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सठिया गई है अंतरात्मा

ब्रजेश उपाध्यायब्रजेश उपाध्याय|मंगलवार, 15 मार्च 2011, 22:26 IST


बड़े बूढ़े कहते थे जब कोई दुविधा हो तो अंतरात्मा की सुनो. जो सही है वही सुनाई देगा.

आज के दिन लगता है मानो ट्विटर, फ़ेसबुक, 24 गुणा सात टेलीविज़न और अनगिनत अख़बारों को देख-देखकर अंतरात्मा भी कनफ़्यूज़ सी हो गई है.

लाखों बेबस लाचार अनपढ़ महिलाओं को छोटे-छोटे कर्ज़ दिलाकर एक मान सम्मान की ज़िंदगी देनेवाले नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनूस को उन्हीं के देश की महिला प्रधानमंत्री जब "ख़ून चूसने वाले" की उपाधि दे, जिस इंसान ने दुनिया को यकीन दिलाया हो कि ग़रीब में भी कर्ज़ लौटाने की कुव्वत है उस पर यदि गरीबों के शोषण का आरोप लगे तो अंतरात्मा को कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि सही कौन है ग़लत कौन.

लेकिन अंतरात्मा भी आजकल डिप्लोमैटिक हो गई है. पहले गूगल पर सर्च करती है, कुछ पुराने आरोपों-अनुभवों पर नज़र दौड़ाती है और फिर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझती है.

डरती है कि कहीं कल अलमारी खोलने पर कुछ छिपे हुए कंकाल न लुढ़क पड़े और टीवी स्क्रीन पर म्यूज़िक के साथ आवाज़ न आ जाए "ग़लत जवाब".

आप कहेंगे अंतरात्मा सठिया गई है. अब वो ये भी नहीं पहचान रही कि नायक कौन है और विलेन कौन ? शायद आप सही हैं..सचमुच सठिया गई है वो.

अब तो उन स्कूली बच्चों की तरह करती है जिनसे मास्टर साहब ने पूरी क्लास के सामने एक आसान सा सवाल पूछा हो और उसका उत्तर न दे पाने की शर्मिंदगी में नाखून चबाने लगते हैं.
हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाते हैं और हर बार अपील की जाती है कि अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट दीजिए.

लेकिन जब नतीजे आते हैं तो पता चलता है कि बहुत से ऐसे लोग संसद पहुंच गए हैं जिनसे हम आमतौर पर मिलना पसंद न करें. मतदान के वक्त सास-बहू सीरियल देख रही थी अंतरात्मा.

ममता दीदी कह रही हैं कि वे चुनाव जीतने के बाद बंगाल को बदल देंगीं. जनता भी आस में है कि शायद वैसा ही हो लेकिन अंतरात्मा यकीन करने को तैयार नहीं और फिर से डिप्लोमैटिक चुप्पी.

बिनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगता है. गूगल सर्च बता रहा है कि उन्हें आदिवासियों के कल्याण के लिए काम करते देखा गया है.

तो क्या वो निर्दोष हैं? फिर से चुप्पी.

टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी कहते हैं कि जीत के लिए उनके लड़के जी-जान लगा देंगे. लेकिन 29 रनों के अंदर नौ विकेट गिर जाते हैं.

इस बार अंतरात्मा चुप है कि क्रिकेट में उतार चढ़ाव तो होते ही रहते हैं. जापान में सुनामी के बाद परमाणु रिएक्टर फटे तो भारत में भी सवाल उठे कि अपने वाले कितने सुरक्षित हैं. प्रधानमंत्री समेत नामीगिरामी वैज्ञानिकों ने कहा--सौ फ़ीसदी.

अंतरात्माजी से पूछा कि यकीन कर लूं तो फिर उसने कन्नी काट ली.

लगता है कि अंतरात्मा से अब बातें ना करने में ही भलाई है. जब जवाब ही न मिले तो पूछ कर क्या फ़ायदा.
वैसे भी ट्विटर, फ़ेसबुक और ढेर सारे ख़बरदार चैनल्स तो हैं ही.

