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पूरा हुआ ख़्वाब

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|रविवार, 03 अप्रैल 2011, 23:05 IST

उन्होंने जो कहा वह पूरा कर दिखाया.

इसके बावजूद कि भारत विवादास्पद परिस्थितियों में टॉस हार गया.

इसके बावजूद कि आखिरी पाँच ओवरों में माहेला जयवर्धने और परेरा की आतिशी बल्लेबाज़ी ने करीब करीब मैच भारत की पहुँच से बाहर पहुँचा दिया.

इसके बावजूद कि पारी की दूसरी ही गेंद पर ख़तरनाक सहवाग पैवेलियन लौट गये.....
और इसके बावजूद कि 31 का स्कोर पहुँचते पहुँचते महान तेंदुल्कर ने भी श्रीलंका के फ़ील्डरों को अपनी पीठ दिखा दी.....

पूरे वानखेड़े स्टेडियम के साथ साथ पूरे भारत में सन्नाटा पसर गया.

पर तभी अब तक साधारण फ़ॉर्म में चल रहे गौतम गंभीर और विराट कोहली ने तय किया कि दो अप्रैल का दिन उनका दिन होगा.

अच्छा ये होता कि गंभीर शतक लगाते लेकिन उनके 97 रन किसी शतक से कम नहीं थे. 114 के स्कोर पर जब विराट विदा हुए तो धोनी ने युवराज को भेजने के बजाय अपने आप को प्रमोट किया और करीब करीब हर बॉल पर रन बनाते हुए भारत के स्कोर को श्रीलंका के स्कोर के नज़दीक ले गए.

अंतत: धोनी ने छक्का लगा कर भारत को छह विकेट से जीत दिलवाई.

भारतीय क्रिकेट को दरकार थी आत्मविश्वास से भरपूर खिलाड़ियों की. 1983 में विश्व कप जीतने वाली कपिल की टीम में भी इस जज़्बे की कमी थी. सौरव गाँगुली ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी जिसे फ़िनिशिंग टच दिया धोनी के रणबाँकुरों ने.

इस फ़ाइनल का डिफ़ाइनिंग मोमेंट था जब पूरी भारतीय टीम ने सचिन को कंधे पर बैठा कर पूरे मैदान का चक्कर लगाया. गावस्कर ने कहा इस तरह के क्षण किसी खिलाड़ी के जीवन में एकाध बार ही आते हैं.

मैच के बाद वह पिच तक गए.... इसकी मिट्टी को छुआ और उसे अपने माथे से लगा लिया.

वानखेड़े पर सचिन अपना सौंवा शतक भले ही न लगा पाए हों लेकिन उनका विश्व कप जीतने का सपना इस धरती पर ज़रूर पूरा हुआ. अभी वह रिटायर नहीं होने जा रहे.

रिकॉर्ड तोड़ने के और भी कई मौके उनके पास आएंगे. उनको और सारे भारत को बधाई!

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 00:55 IST, 04 अप्रैल 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    सचिन को टीम की जीत से ज्यादा अपने रिकार्ड की फ़िक्र होती है..

  • 2. 10:38 IST, 04 अप्रैल 2011 RAJ THAKUR:

    भारत की भव्य जीत पर उत्तराखंड में भी हर्ष का माहौल है और मुख्यमंत्री ने कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को उत्तराखंड रतन पुरस्कार देकर उनका सम्मान किए जाने की घोषणा की है.

  • 3. 11:30 IST, 04 अप्रैल 2011 shantanu gautam:

    करोड़ों नवयुवक का सपना. वर्ल्ड कप हो अपना. पूरा हो गया है. सब की आँखें नम हो गईं. धन्यवाद इंडिया.

