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हमारा काम है ख़बरें पहुँचाना!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|बुधवार, 30 मार्च 2011, 13:51 IST

बीबीसी के पत्रकारों के लिए एक उसूल है. आप जब काम पर आएँ तो अपनी राष्ट्रीयता को भूल जाएँ. यानी आप न भारतीय हैं, न पाकिस्तानी, न ही ब्रितानी. आप एक निष्पक्ष, तटस्थ पत्रकार हैं जिसका काम है बिना भेदभाव या पक्षपात के ख़बर लोगों तक पहुँचाना.

इस संस्थान के साथ सत्रह वर्ष के अरसे में मैंने इस बात का पूरी तरह ख़्याल रखा. पूरी निष्ठा के साथ अपनी भावनाओं को कभी अपने काम पर या अपनी लेखनी पर हावी नहीं होने दिया.

लेकिन दफ़्तर से बाहर की ज़िंदगी तो आपकी अपनी है. इसीलिए आज जब मैं ने फ़ेसबुक पर अपनी एक पाकिस्तानी रिश्तेदार का यह कथन देखा कि, 'हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब बुध के दिन...' तो स्वयं को यह लिखने से नहीं रोक पाई कि...'कम ऑन इंडिया यू कैन डू इट'.

मुझे लगता है क्रिकेट मैच एक ऐसी घटना है जिसमें आप की मन की भावनाएँ खुल कर सामने आ जाती हैं.

उस समय की मनस्थिति शब्दों में बयान करना आसान काम नहीं है.

हालाँकि आज भी अगर मैं बीबीसी के लिए क्रिकेट मैच कवर करूँगी या उस पर स्टोरी करूँगी तो भावनाशून्य हो कर करूँगी.

उस समय मैं भारतीय नागरिक नहीं बीबीसी की पत्रकार का दायित्व निभाऊँगी. किसी की जीत-हार मेरी रिपोर्टों को प्रभावित नहीं करेगी.

लेकिन दफ़्तर से बाहर निकलते ही हो सकता है मैं भारत के प्रदर्शन पर अपने मन की भावनाओं को प्रकट होने से न रोक पाऊँ.

क्या यह कुछ ग़लत होगा?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:20 IST, 30 मार्च 2011 Saagar:

    बिलकुल गलत नहीं होगा सलमा जी.

  • 2. 14:23 IST, 30 मार्च 2011 Navin Kumar:

    इसे कहते हैं सच्चा काम, सही प्रोफ़ेशनलिज़्म और सच्ची पत्रकारिता.

  • 3. 15:20 IST, 30 मार्च 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, आपका तो मुझे पता नहीं लेकिन मैंने बीबीसी के कई पत्रकारों को खुले आम भावुकता में बहते सुना है. रहा सवाल भारत और पाकिस्तान के सेमीफ़ाइनल का तो मेरे ख़याल में बीबीसी और बाक़ी सभी मीडिया ने दोनों के बीच जंग का माहौल बना दिया है.

  • 4. 15:53 IST, 30 मार्च 2011 Ajeet S Sachan:

    काम अपनी जगह है और निजी ज़िंदगी अपनी जगह और दोनों को अलग-अलग रखने में कोई बुराई नहीं है. मैं ख़ुद एक मल्टीनेशनल कंपनी के लिए काम कर रहा हूँ लेकिन दिल से चाहता हूँ कि मेरा काम हमारे देश को भी आगे ले जाए. और समय आने पर उसमें ख़ुद भी भागीदार हो सकूँ. वैसे, भारत का ग्लोबलाइज़ेशन होने के बाद यह बात तो हमने बहुत अच्छी तरह सीख ली है और मुझे इसमें कोई भी बुराई नज़र नहीं आती है.

  • 5. 17:17 IST, 30 मार्च 2011 ajeet kumar:

    एक पत्रकार होने के साथ-साथ आप या कोई भी एक इंसान है. और सभी इंसानों की अपनी भावनाएँ होती हैं. हम आपकी सच्ची भावना का सम्मान करते हैं.

