जय जनादेश!
सात, रेसकोर्स रोड प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निवास है. कुछ सुविज्ञ लोगों को लगता है कि वहाँ पीने के पानी की जाँच करनी चाहिए. उन्हें शक है कि उस पानी में भंग घुल गई है.
इन लोगों को मानना है कि मनमोहन सिंह जैसे ज्ञानी-ध्यानी व्यक्ति बिना कारण इस तरह का बयान नहीं दे सकते जैसा उन्होंने पिछले दिनों दिया है.
उन्होंने कहा है कि सरकार को बचाने के लिए घूसख़ोरी उनकी जानकारी में नहीं थी. फिर उन्होंने कहा कि संसद के चुनाव में जीत से सारा मुद्दा ही ख़त्म हो गया. मानो जनादेश सारे अपराध मिटा देता हो.
इस बयान के बाद लालकृष्ण आडवाणी को लग रहा है कि ये सुझाव उनके बहुत काम आ सकता है. उन पर लोग रथयात्रा करके दंगे करवाने और फिर बाबरी मस्जिद गिरवाने के आरोप लगाते रहे हैं. अब वे कह सकते हैं कि उसके बाद केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में दो-दो बार एनडीए की सरकार बन गई. जनादेश ने साबित कर दिया कि भाजपा निर्दोष थी. साथ में उन्हें, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती आदि सब को जनता ने सही ठहरा दिया है.
पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण ठीक कह रहे हैं कि अब लोग तर्क दे सकते हैं कि गुजरात में दो बार की चुनावी जीत के बाद नरेंद्र मोदी को गुजरात के दंगों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. जनता ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है.
अब शहाबुद्दीन और पप्पू यादव दोनों मांग कर सकते हैं कि वे जेलों में आते-जाते कितने ही चुनाव जीत चुके हैं. उनको मिले जनादेशों के बाद उन्हें जेलों में रखना ठीक नहीं है. सारे अपराधों के लिए जनता ने उन्हें क्षमा कर दिया है.
डेढ़ सौ के क़रीब लोकसभा सदस्य सोच रहे होंगे कि वे अपने ख़िलाफ़ लगे आपराधिक आरोपों को जनादेश का हवाला देकर ख़त्म करवा सकते हैं. उधर राज्य विधानसभाओं में आपराधिक मुक़दमे झेल रहे सैकड़ों माननीय विधायक प्रधानमंत्री के क़ायल हो गए हैं कि अब वे भी जनादेश के हथियार का उपयोग कर सकते हैं.
सुरेश कलमाड़ी सोच रहे होंगे कि अब जल्दी चुनाव हो जाएँ और वे फिर चुनाव जीत जाएँ तो फिर कह सकें कि जनादेश मिल गया और राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाले के आरोपों को जनता ने नकार दिया है. ए राजा को लग रहा है कि प्रधानमंत्री को 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जाँच करवाने की ज़रुरत ही नहीं थी. चुनाव करवा लेते और फिर जीत कर बरी हो जाते.
और अब ललित मोदी, हसन अली और शाहिद बलवा भी अपने-अपने लिए एक-एक सीट की तलाश कर रहे होंगे जिससे कि वे जनादेश लेकर आपराधिक मामलों से बरी हो जाएँ.
अब मुश्किल जनता की है जो अपने प्रतिनिधि चुन कर विधानसभाओं और संसद में भेज रही है लेकिन जनप्रतिनिधि दावा कर रहे हैं कि यह उनके आपराधिक मामलों पर जनता का फ़ैसला है.
जनादेश के इस हथियार का उपयोग जनप्रतिनिधि तो ठीक से करना सीख गए हैं पता नहीं जनता कब सीखेगी. अगर सीख नहीं मिली तो पानी में घुली भंग का असर और व्यापक होता जाएगा.

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वाह विनोद जी, आपने शानदार और सच लिखा है. मेरे विचार से अगर जनता में दम हो तो ये सब नहीं हो सकता है, लेकिन सब कुछ लगाकर जनता को आसानी से बेवक़ूफ़ बनाया जाता है और बाक़ी क्या होता है आपने सब कुछ लिख कर बीबीसी स्रोताओं को समझा दिया है. इन बेईमान नेताओं के बारे में लिखना यहां अपना समय बर्बाद करना है.
विनोद जी धन्यवाद. एक सही विषय पर ध्यान दिलाने के लिए. लेकिन समस्या यही है कि लोग सुबह जगते ही सब कुछ भूल जाते हैं. ज़रूरत है इन भ्रष्ट (नेता) लोगों को सबक़ सिखाने की, सारी दुनिया जग गई है लेकिन भारत अभी भी सो रहा है.