वैसे आपकी अंतरात्मा के क्या हाल हैं?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 01:16 IST, 16 मार्च 2011 Rakesh Jain:

    बहुत अच्छा लेख पढ़ने को मिला. धन्यवाद ब्रजेश जी.

  • 2. 09:07 IST, 16 मार्च 2011 Dhananjay Nath:

    ब्रजेश जी बहुत ख़ूब. हमार नैतिक पतन इस क़दर हो चुका है जहाँ कोई भी आवाज़ नहीं पहुँचती.

  • 3. 09:45 IST, 16 मार्च 2011 dkmahto:

    उपाध्याय जी जब कोई चीज़ उलटी दिखने लगे तो उसे उलट कर देखिए वह सीधी लगेगी.

  • 4. 09:51 IST, 16 मार्च 2011 dkmahto:

    उपाध्याय जी जब कोई चीज़ उलटी दिखने लगे तो उसे उलट कर देखिए वह सीधी लगने लगेगी.

  • 5. 09:53 IST, 16 मार्च 2011 Lavesh Agrawal:

    मैं आपसे सहमत नहीं हूँ कि अंतरात्मा साठ को पार कर गई है. मेरी राय में तो अंतरात्मा मर चुकी है. आज हम उससे सवाल नहीं पूछते बल्कि उस पर यक़ीन करते हैं जो ट्विटर पर आया है या टीवी चैनल दिखा रहे हैं. बहरहाल मेरी अंतरात्मा को झकझोरने के लिए धन्यवाद.

  • 6. 11:11 IST, 16 मार्च 2011 KAPIL BATRA:

    यह एक कड़वा सच है. सबको अपने हितों की पड़ी है. लोगों में आपसी बातचीत की आदत छूटती जा रही है. जो लोग सच का बीड़ा उठाए हैं उनकी संख्या घटती जा रही है क्योंकि ऐसे अनेक लोगों की जानें गईं और उनके लिए न तो सरकार ने कुछ किया और न ही समाज ने.

  • 7. 12:18 IST, 16 मार्च 2011 Ravi Srivastava:

    अंतरात्मा को लोग हमेशा से तो दबाते आ रहे हैं. तो फिर आज उससे यह उम्मीद कैसे करते हैं कि वह आप के सवालों के जवाब दे...और वे जवाब सही ही हों.

  • 8. 12:19 IST, 16 मार्च 2011 rajendra soni:

    ब्रजेश जी, बहुत अच्छा लिखा आपने. मैं आप के विचार और आवाज़ दोनों बहुत पसंद करता हूँ.

  • 9. 13:23 IST, 16 मार्च 2011 VEERMA RAM,BARMER:

    बहुत अच्छा लेख है.

  • 10. 13:56 IST, 16 मार्च 2011 Durgesh:

    बहुत ख़ूब, वैसे अंतरात्मा क्या होती है?

  • 11. 14:08 IST, 16 मार्च 2011 Ravi Kumar:

    शानदार, अति उत्तम.

  • 12. 16:14 IST, 16 मार्च 2011 farhat farooqi:

    ऐसा गड़बड़झाला देख कर हत्प्रभ है परमात्मा
    और जाकर भीतर कहीं जा छुपी अंतरात्मा.

  • 13. 16:14 IST, 16 मार्च 2011 Durgesh:

    आपकी आत्मा का क्या उपाध्याय जी? क्या आप कभी अपनी अंतरात्मा की बात सुनते हैं?

  • 14. 16:17 IST, 16 मार्च 2011 Tiwari:

    मैं आपसे सहमत नहीं हूँ. क्योंकि आप लोग अपने विचार साबित करने को ही लिखते हैं.

  • 15. 16:40 IST, 16 मार्च 2011 pradeep shabdilya:

    ब्रजेश जी के कथन में आम आदमी की हताशा झलकती है. हम भारत में क्या पूरे विश्व में दोषरहित व्यवस्था स्थापित कर पाने में विफल रहे हैं. यह मेरी अंतरात्मा की आवाज़ है. इसलिए गाहे बगाहे यह गीत गुनगुनाता हूँ कि 'इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो न.'