  • 6. 18:00 IST, 30 मार्च 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    सलमा जी आपके कहने का मतलब बिलकुल साफ़ है, आप जो कहना चाह रही हैं वही कह रही हैं, जब आप दफ्तर से बाहर होती हैं तो भारतीय होती हैं और मुसलमान और महिला भी, यह आप की महानता है कि आप 'कम ऑन इंडिया यू कैन डू इट' कह पा रही हैं, यदि हम आप की जगह होते और उत्तर प्रदेश के या बिहार के होते भले ही हिन्दू होते अगर गैर बिरादर जीत रहा होता और गैर प्रदेश का सजातीय हार रहा होता तो हम भी यही कहते 'कम ऑन ठाकुर यू कैन डू इट' पर इंडिया की जगह ठाकुर लगा देते या ....!

  • 7. 19:22 IST, 30 मार्च 2011 rajendra motiyani:

    सलमा जी, बचपन से बीबीसी सुन रहा हूँ. अब पढ़ रहा हूँ. लेकिन कभी नहीं लगा कि आप लोग कभी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकते हैं. आप जैसे कुछ लोग ही बचे हैं जिनकी पत्रकारिता का हवाला दे कर बात की जा सकती है. वरना अब बचा क्या है. आप जैसे लोगों पर शक करना अपना विश्वास खोने जैसा है. आप लगातार लिखिए, यही इच्छा है.

  • 8. 20:27 IST, 30 मार्च 2011 आशुतोष कुमार सिंह:

    आपने बिल्कुल सही बात कही है.

  • 9. 22:53 IST, 30 मार्च 2011 SHAHNAWAZ ANWAR SINTU, DHALAN CHOWNK, SAHARSA (BIHAR) :

    पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसमें जात-पात, धर्म और देश से ऊपर उठ कर काम करना होता है. लेकिन निजी जीवन की बात हो तो भला अपने जज़्बात को कैसे रोक सकते हैं.

  • 10. 10:03 IST, 31 मार्च 2011 dharmendra :

    आप बिलकुल सही फ़रमा रही हैं.

  • 11. 10:18 IST, 31 मार्च 2011 dkmahto:

    सलमा जी तब तो आप ख़ुद समझ रही होंगी कि बीबीसी हिंदी का बंद होने की कगार पर पहुँचना कितना दुखद और निराशाजनक है. न केवल पत्रकारिता की दृष्टि से बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी. आशा है इस ओर भी आप लोग उसी प्रकार ज़रूर प्रयास करेंगे.

  • 12. 11:37 IST, 31 मार्च 2011 उमेश कुमार यादव:

    सलमा जी, एक अर्सा हो गया है बीबीसी सुनते हुए। कैलाश बुधवार जी से लेकर अचला जी ..... बस आप सबमें यही खासियत रही है कि आप पत्रकार रहे हैं...निष्पक्ष पत्रकार। यही ताकत है बीबीसी की। आज भारत में खबरिया चैनलों की भरमार है पर पत्रकारिता नहीं है, सिर्फ पीत पत्रकारिता है वहां। मन नहीं करता है उन्हें देखने का। उनसे तो लाख गुना बेहतर दूरदर्शन है। बीबीसी हिंदी सेवा बंद करने का जितना विरोध भारत में हुआ था मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य चैनल या रेडियो स्टेशन के लिए ऐसा हुआ होगा या भविष्य में होगा। आपकी पत्रकारिता की छवि बेदाग रहे...यही कामना है। पर जब पत्रकारिता का चोला उतरेगा तो दिल तो यही बोलेगा ना कि.....फिर भी दिल है हिंदुस्तानी। हाहाहाहाहाहा। कुछ गलत नहीं करेंगी आप सलमा जी।

  • 13. 12:18 IST, 31 मार्च 2011 ashish yadav:

    आपने बिलकुल सही लिखा है. आख़िर आप भी तो इंसान हैं. बीबीसी की निष्ठा पर तो कोई शक ही नहीं है. असली पत्रकारिता तो बीबीसी ही करता है. बाक़ी सब तो ख़बरों में नमक मिर्च लगा कर बेच रहे हैं.