  • 4. 12:02 IST, 04 अप्रैल 2011 naval joshi:

    कहा जाता है कि किसी भी बात की अति ठीक नहीं होती है।जाहिर है कि क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं है।खेल के रोमांच को उन्माद में बदलने का जिनको लाभ मिलता है वे तो खेल के नाम पर दंगें कराने से भी नहीं चूकते है। इनमें सटोरिए, विज्ञापन के प्यापारी ,खेल संघ से लेकर देश के वे नेता तक जो लोगों का ध्यान समस्याओं से हटाना चाहते हैं, खेल का इस्तेमाल अपने हित के लिए करते हैं यह किसी से छुपा नहीं है। लेकिन बीबीसी ने जिस तरह इस टूªनामेंट की कवरेज की उससे लगा कि बीबीसी ने इस आयोजन पर अपनी कोई छाप नही छोडी बल्कि उन्माद जैसी स्थिति यदि न भी हो तो आवेश के क्षण बीबीसी की रिपोर्टो में भी आये हैं यह थोडा निराशा पैदा करने वाली बात है।रेहान फजल जी ने अपने ब्लाग में लिखा है कि रिकार्ड बनाने के अभी और भी मौके आयेगें ,इस बात का क्या मतलब हो सकता है यह समझ में नहीं आया। क्रिकेट या कोई भी अन्य खेल रिकॉर्डो के लिए नहीं खेला जाता है। यह सिर्फ चोंचलेबाजी है किसी खिलाडी की महानता को गणितीय रूप से श्रेष्ठ साबित करने की।ताकि विज्ञापन कम्पनियां उस खिलाडी की विश्वसनीयता का अधिकतम उपयोग अपने लाभ कमाने में कर सके ।हमने देखा है जब उस्ताद बिस्मल्लाह खान साहब शहनाई बजाते थे तो वे उनका सौन्दर्य शहनाई के जरिए जाहिर होता था ।इस बात का क्या रिकार्ड हो सकता है।या उसे कैसे समझा जा सकता है। इसी तरह अनेको विधायें हैं जिनका कोई पैमाना या रिकार्ड नहीं हो सकता है। खेल भी इसी तरह की एक विधा है जिसमें उच्चतम मूल्यों का प्रदर्शन होता है कभी कोई खिलाडी उस स्थिति तक पहुँच सकता है कि वह उच्चतम मूल्यों का प्रतिरूप हो जाए। लेकिन जिन संदर्भों में रेहान जी ने रिकॉर्डों की उम्मीद की है। उसका क्या मूल्य है।इससे केवल वही कम्पनी वाले लाभान्वित होगें जिसके लिए ये खिलाडी विज्ञापन अनुबन्ध करते हैं ।एक खेल में भारत का प्रदर्शन ठीक रहा है । लेकिन अब असली खेल शुरू होने वाला है जब ये खिलाडी अपनी छवि का इस्तेमाल हमारे बच्चों के दिलो-दिमाग में इस तरह से करेंगें कि फालतू चीजें मंहगें दामों पर खरीदने के लिए हम अभिशप्त होगें। इस खेल का रिकार्ड भी रेहान जी रखना पंसद करेंगे!

  • 5. 12:20 IST, 04 अप्रैल 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    भाई नवल जोशी ने शानदार आकलन किया है और रेहान साहब मेरे ख़्याल से अगर कोई बादशाह अकबर की तरह भारत में नया धर्म क्रिकेट का शुरू करदे तो करोड़ों लोग उस धर्म के अनुयायी बन जाएँगे. बीबीसी ने तो अपना धर्म, अपना सब कुछ इस खेल को दे दिया. लगता है हिंदुस्तान में बर्बादी इस खेल से ही होगी.

  • 6. 13:40 IST, 04 अप्रैल 2011 SHAHNAWAZ ANWAR , SAHARSA ( BIHAR):

    हिंदुस्तान पिछले 28 सालों से आत्मविश्वास का कमी को लेकर विश्व कर में हारता रहा है. लेकिन धोनी ने जिस तरह टीम इंडिया के कैमिकल रिएक्शन में कैटिलिस्ट की भूमिका निभाई है वो एक अगल पदार्थ पैदा कर गई है... जिसे शायद भारत आने वाले कम से कम 20 सालों तक संजोकर रखना चाहेगा.

