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सवा अरब बेचारे और एक अन्ना हज़ारे

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शुक्रवार, 08 अप्रैल 2011, 10:52 IST

उम्मीदें जाग गई हैं. सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?

माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर. अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है.

लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है. सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा.

जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में भी नहीं पहुँची है.

हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब. इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग भी जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे नहीं हो रहे हैं.

वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में.

मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी अपने आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम.

लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी. वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है.

भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है.

फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ सौ लोग.

ब्रिटेन से एक पत्रकार ने पूछा कि दिल्ली में ही एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं और जितने लोग इकट्ठे हो रहे हैं वो तो बहुत ज़्यादा नहीं है, तो क्या अभी लोगों को भ्रष्टाचार अपना मुद्दा नहीं लगता?

जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है. सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं.

भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता.

उस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा.

ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को.

लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है.

लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं. लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन.

अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं.

भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता.

बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है.

सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी.

उस दिन अन्ना हज़ारे का अनशन ख़त्म हो जाएगा. अन्ना हज़ारे रालेगणसिद्धि लौट जाएँगे. पता नहीं इन सवा अरब बेचारों का क्या होगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:42 IST, 08 अप्रैल 2011 Sunil k Pandey:

    हज़ारे का प्रयास एक शुरुआत है, आम आदमी को अपने दैनिक जीवन में भ्रष्टाचार से लड़ना चाहिए. दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रुरत है नहीं तो इसका भी परिणाम जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति जैसा ही हो जाएगा. एक भ्रष्ट सरकार हटी तो दूसरी आ गई. हज़ारे का प्रयास सराहनीय है. सबको उनका समर्थन करना चाहिए. जिससे भ्रष्टाचारियों कि आँखे खुलें. आपके लेख के लिए धन्यवाद.

  • 2. 12:46 IST, 08 अप्रैल 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    बहुत अच्छा लिखा है विनोद जी आपने. कुछ नहीं होगा यहां. आपका लिखना बिल्कुल सही है कि भारत में तहरीर चौक नहीं बन सकता कियोंकि यहां मिस्र जैसा माहौल नहीं हो सकता. भारत में सिवाय क्रिकेट के कुछ नहीं चलता. जनता बुज़दिल हो गई है. भारत में अब भगत सिंह पैदा नहीं हो सकता. एक बार फिर आपको शुक्रिया विनोद जी.

  • 3. 13:49 IST, 08 अप्रैल 2011 JITENDRA KUMAR YADAV, CHAKFATMA, BHAGALPUR:

    काफ़ी अच्छा ब्लॉग लिखा है विनोद जी. इन बेचारों को भी अन्ना हज़ारे जी के साथ आना होगा.

  • 4. 14:59 IST, 08 अप्रैल 2011 Satya:

    कहते हैं बिना चंद्रगुप्त के चाणक्य के प्राणों का कोई मतलब नहीं. अगर हम सब अन्ना हज़ारे को चाणक्य मान भी लें तो चंद्रगुप्त कहां हैं. यही इस देश की विडम्बना है कि आज़ादी के बाद कोई भी ऐसा नेता नहीं हुआ जो जनता की सुध ले. मनमोहन सिंह से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती.

  • 5. 15:23 IST, 08 अप्रैल 2011 vimal kishor singh:

    आपका लिखा पढ़कर जोश आ गया मैं भी अब अन्ना हज़ारे के इस मिशन से जुड़ने जा रहा हूं. आपका लेख जोश जगाने वाला है.

  • 6. 15:33 IST, 08 अप्रैल 2011 Ajeet S Sachan:

    हमारे जैसे सवा अरब लोगों का क्या होगा इस सवाल का जवाब तो यही है कि वो रोज़ की तरह अपनी ज़िंदगी जीते रहेंगे. हम लोग उसी तरह काम करते रहेंगे जैसे मशीन में लगा एक पुर्ज़ा. मशीन बनाने वाला उच्च वर्ग है और मशीन से निकलने वाला मध्यमवर्ग. फिलहाल समस्या देश के उच्च वर्ग की ओर से किए गए घोटालों की है. किया मेरे बाहर निकलने से ट्रैफिक पुलिस, सरकारी बाबू मुझसे घूस मांगना बंद कर देंगे. तो फिर मैं बाहर क्यों निकलूं.

  • 7. 15:58 IST, 08 अप्रैल 2011 Sarfaraz:

    '' हम को उनसे वफ़ा की उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है.'' मध्यवर्ग एक विशेष तबका है और आप उससे किसी नएपन की उम्मीद नहीं कर सकते. आज का भारतीय 1947 के भारतीय से बिल्कुल अलग है, आजकल हर कोई अपना फ़ायदा देखता है. तभी भ्रष्टाचार इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है.

  • 8. 16:24 IST, 08 अप्रैल 2011 B K NAIK:

    विनोद जी आपने सही कहा असल में आम आदमी टीवी स्क्रीन के सामने या कहीं चौक में पान चबाते हुए देश विदेश से लेकर सभी मुद्दों पर अपनी राय देते दिखेंगे. हालांकि कदम उठाने की बारी आने पर सामने नहीं आते. तभी नेता वही कर रहे हैं जो उनकी इच्छा होती है. अब वक्त आ गया है कि लोग अपने घरों से बाहर निकलें.

  • 9. 16:30 IST, 08 अप्रैल 2011 sudhanshu chouhan:

    सही कहा विनोद जी, यह तो जंतर मंतर पर ''पीपली लाइव'' है.

  • 10. 17:53 IST, 08 अप्रैल 2011 Rishi:

    अन्ना वोट नहीं दिला सकते वर्ना गांधी परिवार के क्राउन प्रिंस अन्ना से मिल ज़रूर आते. गांधी के आज़ाद देश में जब उनकी ही समर्थित पार्टी ने लगभग नब्बे फ़ीसदी समय तक राज किया है तो इस देश के अच्छे-बुरे सारे मसलों की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही है. प्रतिष्टित गांधी परिवार से आशा है कि वे अन्ना को बचा लें, उनका वृद्ध शरीर इस पीड़ा को ज्यादा नहीं सह पायेगा. ज़रूरत सिर्फ राजनीति छोड़ने और सेवानिवृत्ति अपनाने की है. अन्यथा कृपा कर अपने नाम से गांधी हटा लें.