  • 14. 12:39 IST, 31 मार्च 2011 BHEEM SINGH:

    मोहतरमा सलमा जी, मैं आपकी अख़बारनवीसी और व्यक्तिगत दोनों पक्षों का समर्थक हूँ. कहीं गहराई से मेरे ज़हन में यह बात आती है कि बीबीसी का बौद्धिक स्तर इतिहास में दफ़न हो गया है. हालाँकि टीम के पत्रकार क़रीब-क़रीब पीएचडी होते हैं परंतु समाचारों को ट्विस्ट देना और राजनीतिक भाषा लिखना, या फिर छद्म पैंतरेबाज़ी की ख़ुशबू या बदबू अकसर ही आती है. संभव है मैं नेगेटिव हूँ या फिर मेरी अपेक्षाएँ कुछ अधिक हैं आप लोगों से. सार तत्व तो यह है कि बीबीसी के पत्रकार अपनी साफ़- निष्पक्ष छवि क़ायम रखने में विफल ही लगते हैं. लेखन भी सतही होता है और कुछ नकारात्मक भी. एक गाना है---दिल का हाल बता देता है चेहरा...यह एक सामान्य टिप्पणी है आप पर केंद्रित नहीं...

  • 15. 15:28 IST, 31 मार्च 2011 Sheo shankar Pandey:

    बिलकुल गलत नहीं होगा.

  • 16. 15:42 IST, 31 मार्च 2011 braj kishore singh, hajipur, bihar:

    सलमाजी,आपने जो कुछ भी किया ठीक किया उसमें कुछ भी गलत नहीं था. प्रेस से जुड़े होने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम इन्सान से मशीन बन जाते हैं. हमारे भी कुछ जज्बात होने है, कुछ संस्कार होते हैं. हाँ, हमें अपने दोनों रूपों में संतुलन बनाये रखना चाहिए.

  • 17. 16:28 IST, 31 मार्च 2011 Ameeque jamei:

    आप जैसे लोगो कि तदाद हमेशा बड़ी कम रही है...पत्रकारिता के नज़रिये कि शायद बुनियाद ही यही है. कबीर ने सच ही कहा है " कबिरा खड़ा बजार में मांगे सबकी खैर, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर ! लेकिन देश से मुहब्बत का इज़हार कोइ चोरी तो नहीं..हाँ इतना ख्याल कि इन्तेहा न हो कि अन्धे हो जाये और कुछ न नज़र आए..क्योंकि वसुधैव कुटुम्बकम का फ़ल्सफ़ा भी भारत ने ही दुनिया को दिया है.. बाइ द वे..भारत दुनिया की उम्दा टीम है..जय हिन्द..इस वक़्त मैं दफ़्तर के बाहर हूँ.

  • 18. 17:03 IST, 31 मार्च 2011 ZAKY:

    सलाम अर्ज़ है, बीबीसी हमारे बचपन का दोस्त रहा है, और मैं बाक़ायदगी से इसे सुनता रहा हूँ। जब में अपने गाव में रहता था या अब जब भी अपने गांव जाता हूँ, रेडियो पर बीबीसी ज़रूर सुनता हूँ। बगैर आपका प्रोग्राम के सुने निंद नहीं आती। आपके द्वारा पेश किए गए सारे रिपोर्ट सटीक व ज्ञानवर्धक होते हैं। अब हम दिल्ली में रेडियो तो नहीं पर ऑनलाईन खबरें पढ़ता हूँ। हमारी दुआएं आपके साथ हैं कि आप सेहतमंद रहकर इसी तरह से अपना काम जारी रखें। अपनी निष्पक्षता के कारण बीबीसी कार्यक्रम आज लोगों में इतना लोकप्रिय है। लोगों का बीबीसी के साथ दीवानगी का यह आलम है कि जब बीबीसी श्रोताओं को पता चला कि हिंदी सेवा बंद होने वाली है तो इसका जितना विरोध हिन्दी श्रोताओं ने किया, मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य चैनल या रेडियो स्टेशन के लिए हुआ होगा या आने वाले दिनों में होगा। यह सारी बातें इस बात का द्योतक हैं कि किस हद दर्जा का लगाव हिन्दी श्रोताओं का आपसे है। आपके सारे कार्यक्रम, खासकर विद्यार्थियों के लिए, जो किसी भी तरह के कॉम्पटीशन की तैयारी में लगे हुए हैं, या मन बना रहे हैं, काफी रूची लेकर आपके कार्यक्रम को सुनते है और लाभांवित होते हैं। जिस तरह से बीबीसी के सभी पत्रकार का काम है लोगों तक निष्पक्ष, तटस्थ और बिना भेदभाव के ख़बरें पहुँचाते हैं, यह वाकई काबिले तारिफ है। लेकिन सभी लोगों का प्रोफेशन लाईफ अपने ड्यूटी के साथ जुड़ा होता है, पर पर्सनल लाइफ अपनी जन्मभूमि से जुड़ी होती है, आपकी भावना भारत की फतह के प्रति होना नैच्यूरल है, यह सभी देशों के लोगों के साथ होता है। यह आपका अपना जन्म सिद्ध अधिकार है। लेकिन देश के कुछ सर्वोच्च नेता लोगों जिस तरह बेवकूफ बनाते हैं मानो उसे भगवान ने झूठ बोलने की सर्टिफिकिट दे दी है, उसके लिए अगर वे लाखों लोगों की हत्या भी कर दें तो उनके लिए कम है। आज के नेता देश की जनता के प्रति इतने कायर और चालूस व लपरवाह हो गए हैं, और उन्हें किस तरह बेवकूफ बनाते हैं, उसकी जिंदा मिशाल आपके सामने पेश करता हूँ। अपने ताज़ा ब्लॉग में जिस तरह से लालकृष्ण आडवाणी जी ने शाहनवाज़ हुसैन के बयान को उत्कृष्ट बताते हुए उसकी तारिफ़ की वह अपने आपमें एक अद्भूत और दुखद था। हमारा मानना है कि यह चीजें आडवानी जी को पहले बिहार आकर लोगों से मिलकर, उनके रहन-सहन को देखकर देनी चाहिए थी ना कि आंख मूंद कर किसी भी नेता की बात मान लेनी चाहिए थी। और प्रश्सा के पूल बांध देने चाहिए थे। मैं आपको बताना चाहूंगा कि एनडीए प्रशासित बिहार की हालत आदिवासियों से भी बदतर है, वहां की शिक्षा का स्तर इतना गिरा दिया गया है कि वह कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता। बिहार के लोग दूसरों की नौकरी तो कर सकते हैं, गुजरात में उसको काम मिल सकता है, क्योंकि वह मेहनती होते हैं। लेकिन अपना कुछ भी नहीं कर सकते। रहा माननीय शाहनवाज़ हुसैन जी का, तो मैं उसी के संसदीय क्षेत्र से ताल्लूक रखता हूं, हमारा शहर भागलपूर दशकों पहले जिस तरह से फल फूल रहा था, वह अब एक गांव में तबदील हो चुका है। पहले की तुलना में आज यह शहर बंजर और पलायन करने को मजबूर है। वहां के लोगों को इस तरह की परेशानी का सामना पहले कभी इतना करना नहीं पड़ा होगा, जितना कि आज करना पड़ रहा है। वह आज विदर्भ के किसानों से भी बदतर है, लोगों को दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज होना पड़ता है, कोई भी यहां रहना नहीं चाहता। शिक्षा की हालत तो इतना बुरी है कि पहले जिन स्कूलों व कॉलेजों में विद्यार्थियों का एक सुखद माहौल रहता था, और लोग जिन कॉलेजों में एडमिशन के लिए तरसते थे, आज वहां ग्रेजुएट के विद्यार्थियों के लिए टेक्स्ट बुक तक उपलब्ध नहीं है। आज स्कूलों व कॉलेजों की हालत आए दिनों हड़तालों, टीचरों की कमी, और अशिक्षित टिचरों की बहाली से तरस्त है, जिससे यहां कि शिक्षा का स्तर निम्न स्तर पर चला गया है। एडमिशन के लिए पैसों के लेन देन बहुत बढ़ गया है। बिहार में जब तक शिक्षा का स्तर में बदलाव नहीं आएगा, तब तक वह तरक्की नहीं कर सकता। मैं नाथनगर विधानसभा क्षेत्र से तालुक रखता हूँ, हमारे गांव (पंचायत) में पीने के पानी के लिए दो बार स्टेट बोरिंग के लिए सरकार की ओर से पैसों का अनुमोदन किया गया, जिसका उद्घाटन भी स्वयं माननीय शाहनवाज़ हुसैन जी किया, लेकिन कुछ भी हाथ नहीं आया। आम जनता पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। अभी मार्च का महीना है और इलाके के सारे कुएं, नलकूपों आदि में पानी नहीं है। गर्मी में लोगों को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, आप समझ सकती है। इस तरह की परियोजनाओं के लिए जब सरकार पैसे देती है, और नेता लोग हजम कर जाते हैं। फिर संसद में बयान देंगे कि बिहार में कोई दिक्कत नहीं है। बिहार तो दिक्कतों का घर है। इस तरह के बयान से आप उन नेताओं के स्टैंडर का पता लगा सकते हैं, जो गलत बयानबाजी करते हैं। हम आपको अपने क्षेत्र की समस्याओं के बारे में अवगत कराने के लिए कि नेता लोग किस तरह से लोगों को बेवकूफ बना कर उसका खून चूसते हैं। हमारा यह क्षेत्र लगातार सुखाग्रस्त घोसित होता रहा है, लेकिन किसी को कुछ भी नहीं मिला, लोग मजबूर होकर पलायन करने पर मजबूर है। सलमा जी “आपका काम है ख़बरें पहुँचाना” जैसा कि आपने अपने ब्लॉग का हेडिंग दिया है। अगर आप सच बोलती हैं और बीबीसी निष्पक्ष है तो मैं आपको अपने क्षेत्र का दौरा करके वहां की समस्याओं और शिक्षा के बदहाली को अपनी आंखों से देखें, और फिर आप बताएं कि नेताओं की बातों में कितनी सच्चाई होती है। इसके बाद आप इस हकीकत को राज्य सरकार के सामने पेश करें। और अपने कार्यक्रमों में भी पेश करें।