  • 7. 14:44 IST, 04 अप्रैल 2011 Shadab Imam:

    खेल तो खेल है साहब, हिंदुस्तान की बात है, धन्यवाद इंडिया.

  • 8. 16:05 IST, 04 अप्रैल 2011 raza husain:

    बहती गंगा में सभी धोते हैं. क्रिकेट जैसी बहती गंगा में मीडिया, राजनेता, बॉलीवुड, उद्योगपति, विज्ञापन कंपनियां सभी गंगा में गोते लगा रहे हैं. अब तो हम क्रिकेट में वर्ल्ड चैंपियन हो गए हैं. एक हिंदुस्तानी होने के नाते में भी यही चाहता था कि इंडिया जीते. मेरा एक ही सवाल है इस मुल्क की जनता, मीडिया, बॉलीवुड, राजनेताओं और उद्योगपतियों से. इस देश में हॉकी, फ़ुटबॉल, जैसे और भी खेल खेले जाते हैं. क्या कभी इन खेलों और खिलाड़ियों पर कभी देश की नज़र पड़ी है? या सिर्फ़ क्रिकेट ही रहेगा. हमारे मुल्क में अगर सिर्फ़ क्रिकेट पर ही पैसे और इज़्ज़त की बौछार होती रहेगी तब वो दिन दूर नहीं जब कोई फ़ुटबॉल या हॉकी में नहीं आना चाहेगा. हमारी इन गंभीर बातों पर मीडिया ज़रा गंभीर होकर विचार करे.

  • 9. 19:05 IST, 04 अप्रैल 2011 Tarun k Thakur:

    क्रिकेट कभी अपनी ज़िंदादिली और जांबाज़ी के लिए जाना जाता था, बदलते नियमों ने जहां तेज गेंदबाजी को मलिंगा जैसे गेंदबाज़ के हाथ पहुंचा दिया वही इस खेल की सर्वोच्च संस्था मुरली जैसे खिलाड़ी को विश्व रिकार्ड बनाने के लिए आधारभूत नियम तक बदल डालती है. अगर गेंदबाजी की वह धार कायम रहने दी जाती तो कई भगवानों को आइना देखना पड़ता मगर जिस तरह नियमों का बहाना बना कर भारतीय हाकी को कुचला गया, उसी तरह वेस्ट इंडीज़ के खेल को बोथरा करने के सारे प्रयास किये गए और इसी संस्करण में टी20 का बच्चों वाला क्रिकेट लाकर पहले ही इस खेल के चाहने वाले और समझने वाले दिलों को कब का तोड़ा जा चुका है. अब तो ये एक मंडी है जिसमे सब बिकता है और इस मंडी के दलाल कौन है सब जानते है.

    आज बदल चुके परिवेश और प्राथमिकताओं के दौर में पिछड़ चुके भ्रष्ट देश के लिए 28 वर्ष के बाद मिला यह कप किसी दकियानूसी परिवार में, बुढापे में जन्मे बालक , जैसा है. इस पर मिल रही प्रतिक्रियाएं तो हमारे नितांत खाप समाजी सोच को ही बताती है. जिस खेल ने राष्ट्रीय खेल सहित सभी प्रतिभाओं को साबुत निगल लिया हो उसके प्रति अति दीवानगी दिखाती भीड़ में वो पालक भी होंगे जिनके नौनिहाल कई क्षेत्रों में देश का नाम रौशन कर सकते होंगे और हम ऐसा चरित्र दिखाए भी क्यों ना, आखिर गर्व करने के लिए , बलात्कारी भ्रष्ट और गरीब देश के पास यही तो उपलब्धि है.
    ग़ालिब चचा का शेर याद आता है "हमको मालूम है जन्नत की हक़ीकत लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है."