  • 11. 18:01 IST, 08 अप्रैल 2011 Md Zaki Iqbal:

    विनोद वर्मा जी, नमस्कार! आपका यह लेख काफी मज़ेदार और विचारणीय है.
    भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हज़ारे जी का जन्तर मन्तर पर आमरण अनशन के लिए बैठना एक एतिहासिक और देश के भविष्य के लिए एक शुभ संकेत है क्योंकि देश में भ्रष्टाचार जिस तेजी से अपना पैर पसार रहा है, लगता है कोई इस पर बोलने या इसका विरोध करने वाला नहीं है. लेकिन इस तरह के आन्दोलन से कितनी क़ामयाबी मिलती है, आगे आने वाला दिन ही बताएगा. मिस्र के तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों लोगों का जमा होना वहां के लोगों की एकता का एक उदाहरण था. लेकिन जहां तक भारत का सवाल है यहां तहरीर चौक जैसी बात कभी भी नहीं होने वाली है. यहां की जनता में एकता नहीं है. बहुत से लोग राष्ट्रपिता की बातों का मज़ाक उड़ाते हैं और उन्हें बुरा-भला कहते हैं. लोगों में उनके प्रति वो स्नेह और सम्मान नहीं रह गया है, जितना होना चाहिए था. सिर्फ़ स्कूली क़िताबों में उनके बारे में पढ़ाया जाता है और 2 अक्तूबर एवं 30 जनवरी को होनेवाली सरकारी छुट्टी की वजह से उन्हें याद कर लिया जाता है. हमारे यहां तहरीर चौक जैसा माहौल नहीं बन सकता है हालांकि लोग मिस्र की जनता की तरह ही देश के नेताओं से आहत हैं. देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुंचा है. नौकरशाहों से लेकर राजनेताओं तक और यहा तक कि न्यायाधीश भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं. राजनेताओं को देश की चिंता नहीं.
    भारत के उच्च वर्ग के ज़्यादातर लोग वैसे भी वोट देने के लिए घर से बाहर नहीं निकलते. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वो अपनी रोज़ी-रोटी के जुगाड़ के लिए एक दिन भी काम नहीं छोड़ सकता है. भारत में व्याप्त ग़रीबी को जड़ से उखाड़ फेंकने की सिर्फ़ बातें होती हैं, लेकिन वास्तव में ये सारी बातें मन को बहलाने की बातें हैं. भ्रष्टचार के खिलाफ़ कोई भी आन्दोलन हमें नहीं लगता कि क़ामयाब हो सकेगा क्योंकि किसी भी पार्टी को ये डर नहीं है कि भ्रष्टाचार से उसकी छवि को नुकसान होने वाला है. लेकिन उम्मीद की एक किरण ज़रूर है कि अन्ना हज़ारे जी की लड़ाई अगर राजनीति से प्रेरित नहीं है तो ज़रूर कामयाब होगी, और हम भी इसके साथ हैं.

  • 12. 18:03 IST, 08 अप्रैल 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    वास्तव में हम लोग जो दिखते हैं वो हैं नहीं ! तहरीर चौक में लोगों के के दिलो -दिमाग में कुछ कर मिटने का ,देश को बचाने का ज़ज्बा था ! हमारे यहाँ हम लोग बस यही कह सोचकर मन मार लेते हैं कि मुझे क्या पड़ी है ? मैं ही क्यों इस आन्दोलन में कुदूं ? असल में यहं किसी को कोइ फर्क ही नहीं पड़ता ! जो कुछ कहना -करना भी चाहते हैं तो उनके सामने कैमरों की चमक- दमक और माईक्रोफोन होने चाहिए ! दिल वालों की दिल्ली ? कहाँ है ये दिल्ली ? करोड़ों के घोटाले के बाबजूद लाखों स्वयंसेवक कॉमन वेल्थ खेलों के दौरान घूम रहे थे ! आज जब एक न्यायप्रासंगिक व् जनहित हेतु अन्ना हजारे जैसे युग पुरुष अपने जीवन दांब पर लगाए हुए हैं पर लोगों के मन ही नहीं पसीज रहे ? तहरीर चौक जैसी उप्लब्धि हेतु मृत - प्राय जन मानस चेतना को जागना होगा !

  • 13. 18:18 IST, 08 अप्रैल 2011 Sheo shankar Pandey:

    विनोद जी, जिस देश की संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है भ्रष्टाचार वहाँ अन्ना के समर्थन मे कितने लोगों को आप देखना चाहते है?

  • 14. 18:27 IST, 08 अप्रैल 2011 makrand bhagwat:

    लोकतंत्र ने जिन्हें चुना
    उन्होंने कईयोँ को चुनवा दिया
    बाबुओं की जमात नें
    नेताओं का हाथ थाम लिया
    ये मुहीम जारी रहे
    ईमानदारी भारी रहे
    आपके प्रयासों में हम भी शामिल हैं
    बड़ी सुंदर पक्तिओं में किसे ने लिखा है
    हम अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल की तरफ
    लोग जुड़ते गए कारवां बनता गया.

  • 15. 19:03 IST, 08 अप्रैल 2011 naval joshi:

    अन्ना हज़ारे और उनके साथियों द्वारा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर छेड़े गए अभियान और इसे मिलने वाले व्यापक जनसमर्थन से यह साबित हो रहा है कि सरकार अब आम लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है बल्कि जनता और सरकार के बीच साफ़ तौर पर विभाजन वाली परिस्थिति होती जा रही है, हालात लगभग उसी तरह के होते जा रहे हैं जैसे कि खाड़ी देशों के शासकों ने लोगों की बात को समझने की बजाए उन पर ही दोषारोपण करना शुरू कर दिया था. इसी तरह सरकार कभी इस आंदोलन को अपरिपक्व बता रही है तो कभी अन्ना हजारे को बहकावे में आया व्यक्ति कह रही है. गांधी जी के बाद किसी भी आमरण अनशन पर लोगों ने इतनी तीखी प्रतिक्रिया दी है इससे समझा जा सकता है कि लोगों को जनआंदोलन शुरू करने के लिए किसी अवसर की तलाश थी जो कि अन्ना हजारे ने दे दिया है. वास्तव में यह समर्थन उस तरह न तो अन्ना हजारे के लिए है और न ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर है, यह समर्थन पूरी व्यवस्था के ही ख़िलाफ़ है. जनआंदोलन का मार्ग चुनने में अन्ना हजारे ने सही वक्त पर सही कदम उठाया है इसलिए इस आंदोलन का पूरा श्रेय उन्हें ही जाता है. एक प्रदर्शनकारी द्वारा दिल्ली को तहरीर चौक बना देने की बात को यदि अतिश्योक्ति मान भी लिया जाए तो कम से कम इस को कोई मजाक में नहीं ले सकता है. इससे इस आंदोलन की महत्ता का पता चलता है.
    लेकिन हंगामा खडा करने और सूरत बदलने के बीच कुछ सवाल भी हैं जिनका जवाब इस आंदोलन को अभी देना है, मसलन भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाना कोई उपलब्धि तो नहीं कही जा सकती है, भ्रष्टाचार कहाँ से और क्यों पैदा हो रहा है? इस पर निश्चित राय अभी नहीं है. भ्रष्टाचार को ही नहीं रोका गया तो देश की बडी आबादी जेलों में होगी क्योंकि भ्रष्टाचार बड़ा या छोटा नहीं होता. लोगों को भयाक्रांत करके भ्रष्टाचारी होने से भी नहीं रोका जा सकेगा इसका कोई मार्ग अवश्य होगा जिससे लोग सदाचारी हो जाते हैं हमें उस पर भी बात करनी होगी. लेकिन अभी वक्त है कि जनआंदोलन को परिपक्व होने में सहयोग किया जाए यह भी हो सकता है कि यह आंदोलन सवालों को भी सुलझाता चले.

