके इस लेख को पढ़ के दिल भर आया.

  • 55. 21:12 IST, 15 अप्रैल 2011 Bansi Butta:

    खुद मां बाप बनने पर महसूस हुआ कि जवानी में मां बाप की अवहेलना कर के उन्हें कितना दुख देते थे. अब लगता है क मैंने भी कई गलतियां की होंगी. मुझे उनकी आत्मा माफ़ करे.

  • 56. 22:01 IST, 15 अप्रैल 2011 Sagir:

    मेरे पास अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं.

  • 57. 02:03 IST, 16 अप्रैल 2011 Dr.Lal Ratnakar-Ghaziabad/Jaunpur:

    खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से
    बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही
    यह लाईनें ही नहीं है विश्वास है, कतरे का, खून का, जिस्म का जो हम आज अपने शहरी माहौल में न जाने कितना दे पा रहे हैं, अपने बच्चों को और वे बच्चे मेरी मा को कितना समझ पा रहे हैं अपनी माँ को दोनों ही तरफ माँ है पर माँ तो केवल माँ है,पता नहीं सुशील जी आपके साथ एसा हुआ की नहीं पर मेरी माँ जिसे दादी माँ कहते हैं कई बार लगता की वही मेरी माँ हैं, फिर बताया जाता असली माँ ये हैं, जो दिन भर खेती के कामों में जानवरों की हिफाजत में, सबके लिए कमर तोड़ मेहनत कराने वाली माँ -
    मेरी आज माँ से गाँव बात हुई ,
    खबर तो ख़राब है, हाल सबका ठीक है,
    पर रत जगा ने बेहाल किया है,
    कभी वहाँ से खबर आती है,
    फला के बेटे को मार दिया,
    किसी कि बेटी को काट दिया,
    रत जगा चल रहा है,
    रात भर आवाज़ आती है -
    जागते रहो -जागते रहो,
    कभी मल्लाहुटी से कभी चमरौटी से ,
    बभनौटिया में चोरी करिके,
    मिश्रयींन क घरवा में फेंक गए,

    हाड़ गोड़,
    लागत है मुसुर्मनावे उधाय गयल बाटे,
    सुनत बाटी अजोध्या में,
    मंदिर बनै वाला बाटे,

  • 58. 07:15 IST, 16 अप्रैल 2011 Krishan Kant:

    दिल को छू लिया आपने..

  • 59. 11:57 IST, 16 अप्रैल 2011 farhat farooqi:

    मां वो अज़ीम और पाक नाम है जिसके बगैर दुनिया का वजूद बेमानी है. हर दिन मां का दिन है. उसे खास दिन के दायरे में बांधा नहीं जा सकता.उसकी बात ही कुछ ऐसी है उसकी
    रब ने मां को ये अज़मत ए कमाल दी
    उसकी दुआ पर हर आई मुसीबत टाल दी
    कुरान ने मां के प्यार की कुछ इस तरह मिसाल दी
    कि ज़माना उठा के मां के क़दमों में डाल दी

  • 60. 17:42 IST, 16 अप्रैल 2011 alok shukla:

    बहुत अच्छा लिखा है मित्र

  • 61. 19:53 IST, 16 अप्रैल 2011 nivedita:

    बहुत सुंदर लिखा है आपने

  • 62. 01:00 IST, 17 अप्रैल 2011 Shashi Bhushan Singh, Sitab Diara,Saran, Bihar :

    शुशील जी, आप ने लाखों ऐसे लोगो के दिलों को छू लेने वाली बेहतरीन ब्लॉग लिखा है, जो हजारों मील दूर होने के वावजूद भी उनकी आत्मा माँ -बाप, खेत - खलिहान तथा बैग - बगीचा में बसता है. यही अंतर है बीबीसी तथा अन्य पत्रकारों में. जिस तरह वर्तमान परिवेश में पत्रकार तथा पत्रकारिता संकुचित और भेद -भाव पूर्ण से प्रभवित है, वहां बीबीसी एक उम्मीद की किरण नजर आता है. सबसे बड़ी समस्या तो यह है की अधिकांस पत्रकारों को पत्रकारिता का वसूल, इसके उद्देशय, समाज और मानवता के प्रति कर्तव्यों का मतलब ही नहीं पता, उनसे कैसी आशा और उम्मीद. जहाँ तक मिडिया का सवाल है, कागज - कलम से दूर तथा आत्म मंथन से परे टीवी चैनलों तक सिमटकर रह गया है, लेकिन यही सिर्फ पत्रकारिता नहीं है. जिस पत्रकार के पास सोचने की शक्ति, कलम की ताकत नहीं, वह कैमरा से फोटो दिखाकर अपना पेट तो भर सकता है, परन्तु समाज नहीं बदल सकता.