  • 16. 16:56 IST, 16 मार्च 2011 himmat singh bhati:

    मेरी अंतरात्मा आप का यह लेख पढ़ कर रोने लगी क्योंकि जापान में इतने लोग मारे गए पर किसी भी देश के नेताओं या बुद्धिजीवियों ने मरने वाले लोगों के लिए कोई प्रार्थना या संवेदना तक व्यक्त नहीं की. यहाँ भी लोगों ने चुप्पी साध रखी है.

  • 17. 17:45 IST, 16 मार्च 2011 Kautilya dutt:

    फेसबुक पर मित्रो की संख्या भले ही बढ रही हो , पर हमारा सामाजिक दायरा छोटा होता जा रहा है .अंतरात्मा भी क्या करे समझौता करे जा रही है ...

  • 18. 22:09 IST, 16 मार्च 2011 neeraj:

    ब्रजेश जी आपको ख़ुश होना चाहिए कि आपकी अंतरात्मा की आवाज़ को पढ़ने वाले भी हैं. आगे भी उम्मीद करते हैं कि ऐसा ही कुछ अच्छा पढ़ने को मिलेगा.

  • 19. 22:27 IST, 16 मार्च 2011 muhammad jalal:

    भाई मेरे अंतरात्मा तो जब सही मार्ग बताती है जब पवित्र और साफसुथरा हो, हज़ार पापों के बाद भी क्या बता पाएगा, यदि आइना पर गुबार हो तो क्या चेहरा नज़र आएगा.

  • 20. 02:37 IST, 17 मार्च 2011 HARISH TOLANI:

    सच कभी मरता नहीं है. सदैव रहता है. अति उत्तम.

  • 21. 07:34 IST, 17 मार्च 2011 braj kishore singh.hajipur,bihar:

    ब्रजेश जी,झूठ और आंकड़ों का मकडजाल इतना घना हो गया है कि सच का सिरा पकड़ना नामुमकिन जैसा हो गया है. पिछले कुछ समय में लोकतंत्र के बहुत-से प्रतीक टूटे हैं;ढह गए हैं. अपने प्रधानमंत्री को ही लीजिए. क्या वे ईमानदारी और सच्चाई का पुतला नहीं माने जा रहे थे? अब वे जितनी सफाई से झूठ बोल लेते हैं जिला अदालत में भाडा पर गवाही देनेवाला भी क्या इतनी सफाई से बोल पाएगा? सबके सिर पर पैसा नाच रहा है और पूरी दुनिया उसके पीछे दौड़ लगाने में व्यस्त है. ऐसे में कौन कब बेईमान हो जाए या निकल जाए कौन जानता है?

  • 22. 08:34 IST, 17 मार्च 2011 राजीव रंजन :

    अति उत्तम ब्रजेश जी....परन्तु अंतरात्मा अभी भी कही कही आवाज़ करती सुने पड़ जाती है.
    बीबीसी पर ब्रिटेन की संसद में बहस मुझे लगता है की अंतरात्मा की आवाज़ पर ही हो रही है.

  • 23. 09:20 IST, 17 मार्च 2011 Santosh Kumar Sharma:

    सच में आज अंतरात्मा सही और ग़लत का निर्णय लेने में असहाय महसूस करती है.

  • 24. 09:49 IST, 17 मार्च 2011 sunil sharma:

    यह आपने बहुत अच्छा सवाल उठाया है. मुझे संदेह है पत्रकारिता में इस तरह के साफ़ सुथरे विचार सामने आते होंगे.

  • 25. 09:52 IST, 17 मार्च 2011 Abhishek:

    आज से पहले अंतरात्मा की इतनी अच्छी व्याख्या नहीं देखी थी. बेहद उत्तम.

  • 26. 10:43 IST, 17 मार्च 2011 Prashant kumar:

    ब्रजेश जी आपका ब्लॉग पढ़ कर ऐसा लगा कि कलियुगी आँधी ने किसी को नहीं छोड़ा. यहाँ तक कि हमारी अंतरात्मा भी मलिन हो गई.