  • 16. 19:16 IST, 08 अप्रैल 2011 himmat singh bhati:

    विनोद जी, आज नहीं तो कल जंतर-मंतर तहरीर चौक बनने जा रहा है. सरकार इस मुगालते में नहीं रहे कि अन्ना जी अकेले हैं. पाप का घड़ा भरते ही फूट जाता है. देश का युवा हताश है, महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है. भ्रष्टाचार के मामले में दुनिया के सामने हम शर्मसार हो रहे हैं. फिर भी हमारे नेताओं को शर्म नहीं आ रही है. आज की युवा पीढ़ी को हिसाब देना होगा. हिसाब मांगने का अधिकार सबको है. यह आमरण अनशन नहीं यह जन आंदोलन है जो किसी सत्याग्रह से कम नहीं. ये सही है कि भ्रष्ट लोग पैसे के बल पर लोगों को हताश करने की कोशिश ज़रुर करेंगे पर जब शोषित लोग जमा होंगे तो सरकार को समझ में आ जाएगा. मैंने पहले भी आपके ब्लॉग पर टिप्पणी की थी कि मिस्र से चली आ रही आंधी एक दिन भारत ज़रुर आएगी.

  • 17. 19:24 IST, 08 अप्रैल 2011 Bikash Rao, Journalist, New Delhi :

    अंतरात्मा की आवाज कह रही है, अब बस बहुत हो चुका. विनोद जी मुझे लगता है कि आपने यह ब्लॉग कुछ दिन पहले लिखी होगी. दरअसल पाँच अप्रैल जिस दिन कि अन्ना हज़ारे ने अमरन अनशन शुरू किया था उस दिन जरूर लोगों की भीड़ थोड़ी कम थी लेकिन जैसे-जैसे अनशन का दिन बढ़ता जा रहा है जनसमर्थन और जनसैलाब दोनों जंतर मंतर की ओर उमड़ रहा है. इसका प्रत्यक्ष गवाह मैं खुद हूं. पाँच अप्रैल, जिस दिन अन्ना हजारे ने जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की थी मैं वहां उपस्थित था. ऐसा लग रहा था कि आम लोगों से ज्यादा भीड़ तो मीडिया कर्मियों की ही है. मैं खुद एक पत्रकार हूं और मैं वहां रिर्पोटिंग के मकसद से नहीं बल्कि अन्ना हजारे को अपना नैतिक समर्थन देने के लिए गया था. पेशे से पत्रकार होने के नाते मैं वहां की हर गतिविधि से करीबी नज़र रखे हुए था. कितने लोग आ रहे हैं, कहां से आ रहे हैं समर्थन करने वाले ज्यादातर लोग कौन है इत्यादि. तब मुझे लगा था कि अन्ना ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जो अभियान छेड़ा है उसमें सभी तरह के लोग हैं. मतलब हम आप जैसे नौकरी पेशा से लेकर सभी गैर राजनीतिक विचारधारा के लोगों का समर्थन प्राप्त है. लेकिन वहां उनके साथ खड़े होने वाले अधिकांश लोग किसी संगठन या स्वयंसेवी संगठन से जुड़े कार्यकर्ता नजर आए. हमारा आपका समर्थन केवल इंटरनेट, फेसबुक, एसएमएस और अन्य माध्यमों तक ही सीमित है. लेकिन मीडिया ने क्रांति को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई है. यह बात मैं केवल इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मैं एक मीडिया कर्मी हूं बल्कि इसलिए कि मीडिया ने अन्ना हजारे मुद्दे को उम्मीद से ज्यादा कवरेज देकर अन्ना का संदेश जन जन तक पहुंचाया है. इसी का परिणाम था कि पहले दिन की तुलना में दूसरे, तीसरे और चौथे दिन लोगों की भारी भीड़ जंतर मंतर की ओर बढ़ रही है. तीसरे दिन तो लोगों ने स्वयं कैंडिल मार्च में भाग लेकर सरकार और आम जन को यह संदेश देने का प्रयास किया कि है कि अब सभी लोगों के दिल में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के ख़िलाफ़ ज्वाला भड़क चुकी है. अब सरकार को जागना ही होगा. क्योंकि इस बार जनता चुप बैठने वाली नहीं है. सबसे अच्छी बात यह है कि लोग स्वत: ही जंतर मंतर की ओर कदम बढ़ा रहे हैं यह उनकी अंतरात्मा की आवाज़ है. केवल दिल्ली ही नहीं पूरे देश के अलग अलग शहरों में लोग धरने पर बैठ चुके हैं. सभी लोगों की अंतरात्मा की आवाज कह रही है बस अब बहुत हो चुका, सरकार तुम शर्म करो. मुझे लगता है यह पिछले 30 साल की सबसे बड़ी जनक्रांति साबित हो सकती है. अन्ना के अन्न त्याग ने बड़ी ताकत का अहसास कराया है.

  • 18. 20:25 IST, 08 अप्रैल 2011 rajkumar gwalani:

    भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे जी के अनशन से आज पूरा देश ही नहीं बल्कि विश्व उबल रहा है. इसमें कोई दो मत नहीं है कि भ्रष्टाचार से आज सभी त्रस्त हैं, लेकिन विचारणीय प्रश्न यह भी है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है, क्या हम इसके लिए दोषी नहीं है? हमारा जहां तक मानना है कि भ्रष्टाचार के लिए सबसे पहले दोषी तो हम ही लोग हैं.
    कहने में यह बात बड़ी अटपटी लगती है, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि आज अगर अपना देश भ्रष्टाचार में डूबा है तो उसके लिए पहले दोषी हम ही हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि इसके लिए हम दोषी कैसे तो हम आपसे पूछना चाहते हैं कि जब आप किसी भी सरकारी काम से कहीं जाते हैं, मान लीजिए आपको निवास प्रमाणपत्र ही बनवाना है और आपको इसके लिए तहसील या जिलाधीश कार्यालय जाना पड़ता है, और आपको वहां पर नजर आती है, एक लंबी लाइन, ऐसे में आप क्या करते हैं? ऐसे समय में चाहे आप हो या हम शार्टकट का रास्ता अपनाने के लिए ऐसे आदमी को तलाश करते हैं जो हमें उस लाइन से बचाकर हमारा काम करवा सके. इसके लिए हम कुछ पैसे खर्च करने से नहीं चूकते हैं. जब हम किसी को किसी काम के लिए पैसे देते हैं तो उस समय हम सिर्फ यही सोचते हैं कि हमारा समय बच जाएगा, लेकिन हम यह कभी नहीं सोचते हैं कि हमारे ऐसा करने से क्या होगा. हमारे ऐसा करने से दो बातें होती हैं, एक तो जो लोग लाइन में लगे होते हैं, उनके साथ अन्याय होता है, दूसरे हम अपने काम के लिए किसी को पैसे देकर उसको रिश्वतखोर और भ्रष्टाचारी बनाने का काम करते हैं.