  • 63. 08:19 IST, 21 अप्रैल 2011 Rakesh Raushan:

    मेरे माँ-पिता भगवान के समान हैं. मैं ईश्वर से यही दुआ माँगता हूँ कि वो हमेशा सुख-शांति से जिएँ.

  • 64. 04:41 IST, 22 अप्रैल 2011 devendra singh:

    मैं अपने माता पिता से बहुत प्यार करता हूं और उन्हें कभी दुख नहीं दूंगा

  • 65. 10:54 IST, 22 अप्रैल 2011 Ankit Jain:

    बहुत अच्छे..पसंद आया.

  • 66. 10:56 IST, 22 अप्रैल 2011 TAHIR KHAN:

    सुशील जी आपका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. क्यों मां बाप से बढ़कर दुनिया में कोई भी चीज़ अच्छी नहीं है. बहुत बहुत धन्यवाद ऐसे ब्लॉग के लिए.

  • 67. 12:14 IST, 22 अप्रैल 2011 hemant kumar sharma:

    पुरानी बातें याद करा के रुला दिया आपने. सचमुच हम कितना बदल गए हैं.

  • 68. 09:43 IST, 26 अप्रैल 2011 gunjesh singh:

    आपने मुझे मेरे बचपन के दिनों की याद ताज़ा करा दी. वह माँ का अपने हाथों से खिलाना, सब कुछ आँखों के सामने आ गया.

  • 69. 17:34 IST, 27 अप्रैल 2011 जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी':

    मैं जन्नतों की गली रस्ते चूम लेता हूँ
    शराब प्यार की पी कर के झूम लेता हूँ
    मैं अपने माता-पिता की लगा के एक चक्कर
    तमाम विश्व को पल भर में घूम लेता हूँ

  • 70. 17:59 IST, 02 मई 2011 abhay singh:

    आपने तो हमारी आंखें खोल दी.

  • 71. 13:09 IST, 03 मई 2011 Binay Kumar Suman:

    आपने मन की बात कह डाली. शायद हम ऐसे ह होते चले जाते हैं कि किसी भी बात का असर नहीं हो पाता है. ज़िंदगी की अमूल्य चीज़ों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं.

  • 72. 16:38 IST, 03 मई 2011 Gaurav(Munger):

    सुशील जी. आपकी टिप्पणी ने दिल को झकझोर कर रख दिया है. सही में हमलोग कितने बदल गए हैं.

  • 73. 22:28 IST, 17 जुलाई 2011 tyagi platoon:

    बहुत ही बढ़िया लेख है.हमें कुछ ऐसे ही दिशानिर्देश चाहिए.

  • 74. 17:54 IST, 18 अक्तूबर 2011 Ram Nivash Jha:

    बहुत ही बढ़िया लेख है.हमें कुछ ऐसे ही दिशानिर्देश चाहिए

  • 75. 22:07 IST, 03 दिसम्बर 2011 navneet dwivedi:

    बहुत अच्छा ब्लॉग है.

  • 76. 17:11 IST, 06 अप्रैल 2012 poonam (patna):

    इस दुनिया की सारी दौलत मां की गोद नहीं खरीद सकती, मां का हाथ सिर पर हो तो बड़ी मुसीबत भी छोटा लगती है. मां-बाप की जो सेवा नहीं कर सकते उनका दुनिया में जन्म लेना बेकार है. आज भी मां से बात करके दिन की शुरुआत और दिन का अंत करता हूं. मां की बात दिल को सुकून देती है. माता और पिता के रुप में भगवान मेरे साथ है.

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