बदल गए हैं गांव
मेरा गांव शहर में रहता है और मेरा शहर ......माफ़ कीजिएगा मेरा नहीं. शहर तो शहर है वो हम सबके दिमाग में रहता है.
गांव अब जीता नहीं. इंतज़ार करता है उनका जो शहर चले गए हैं और साथ ले गए हैं गांव का लड़कपन, उसका बांकपन, उसकी मिट्टी, उसके सपने और उसका दीवानापन.
फागुन में अब गांव में फाग नहीं गाए जाते बल्कि होली वाले दिन लाउडस्पीकर पर शहर के गुड्डू रंगीला और चंदू चमकीला अपनी भौंडी आवाज़ में छींटाकशी वाले गाने गाते हैं.
साथ में होती है मदिरा और पैंट बुश्शर्ट वाले नौजवान जो भांग नहीं बल्कि बोतल से शराब पीते हैं.
बरसात में बूढ़े दालान पर बैठकर अपनी बूढ़ी बीवियों और जवान बहुओं को गरियाते हैं या फिर अपने छोटे छोट पोते पोतियों की नाक से निकलता पोटा पोंछते हुए कहते हैं कि छोटा ही रह.
उन्हें डर है कि पोता भी बड़ा होते ही शहर हो जाएगा.
जवान औरतें अब मेला नहीं जाती हैं बल्कि मोबाइल फोन पर अपने शहर में रह रहे पतियों या किसी और से गप्प लड़ाती हैं.घर से बाहर निकलती हैं और बूढ़ों की भाषा में लेफ्ट राइट करती हैं.
शहर कभी कभी गांव आता है. होली दीवाली में. दो चार दिन रहता है. अपने कोलगेट से मांजे गए दांतों से ईख चबाने की कोशिश में दांत तुड़ाता है और फिर ईख को गरियाते हुए गांव को रौंद कर निकल जाता है.
फिर गांव इंतज़ार करता रहता है कि कब शहर आएगा और भैंस को दाना खिलाएगा. हल या ट्रैक्टर से खेत जोतेगा और बीज बोएगा. कब अपनी भीनी आवाज़ में गीत गाते हुए फसल काटेगा और कब चांदनी रात में कटी फसल पर अपनी बीवी के पसीने में लथपथ होगा.
ऐसा होता नहीं है. शहर अब फ़िल्मी गाने गाता है. ट्रैक्टर चलाने की बजाय ट्रैक्टर के पीछे हेलमेट लगा कर बैठता है. बुलडोज़र और गारा मशीन की आवाज़ों के बीच मशीन हो जाता है. दिन रात ठेकेदार की गालियां सुनता है. शाम को अपनी दिहाड़ी लेकर कमरे पर लौटता है और दो रोटियां सेंककर सो जाता है कल फिर मुंह अंधेरे उठ कर काम के इंतजा़र में.
सब कहते हैं गांव बदल गया है.
हां गांव बिल्कुल बदल गया है. अब गांव भी शहर की तरह भूतिया हो गया है जहां सिर्फ़ औरतें और बूढ़े दिखते हैं. खेत खलिहान सूखे और पानी की किल्लत दिखती है. लोकगीतों की बजाय फ़िल्मी गाने सुनाई पड़ते हैं और लोग कहते हैं अपने काम से काम रखो.

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बिलकुल सही फ़रमाया आपने,एक शोध के मुताबिक २०६० तक विश्व की ७० फीसदी आबादी शहेरो में बसने लगेगी,भारत में भी शहेरो में बढाती आबादी इसी का प्रमाण माना जा सकता है,आपने जो आजके गाँव का वर्णन लिखा है,वो बिलकुल सही लगता है.
गांव और शहर का यह दौर अंतहीन हो गया है. कारण बहुत है लेकिन पहल उसकी तुलना में कम है. बदलते वक्त को हम नहीं थाम सकते लेकिन अपनी विरासत, अपने बीते हुए दिनों को सहेज सकते हैं. जरुरत है एक ईमानदार पहल की.