  • 19. 21:04 IST, 08 अप्रैल 2011 chandresh gaur:

    विनोद जी, बजा फ़र्मा रहे हैं आप. अन्ना भी राजनेताओं की जमात जैसे ही हैं.

  • 20. 23:46 IST, 08 अप्रैल 2011 anand:

    निराशावादी बात है....बेकार बात है...मिस्र से तुलना ही ग़लत है. उन्होंने जो लड़ाई 2011 में लड़ी, वो हम 1942 में लड़ चुके हैं. भारत की जनता का समर्थन हज़ारे को है. चाहे वो मौन या मूक समर्थन क्यों न हो. और ये बात नेता जानते हैं, वर्ना सरकार इतनी आसानी से दबाव में नहीं आती. गौर से देखिये...पिछले साल विपक्षी पार्टियों का कोई भी आंदोलन सरकार को दबाव में नहीं ला पाएगा. क्योंकि सरकार जानती है कि उसको जनता का नहीं समर्थन है. ये ज़रुरी नहीं कि सड़कों पर ख़ून बहे, तभी आपको क्रांति होती नज़र आए...

  • 21. 01:23 IST, 09 अप्रैल 2011 Balwan Fauji:

    चलो अन्ना हज़ारे जी अब एक बार जो शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है उसके ख़िलाफ़ भी आमरण अनशन पर बैठ जाइए. क्या पता ये सरकार आपकी सुन ही ले और जो प्राइवेट स्कूल और कॉलेज अपनी-अपनी दुकानें खोले बैठे हैं उन पर क़ाबू पाने की कोशिश ही कर ले.

  • 22. 03:18 IST, 09 अप्रैल 2011 AKASHDEEP:

    कोई बात नहीं हम निराश नहीं होंगे, कभी भी नहीं. अब तब्दीली आ रही है. आने वाले समय में भारत सूरज की तरह चमकेगा. इसकी चमक को कोई नहीं रोक सकता. हम युवा हमारे भारत को स्वर्ग बना देंगे. मैं अपने भारत लिए हर क़ुर्बानी देने के लिए तैयार हूं. मैं भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा दे रहा हूँ और देश सेवा के लिए बहुत उतावला हूं. भगवान से विनती करता हूं कि मेरा सारा जीवन देश की सेवा में लग जाये. इस देश की मिटटी ने ही मुझे पाल पोस कर बड़ा किया, कैसे चुका पाऊंगा ये कर्ज़? मैं भगवान की इस दुनिया को बेहद खूबसूरत बनाने में योगदान देने के लिए तत्पर हूं.

  • 23. 09:52 IST, 09 अप्रैल 2011 s.p.aseem:

    सही आकलन है विनोद जी. अन्ना की ये मुहिम एक सालाना जलसा बन कर सामने आएगी, इतने मुद्दे जो हैं समाज में...हर बात के लिए कब तक जंतर मंतर पर इस तरह जुटेंगें या जुटाएंगें लोग? इस मुल्क में प्रजातंत्र है. संसद में सभी बैठे सभी लोग भ्रष्ट नहीं हैं. उन्हें हम और आप ही चुनते हैं. सिस्टम को सिरे से नकारने की आदत अच्छी नहीं है. हम उसमें सुधारने की बात ज़रुर कर सकते हैं. संयुक्त समिति में जो पांच नाम अन्ना ने रखें हैं, उससे अलग नाम होते तो शायद अन्ना की टीम की साख़ अधिक बढ़ जाती. सत्ता से निर्पेक्ष तो आप भी नहीं हैं मुहिम के आकाओं! बहुत अच्छा लिखा आपने...सवा करोड़ बेचारे, कभी मनमोहन के तो कभी अन्ना के मारे.

  • 24. 11:31 IST, 09 अप्रैल 2011 dkmahto:

    आसमां में
    हो सकता है सुराख़
    एक पत्थर तो
    तबीयत से उछालो यारों.

  • 25. 11:48 IST, 09 अप्रैल 2011 Amit :

    ये बहुत अच्छा है. पता चला है कि भारत सरकार 'लोकपाल विधेयक' के लिए संयुक्त समिति बनाने पर सहमत हो गई है. अन्ना साहब को बहुत-बहुत धन्यवाद. अब इस आंदोलन को सार्थक रूप देना भारतीय नागरिकों का कर्तव्य है. इसके अलावा मैं बीबीसी का धन्यवाद करना चाहता हूं इस ख़बर को अच्छा कवरेज देने के लिए.

  • 26. 12:23 IST, 09 अप्रैल 2011 ZIA JAFRI:

    जब देश ग़ुलाम था तो एक बड़े और पढ़े-लिखे तबके का ये मानना था कि देश आज़ाद नहीं हो सकता, लेकिन ऐसा हुआ. इस बार भी ऐसी ही उम्मीद है. इस आंदोलन से जुड़े हुए लोगों में एक बड़ा तबका बुद्धिजीवी और ईमानदार है जिसको जनता समझ रही है. कोई भी परिवर्तन एक दिन में और बिना किसी क़ुर्बानी के नहीं होता. इस आंदोलन से हमें बहुत आशाएं हैं. दीवार पर लिखी इबारत कह रही है कि इसके बाद कई और आंदोलन होंगे जो समाज और देश के लिए एक अच्छा संकेत है.

  • 27. 12:50 IST, 09 अप्रैल 2011 Md.Shahnawaz:

    बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है आपने. लेकिन चिंता की बात ये है कि हम भारतीय चिल्लाते तो बहुत हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. पर उससे लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. इसकी एक सबसे बुनियादी वजह है हमारी सोच और समझौतावादी आदत. हर चीज़ से समझौता चाहे वो हमारे ख़िलाफ़ हो समाज के या देश के ख़िलाफ़. आपने बिल्कुल सही कहा कि सब चाहते हैं कि गांधी और भगत पैदा हों लेकिन हमारे घर में नहीं बल्कि पड़ोस में. अब देखना ये है कि हमारे अंदर गांधी और भगत कब पैदा होते हैं.