इसे कहते हैं बात का बतंगड़. प्रधानमंत्री का कहने का यह मतलब क़तई नहीं था कि चुनाव जीत लेने के बाद अपराधियों के सारे दोष धुल जाते हैं. हर बयान का अपना मतलब होता है, यह आप पर निर्भर करता है आप उसे किस तरह से लेते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री का जो बयान था वह चुनावी मुद्दे पर था. चुनाव में जनादेश किसी व्यक्ति को नहीं मिलता बल्कि पार्टी को मिलता है और विपक्ष ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया भी था. लेकिन फिर भी देश के लोगों ने विपक्ष के आरोपों को नकार दिया था तो प्रधानमंत्री इस तर्क के सहारे विपक्ष को संतुष्ट करना चाहते थे. फिर भी मैं इस बात से सहमत हूं कि अगर कोई गड़बड़ी है तो उस पर से पर्दा उठना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह के मौक़े से बचा जा सके.
बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है
हर शाख़ पे उल्लू बैठे हैं, अंजामे-गुलिस्ताँ क्या होगा.
ये एक साधारण सा फंडा है, विनोद समझने की कोशिश करें--
मनुष्य की औसत उम्र 60 साल, 1-20 साल शिक्षा, 40-60 साल वृद्धालय या अस्पताल, अब आपके पास सिर्फ़ 20 साल है.
इतना सारा डॉलर, स्टर्लिंग पाउंड और रूपया लेकर कहां जाना है दोस्त, इंसान कितना भी कर ले साथ में कुछ नहीं ले जा पाएगा. फिर भी पता नहीं क्यों करोड़ों रुपयों का घोटाला..!
जितना पैसा कर में पुणे के घोड़े वाले को देना है उतने में तो पूरे पुणे की ग़रीबी दूर हो जाएगी. अगर सरकार से दुशमनी है और उनको न देना है तो न दें... वैसे भी उस घोड़े वाले की उम्र हो गई है.
जी विनोद भाई, सच्चे सच को इतनी सच्चाई से पटल पर आपने दिखाया इसके लिए शाबाश. फ़िलहाल आपको इस बात का पता होना चाहिए कि महानुभवों/ मान्यवरों के संबंध में आपने लिखा है... वे लोग तो बिल्कुल बेशर्म होते हैं जो पहले से ही गंदगी में कीच में सने हैं उनके ऊपर और कितना कीचड़ डालो क्या फ़र्क़ पड़ता है. आप बुद्धिजीवी लोग से उम्मीद है रचनात्मक तथा तवरित विषय पर कुछ प्रकाश डालें. धन्यवाद.
यह सब भद्दा नाटक है. इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार और अपराध को जन्म देती है और अपनी कुर्सी के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है और देश को भी बेच सकती है.
प्रधानमंत्री अप सठिया गए हैं. उन्हें ये समझना चाहिए कि वे देश के कोई आम नागरिक नहीं हैं वो कुछ भी कह दें और उसका नोटिस नहीं लिया जाए ऐसा नहीं है. उनकी कही एक एक बात से देश की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था चलती है. उनकी बात पर सुप्रीम कोर्ट और देश की सभी विधान सभाएं और परिषद का ध्यान होता है. यदि उनका ऐसा बयान होगा तो फिर इस देश में किसी भी अपराध के लिए कोर्ट की शरण में जाने के बजाए लोग जनता की अदालत में जाना पसंद करेंगे. और कोई भी जीत कर ये कहेगा कि मैं निर्दोष हूं क्योंकि मुझे जनता ने चुना है. तब तो सारी व्यवस्था को लोगों की मर्ज़ी पर छोड़ देना चाहिए.
विनोद जी, मैं आपके जनता पर लगाए आक्षेप से सहमत नही हूँ. जनता के पास विकल्प नहीं है. लगभग 50% जनता वोट देने नही जाती है. इसका मतलब उसे कोई प्रत्याशी पसंद नही है. एक बार आप नकारात्मक वोटिंग तथा प्रत्याशी को वापस बुलाने का अधिकार देकर देखिए. तब पता चलेगा जनता कितनी जागरूक है. परंतु छद्म लोकतांत्रिक देश में यह संभव नहीं है.
हमारे देश में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ने ईश्वर में आस्था खो दी है. यदि भगवान का डर हो तो यह सब संभव नहीं है. हमें अपनी व्यवस्था में बदलाव लाने की ज़रूरत है.