सुशील जी, आपने एक अच्छा प्रतीकात्मक शोध लिखा है जो आपकी वेदना को दिखा रहा है. आपकी बात सही है लेकिन एक बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोई गाँव छोड़ कर शहर बनना नहीं चाहता है पर न बने तो लोग कहते हैं कि तू गाँव की मिट्टी को खाएगा और गाँव की मिट्टी एक दिन तुझे खाकर संसार से विलीन कर देगी.
इस मुद्दे पर 1994 में एक कविता लिखी थी. दिक़्क़त यह है कि स्थितियाँ नहीं बदल रही हैं.
ढहल ढनमनायल गाम
हमरा दलानक सॊझां
साफ पानिक छॊट सन
पॊखरि मे
हेलैत छॊट-छॊट माछ
अहां
आब नहि देख सकब
आ नहि देख सकब
दूर तड्डिहा बान्ह धरि
लगातार पसरल खेत मे
लहलहाइत धान
आब ओ नहि रहल पुरनका गाम
खलिहान मे जे रमा
बिहुंसल छली
ओ पछिला दशकक
गप्प थिक
आब केओ
नहि दौड़ैत छै
खरिहान मे
केओ नहि हंसि पड़ैत छै
हमरा गाम मे
ओना
बिसंभर कका
भेट जयताह अबस्से
टुटलाहा चौकी पर
खॊंखी करैत
एक सॊह मे
भेट जायत अबस्से
बाहर जंग लागि कऽ
सड़ैत मिशीन सभ
दुर्लभ नहि छै
बरऽद बिहीन खूंटा आ लादि
चार खसल बरऽदक घर
मैल आ पुरान नूआ मे
हमर नवकी भौजी
असक्क काकी
आ खॊंताक छिरिआयल
समस्त खढ़
एम्हर विगत किछु बरख संऽ
केकर शापक छाह मे
हुकहुक कऽ रहल अछि
अप्पन गाम
आकि मरि गेल अछि अप्पन गाम
नहि बूझल
नहि बूझल इहॊ जे
बुढ़बा-बुढ़िया कएं भॊजन रान्हि कऽ
खुआवैत जवान नवकनियां
सुहासिनी
कखन धरि
बाट जॊहैत रहतीह
अप्पन-अप्पन मदनक
कखन धरि ?...!
२५ नवंबर ९४
कितनी सच्चाई है आपकी बातों में!
दो साल हो गए गांव गए मेरे। पर यह पढ़ने के बाद अब लगता है मैं कल ही गांव से लौटा हूं।
बेहतरीन लिखा है आपने देहात अब ग्लोबल विलेज़ वाली अवधारणा पर चल रहे हैं और शहरी लोग इसकी पैरोकारी कर रहे हैं.
ये बहुत अच्छा ब्लॉग है. हम भारत में अपने गांवों को भूलते जा रहे हैं. हम अपना सबकुछ खो रहे हैं.
एक लड़का शहर की रौनक में सब कुछ भूल जाये
एक बुढिया रोज़ चौखट पे दिया रौशन करे
शहर ये जबसे शहर हुए हैं
गाँव पे सचमुच बड़े कहर हुए हैं
रातें खामोश, दिन भयभीत
मिनटों से छोटे पहर हुए हैं.
बहुत कुछ बदल गया है गांवों में..
सुशील भाई, हमेशा की तरह दिल को छूते शब्द और उनसे बनती एक सच्ची तस्वीर, जिसकी कई परतें हैं। लेकिन मित्र! समझ में नहीं आता दोष किसे दें या फिर हालात में बदलाव के लिए पहल की उम्मीद किससे करें? क्या यह अच्छा न होगा कि शुरुआत हम ही करें? मैंने तो कोशिशें शुरू कर दी है देखें कब तक रंग लातीं है। आपने अपने लिए क्या सोचा है? झारखंड के जंगल से लेकर बिहार के मैदान तक आपकी बाट जोह रहे हैं। चलो चलें!