    भारत जैसा देश जिसकी ना मालुम कितनी जनसंख्या , खिलौना बन चुकी गरीबी रेखा के नीचे सड कर मरने के लिए मजबूर कर दी गयी है | जो देश शिक्षा तक का विनिवेश करने पर उतारू है | उस देश के तथाकथित बुद्धिजीवी नेता , जिनमे देश के सर्वोच्च आसनों पर विराजित महानुभाव भी है , आज सभी मेहनत से कमाई देश कि पूजी खेल तमाशों पर लुटाने को बैचैन दिखते है | ये इस देश के लिए घोर शर्म और निराशा का विषय है की इसने तुच्छ स्वार्थी घरानों और प्रतिष्ठानों का हित साधने के लिए अपना विवेक भी घिनौने शो बाजार के बिस्तर पर चढ़ा दिया है |
    जनता वही स्वांग रचती है जिसको महामना अपनाते है तो किस मुह से हम अपनी अगली पीढ़ी को मानवता के पाठ पढ़ा कर ये अपेक्षा रख पायेंगे की वो देश कि सदियों पुरानी साख को बढाए ना सही बरकरार ही रख सके | इस जूनून को देख कर तो भविष्य गर्त में जाता दिखता है |

    शर्म करो इंडिया शर्म करो !!!

    my blog : www.whoistarun.blogspot.com

  • 10. 19:48 IST, 04 अप्रैल 2011 सुखदेवसिंह चौहान 4 के डी:

    एक साथी ने लिखा है कि सचिन को टीम की जीत से ज्यादा अपने रिकार्ड की फ़िक्र होती है. मेरे विचार से तो ये कहना बिल्कुल गलत है. सचिन सिर्फ देश के लिए खेलते हैं. इस दौरान रिकार्ड अपने आप बन जाते हैं तो बेचारे सचिन का क्या दोष है. दूसरी बात अच्छा खेलेगे तभी रिकार्ड बनता है और टीम भी जीतती है. मीडिया में भी इनदिनों ये चर्चा रही है कि सचिन जब जब शतक बनाते है तो भारतीय टीम मैच नही जीतती है. लेकिन आप ये क्यों नही देखते की सचिन के शतक हमेशा मुश्किल समय में ही बने है. इसमे यदि बाकी खिलाड़ियों का प्रदर्शन कमजोर रहा तो टीम हारी है. इसमें सचिन का क्या दोष है? सचिन ने शतक लगाकर भी अकेले दम पर टीम को मैच जितवाए है. याद करो शारजाह में भारत ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला जब सचिन ने शतक लगाकर 41 ओवर में ही टीम को जीत दिलाकर फाइनल में पहुचाया और फिर फाइनल में भी शतक लगाकर टीम इंडिया को विजेता बनाया. सचिन की उस बैंटिंग के लिए शेनवॉर्न ने कहा था कि उसे सपने में भी सचिन छक्के लगाते दिखते हैं. ऐसा खिलाड़ी भारतीय टीम में है इसका हमे फ़क्र होना चाहीए.


  • 11. 21:25 IST, 04 अप्रैल 2011 mksankhu:

    121 करोड़ भारतीयों का सपना साकार हुआ है. जो अदभुत है. 'गो इंडिया गो'. ऐसा दिन हर चार साल में आए.

  • 12. 21:51 IST, 04 अप्रैल 2011 Bikash Rao, Journalist, New Delhi :