  • 28. 13:19 IST, 09 अप्रैल 2011 guddu sharma, khagaria, Bihar:

    अन्‍ना जी की सोच तो बिल्‍कुल ठीक है सही समय पर इस तरह का भ्रष्‍टाचार के ख़िलाफ़ उनका आन्‍दोलन तो सराहनीय है जिसमें की बहुत लोगों ने उनका साथ निभाया अब रही बात सरकार की तो वो इस विषय पर कितना खरी उतरती है ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि क्‍या कुछ खत्‍म हुआ या फिर कहीं उससे ज्‍यादा ना व्‍यक्ति भ्रष्‍ट हो जाए. कहने के लिए तो मुंह पर कुछ कह देते हैं बाद कौन किसको पूछता है. यूं तो इस विषय पर खुल कर, बिना डर, भय के व्‍यक्तियों को आन्‍दोलन करना चाहिए क्‍योंकि यह आन्‍दोलन देश के हित में है और आम लोंगों को बहुत फायदा है और अपने देश को भी. आज के लोग शायद ये भूल गए हैं कि गांधी और जैसे भगत सिंह जैसे महापुरूषों का देश में आज यहां के लोग ही अंग्रेज़ बने हुए हैं जो उससे भी ज्‍यादा ख़तरनाक बनकर अपने देश को अपने हाथों ही अस्मत लूट रहा है. जरा सोचें अपने उन महापुरूषों के मुँह पर कालिख मत चिपकाओं नहीं तो बहुत ठेस पहुंचेगी उनकी आत्‍मा को. इतनी दूरी पर पहूंच कर कहां थम से गये हैं. सब कुछ ठीक ठाक है लेकिन इसी विषय पर अगर साकारात्‍मक सोच सोंचे तो शायद कुछ हासिल हो सके. नहीं तो दिन-प्रतिदिन यह और बढ़ता जायेगा जिससे फटेहाल तो भारतीय जनता रहेगी कोई अपने काले कारनामों से बाज़ नहीं आया. कर लो जिन्‍दगी भर ऐसे मौज बाद में पता चलेगा मरने वक्‍त की क्‍या साथ लाए और क्‍या ले के जा रहे हैं. थोड़ी कोशिश करें तो भारत और तरक्की कर जाएगा.

  • 29. 14:11 IST, 09 अप्रैल 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    हमारे देश के लोगों की सबसे बुरी आदत है कि हम जब भी कोई इन्सान महान कार्य करता है हम उसे या तो अवतार बना देते हैं या फिर भगवान और यह मान लेते हैं कि उक्त व्यक्ति ने जो कुछ भी किया वह सिर्फ वही कर सकता था हम नहीं कर सकते.ऐसा हम राम,कृष्ण,बुद्ध,महावीर,कबीर और गाँधी के साथ भी कर चुके हैं.बुद्ध हमारी इस प्रवृत्ति को समझ गए थे इसलिए उन्होंने अप्पो दीपो भव का उपदेश दिया था.आज तो एक अन्ना ने आकर हमें नेतृत्व देकर अकर्मण्य होने से बचा लिया लेकिन जब कोई अन्ना आगे नहीं आएगा तो?तो क्या हम यूं ही घूट-घूट कर जीते रहेंगे,सिर्फ बातें बनायेंगे और करेंगे कुछ भी नहीं?यह स्थिति अच्छी नहीं है,इसे बदलना होगा और ऐसा तभी होगा जब हम जोखिम उठाने का साहस दिखाएंगे.नेतृत्व की जरुरत उन्हें होती है जो अनपढ़ हों पढ़े-लिखे लोग तो स्वयं ही नेतृत्व होते हैं.

  • 30. 17:48 IST, 09 अप्रैल 2011 विकाश कुमार :

    देश की दुर्दशा के पीछे आम जनता का हाथ नेताओ से कम नही है. आपने यह बात बहुत अच्छी कही की " हम देश में भगत सिंह और गाँधी तो चाहते हैं लेकिन पड़ोसी के घर में." कोई सड़क पे उतरने को तैयार नहीं है.

  • 31. 18:05 IST, 09 अप्रैल 2011 rahul sankrityayan:

    सबसे अच्छा है.

  • 32. 00:55 IST, 10 अप्रैल 2011 Kashif , Shahjahanpur:

    आदाब सर,
    इस देश का भला करने के लिए सिर्फ़ गांधी जी के पैदा होने से काम नहीं चलेगा. उसके लिए सुभाष चंद्र बोस जैसे लोग भी इसी देश में पैदा होने चाहिए. गांधी पैदा तो हों लेकिन पड़ोसी के घर. अब गांधी को पड़ोसी के घर भी नहीं ''पड़ोसी देश'' में पैदा होना चाहिए.

  • 33. 01:07 IST, 10 अप्रैल 2011 Kapil Batra:

    मैं अपनी कविता की दो पंक्तियां अन्ना हज़ारे को समर्पित करना चाहता हूं :

    निज प्रकाश दे धरा को तारा शेष की चिंता किए बिना।
    हाय प्रयास कम ही हो ज्ञात है तमस नहीं मिटने वाला।।

    मेरा नमन.

  • 34. 07:20 IST, 10 अप्रैल 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    "सवा अरब बेचारे और एक अन्ना हज़ारे" आपका ब्लॉग पढ़ने से पहले ही ये खबर आ चुकी है कि अन्ना ने उपवास तोड़ दिया हैं. 'सरकार' ने उनकी बात मान ली है. सिविल सोसायटी की तरफ़ से प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, अन्ना हज़ारे और संतोष हेगड़े संयुक्त समिति के सदस्य होंगे. एक अध्याय तो पूरा हुआ पर अब आगे क्या होने जा रहा है प्रतीक्षा तो उसकी होगी. क्या सचमुच भ्रष्टाचार समाप्त होने जा रहा है. 'लोकपाल बिल' बन जाने से क्या वाक़ई भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा. क़ानून के बारे में आम धारणा बनती जा रही है कि क़ानून को लागू कराना ही दरअसल भ्रष्टाचार की जड़ है, क्योंकि अभी तक जो क़ानून हैं उनके चलते देश के सारे न्यायालय कितने महंगे न्याय के स्वरूप बन गए हैं ये सभी जानते हैं. यानि न्याय बाज़ार में बिकने जैसा हो गया है. 'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' की प्रवृति से जिस न्याय की ही ऐसी की तैसी हो रही हो, ऐसे में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में बदलने वालों का क्या होगा? अन्ना हज़ारे समाजसेवी और ईमानदार व्यक्ति हैं उनके साथ 'ईमानदारी' चाहने वालों का तांता लग गया और सरकार ने उनकी बात मान भी ली, पर जिस देश के रक्त में घुट्टी की तरह भ्रष्टाचार पिलाया जा रहा हो वहां से अन्ना हजारे 'भ्रष्टाचार' के ज़हर को कैसे अलग करेंगे यह एक महत्वपूर्ण सवाल है. ईमानदारी की कामना किसको नहीं होती पर सिर्फ़ अपने लिए. जब दूसरे की बात आती है तो वही भ्रष्टाचारी हो जाता है. ऐसे में अन्ना का योगदान कितना सार्थक होगा ये विचारणीय सवाल है.

  • 35. 08:38 IST, 10 अप्रैल 2011 anurag shukla:

    वर्मा जी, सब जैसा था वैसा ही चलेगा. कुछ नहीं बदलेगा.