उम्दा, सुशील पिछले दो ब्लॉग से आपको पढ़ रहा हूं. काफ़ी उम्दा है लेकिन ये तो वही बात है कि कहीं कुछ होता है तो तो हम फोन कर के पूछ लेते हैं कि मेरा तो कोई नहीं मरा कहीं.अब समय आ गया है दिल्ली चलो का नारा बदलने का. आज मैं इस ब्लॉग के ज़रिए नया नारा देना चाहता हूं. चलो गांव.
लेख पढ़कर दिल में फिर से खोया हुआ गांव वापस आ गया. गांव में रहकर भी रोज़गार किया जा सकता है पल लोग शहर के चकाचौंध के कारण ही शहर की तरफ पलायन करते हैं.
सुशील जी, ऐसा लेख मत लिखा कीजिए, रोना आ जाता है पर अगर कभी मौका मिले तो वापस ज़रुर जाना चाहूंगा. अगर भगवान ने चाहा तो ज़िंदगी के आखिरी समय में तो ज़रुर. और अगर हमारे नेता लोग चाहें तो कुछ ही बाद ही. रोटी का इंतज़ाम हो जाए तो ...लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है.
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गांव नहीं हालात बदल गए हैं.
बहुत अच्छा लिखा है सुशील भाई. एकदम से मन कहीं खो सा गया है पुराने दिनों में.
प्रिय सुशील आपने अच्छा लिखा है. जिस तरह आपने लिखा है वो बहुत इमोशनल है. इस लेख ने मेरे दिल को छू लिया है.
सुशील जी, थोड़ा सा शहर के बदलने पर लिखिए. आपको क्या लगता है सिर्फ़ गांव ही बदले हैं शहरों में बदलाव नहीं आया है. थो़ड़ा विचार करके बताइएगा कि कि दिल्ली खुद कितनी बदल गई है. 20 सालों में. पुराने शहरों के युवा अब गायब होकर मेट्रो में आ रहे हैं.
सुशील जी क्या लिखा है आपने. रोंगटे खड़े हो गए. ऐसा लगता है कि सब कुछ सामने हुए एक चलचित्र की तरह. किंकर्तव्यविमूढ सा ज्ञात होता है. ना जाने कब तक रहूंगा आपके इस सोच के साथ.
गांव नहीं बदला है. लोगों की सोच बदल गई है. अब लोग टीवी देखकर शहर के लोगों की नकल करते हैं. वो उनके जैसा दिखना चाहते हैं.
बहुत अच्छा लगा पढ़कर
बदलाव ही तो जीवन है, ठहराव तो मौत के समान है। पहले के गांव की अच्छाईयों को याद करना अच्छी बात है, लेकिन साथ में यह भी याद जरूर करना चाहिए कि पुराने समय में गांव का समाज कितना अधिक रुढ़िवादी तथा शोषणपरक था। ऐसे में आज एक मजदूर अगर दो पैसे कमाकर दो रोटी सेंकता है तो ठीक ही है, कम से कम उसे जमींदारों की गालियां और एक-एक पैसे का मोहताज तो नहीं रहना पड़ता। अच्छा यही है कि शोक गीत गाने की बजाय हम इस बदलाव को बड़ी नजर से देखें।
सही कहा आपने. पढ़कर आंखों में आंसू आ गए. लेकिन शुरुआत हमें ही करनी पड़ेगी अपने जड़ों तक लौटने की. क्या आपको नहीं लगता कि सिर्फ़ लिखने से गांव में रौनक नहीं लौटेगी. हमें वापस जाकर फिर से रोशनी बिखेरनी पड़ेगी. मैं अपने गांव लौट गया हूं. आप भी कर के देखिए. सूकुन मिलेगा और बुजुर्गों को सहारा जो आपके आने की आस में बैठे होंगे.