    क्रिकेट जीता पर भारत हारा !
    क्रिकेट विश्व कप जीत कर भारत विश्व विजेता बन गया है. एक भारतीय होने के नाते मुझे भी टीम की इस उपलब्धि पर गर्व है और मैं टीम को इसके लिए बधाई देता हूं. लेकिन विश्व कप शुरू होने से लेकर जीत के बाद तक के पूरे घटनाक्रम को देखते हुए मेरे मन में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. मुझे लगता है कि इस विश्व कप में केवल क्रिकेट जीता है जबकि देश हार गया है.
    इसके पीछे कई तर्क हैं. क्रिकेट इस मायने में क्योंकि क्रिकेट अब केवल खेल भी नहीं रह गया है बल्कि यह तो कारोबार का खेल बन बया है. इस महाकुंभ में आईसीसी, बीसीसीआई, क्रिकेट खिलाड़ी, आयोजक, प्रसरक आदि सबने जमकर धन बटोरा है. जीत के बाद तो टीम इंडिया की प्रशंसा में कसीदे पढ़े जा रहे हैं और उनपर चारों ओर से धनवर्षा हो रही है. बीसीसीआई, केंद्र सरकार, राज्य सरकारें सभी ने अपने-अपने तरीके से करोड़ों रुपये पुरस्कार के रूप में देने की घोषणा कर दी है. उधर कॉर्पोरेट जगत ने भी खिलाडिय़ों को हाथों हाथ लेना शुरू कर दिया है. हालांकि क्रिकेट खिलाड़ी तो पहले से ही कंपनियों की गोद में पलते रहे हैं लेकिन इस जीत ने उनके भाव सातवें आसमान पर पहुंचा दिए हैं. किक्रेट का सबसे बड़ा कारोबारी अड्डा बन चुके भारत में अब क्रिकेट का और नया तमाशा शुरू होने वाला है. बस सब तमाशाबीन बन कर देखते रहिए.

  • 13. 21:55 IST, 04 अप्रैल 2011 Sharad Agrawal:

    विश्व कप जीतना ना ही आसान है और ना ही सिर्फ़ भाग्य की बात है. जिसने भी टीम इंडिया को बनाने में मदद की है हमें उनसब की तारीफ़ करनी चाहिए.प्रबंधन के सलाहकारों को इससे कुछ सीखना चाहिए और हर टीम बनाने के कार्यक्रम में इस घटना को एक केस की तरह शामिल किया जाना चाहिए. भारत को टीम इंडिया पर गर्व है.

  • 14. 22:14 IST, 04 अप्रैल 2011 Rashmi Kant:

    भाई नवल जी की टिप्पणी से मै शत प्रतिशत सहमत हूँ. ये क्रिकेट ही एक ऐसा खेल है जिसमे हरेक बॉल पर कोई न कोई रिकॉर्ड बनता है. ये भी सही है कि इन खिलाडियों का कोई सामाजिक सरोकार नहीं है. साबुन, तेल, कोक,पेप्सी और ऐसी ही अनगिनत चीजें ही उनका धर्म है. हमारे बच्चे उनकी बातों पर आंख मूंदकर विश्वास करते है, हम ब्लैक मेल किये जाते है. कोई मुझे बताए कि इस वर्ल्ड कप के पा जाने से कितने भूखे, बीमार, बेरोज़गार जो कि हमारे देश कि आधी आबादी है, के जीवन में क्या सकारात्मक परिवर्तन आ जायेगा ?

  • 15. 22:51 IST, 04 अप्रैल 2011 dkmahto:

    कुछ लोग खेल को बिजनेस बना लेते हैं,
    कुछ बिजनेस को भी खेल.
    जो इसको समझा,
    वो तो लुटने से बच जाता है,
    और जो नहीं,
    उसको भगवान भी नहीं बचा पाता है.

  • 16. 13:01 IST, 05 अप्रैल 2011 ganga dhar dwivedi:

    शुक्रिया रेहान साहब. आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है. क्या इसे मैं आपकी आवाज़ में सुन सकता हूं.