  • 36. 14:05 IST, 10 अप्रैल 2011 anshul bhatnagar:

    भारत के लोकतंत्र की एक विशेष बात ये है कि यहां के लोकतंत्र में भूख और बदहाली से साधारण जन त्रस्त है. इसी बात का फ़ायदा नौकरशाह उठाते हैं. कोई नहीं जानता कि अन्ना हज़ारे जिस लोकपाल विधेयक के लिए लड़ रहे हैं वो कितना भ्रष्टाचार मुक्त होगा जबकि खुद नागरिक समाज ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है. किसी भी नए क़ानून में छेद आखिर ढूंढ ही लिया जाता है और फिर ज़रूरत होती है नए क़ानून की. अब देखने वाली बात ये है कि ये नई व्यवस्था किस हद तक भ्रष्टाचार मुक्त समाज का निर्माण कर पाती है.

  • 37. 15:20 IST, 10 अप्रैल 2011 Bhim Kumar Singh:

    वर्मा जी, हमारे देश में भ्रष्टाचार कभी मुद्दा नहीं बन पाया, भविष्य में बन पाएगा ऐसा लगता भी नहीं. हम अपने निजी हित साधने के आदी हैं और जब-तक यह आदत नहीं जाएगी, तब तक भ्रष्टाचार की बीमारी भी नहीं जाने वाली है.

  • 38. 15:41 IST, 10 अप्रैल 2011 Ashok Kumar:

    हज़ारे जी की इस उपलब्धि के तुरंत बाद ही जो ड्राफ्टिंग समिति पर सवाल उठ रहे हैं कि एक ही परिवार के दो सदस्यों को समिति में लेने की क्यों आवश्यकता पड़ी. इससे तो फिर यही संकेत मिल रहे हैं कि कुछ तो गड़बड़ है वरना क्यों किरण बेदी जी को अलग कर दिया गया और क्यों कुछ लोगों के सवाल उठाने के बावजूद इसमें बदलाव नहीं लाया गया. क्या हज़ारे जी शांति भूषण या प्रशांत भूषण को किरण बेदी से बेहतर साबित कर सकते हैं?
    अगर हज़ारे जी कह रहे हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि समिति में कौन है तो फिर क्यों वे नागरिक सदस्यों कि मांग कर रहे थे? ऐसा होने से कम से कम आम आदमी के मन में भी हज़ारे जी के ख़िलाफ़ ये धारणा बन जाएगी कि वे भी निष्पक्ष नहीं हैं.

  • 39. 16:26 IST, 10 अप्रैल 2011 Ghildiyalms:

    एक दिलचस्प बात है कि एक अरब से अधिक आबादी वाले देश मे कमेटी के अध्यक्ष श्री शांति भूषण और सदस्य उनके सुपुत्र ही मिले. यही वो बात है जहां से भ्रष्टाचार प्रारम्भ होता है. मैं, मेरा बेटा, मेरा परिवार. अन्ना हज़ारे ने वास्तव में संवेदनशील लोगों की आत्मा को झकझोरा है. किंतु अभी भी ये प्रश्न अनुत्तरित है कि देश की आज़ादी के बाद से हुए भ्रष्टाचार को भी इसमें शामिल किया जायेगा या नहीं या फिर जिनके बाप-दादाओं ने भ्रष्टाचार कर अपनी कई पुश्तों के लिए इंतजाम कर दिया है, क्या उनकी जायजादें भी ज़ब्त होंगी. बेशक अन्ना हज़ारे, किरण बेदी उनमें शामिल नहीं हैं. फिर एक प्रश्न ये भी उठता है कि विदेशों में भ्रष्टाचार कम है ओर हमारे देश में ज्यादा. उन सब लोगों को ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि पूंजीवादी देशों में जब दलाली को क़ानूनी जामा पहना दिया गया है तो वहां भ्रष्टाचार कम होगा ही. ये भी ध्यान में रखना होगा कि जिस देश में करोडों लोगों के पास खाने को नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं, सर पर छ्त नहीं वहां भ्रष्टाचार नहीं होगा तो और क्या होगा. रही बात क़ानून की तो भ्रष्टाचार रोकने के लिए पहले से ही कई क़ानून मौजूद हैं. लेकिन जहां कुएं में ही भांग पड़ी हो वहां क्या हो सकता है.

  • 40. 19:33 IST, 10 अप्रैल 2011 Balwan Fauji, Rohtak:

    अगर हज़ारे जी को लगता है की वर्तमान शासक भ्रष्ट हैं, यहां तक कि उनके किसी भी पत्र का कोई उत्तर तक नहीं दिया गया तो फिर वो ऐसा कैसे सोच सकते हैं कि एक ड्राफ्ट समिति में अपने सदस्य शामिल करवा कर पूरे के पूरे भ्रष्ट शासन तंत्र को ही बदल देंगे. चूंकि पूरे शासन तंत्र में क़दम-क़दम पर भ्रष्ट अधिकारी बैठे हैं, ऐसे में हज़ारे जी जैसे कितने भी लोग चाहे कितनी भी कोशिश कर लें भ्रष्टाचार के कारणों की तह में जाए बगैर उसे मिटा नहीं सकते.

  • 41. 20:24 IST, 10 अप्रैल 2011 manoj kaushik:

    विनोद जी, ये हमारे देश की विडंबना है कि हम एकजुट नहीं हैं क्योंकि समाज में रहकर कहीं न कहीं हमने सिर्फ़ अपने लिए जीना सीख लिया है. जब तक इस देश के लोगों में एकजुटता नहीं आएगी तब तक हम भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित नहीं हो सकते.

  • 42. 21:10 IST, 10 अप्रैल 2011 Ashok Kumar:

    हज़ारे जी का कहना है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि यानि सांसद और विधायक जनता के सेवक हैं, लेकिन नेता ऐसा मानने को तैयार नहीं हैं. इसीलिए जनता को हक़ है कि वो इस तरह का आंदोलन करे. परन्तु ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि जनता ऐसे प्रतिनिधियों को चुनकर ही न भेजे. अगर जनता को लगता है कि किसी एक सीट के लिए सारे के सारे नेता भ्रष्ट हैं तो जनता को चुनाव का बहिष्कार कर देना चाहिए. ऐसे में राजनीतिक दलों को मजबूरन स्वच्छ छवि वाले नेताओं टिकेट देना ही होगा.

  • 43. 01:15 IST, 11 अप्रैल 2011 Prashant kumar Buxar,bihar:

    विनोद जी, अन्ना हज़ारे के अनशन ने ये सिद्ध कर दिया कि, ''सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं.'' ऐसा ब्लॉग लिखने के लिए धन्यवाद.