  • 27. 10:53 IST, 17 मार्च 2011 harikrishnalalverma:

    ब्रजेश जी बहुत ख़ूब. हमार नैतिक पतन इस क़दर हो चुका है जहाँ कोई भी आवाज़ नहीं पहुँचती

  • 28. 11:22 IST, 17 मार्च 2011 Pranav Kumar Das:

    प्रिय ब्रजेश जी, अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की रिपोर्टिंग के बाद आप रेडियो पर आ ही नहीं रहे हैं क्यों..? मैं आपको बहुत मिस करता हूँ.

  • 29. 13:28 IST, 17 मार्च 2011 MD ZAKI IQBAL:

    जो व्यक्ति लगातार सीखना चाहते हैं, वह झुकना भी जानते हैं। इसमें उसका अहं बाधक नहीं होता। उसके साथ ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसे अपनी अंतरात्मा का सम्मान करने की कला मालूम होती है। इस संदर्भ में हमारे देश में भी कई मिसालें मिल जाएंगी, जो अन्तरात्मा की बात करेंगे लेकिन अन्तरात्मा की बात नहीं सुनेंगे। हमारे नेता लोग चाहे, वह सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के या वाम दल के हों, अपना उल्लू सीधा करने के लिए हमेशा ही लोगों को बेवकुफ बनाते रहते हैं। स्कूली शिक्षा में बच्चों को शिक्षा दी जाती है कि झूठ मत बोलो, लाचारों की मदद करो, आदि-आदि। लेकिन अब हालात तो इस कदर बदतर हो गए हैं कि हर कोई - अंग्रेजी के महान कवि शेक्सपियर के इस कथन को गांठ बाध कर जीवन में सफल होने की चाहत रखने लगा है। शेक्सपियर कहते थे कि “अन्तरात्मा मनुष्य को कायर बना देती है”। यह वकतव्य आजके संदर्भ में सौ फीसदी सही है। आज हमारे नेता लोग और बुद्धिजीवि वर्ग, लोगों को चिकनी चपटी बात से बहला फुसला कर लोकतंत्र के महापर्व में वोट डालने की बात करके वोट ते ले लेते हैं मगर उसके बाद इस तरह से ग़ायब हो जाते हैं। जैसे कि उसे उस क्षेत्र से कोई लेना देना ही नहीं है, और अगर क्षेत्र में रहते भी हैं तो अपने वोट बैंक को लाभ पहुंचाने कि जुगाड़ मे रहते हैं, बाकि लोग अपने अन्तरात्मा को कोसते रहते हैं। हालात अब ऐसे हो गए है कि अधिकतर लोग गांव से महानगरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हो गए हैं। हमारे मुख्यमंत्री जी कहते हैं कि बिहार को एक विकासित प्रदेश बना दूंगा, लेकिन हमारी अन्तरात्मा इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। पांच साल में कुछ नहीं कर सके तो कहते हैं इस बार कर के दिख दूंगा, लेकिन वह भी अगर अपने अन्तरात्मा की सनते तो इस तरह की बात नहीं करते, और सतही बात करते और शिक्षा को प्राथमिकता के तौर पर लेते, क्योंकि किसी भी प्रदेश की प्रगति वहां की शिक्षा स्तर पर निर्भर करती है। लेकिन जिस तरह की भर्ती शिक्षा क्षेत्र में हुई है, उससे तो भविष्य अन्धकारमय ही रहेगा, और प्रदेश की तरक्की की बात ना करें तो बेहतर होगा। आज प्रदेश की तरक्की प्रदेश के नेताओं के बल पर नहीं हो रही है, बल्कि प्रदेश से बाहर मेहनत मज़दूरी करने वाले मेहनतकशों की वजह से। अगर हमारी सरकार प्रदेश की भलाई के लिए सोचती तो प्रदेश का मैदानी भाग, कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़ से तरस्त/ग्रस्त नहीं होती। हमारे नेता कभी भी अपने अन्तरात्मा की बात नहीं करते, वे यह नेहीं सोचते कि लोग पलायन करने पर क्यों मजबूर हैं। लोगों की भलाई करना उसकी प्राथिमकता नहीं रह गई है। सच तो यह है कि हमारे नेता लोग चाहे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के हों उनकी अन्तरात्मा सठिया गई है।