  • 17. 17:07 IST, 05 अप्रैल 2011 zaky:

    रेहान फज़ल भाई साहब आदाब!
    हम वर्ल्ड चैम्पियन तो बन गए, लेकिन जिस तरह से विजय समारोह में कैप्टन कूल यानि महेंद्र सिंह धोनी को नज़रअंदाज़ा किया गया, वो शर्मनाक था. जिस तरह का सम्मान हमें अपने कप्तान को देनी चाहिए थी नहीं दी. क्या सभी खिलाड़ियों को एक साथ मिलकर कप के साथ फ़ाइल फ़ोटो नहीं खिचवानी चाहिए थी, जिस तरह से 1983 कप जीतने के बाद कपिल देव साहब को कप के साथ दिखाया गया और उन्हें इज़्ज़त दी गई, वह हमारे कैप्टन कूल को नहीं मिली, जो कि शर्मनाक है. कम से कम कुछ देर के लिए कप के साथ कप्तान के साथ सभी खिलाड़ी को मैदान में चक्कर लगाना चाहिए था.यह ब्लॉग ज़रूरी नहीं कि सभी लोगों को पसंद आए, फ़ाइनल मैच में जो कुछ घटना घटी, वह कोई अनहोनी घटना नहीं थी. हो सकता है कि कुछ लोगों को भारत के खिलाड़ियों पर भरोसा नहीं रहा हो, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि पूर टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने जिस टीम स्प्रीट का मुज़ाहिरा किया, वह क़ाबिले तारिफ़ और लाजवाब है. इस वर्ल्ड कप ने भारतीयों प्रशंसकों को संदेश दिया है कि भारतीय क्रिकेट अब किसी एक या दो खिलाड़ी के ईर्द-गिर्द नहीं घुमती, बल्कि हमारे तमाम 11 के 11 खिलाड़ी महत्वपूर्ण हैं. अगर आप में जोश और जज़्बा है, और आपके पास इतने बेहतरीन कप्तान और कोच हैं तो भारत में क्रिकेट का स्तर कितना ऊंचा जा सकता है, यह वर्ल्ड कप जीतने के बाद आपको पता लग गया होगा.
    जहां तक आपका मानना है कि भारत के शुरू के दो विकेट गिर जाने के बाद पूरे भारत में सन्नाटा पसर गया, सच नहीं है, और यह कहना कि आख़िरी पाँच ओवरों में माहेला जयवर्धने और परेरा की आतिशी बल्लेबाज़ी ने क़रीब क़रीब मैच भारत की पहुँच से बाहर कर दिया था, सिर्फ आपकी की और आप जैसे लोगों की सोंच हो सकती है, हमें तो सौ फ़िसदी यक़ीन था कि हम चैम्पियन बनेंगें. खेल के हर क्षेत्र में चाहे गेन्दबाज़ी हो या बल्लेबाज़ी सभी की कारकर्दगी अच्छी रही थी. इसलिए हमें पूरा यक़ीन था कि कप हम ही जीतेंगे. पिछले रिकार्ड गवाह हैं कि ना सचीन और ना ही सहवाग का फ़ाइनल में टीम के लिए योगदान अच्छा रहा है. आपको इनके अलावे किसी और खिलाड़ी पर यक़ीन भी नहीं होगा. आपने गौतम गंभीर और विराट कोहली के खेल को साधारण फ़ॉर्म में होना बताया, जो कि बिल्कुल ग़लत है और दिल तोड़ने वाला है, आपको पता होना चाहिए कि फ़ाइनल से पहले गौतम गंभीर और विराट कोहली ने क्रमशः 296 व 247 बना लिए थे, और आप उसे कह रहे है, साधारण फ़ार्म वाले खिलाड़ी. क्या यह मज़ाक़ नहीं है.
    और जहां तक कैप्टन कूल महेन्द्र सिंह धोनी जी का सवाल है, जिस तरह की प्रशंसा और तारिफ़ उसकी होना चाहिए थी, किसी ने भी उनकी बैटिंग पर ज्यादा कुछ नहीं कहा.हर कोई या तो सचिन की या कोच गैरी कर्स्टन की तारिफ़ कर रहा है क्या महेन्द्र सिंह इसके लायक़ नहीं थे कि उनके बारे में कोई कुछ कहता. अभी भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो कि महेन्द्र सिंह धोना जी को सिर्फ़ एक लकी कैप्टन ही मानते है, और कहते हैं कि सौरभ गाँगुली ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी जिसे फ़िनिशिंग टच दिया धोनी के रणबाँकुरों ने, जो कि बिल्कुल हास्यादपद है. अगर ऐसी बात होती तो महेन्द्र सिंह धोना की टीम आईपीएल चैम्पियन और फिर चैम्पियन लीग की चैम्पियन नहीं बन सकती. वह एक ऐसा होनहार खिलाड़ी है, जिसने कभी भी अपने लिए नहीं, बल्कि अपने देश और टीम के लिए खेला, जिसकी बदौलत उसने हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल की और जितना ऊंचाई उसने छुई है वह किसी ने भी नहीं छुई. हमारे कैप्टन कूल ख्वाब नहीं देखते बल्कि हक़ीक़त को पहचानते हैं. ख्वाब वह देखते हैं जिसे पाने की उम्मीद न हो. लेकिन हमारे इस वीर ने वह कर दिखाया जो ख्वाब नहीं हक़ीक़त है. वैसे वर्ल्ड कप जितना सिर्फ़ कुछ खिलाड़ियों का सपना नहीं हो सकता, बल्कि सारे भारतवासी का सपना था.