  • 44. 03:20 IST, 11 अप्रैल 2011 JOHAN KYLE:

    मुझे डिस्कवरी चैनल देखने का शौक़ रहा है. एक बार मैंने अंटार्कटिक पर एक कार्यक्रम देखा. उसमें दिखाया गया था कि गर्मियों में पेंगुइन कैसे वहां भोजन की तलाश में जमा होती हैं. वो लाखों की तादात में पहुंचती हैं. मगर बर्फीले पानी में पहले गोता लगाने की हिम्मत किसी की नहीं होती. वो इंतज़ार करती हैं किसी की पहल का क्योंकि नीचे पानी में विशालकाय समुद्री मछलियां भी भोजन की ताक में चक्कर लगा रही होती हैं. वहां सबसे बड़ा सवाल ये होता है कि कौन पहले गोता लगाकर पता लगाए कि नीचे ख़तरा नहीं है. उस लाखों की भीड़ में जो सबसे आगे खड़ा होता है उसे ज़ोर का धक्का लगता है और वो नीचे जा गिरता है. अब सब ये तमाशा देख रहे होते हैं कि वो ज़िंदा बाहर निकल पाता है या नहीं. जैसे ही वो सुरक्षित बाहर निकलता है किनारे पर खड़ी लाखों पेंगुइन गोता लगा देती हैं. इस कहानी से दो सीख मिलती है. जीने के लिए सबको भोजन चाहिए. हम भारतीय कुछ ऐसे ही बेचारे हैं. हम डरपोक हैं इसलिए हमेशा शूरवीरों की तलाश में रहते हैं. यही कि सबसे पहले कौन क़ुर्बानी दे. मगर हम ये ही नहीं समझ पाते कि अगर ठान लिया जाए तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है. एक आदमी काफ़ी होता है वक़्त को बदलने के लिए. मगर कोई अपनी ताक़त आज़मा कर तो देखे.जिस दिन हर एक घऱ से एक-एक हिंदुस्तानी देश की खातिर निकलेगा तब देख लीजिएगा हिंदुस्तान का हर एक गली-कूचा तहरीर चौक बन जाएगा और तब निकलेगा बदलाव का सूरज.

  • 45. 09:06 IST, 11 अप्रैल 2011 Arghya Pal:

    दिल्ली की सत्ता पर बैठे हुए उन राजनेताओं को तो ज़रा-सी शर्म भी नहीं है कि अन्ना को 'भ्रष्टाचार' जैसे मुद्दे को लेकर मरण अनशन पर बैठना पड़ा . हमारी सरकार ऐसे मुद्दे को जड़ से कैसे मिटाएगी जब वो सुनने तक को राज़ी नहीं थी. यहां पर ''16 दिसंबर'' फ़िल्म का एक डायलॉग याद आ गया - ''सौ में से निन्यानबे बईमान, फिर भी मेरा भारत महान.''

  • 46. 11:18 IST, 11 अप्रैल 2011 ashutosh:

    भ्रष्टाचार का मूल कारण हमारी परिवार व्यवस्था है. भ्रष्टाचार को केवल पैसे के आधार पर नहीं मापा जा सकता. जातिवाद, भाई-भतीजावाद, जुगाड़, आरक्षण, रिश्वत ये सब भी भ्रष्टाचार के ही अलग-अलग पहलू हैं. दरअसल भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह हमारा सामाजिक ढांचा है जिसमें सबसे पहले आता है हमारा परिवार, फिर जाति, धर्म और आख़िर में आता है देश.
    एक व्यक्ति जब अपने अपराधी रिश्तेदार को बचाने की कोशिश करता है तो क़ानून के शासन का कोई मतलब नहीं रह जाता और यहीं से प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है. भारत में भ्रष्टाचार बना रहेगा क्योंकि इस देश के लोग वैध तरीक़ों से जो कुछ भी हासिल कर पाते हैं उससे संतुष्ट नहीं होते और थोड़ा और हासिल करने के लिए भ्रष्ट आचरण करने को ग़लत नहीं समझते. चरित्र की ये दुर्बलता समाज के हर तबके में पाई जाती है चाहे वो कारोबारी हो या सरकारी मुलाज़िम या फिर कोई और.

  • 47. 13:06 IST, 11 अप्रैल 2011 atul patel :

    विनोद जी, अन्नाजी ने शुरुआत तो कर दी है अब हमें इसे आगे ले जाना है.

  • 48. 13:59 IST, 11 अप्रैल 2011 SUNIL DIXIT:

    अभी किसी सज्जन ने इसको सवर्ण बनाम दलित मुद्दा बनाने की कोशिश की फेसबुक में. ये शब्द उन्हें ही समर्पित हैं:
    लो हो गई जनमत को फाड़ने की तैयारी. सवर्ण, दलित, सिख, जैन इत्यादि-इत्यादि.
    पता नहीं इस तरह की प्रवृत्तियां कब ख़त्म होंगी हमारे समाज से.
    जैसे ही कुछ हुआ, कोई ज्ञानी चला आया अपना ज्ञान दिखाने,
    चाहे एक भी दलित बच्चे की फ़ीस न दी हो अपनी जेब से.
    लेकिन बस ठीक है भाई लगे रहो. नेता बन जाओगे तो हम भी सलाम करेंगे.

  • 49. 14:09 IST, 11 अप्रैल 2011 VIJAY RAJAK:

    सभी लोग पानी में हाथ मार रहे हैं, किसी की मछली में दिलचस्पी नहीं है. ब्लॉग का थीम भूला-भटका और दिशाहीन प्रतीत होता है. पाठक और ब्लॉग लेखक मिलकर एक अच्छा-खासा समाज बन जाता है और उनसे आशा की जाती है कि इस समुदाय को भारतीय समाज की रचना और संविधान का कुछ-कुछ आउटलाइन पता होगा. उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री और कैबिनेट संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं. संसद के प्रतिनिधि भारत की जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं. हमारा समाज और जनता ही नेताओं को चुनकर संसद में भेजती है. यानि संविधान ने सारी शक्ति जनता को दे रखी है. फिर जब रिमोट आपके पास है तो क्यों रोते हो भाई.

  • 50. 14:15 IST, 11 अप्रैल 2011 ABU FAYEZ:

    अति सुन्दर

  • 51. 14:47 IST, 11 अप्रैल 2011 dr ajay arya:

    आज भ्रष्ट और बेईमान लोग एक हो रहे हैं. सच्चे लोग अलग-थलग हैं. यही हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है.

  • 52. 17:43 IST, 11 अप्रैल 2011 PRAVEEN SINGH:

    समस्त घपले-घोटाले और भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करनेवाले भारतीय लोग ही हैं. अगर समाज के लोग सज्जन और ईमानदार व्यक्तियों को सांसद या जन प्रतिनिधि बना कर भेजें और स्वस्थ लोकतंत्र बनाने की चेष्टा करें तो भ्रष्टाचार कभी सिर नहीं उठा सकेगा.