सुशील जी मेरी समझ में यह आपका सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग है.लगता है जैसे इसे आपने नहीं बल्कि हमारे देश के किसी गाँव ने खुद-ब-खुद लिखा है.गाँव और शहर के बीच सिर्फ आप ही नहीं झूल रहे बल्कि हम सबकी स्थिति त्रिशंकूवाली है.हम शरीर से तो शहर के हो चुके हैं लेकिन मन से हम आज भी ग्रामीण हैं.हमारा मन शहर को अपना मानने को तैयार ही नहीं है.
बहुत ही अच्छा लेख लिखा है आपने सुशील जी. पढ़ कर मन भर आया. कोई उपाय है मिट्टी की उस ख़ुशबू को वापस लाने का?
मुझे अफ़सोस हो रहा हैं आप तमाम ब्लॉग पढने वाले सुशील जी के ब्लॉग पर हाँ में हाँ मिला रहे हैं | इसके बजाय अगर आप अपनी कीमती समय गाँव के विकास में लगाये तो शायद आप का गाँव शहर में तब्दील नहीं होगा | आप तमाम लोग जरुर पूछेंगे की आप अपने गाँव के विकास के लिए क्या कर सकते | भाषण देना तो नेताजी का काम हैं | कभी अपने गाँव के ब्लाक में जा कर ब्लाक डेवेलप्मेंट अफसर से मिले नहीं होगे गाँव में क्या दिक्कत हैं जानने की कोई कोशिश नहीं. बस ब्लॉग पढ़े अपना 4 लाइन का भाषण पोस्ट कर वाह वाह कर दिए | माफ़ कीजिये मेरा कोई हक़ नहीं बनता ऐसा बोलने का लेकिन आपकी तरह मैं भी गाँव से ही शहर आया हूँ और अपने गाँव जाता हूँ जितना बस में होता है कोशिश करता हूँ अपने गाँव की सभ्यता और संस्कृति को बचाने की | शायद मैं आप तमाम लोगो के तरह कोई ऊंची ओदे पर नहीं हूँ फिर भी जितना बनता है कोशिश करता हूँ | आप लोगो के तरह वाह वाह नहीं पोस्ट कर रहा हूँ | आप का गाँव अगर शहर बन रहा उसके जिमेदार आप है |
सुशील जी जैसा कि आपने अपने ब्लॉग में लिखा है कि “बदल गए हैं गांव”, वास्तव में ऐसा नहीं हैं बल्कि उसे बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। शहर में रह रहे ग्रामीणों से पुछें तो वह कभी भी दिल से शहरी जिन्दगी को स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे वे शहर में ऐशो-आराम की जिन्दगी ही क्यों ना बिता रहे हों। गर्मी की छुट्टी आते ही उन्हें अपने गांव की याद सताने लगती है। गर्मी की छुट्टी आने के कई महीने पहले से ही गांव जाने की प्लानिंग करने लगते हैं। अपने गांव को कभी भी भूल नहीं पाते। ग्रामीण अब पहले जैसे भोले-भाले, बेवकुफ़ और देहाती नहीं रह गए हैं। अपने और अपने बच्चों के कैरियर व भविष्य के बारे में वे काफी सजग हो गए हैं। और उसके लिए उसने अपने मिट्टी से थोड़े समय के लिए तन से दूरी अख्तयार कर ली है, लेकिन मन से व अपने गांव से ही जुड़े रहते हैं। भारत गांव का देश है, अब भी देश की आबादी का 65 प्रतिशत से अधिक लोग गांव में ही रहते हैं। गांव में पहले लोग खुशी-खुशी रहते थे, अब ऐसा नहीं है, ऐसा क्यों हुआ, क्यों हो रहा है, यह विचारणीय है, पर हमारे तथाकथित जनता के सेवक व ब्युरोक्रेट्स इसपर न कभी गौर करते हैं, और न ही आगे विचार करैंगे। अपने उत्थान के लिए हम ग्रामीणों को ही जागरूक होना पड़ेगा। और जिन्दगी के सारे गुर हमें सिखने पड़ेंगे जो इन तथाकथित जनसेवकों और ब्युरोक्रेट्स से लड़ सकें। शहरी क्षेत्रों में जिस तरह से औद्योगिक विकास हो रहा है, और जिसके चलते लोगों के स्वास्थ्य में दिनों दिन गिरावट आ रही है, इसे देखते हुए अपने ग्रामीण