  • 19. 17:15 IST, 31 मार्च 2011 Bhim Kumar Singh:

    मैं एक अख़बार में काम करता हूं। मेरा करियर लगभग चार वर्षों का है। लेकिन अब तक मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मैंने पत्रकारिता भी की है। खैर यह मेरा निजी मामला है। लेकिन सलमा जी क्या किसी इंसान के लिए भावनाशून्य होना संभव है?

  • 20. 17:54 IST, 31 मार्च 2011 VIJAY RAJAK:

    दिल को अत्यंत राहत मिली आपका लेख पढ़ कर. कोटि कोटि प्रणाम. प्रेमचंद के साहित्य में पढ़ा था कभी...तुम जहाँ पहुँचे हो अपने विचारों के कारण और जहाँ तक पहुँचोगे वहाँ अपने विचारों के कारण ही. मुझे केवल दो शब्द मालूम हैं-बीबीसी लंदन. मेरा व्यक्तिगत विकास, और जीवन को पुष्ट करने में बीबीसी मुख्य तत्व रहा है. आपको और बीबीसी की टीम को कोटिशः प्रणाम.

  • 21. 20:39 IST, 31 मार्च 2011 ankit:

    आशा है सभी आपकी तरह ही सोचते होंगे, क्यूँकि वास्तव में पत्रकारिता अलग मोड़ पे खड़ी दिख रही है, अमिताभ जी का एक फ़िल्मी संवाद मुझे याद है, कि पत्रकारिता में धन माध्यम हो खबरों के लिए, पर आज खबरें माध्यम है, धन अर्जित करने के लिए!!

  • 22. 00:00 IST, 01 अप्रैल 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    सभी पत्रकारों को ऐसा ही सोचना चाहिए लेकिन टीवी वालों को कौन समझाए. आप का लेख पढ़ कर उन्हें सीखना चाहिए.
    अगर आप 'कम ऑन पाकिस्तान' भी कहतीं, तो भी ग़लत न होता. भारत के लोग बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड को पसंद कर सकते हैं, भारतीय कंपनियों को छोड़ कर विदेशी माल खरीद सकते हैं, तो पाकिस्तानी टीम का समर्थन क्यों नहीं कर सकते?. भारतीय मीडिया तो इस खेल को युद्ध की तरह पेश कर रही थी और पाकिस्तान विरोधी मानसिकता को बढ़ावा दे रही थी.