  • 53. 21:21 IST, 11 अप्रैल 2011 himmat singh bhati:

    विनोद जी तहरीर चौक से चली परिवर्तन और बदलाव की आंधी ने भारत में दस्तक दे दी है. अन्ना हज़ारे और उनके सहयोग से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस तरह जनता जुड़ी है ये कोई ख़्वाब नहीं है. जब जनता के सहयोग से पहले क़दम पर क़ामयाबी हासिल हुई तो कई लोग भौचक्के रह गए हैं उन्हें यक़ीन नहीं हो पा रहा कि अन्ना हज़ारे ने आम जनता के सहयोग से इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया और ऐसी क़ामयाबी हासिल कर ली.

  • 54. 06:03 IST, 12 अप्रैल 2011 arvind kr pappu:

    हमारे देश की ये सबसे बड़ी त्रासदी है कि हम बेचारे हैं.

  • 55. 12:35 IST, 12 अप्रैल 2011 Rohit Srivastava:

    इस आंदोलन के ज़रिए अन्ना हज़ारे ने एक नई दिशा दी है इस देश के युवाओं को. देश के राजनीतिक आकाओं को एहसास तो हुआ कि वो ग़लत हैं और अगर फिर भी ग़लती दोहराते रहे तो ये धुँआ कब आग में बदल जाएगा उन्हें पता भी नहीं चलेगा. अन्ना को धन्यवाद.

  • 56. 13:30 IST, 12 अप्रैल 2011 टी एन दुबे:

    विनोद वर्मा जी विचार रखने के लिए धन्यवाद....

    आजादी की लड़ाई के दौरान गांधीजी को लेकर भी अंग्रेजों में कुछ ऐसा ही भ्रम था.. ये अकेला आदमी हिंदुस्तानियों का क्या भला कर सकता है जो आपस में लड़ते झगड़ते हैं... इन सभी को फिरंगी हुकूमत के खिलाफ एक साथ लाना मेंढ़क को तराजू पर तौलने की तरह है... जो कभी नहीं हो सकता... आश्चर्य की गांधी ने ऐसा किया और फिरंगियों को देश छोड़ना पड़ा। गांधीजी ने लोगों की दमित और बिखरी प्रतिरोधी भावनाओं को एक मंच दिया और खड़ा हो गया एक व्यापक जनआंदोलन...अन्ना भी आज कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। अन्ना की आवाज इस देश की आवाज है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ उठी है। भले भ्रष्टाचार के खिलाफ जंतर मंतर पर बैठे आपको केवल एक हजारे दिखाई दे रहे हैं बाकी एक अरब इक्कीस करोड़ लोग बेचारे.... लोकतंत्र में विचार रखने की आजादी है हर किसी को है और सभी अपनी बात रख सकते हैं... लेकिन ये भी सच है कि अन्ना भी एक अरब इक्कीस करोड़ में से ही निकले हैं... और वो एक व्यक्ति की आवाज नहीं बल्कि हिंदुस्तान की आवाज हैं। क्योंकि पूरा हिंदुस्तान उनके साथ हैं.. उनका विरोध या अन्ना की सफलता पर वही सवाल उठा रहे हैं जो बाल की खाल निकालना जानते हैं या फिर किसी पार्टी की ओर से प्रोजेक्टेड लोग हैं जो किसी न किसी रुप में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। हमें इन बातों में न पड़कर आंदोलन की सफलता और भ्रष्टाचार के खात्में के बारे में सोचना चाहिए। हम ये क्यों नहीं देखते की आंदोलन में अगर कुछ ही लोग शामिल हुए तो क्या हुआ...कोई पैसा खिलाकर नहीं बुलाया गया था जो भी यहां आया स्वतः चलकर आया। और जो दिखे नहीं उनका दूर से ही सही उनका समर्थन जरुर था अन्ना के साथ जो आगे भी रहेगा। तो हमे इन बातों में पड़ने के बजाय की इस आंदोलन का हस्र भी जेपी या दूसरे टांय टांय फिस्स आंदोलन की तरह हो जाएगा.... फिलहाल लोकपाल और भ्रष्टाचार के खिलाफ खात्मे जैसे मुद्दे पर देना चाहिए... जो जनता भी चाहती है..... और अन्ना भी।

  • 57. 15:45 IST, 12 अप्रैल 2011 pankaj saxena:

    वाकई ये सच है. अब हमें भी अपने भ्रष्ट और उम्रदराज़ नेताओं को बता देना होगा कि सत्ता उनकी अय्याशी का ज़रिया नहीं.

  • 58. 16:23 IST, 12 अप्रैल 2011 BHEEMAL:

    एक लंबी और गहरी साज़िश है जिसे भारतीय देख नहीं सकते. कभी मानवाधिकार, कभी स्वायत्तता, कभी नक्सल, कभी कालाधन तो कभी भ्रष्टाचार का मुखौटा पहन कर विदेशी शक्तियाँ सारा आयोजित करवा रही हैं. ये देश को अस्थिर करने की साज़िश है. कोई नेता, पत्रकार या बुद्धिजीवी शायद इसका अंदाज़ा नहीं लगा पाएगा.

  • 59. 16:32 IST, 12 अप्रैल 2011 lovely:

    अभी तो ये शुरुआत हुई है. ये एक कटु सत्य है.

  • 60. 15:39 IST, 13 अप्रैल 2011 BHEEM SINGH:

    ये तो भारत को अस्थिर करने की विदेशी ताक़तों की साज़िश लगती है.

  • 61. 08:13 IST, 14 अप्रैल 2011 subhash bhadu:

    अन्ना हज़ारे जी के अहिंसक आंदोलन ने सच्चाइयों के रास्ते पर चलने वालों को एक संकेत दिया है कि आपकी संख्या बेशक कम हो लेकिन सत्य की ताक़त हमेशा अच्छा परिणाम देती है.

  • 62. 14:11 IST, 14 अप्रैल 2011 Narendra Kumar Gahlot:

    भ्रष्टाचार इतना फैल चुका है कि ये कहना मुश्किल है कि कौन भ्रष्ट है और कौन नहीं. पूरी दुनिया में क्रांति हो रही है. अब तो यहाँ भी क्रांति होकर रहेगी. लोकतंत्र की आंधी चल रही है. हर पार्टी, हर संगठन और हर समाज में लोकतंत्र आकर रहेगा.

  • 63. 14:17 IST, 14 अप्रैल 2011 Narendra Kumar Gahlot:

    पूरे भारत को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जगाने के लिए अन्ना हज़ारे जी को धन्यवाद.

  • 64. 14:21 IST, 14 अप्रैल 2011 Narendra Kumar Gahlot:

    अन्ना हज़ारे को बहुत बहुत धन्यवाद.

  • 65. 16:53 IST, 21 अप्रैल 2011 TAHIR KHAN:

    अन्ना हज़ारे जैसे यदि 2-4 हो जाएँ तो भारत से भ्रष्टाचार का नामो निशान मिट जाएगा और देश की ज़्यादा तरक्की होगी.

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