    आपने सोलह आने सही कहा कि आजकल अंतरात्मा भी डिप्लोमैटिक हो गई है। जब लाचार अनपढ़ महिलाओं को मान सम्मान की ज़िंदगी दिलाने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनूस को उन्हीं के देश की महिला प्रधानमंत्री ने "ख़ून चूसने वाले" की उपाधि दे डाली तो और इससे क्या बड़ी बात क्या हो सकती है। अपने लोगों के लिए कार्य करने वाले “नायक” मगर सरकार की नज़र में “विलन” बिनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगा कर जेल में डाल दिया गया। टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के बारे में हमारे देश में कुछ लोगों, और मीडिया वाले की राय इतनी संकुचित है कि अगर वह बैटिंग में सचिन के स्तर की बैटिंग नहीं करते तो उसे बुरा भला कहते हैं, टीम से बाहर तक निकालने की मुहिम भी चलाते है। वह क्या करें बैटिंग करें या बॉलिंग करें या, विकेट कीपिंग करें अथवा टीम की कप्तानी करें। अगर एक मैच हार जाए तो हाय तौबा करने लगते हैं, जब वर्ल्ड कप शुरू भी नहीं हुआ था तो हर किसी की ज़ुबान पर भारत के ही वर्ल्ड कप विजेता होने की संभावना व्यक्त की जा रही थी, लेकिन एक मैच हारने के बाद ही अपनों द्वारा ऐसी नकारात्मक प्रतिक्रिया का होना, एक सठियाए हुए मानसिकता को ही दर्शाता है। स्पोर्टमैनशिप हमारे में नहीं है, गेम में जो भी टीम पुरे समय तक में अच्छा खेलेगी वही जीतेगा, और यह भी किसी एक या दो खिलाड़ी पर डिपेंड नहीं करता कि उसके चलने से हमारी टीम जीत जाएगी। किसी भी टीम स्पर्धा में पुरे टीम की कारकर्दगी महत्वपुर्ण होती है। लेकिन हम भारतीयों में स्पोर्टमैनशिप की कमी है। यहां के लोगों को सिर्फ की सेंचुरी चाहिए, चाहे भारत जीते या हारे। अगर भारत, पाकिस्तान से जीत जाए तो चलेगा, चाहे वर्ल्ड कप जीतें या न जीते। अफजल गुरु की फांसी की सजा बहाल रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में कहा था कि इस कांड ने देश की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया है। तो क्या दारा सिंह के मामले में हुए फैसले के बाद हम यह मानें कि ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चों की हत्या ने देश की अंतरात्मा को नहीं हिलाया? या हम यह मान लें कि इस देश की आत्मा ही मर चुकी है , बल्कि यूं कहें कि हमने अपने देश की आत्मा को ही सर्वसम्मति से फांसी पर लटका दिया है! राजस्थान से प्राप्त एक रिपोर्ट के अनुसार वहां इस योजना के अंतर्गत लगाए गए मजदूरों को एक रुपये से 13 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी मिली। शेष धन बिचौलिये खा गए। संसद में बैठे जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस ओर नहीं है कि देश में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या करोड़ों में है। ये असमय ही मौत के गाल में समा जाते हैं। बस्तर तथा अन्य आदिवासी क्षेत्रों के लोग पास के शहरों में दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में मजदूरी के लिए जाते हैं। इस प्रकार की रिपोटर्ें भी आई हैं कि उनमें से कुछ लोग रास्ते में ही भूख से तड़प कर मर गए। इन सांसदों का इससे कोई सरोकार नहीं है। इनकी मानसिकता तो यह है कि जब देश में लूट-खसोट चल ही रही है तो वे इस अवसर को हाथ से क्यों जाने दें।

  • 30. 14:04 IST, 17 मार्च 2011 Anshuman:

    बहुत ही अच्छा लेख. धन्यवाद.