इमरजेंसी भी धुल गई क्योंकि इंदिरा गांधी चुनाव जीत गईं।
मनमोहन सिंह राजनीतिज्ञ नहीं हैं बल्कि वर्ल्ड बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री हैं. वह आम आदमी के प्रधानमंत्री नहीं हैं बल्कि पैसा कमाने वाले समाज के डॉक्टर हैं. उनके प्रधामंत्रित्व में भारत का हर तरह से पतन हुआ-चाहे वह आज़ादी हो, स्वायत्तता हो, लोकतंत्र हो या धर्मनिरपेक्षता हो. उनका कार्यकाल पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल के ही समकक्ष है जहाँ अंधेर नगरी, चौपट राजा की परिकल्पना साकार होती थी. वह ग़लतियों की तरफ़ से आँखें मूंदे हुए हैं और इस बात को चरितार्थ कर रहे हैं कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो.
विनोद भाई, आप की सोच काफ़ी सीमा तक नकारात्मक हो गई लगती है. संक्षेप में, साँप निकल गया लकीर को पीट रहे हैं. इससे काम नहीं चलेगा. कृपया कुछ सकारात्मक सोचें. व्यंग्यात्मक लिखना कब तक चलेगा.
विनोद जी,प्रधानमंत्री के ऐसे बेतुके बयान पर आपका कहना बिल्कुल सही है। यह विचित्र सरकार है। कभी पिछली सरकारों के फैसले के लिए खुद को जिम्मेदारी मानने से इंकार कर देती है तो कभी सारे अपराधों को जनादेश मिलने से धुल डालती है। ऐसे बयान बहुत ही गलत परंपरा का निर्माण कर रहे हैं।
विनोद जी प्रधानमंत्री जी बूढ़े और सेवा निवृत्त भी हो गए हैं, पुनर्नियुक्ति पर हैं तब जब देश का हर राजनेता फेल हो चुका है, राजनीति के हिसाब से अब उनसे किसी प्रकार की अपेक्षा करना लगता है उन पर ज्यादती ही होगी. प्रधानमंत्री निवास के नल से 'भंग' नहीं निकलेगा तो निकलेगा कहाँ से कभी यह पेय सर्वाधिक शिव 'भोले बाबा' को प्रिय था, सो अब आम आदमी को मुहैया है भी या नहीं, पर जनादेश का फार्मूला अच्छा है सी.बी आयी.,सुप्रीमकोर्ट सब परेशान हैं, नाहक जाँच में वक्त और धन बर्बाद करवा रहे हैं, सभी घपले में फंसे लोगों को जनता से मुहर लगवा लेनी चाहिए. तभी तो कहते हैं इलाहबाद के संगम में 'त्रिवेणी' की गंगा और यमुना तो दृश्यमान हैं पर सरस्वती विलुप्त है. प्रधानमंत्री तो हैं पर 'अधिकार'...!
मैंने तो सुना था कि नशे में लोग सच्ची बात बोलते हैं... ये नशा नहीं कुछ और ही है...!!
भारत में राजनीति का मतलब शून्य होता जा रहा है. जिस तरह बयान दर बयान आ रहे हैं उससे पता चलता है कि नेताओं की मानसिकता कितनी गिर गई है. अगर प्रधानमंत्री का बयान सही है तो भला संसद के डेढ़ सौ सांसदों की भी मांग होगी कि उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामला बंद हो.
इसे कहते हैं लोकतंत्र के साथ भद्दा मज़ाक़. अबतो इसे लोकतंत्र नहीं बल्कि लूटतंत्र कहना चाहिए.
में सोचता हूँ कि जो भी भारत के संविधान के बारे में समझाते है ( जो कि हमें समझना चाहिए), उन्हें पता है कि न्यायिक और संसदीय प्रक्रिया भिन्न है, इसलिए दोनों को एक दूसरे के पूर्णतः प्रमाण नहीं माना जा सकता.
प्रधानमंत्री सच्चे कॉंग्रेसी हो गए हैं.
विनोद जी आपने बहुत अच्छा लिखा है.इस लेख की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है.आने जो सवाल लेख में उठाये हैं पूरी तरह से समीचीन हैं.जहाँ तक सात, रेसकोर्स रोड के पेय जल में भंग घुले होने की आपके द्वारा प्रकट की गयी आशंका का प्रश्न है तो मुझे तो लगता है कि वहां के पानी में भंग नहीं अफीम घुला हुआ है जिसने मनमोहन सिंह की सोचने समझने की क्षमता ही छीन ली है.
यह सब दस का दम है भाई!
इसे कहते हैं लोकतंत्र के साथ भद्दा मज़ाक़. अबतो इसे लोकतंत्र नहीं बल्कि लूटतंत्र कहना चाहिए.
बहुत अच्छा ब्लॉग.