  • 23. 08:43 IST, 01 अप्रैल 2011 PANKAJ KUMAR SINGH:

    आपकी बात मेरे दिल को छू गई. बस और क्या कहूँ. मैं तो बचपन से आपकी आवाज़ रेडियो पर सुनता आया हूँ.

  • 24. 11:26 IST, 01 अप्रैल 2011 ravji:

    मेरे विचार में बीबीसी की पत्रकारिता बेमिसाल है और मेरा मानना है कि अमित जी, सलमा जी या बीबीसी का अन्य कोई भी पत्रकार बेहतरीन हैं.

  • 25. 11:55 IST, 01 अप्रैल 2011 rohit mishra:

    असल पत्रकारिता, राष्ट्रीयता और भावनाओं का समावेश आप में है. .. बहुत खूब लिखा .

  • 26. 16:02 IST, 01 अप्रैल 2011 Bikas Rao:

    राष्ट्रीयता का मतलब केवल क्रिकेट ही क्यों? किसी प्रकार का पक्षपात न करना यानी निष्पक्ष तौर पर अपने प्रोफेशन से जुड़े कार्य को अंजाम देना ही सबसे बड़ी मानवता और देश भक्ति है. मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि अब हम राष्ट्रीयता से भी ऊपर उठकर सोचें। देश में आज जो माहौल है उससे यही लगता है कि क्रिकेट ही राष्ट्रीयता का सर्टिफिकेट बन गया है। यानी टीम इंडिया की जीत की खुशी में जश्न और हार के गम में शोक मनाइए तो लोग आपको सबसे बड़ा देश भक्त कहेंगे। फिर बाकी अपराध माफ़ हैं। तभी तो नेता, उद्योगपति, फिल्मी हस्तियां, प्रोफेशनल्स, सामान्य जन सभी कदर भाव विभोर हो गए हैं उन्होंने सारा काम धाम छोड़-छाड़ कर राष्ट्रीयता के इस पर्व में सरीक होने से नहीं चूके। जीत की खुशी में लोग जश्न नहीं, पागलपन की हद पार कर रहे हैं। इंदौर और लखनऊ में तो इस दौरान दिल का दौरा पडऩे से दो युवाओं की मौत हो गई। एक ओर तो आम जन पर क्रिकेट का पागलपन सवार है तो दूसरी तरफ इसे भुनाने में उद्योगपति, फिल्मी हस्तियां और राजनेता सभी लगे हुए हैं। यही कारण है कि ज्यादातर क्रिकेट संघ राजनेताओं और उद्योगपतियों के कब्जे में जा चुका है। जबकि बाकी खेल दम तोड़ रहा है और उसे देखने वाला कोई नहीं है। क्या यही राष्ट्रीयता है? अभी तो केवल सेमीफाइनल हुआ अब फाइनल और इसके बाद करीब दो माह तक चलने वाला आईपीएल तमाशा भी आपका इंतजार कर रहा है।

  • 27. 16:49 IST, 01 अप्रैल 2011 PRAVEEN SINGH:

    बीबीसी एक ब्रांड है साफ़गोई का, बीबीसी के पत्रकारों को गंगा स्नान की कोई आवश्यकता नहीं है. ( दिल की जो बात हो, आँखों से बयाँ होती है). सलमा जी आप शतायु हों, मेरी शुभकामना.

  • 28. 18:46 IST, 01 अप्रैल 2011 shatrughan sharma:

    बढ़िया है

  • 29. 02:19 IST, 02 अप्रैल 2011 BALRAM KUMAR:

    ये दर्शाता है कि क्यों लोग बीबीसी पर भरोसा करते हैं.

  • 30. 13:18 IST, 02 अप्रैल 2011 tahir gazi:

    इसे कहते हैं आदर्श प्रोफ़ेशनलिज़्म. निजी और व्यावसायिक जीवन में अच्छी तालमेल ज़रूरी है और इससे ही जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है.