  • 18. 21:17 IST, 05 अप्रैल 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    रेहान भाई ग़ालिब ने कहा है कि हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले.फिर भी इस उपलब्धि की उपलब्धि कम नहीं हो जाती.लेकिन यह भी सच है कि खेल का हमारे जीवन पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है.वास्तव में मेरा ख़्वाब तो तब पूरा होता जब देश से भ्रष्टाचार का अंत हो जाता.

  • 19. 13:22 IST, 06 अप्रैल 2011 farhat farooqi:

    अच्छा लगता है जब देश जीतता है. हमारे लिए ये गर्व की बात है. लेकिन इससे भी ज़्यादा ज़रूरी काम हो सकते हैं, जब हम वाक़ई गौरवान्वित महसूस कर सकते हैं. वो तब होगा जब हम देश को भ्रष्टाचार मुक्त देश बना सकेंगे, जब हम देश में पूर्ण साक्षरता ला सकेंगे, जब देश से भूखमरी और दरिद्रता पूरी तरह से दूर हो जाएगी, जब लिंग भेद की कलुषित मानसिकता से छुटकारा पा जाएंगे और जब हम आपसी वैमनस्य को दिल से भुला कर एक साथ देश की प्रगति के भागीदार बन सकेंगे. क्रिकेट का खेल आज सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यापार बन कर रह गया है. क्रिकेट के नाम पर जिस तरह से अंधाधुंध पैसा बनाया जा रहा है उससे बड़ी कंपनियों और ऊंचे लोगों की पौ बारह हो रही है. खिलाड़ियों पर तो अरबों रुपए न्योछावर किए जा रहे हैं. बीसीसीआई का पूरा टैक्स माफ़ कर दिया जा रहा है. आख़िर ये आम जनता को क्या दे रहे हैं? हम दिन-रात मेहनत करते हैं, ऊपर से भारी-भरकम टैक्स भी चुकाते हैं और हमारा पैसा उद्योगपतियों और नेताओं की झोलियां भर रहा है. मीडिया इस क़दर बरगलाने का काम कर रही है कि बेचारा एक मज़दूर जो रोज़ कमाता और रोज़ खाता है वो अपना काम-धंधा छोड़ कर मैच देखने में समय बर्बाद कर देता है और उसके घर वाले दो जून की रोटी को तरसते रह जाते हैं. क्रिकेट से आम जनता का पेट नहीं भरता. आम जनता ज़रा सोचे कि इस विश्व कप से उसे क्या मिला. यही कि हमने समय और पैसे की बर्बादी की, साथ ही कहीं ना कहीं अपने बड़बोलेपन से पड़ोसियों से संबंध में खटास पैदा की. कितनों ने तो जोश में होश खोकर अपनी जान भी गंवा दी. इसलिए खेल को सिर्फ़ खेल ही रहने दिया जाए तो अच्छा है वर्ना हमारा-आपका तो सिवा नुक़सान के कुछ फ़ायदा होनेवाला नहीं है.