क्षेत्रों में इस अंधाधुंध विकास के नाम पर खतरनाक कारखाने अपने क्षेत्र स्थापित में नहीं होने देने चाहिए, जिससे वातावरण दूषित होता हो। हमारी भूमि अगर कृषि योग्य है तो वहां खेती के लिए सतत् प्रयासरत करते रहना चाहिए। शहर अब इतना दूषित हो चुका है कि आने वाले दिनों में लोग गांव का ही रूख करैंगे। वैसे अब गांव में रहकर आप कुछ कर भी नहीं सकते, वहां बुनियादी सुविधाओं की इतनी कमी है कि लोग जीवित नहीं रह सकते। गांव में न तो पीने के लिए पानी उपलब्ध है, न ही जीवीकोपार्जन के लिए कोई काम धंधे। कृषि जो ग्रामीण जीवन की रीढ़ की हड्डी हुआ करती थी, उसे जन सेवकों की घटिया मानसिकता ने हासिए पर ला कर खड़ा कर दिया। खेती अब फायदे का कारोबार नहीं रह गया, यह अब एक मात्र घाटे और वक्त गुज़ारी का साधन बन गया है, इस महंगाई के जमाने में यह भी अब चलने वाला नहीं है। ग्रामीण इलाकों में मार्च का महिना शुरू होते ही बिहार, उड़िसा, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए पीने के पानी का भारी संकट खड़ा हो जाता है, लेकिन हमारे नेता लोग इसके लिए कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि ग्रामीणों से उसका कोई सरोकार नहीं है। इसी कारण देश के आज़ाद होने के 65 साल बाद भी देश की अधिकांश ग्रामीण जनता बेबस, गरीब, लाचार और गुलामी की तरह जिन्दगी जीने के लिए मजबूर हैं। इसी कारणों के चलते ग्रामिणों को अपने गांव से पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। इसका फायदा अवसरवादी लोग उठाते हैं, उन्हें गुलाम की तरह काम करवाया जाता है। उनका सुनने वाला कोई नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी-कुर्सी के लिए लड़ रहे हैं, और लाचार जनता को बवकुफ बना रही है। लेकिन सज्जनों को कभी इस बात की परवाह नहीं रही कि ग्रामीण लोग शहर की ओर क्यों आर रहे हैं, उसने अपने क्षेत्र, अपने लोगों की दुःख के लिए बहुत कुछ नहीं किया। वह अब शहर जा कर अपने लिए और अपनों के लिए मेहनत करके दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में लगे हुए हैं, शहर में रह कर उनमें भी शहरी लक्षण का आना कोई अनहोनी बात नहीं है। ग्रामीण शहर, या विदेश मजबूरी की हालत में जाते हैं। उलके भी दिल में अपने परिवार के प्रति संवेदना होती है, पर उनकी खुशी के लिए अपना सब कुछ छोड़ कर, अपने मां-बाप, भाई-बहन, बीवी-बच्चे, अपनी जन्मभूमि को छोड़ कर किस तरह से घर से बाहर जाते हैं। ग्रामिण माता-पिता भी अब अपने बच्चे को शहर या विदेश जाने से रोकते नेहीं हैं, उसे पता है कि अपने घरों में रह कर वह कुछ भी नहीं कर सकते। ग्रामीणों को इस तरह के हालात से दोचार होने में अपने काबिल देश भक्त नेताओं, कानून विदों आदि का सबसे बड़ा योगदान है। ग्रामिण भाईयों को चाहिए कि वे अपने मिट्टी को कभी न भूलें, और कभी भी अपने को मजबूर न समझें, इतिहास इसका गवाह है कि भारत में कमजोर ग्रामीणों को ही माना जाता है, इसलिए शहरी लोग भोले भाले ग्रामिणों के देहाती कर नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। ग्रामिण भाईयों अपने मिट्टी प्यार करें, क्योंकि हमारे दिलो-दिमाग में यही गांव वास करता है।
वाह दोस्त बहुत ख़ूब...बहुत अच्छा लिखा है.