  • 31. 15:45 IST, 02 अप्रैल 2011 Jitendra samant:

    बहुत अच्छा लेख है। उद्योगपतियोँ ने क्रिकेट को धन्धा बना दिया है।

  • 32. 06:13 IST, 03 अप्रैल 2011 SANDEEP:

    नमस्कार सलमा जी, आपका लेख आपकी पत्रकारिता जितना ही पारदर्शी है. भावनाएँ तो हर एक की अपनी होती हैं पर उनका प्रोफ़ेशनल जीवन पर हावी होना बहुत ही घातक होता हो सकता है. ख़ासकर आप अगर पत्रकार हैं तो...आप ऐसे ही निष्पक्ष समाचार देते रहें और बीबीसी हिंदी फिर से प्रतिदिन चार बार प्रसारित होता रहे यह आशा करता हूँ.

  • 33. 13:23 IST, 03 अप्रैल 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    सलमा जी ! बहुत सटीक लेख लिखा है ! सच्ची पत्रकारिता का यही पैमाना है ! निष्पक्ष पत्रकारिता ही लोकतंत्र की दिशा और दशा को दर्शाता है ! पत्रकारिता के क्षेत्र में भावुकता और निष्पक्षता नदी के दो किनारे हैं ! लेकिन एक आम इन्सान होते हुए भी सच्चे पत्रकार अपनी कर्मपूजा को अहमियत देते हैं !

  • 34. 15:11 IST, 03 अप्रैल 2011 pradeep shabdilya:

    सलमा जी नमस्कार, आपने जो लिखा वह पत्रकारिता का का सिर्फ़ एक पहलू है. ऐसा होना ही चाहिए लेकिन बात सिर्फ़ यहीं ख़त्म होती तो शायद आपको बी यह लिखने की नौबत नहीं आती. एक पत्रकार को तटस्थ रिपोर्टर के साथ एक सत्यअणवेषी भी होना चाहिए. बाह्य आवरण के पीछे का सत्य और भी ज़्यादा स्पष्ट कर पाने की क्षमता शायद ही किसी पत्रकार या मीडियाकर्मी में बची है. पत्रकारिता जब एक धर्म हुआ करती थी तो वह युग अब समाप्त सा प्रतीत होता है. अब तो यह महज़ एक करियर से ज़्यादा कुछ नहीं है. अब तो समाचार कम मतलब की रिपोर्टें ज़्यादा नज़र आती हैं.

  • 35. 23:45 IST, 03 अप्रैल 2011 Ram Lakshman Tewari:

    सलमा जी को मेरा नमस्कार. ईमानदारी से काम करने के लिए धन्यवाद. यह लोगों को प्रेरणा देगा.

  • 36. 14:58 IST, 06 अप्रैल 2011 Anand Bassi:

    काश भारतीय हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आपसे और बीबीसी से कुछ सबक सीखती. आजकल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया केवल क्रिकेट मैच और टीआरपी से जुड़ी ख़बरों पर अपना सारा ध्यान केंद्रीत करती है, लेकिन असम चुनाव को सकारात्मक नज़रिए से कवर करने में शर्म महसूस करती है. मीडिया अब अनियंत्रित मिसाइल की तरह काम कर रही है.

  • 37. 17:50 IST, 06 अप्रैल 2011 farhat farooqi:

    प्रलोभन से ज़रा भी विचलित ना हो
    ये इस युग में एक चमत्कार है;
    अपने-पराए सबके लिए एक-सी नज़र हो,
    ये बेहतर मानवीय व्यवहार है;
    देखे, सुने, समझे और जो सच बोले,
    समझो, वही सच्चा पत्रकार है.

  • 38. 01:51 IST, 07 अप्रैल 2011 Prashant kumar Buxar,bihar:

    सलमा जी, आपका कथन बिल्कुल सही है. हमें अपने पेशागत जीवन को अपने व्यक्तिगत जीवन से दूर ही रखना चाहिए. इसीलिए कहा भी गया है 'काम के वक़्त काम और आराम के वक़्त आराम करना चाहिए.'

  • 39. 02:52 IST, 07 अप्रैल 2011 devendra singh:

    सलमा जी आप आगे बढ़ें. मुझे लगता है आप भारतीय संवाददाताओं में सबसे बेहतर हैं. गुड लक.

  • 40. 12:16 IST, 05 मई 2011 TAHIR KHAN,PUTTHA(MEERUT).:

    क्या हर पत्रकार को अपनी राष्ट्रीयता को भूलना होगा, तभी पत्रकारिता की गरिमा को बचाया जा सकता है?

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