  • 20. 13:34 IST, 06 अप्रैल 2011 jeeva afghanistan:

    भारत को ईश्वर का आशीर्वाद इसी तरह मिलता रहे.

  • 21. 16:15 IST, 06 अप्रैल 2011 mukesh gomey:

    सचिन को अपने रिकॉर्ड की ज़्यादा फ़िक्र होती है.

  • 22. 21:21 IST, 06 अप्रैल 2011 Maharshi Subhash:

    मानव ने खेल इसलिए विकसित किया जिससे उसकी हिंसा की ऊर्जा अहिंसात्मक रूप से खर्च हो जाए. वास्तव में खेल युद्ध का अहिंसात्मक रूप है जिसमें मनुष्य की युद्ध करने की प्रवृत्ति का निराकरण हो जाता है. वही खिलाड़ी खेल में उत्कृष्ट हो सकता है जिसके अंदर बहुत सी ऊर्जा युद्ध के रूप में निकलना चाहती हो. धन और यश की कामना भी हिंसा का ही रूप है.

  • 23. 04:47 IST, 07 अप्रैल 2011 farid ahmed :

    सचिन अपने लिए खेलें या हिंदुस्तान के लिए, उनके बल्ले से बना रन भी तो टीम की जीत के काम आता है.

  • 24. 13:04 IST, 07 अप्रैल 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    आपके माध्यम से भारतीय टीम को बधाई देना चाहूंगा. बेशक हमारी टीम ने अच्छा प्रदर्शन किया. लेकिन श्रीलंकाई टीम ने भी ज़बर्दस्त प्रदर्शन किया है. खेल तो खेल है. जहां एक ओर भारतीय खिलाड़ियों की आंखों में जीत और खुशी के आंसू दिखे तो दूसरी और श्रीलंकाई टीम के चेहरों पर अच्छे प्रदर्शन के बाबजूद उदासी व हार की परछाईं दिखी. जीत के बाद के जश्न में मीडिया द्वारा खिलाड़ियों के प्रति भेदभाव व कुछ ही खिलाडियों का गुणगान देख-सुनकर बहुत निराशा हो रही है. इसी प्रकार की निराशा तब होती है जब हॉकी, फ़ुटबाल व अन्य खेलों के खिलाड़ियों को कोई पहचान नहीं मिलती. दुःख तब भी होता है जब एक तरफ तो पांच सितारा संस्कृति का शुमार हो और दूसरी तरफ कमरतोड़ मेहनत करने वाले खिलाड़ी यहां-वहां ऑटोरिक्शा में गुमनामी में धक्के खाते फिरते हों. कुल मिलाकर पूरी टीम ने अच्छा प्रदर्शन किया है और टीम की पीछे की टीम भी बधाई की पात्र है.

  • 25. 13:36 IST, 07 अप्रैल 2011 BHEEM SINGH:

    धन्य हो. आखिर मेहनत रंग लाई. जय हिंद

  • 26. 11:35 IST, 29 अप्रैल 2011 TAHIR KHAN PUTTHA (MEERUT):

    सचिन जैसा बल्लेबाज़ पूरे विश्व में नहीं मिल सकता और न ही उसके जितने कोई रिकॉर्ड बना सकता है. वाह सचिन, तुम यूं ही खेलते रहो और रिकॉर्ड बनाते रहो और भारत को जिताते रहो.


  • 27. 12:00 IST, 30 अप्रैल 2011 TAHIR KHAN PUTTHA(MEERUT).:

    भारत ने 28 साल बाद जीत कर दिखा दिया कि हम वास्तव में चैंपियन हैं जिसकी भारत को सख़्त ज़रूरत थी.

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