सुशील जी, नमस्कार. मैं 13 साल से दुबई में रहता हूं और क़रीब 22 साल से अपने गांव से दूर होने के बाद भी एक पल के लिए भी उन यादों को भूल नहीं पाया हूं. उन्हीं यादों को हमेशा के लिए संजोए रखने के लिए मैंने अपने गांव में एक मकान बनवाना शुरू किया है. मकान में काम लगे दो साल हो गए हैं, एक हिस्सा बनकर तैयार भी हो गया है, लेकिन गांव में मकान बनवाने को लेकर मेरे ज़्यादातर दोस्तों की यही राय है कि गांव के उस मकान में मैं इतने पैसे क्यों ख़र्च कर रहा हूं जहां कि मुझे रहना नहीं है. ये सब सुनकर मैं बहुत परेशान हो जाता हूं. ये भी सच है कि गांव अब वाकई बहुत बदल गया है. काका नहीं रहे, दादाजी नहीं रहे, कोई बुज़ुर्ग नहीं बचे हैं जिनकी गोद में बचपन बीता था. केवल शहर से आता बेगानापन गांव पर छाता जा रहा है. लेकिन आपका लेख पढ़ने के बाद तो और भी दुख हो रहा है.
झा साहब, आपने कितनी अच्छी बात लिखी है. इसे पढ़ने के बाद मुझे बचपन की यादें ताज़ा हो आईं. याद आया बचपन में मिट्टी में खेलना, तालाब में नहाना, प्राइमरी स्कूल में चटाई पर बैठकर पढ़ना. आपने ठीक ही कहा कि आज शहर में आने के बाद हम वो सारी चीज़ें भूल चुके हैं. आपने आज एक बार फिर उन खेतों-खलिहानों की याद ताज़ा कर दी वरना हम तो ये भी भूल चुके थे कि कभी गांव में रहते थे. शुक्रिया झा साहब आपका लेख क़ाबिले तारीफ़ है.
सुशील जी, आपने बहुत अच्छी बात लिखी है और इस तरह की टिप्पणियां बहुत ज़रूरी हैं शहर को गांव में लाने के लिए.
सुशील जी, मैं भी अपने गांव को काफ़ी याद करता हूं. पर मेरी यादें अब बंट गई हैं. मेरा गांव यूपी के कुशीनगर ज़िले में है. वहां मैंने अपना बचपन बिताया है. पिताजी की नौकरी धनबाद में है, सो सारी पढ़ाई-लिखाई धनबाद में ही हुई है. मेरी पहली पोस्टिंग अहमदाबाद में है. अब मैं धनबाद को भी उतना ही याद करता हूं जितना अपने गांव को. पता नहीं ये पूरब का बेटा कब पूरब की ओर जाएगा.
इस पोस्ट में गांव के प्रति एक रूमानीपन है. मेरी नजर में गांव पहले भी शोषण के केन्द्र थे, उन्हीं लोगों के लिए जिनके लिए इस पोस्ट में सहानुभूति जताई गई है. इसलिए मुझे लगता है कि उन्होंने गांव छोडकर अच्छा ही किया. संपन्न लोगों के लिए ही गांव 'अहा ग्राम्य जीवन' रह हैं. शहर भी संपन्न लोगों के लिए है. शहर में एक अच्छाई यह है कि आपकी जातिगत पहचान की वजह से आपके उत्पीडन की संभावनाएं कम हो जाती हैं और रोजगार के अवसर बढ जाते हैं.
