दिल्ली, लंदन के साथ-साथ हमारे भीतर का वसंत
सुबह अलार्म बजने से पहले ही नींद खुल गई, खिड़की से अंदर आती सूरज की किरणों ने जगाया, लंदन का मौसम ऐसा है कि सूरज नहीं बताता, घड़ी से पूछना पड़ता है कि कितने बजे हैं.
हवा में नसों को सुन्न कर देने वाली सर्दी नहीं बल्कि ताज़गी देने वाली शीतलता है.
घास का हरा रंग वापस लौट रहा है, डेफ़ो़डिल्स के पीले-नारंगी फूल खिल उठे हैं, चेरी, नाशपाती और आलूबुख़ारे के पेड़ों पर सफ़ेद-गुलाबी फूल लद गए हैं.
अभिशप्त प्रेतों की तरह खड़े मेपल और ओक के पेड़ों पर कोंपल दिख रहे हैं, झील में बत्तखों के पीछे नन्हे चूज़े तैर रहे हैं. मोटे-मोटे कोट उतारते ही ऐसा लग रहा है मानो भारी कर्ज़ उतर गया हो.
गिलहरियाँ और मधुमक्खियाँ कई महीनों की छुट्टी के बाद दोबारा व्यस्त हो गई हैं.
वसंत आ गया है.
जैसे आतिशबाज़ी आसमान में रंग बिखेरती है, वैसे ही रंग ज़मीन पर बिखरे हैं, कोई धमाका नहीं है, कोई धुआँ नहीं है लेकिन रंगों का एक अदभुत नरम सा विस्फोट है.
यह लंदन का वसंत है, जैसा कि कहते हैं मैंने भारत में 27 वसंत देखे हैं, लेकिन वसंत दिखा सिर्फ़ एक बार देहरादून में और एक बार श्रीनगर में, बाक़ी के 25 वसंत मुझे दिखाई नहीं दिए, न राँची में, न दिल्ली में.
ऐसा नहीं है कि वसंत लंदन का मौसम है, वसंत को भारत में ऋतुराज कहा जाता है. संस्कृत के पुराने काव्य में वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है, भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है ऋतुओं में मैं वसंत हूँ.
फिर भारत का वसंत कहाँ गया, वह दिखाई क्यों नहीं देता, महानगर लंदन में वसंत ऐसा है कि हर क़दम वह आपको टोकता है, देखो मैं आ गया हूँ, दिल्ली में उसे ढूँढने के लिए शायद मुग़ल गार्डन जाना पड़ेगा.
लंदन में वसंत आता है क्योंकि वह पेड़ों पर आता है, पार्कों में आता है, मॉल और हाइवे पर वसंत न तो लंदन में आता है, और न दिल्ली में आएगा.
वसंत के सुहाने मौसम में विकास और वसंत के मुद्दे पर बहस का कोई इरादा नहीं है.
अगर आप छोटे से कमरे में रहते हैं तो एक गमले में ही फूल उगाइए, वही आपका वसंत होगा, वसंत हमारे भीतर भी तो होता है उसके अंकुरों को सहेजिए.

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आपने सही कहा कि वसंत तो हमारे अंदर ही है, बस ज़रुरत है उसको बाहर लाने की. लेकिन इस महंगाई और बढ़ती बेरोज़गारी के सामने आम आदमी का पूरा दिन दो जून की रोटी के इंतज़ाम में गुज़र जाता है. उसके पास वसंत देखने का वक्त कहां है?
राजेश जी, आप लंदन की तारीफ करें हमें कोई ऐतराज नही है, पर भारत की तुलना मे बेहतर ठहराएँ तो हमें सख़्त आपत्ति है. वसंत केवल देहरादून मे ही नही आता. आंध्रप्रदेश का वसंत महसूस करने के लिए वहाँ की मिट्टी से आत्मीय लगाव का होना ज़रूरी है. मौसम के सूक्ष्म परिवर्तन को आप पाँच सितारा होटेल मे बैठकर महसूस नही कर सकते.
आप ने सही लिखा है दिल्ली में वसंत नहीं दिखता. जब से मैंने अपना गाँव छोड़ा है तब से शायद मुझे कभी वसंत नहीं दिखा. पर हाँ हम अपने अंदर और अपने आसपास तो वसंत ला ही सकते हैं. बस ज़रूरत है एक कोशिश की.