  • 31. 14:23 IST, 17 मार्च 2011 Prashant kumar:

    बहुत ख़ूब ब्रजेश जी, आपने तो इस ब्लॉग में अंतरात्मा के रहस्य को उजागर कर दिया.

  • 32. 15:46 IST, 17 मार्च 2011 Bhaskar Karn:

    अगर हम इतिहास से सीख कर सुधरेंगे नहीं तो प्रकृति हमें सबक़ सिखा देगी.

  • 33. 16:18 IST, 17 मार्च 2011 BHEEM SINGH:

    उपाध्याय जी, आज की दुनिया जहाँ सब कुछ बाज़ार पर आधारित है आप उसको शास्त्र पर आधारित मान कर भारी भूल कर रहे हैं. इस बाज़ारवाद में मीडिया की भूमिका सिर्फ़ एजेंट की रह गई है जो कि आयात-निर्यात तथा अन्य सौदे में पाँच-दस प्रतिशत का कमीशन लेकर सौदा पक्का करवाते हैं. इस बाज़ार में प्रधानमंत्री से लेकर संत्री तक विक्रेता हैं और कमीशन (मीडिया) की ताक़त पर जो भी सामान बनाओ बिक जाता है. अब तो मीडिया की ताक़त काफ़ी बढ़ गई है. किसी को भी ज़ीरो से हीरो बना सकती है. अब आप को क्या पड़ी है कि शास्त्र पर आधारित दुनिया का स्वप्न देख रहे हैं. मुझे प्रतीत होता है खुली धूप में तारे देख रहे हो. सच को स्वीकार करने की आदत डालना ही ठीक रहेगा.

  • 34. 17:07 IST, 17 मार्च 2011 Sweta:

    अंतरात्मा पर एक अच्छा लेख है. धन्यवाद.

  • 35. 22:26 IST, 17 मार्च 2011 Dr A K Singh:

    यह तब होता है जब हमारी इच्छाएँ अपरंपार होती हैं. आत्मा को सठियाने से रोकने के लिए कुछ देर यह सोचिए कि हम क्या कर रहे हैं? बेहतर होगा यदि विपासना का मार्ग अपनाया जाए.

  • 36. 02:42 IST, 18 मार्च 2011 Narendra:

    ब्रजेशजी, आपका लेख बहुत ही विचारप्रेरक है व इतने स्पष्ट आपके विचार हैं, किसी भी सच्चे इन्सानकी अंतरात्मा जाग उठेगी। मुझे सिर्फ इतना कहना है कि देशकी सबसे बडी अंतरात्मा - जनताके सर्वोच्च प्रतिनिधिकी अंतरात्मा - सठियाभी गइ है और निली पगडीमें कैद भी! इनके लिये अपने और कितने साथी और माताहतोंके भ्रष्टाचार किस्से पर्याप्त होंगे जब इनकी अंतरात्मा बाहर निकलेगी? हमें तो यह भी मालुम नहि की वह जिंदा है या मर गइ है।

  • 37. 12:18 IST, 18 मार्च 2011 Firoz Khan:

    बहुत दिनों के बाद कुछ अच्छा पढ़ने को मिला...

  • 38. 14:56 IST, 18 मार्च 2011 Raj:

    बहुत अच्छा लेख है.

  • 39. 17:41 IST, 18 मार्च 2011 dinesh singh:

    यह आधुनिक दर्शन पर लिखा एक सुंदर कटाक्ष है.

  • 40. 19:12 IST, 18 मार्च 2011 rakesh pandey:

    ब्रजेश जी, आप अंतरात्मा के सठियाने की बात कर रहे हैं लेकिन मैं मानता हूँ कि अगर ऐसा होता तो आप यह बात नहीं करते. सच तो यह है कि हम ही कुछ करना नहीं चाहते हैं, दूसरों के ऊपर सवाल उठाने से पहले अपने आप से पूछ कर देखें कि हम आप कितने सही हैं. जब तक अपनी अतंरात्मा साफ़ नहीं होगी तब तक हम उसकी आवाज़ सुन ही नहीं पाएँगे. और अगर सुन भी ली तो कुछ कर नहीं पाएँगे.