गांव के प्रति आपके और अधिकांश लोगों के रूमानीपन की वजह यह है कि हम सब ठीक-ठाक परिवारों से आते हैं इसलिए हमने गांव में अभाव और शोषण को नहीं झेला है. बचपन में हम इसे समझते भी नहीं थे, इसलिए सब अच्छा-अच्छा लगता था. आज चीजें समझ में आने लगी है, इसलिए गांव की सच्चाई भी समझ में आने लगी है. गांव सामंतवादी मूल्यों का गढ रहे हैं. वहां की मीठी बोली के पीछे शोषण का तंत्र छिपा होता है. जो चीजें शहर में खुले में होती हैं, वही गांव में छिपे और इसलिए विकृत ढंग से होती हैं. मैंने जितने गांवों को देखा है, कम से कम उनका सच तो यही है.
गांधी जी भारत माता को ग्रामवासिनी मानते थे लेकिन इस मौके पर मुझे गांधीजी का ही वह जंतर याद आ रहा है जिसमें वे कहते हैं कि जब मन में कोई संदेह पैदा हो रहा हो तो हमें अपने जीवन में देखे सबसे कमजोर व्यक्ति को याद करना चाहिए और सोचना चाहिए के जो काम हम करने जा रहे हैं इससे उस व्यक्ति को लाभ होगा या नहीं. यानी हमें अपना दृष्टिबिंदु बदलते हुए सबसे कमजोर व्यक्ति की नजर से पूरे मंजर को देखना चाहिए. और सच्चाई यह है कि शहर की तुलना में सबसे कमजोर व्यक्ति के लिए गांव ज्यादा शोषक की भूमिका में आता है.
कब चांदनी रात में कटी फसल पर अपनी बीवी के पसीने में लथपथ होगा. वाह, वाह,
सुशील जी जैसा कि आपने अपने ब्लॉग में लिखा है कि “बदल गए हैं गांव”, वास्तव में ऐसा नहीं हैं बल्कि उसे बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। शहर में रह रहे ग्रामीणों से पुछें तो वह कभी भी दिल से शहरी जिन्दगी को स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे वे शहर में ऐशो-आराम की जिन्दगी ही क्यों ना बिता रहे हों। गर्मी की छुट्टी आते ही उन्हें अपने गांव की याद सताने लगती है। गर्मी की छुट्टी आने के कई महीने पहले से ही गांव जाने की प्लानिंग करने लगते हैं। अपने गांव को कभी भी भूल नहीं पाते। ग्रामीण अब पहले जैसे भोले-भाले, बेवकुफ़ और देहाती नहीं रह गए हैं। अपने और अपने बच्चों के कैरियर व भविष्य के बारे में वे काफी सजग हो गए हैं। और उसके लिए उसने अपने मिट्टी से थोड़े समय के लिए तन से दूरी अख्तयार कर ली है, लेकिन मन से व अपने गांव से ही जुड़े रहते हैं। भारत गांव का देश है, अब भी देश की आबादी का 65 प्रतिशत से अधिक लोग गांव में ही रहते हैं। गांव में पहले लोग खुशी-खुशी रहते थे, अब ऐसा नहीं है, ऐसा क्यों हुआ, क्यों हो रहा है, यह विचारणीय है, पर हमारे तथाकथित जनता के सेवक व ब्युरोक्रेट्स इसपर न कभी गौर करते हैं, और न ही आगे विचार करैंगे। अपने उत्थान के लिए हम ग्रामीणों को ही जागरूक होना पड़ेगा
गाँव भागने पर मज़बूर कर दिया आपने !
आप से अनुरोध है कि हमारे भारत में जाति के आधार पर जो आरक्षण देने का नियम है उससे आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को बहुत ही परेशानी का सामाना करना पड़ रहा है, इस लिए 'जाति' के स्थान पर 'आर्थिक' स्थिति पर आरक्षण देने की वकालत करें ।
सुशील जी, अभी मैं राजस्थान के अपने गांव से 10 दिन की छुट्टियां बिताकर आया और वो सब शिद्दत से महसूस किया जो आपने लिखा है. वाक़ई गांव बहुत बदल गए हैं.