सही है, भीतर यदि वसंत आ गया हो तो ही बाहर का वसंत दिखाई पड़ता है।
हालांकि, नई दिल्ली में भी अब आपको वसंत दिख सकता है। कम से कम, मुझे तो दिखता है, घर से और दफ्तर से और आने-जाने के रास्ते में भी।
राजेश जी एक श्रंगारिक लेख. महानगरों में भले ही वसंत कृत्रिम रूप से दिखे लेकिन गाँव में आज भी अहसास होता है वसंत के आगमन का. पीली सरसों के फूल और पेड़ों से फूटते किसलय झूम-झूम कर वसंत के आगमन की सूचना देते हैं. आपकी पहल भी सराहनीय है, 'गमले में एक फूल उगाइए'.
ये ब्लॉग पढ़ने में उतना मज़ा नही आया जितना की सुनने में आया था.
राजेश जी,
लंदन में आप जिस ऋतु की बात कर रहे हैं उसे 'स्प्रिंग' कहते हैं. लोग ग़लती से 'स्प्रिंग' को वसंत समझ लेते हैं. शायद यह ग़लती हमेशा से होती आ रही है, हां ये बात अलग है कि जिस वक़्त (फ़रवरी-मार्च में) इंग्लैंड में 'स्प्रिंग' होता है उस वक़्त उत्तर भारत में 'वसंत' होता है.
स्प्रिंग - स्प्रिंग वो ऋतु है जब पेड़ों में सर्दी के बाद नई पत्तियां आ जाती हैं (भारत में ऐसा नहीं होता है, भारत में पेड़ों पर पत्तियां हमेशा बनी रहती हैं).
वसंत - वसंत वह ऋतु है जिसमें फसल पकती है जो कि देखने में पीली लगती है साथ ही फूल खिलते हैं.
वसंत का मतलब है पीला रंग और स्प्रिंग का मतलब है अचानक बहार का आ जाना.
मार्के कि बात यह कि 'वसंत' और 'स्प्रिंग' दो एकदम अलग ऋतुएं हैं.
'मन चंगा तो कठौती में गंगा'. सच है खुशियां हमारे मन के भीतर होती हैं और जब मन ही ठीक न हो तो भला कोई खुश कैसे रह सकता है? अधिकतर भारतीयों की ज़िंदगी पर परेशानियों की आपाधापी इस क़दर हावी है कि मन का वसंत कहीं नीचे दब कर रह गया है और वो लोग जो इनसे कम प्रभावित हैं वो ख़ूब वसंत का आनंद लेते हैं, चाहे वह नई दिल्ली का वसंत हो या लंदन का. उनको हर तरफ़ रंगीनियां नज़र आती हैं. ज़रा बेसुकून दिलों में कुछ सुकून पैदा करने की कोशिश तो कीजिए फिर देखिएगा कि कैसे वसंत खिलता है उनके दिलों और घरों में.
प्रियवर प्रियदर्शी जी,
लंबे अंतराल के उपरांत एक लेख पढ़ने को मिला जिसे सकारात्मक-रचनात्मक कहा जा सकता है. अन्यथा कुछ समय से बीबीसी के पटल पर भी नकारात्मक या राजनीतिक पैंतरेबाज़ी वाले शब्द पढ़कर कुछ दिन में ऊब सी होने लगी थी.
बहुत-बहुत धन्यवाद
अत्यंत मधुर याद दिलाने वाली बात आपने छेड़ी है. दिल्ली तो बस गाँधी जी के चेहरे वाले नोटों का बसंत मनाने लगी है. इसे शायद यह एहसास भी नहीं कि वास्तविक भारत में (गाँव में) किस तरह लोग मंजरों, फूलों और नई-नई फसलों की खुशियों में नहा रहे है I इसके कसूरवार हम सभी हैं I
राजेश जी आप तो भारत से ज़्यादा लंदन को अच्छा बता रहे हो. ये पहली बार देख रहे हैं कि कोई अपने देश की बुराई कर रहा है.
बहुत अच्छे.