  • 41. 19:43 IST, 18 मार्च 2011 govind:

    ब्रजेश उपाध्याय, आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है.

  • 42. 22:30 IST, 18 मार्च 2011 madhuresh:

    बहुत अच्छा लगा पढ़ कर.

  • 43. 23:19 IST, 18 मार्च 2011 rahul:

    आज के हाई टेक युग में अंतरात्मा जैसी आउट डेटेड चीज़ पे भरोसा क्यों करते हैं जी, जब फेसबुक या ट्विटर नहीं था तब बात और थी, तब कुछ था भी नहीं अंतरात्मा के सिवा. जेट के युग में बैलगाड़ी की सवारी अपन नहीं कर सकते, इसलिए मेरी राय में अंतरात्मा को ताक पे रख दिया जाना चाहिए. इसी में देश की भलाई है.

  • 44. 08:05 IST, 19 मार्च 2011 dr sudhakar hathi :

    आख़िर अंतरात्मा है क्या?

  • 45. 11:55 IST, 19 मार्च 2011 Dev :

    अब तो अंतरात्मा से बग़ावत करना ही एक रास्ता है.

  • 46. 15:04 IST, 19 मार्च 2011 PRAVEEN SINGH:


    प्रिय ब्रजेश जी, जब कभी किसी से शिकवा शिकायत करना तो सामने अपने बस आईना रखना. धन्यवाद

  • 47. 10:38 IST, 20 मार्च 2011 Manish:

    बहुत अच्छा लेख है, सर. लेकिन ज़रूरत है कि ऐसे लेख को भाषण में बदल कर आम जनता तक पहुंचाया जाए. ऐसे ब्लॉग पर लिख-लिख कर क्या फ़ायदा.

  • 48. 18:38 IST, 20 मार्च 2011 Ashish Kolarkar:

    ब्रजेश जी आपने बहुत ही प्रासंगिक लिखा है. विकिलीक्स के ख़ुलासे के बाद प्रधानमंत्री की सफ़ाई ऐसी ही श्रेणी में आती है. अंतरात्मा की माने या प्रधानमंत्री की? इस अंतरद्वंद को सार्वजनिक नहीं ही करें तो अच्छा है.

  • 49. 08:31 IST, 21 मार्च 2011 Dinesh Kumar:

    सही मायने में हम अपनी अंतरात्मा की सुनते ही कब हैं ब्रजेश जी. सिर्फ़ सुनने का ढोंग करते हैं. हर कोई दूसरे में दोष ढूंढता है. अपने बारे में नहीं सोचता.

  • 50. 12:29 IST, 21 मार्च 2011 Rituraj singh:

    अंतरात्मा की आवाज़ सुनना आसान भी नहीं है. जिसे आप अंतरात्मा की आवाज़ कहते हैं वो आपका अपना ही मन है. अंतरात्मा की आवाज़ तो एक पल के लिए आती है और चली जाती है, आवश्यक्ता है कि आप उस पल की आवाज़ सुनें. फिर शायद आप अंतरात्मा का सही अनुभव कर पाएंगे.

  • 51. 22:17 IST, 29 मार्च 2011 DHEERAJ KUMAR:

    दिल से लिखा गया लेख, पढ़ कर दिल को दर्द हुआ पर संतुष्टि मिली की देश-दुनिया में दिलवाले लोग भी हैं. जैसे आप...

  • 52. 18:50 IST, 03 अप्रैल 2011 R.P.Pandey:

    ब्रजेश जी, अंतरात्मा बहस करने की नहीं चिंतन करने की चीज़ है. अंतरात्मा अब है ही कहाँ कि सठियाएगी.

  • 53. 11:48 IST, 09 मई 2011 Harjinder:

    राजेश जी नमस्कार, अपने बारे में सोचता हूँ तो आपकी बात सही लगती है.

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