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काहे करें खेती....

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 08 मार्च 2011, 11:24 IST

पछुआ का धुक्कड़ चल रहा है.. एक्को गो मकई में दाना नहीं धरेगा.......जो लागत लगाए उ भी डूबेगा.... काहे करें खेती...

ये बात एक किसान के जवान बेटे की है जो अब खेती नहीं करना चाहता है. ज़मीन बहुत है लेकिन कहता है कि खेती से पेट नहीं भरता.

उसने अपनी ज़मीनें बेचने का फ़ैसला कर लिया है और कहता है कि सारा पैसा बैंक में रखूंगा तो जो ब्याज़ मिलेगा वो भी खेती से ज्यादा है.

बात वाजिब है..कौन माथापच्ची करे..ट्रैक्टर मंगाए, ज़मीन जोते, बीज बोए, खाद डाले, रातों को जग कर फसल की रखवाली करे. बारिश न हो तो बोरिंग चलवाए. फिर कटाई में मज़दूर खोजे और हिसाब करे तो पता चले कि लागत भी मुश्किल से निकल रही है.

बैंक से पैसा निकालेगा, अनाज खरीदेगा, गाड़ी खरीदेगा, मॉल में जाएगा शॉपिंग करेगा और मज़े से जिएगा.

मैंने पूछा कि बात तुम्हारी ठीक लेकिन अगर सारे किसानों ने यही कर दिया तो क्या होगा. जवाब मिला.... गेहूं महंगा होता है तो मिडिल क्लास बाप बाप करने लगता है. उसको सस्ता में खिलाने का हमने ठेका ले रखा है.

मैंने कहा. सरकार सब्सिडी देती है. ऋण देती है तो खेती फायदे का सौदा हो सकता है. उसने कहा सब्सिडी सबसे बड़ा सरकारी धोखा है. डीजल, खाद, बीज और कीटनाशकों के बाद जो वापस मिलता है उससे लोग जहर भी नहीं खरीद सकते हैं. बचा हुआ कीटनाशक विदर्भ के किसान पी जाते हैं.

वो बहुत नाराज़ था. बोला, किसान का मुंह हमेसा सुखले ही काहे रहता है. एक और बहुत बड़ा दिक्कत है कि मीडिया समझती है कि देश में किसान सिर्फ हरियाणा और पंजाब में ही रहते हैं. कभी सड़क से चंडीगढ़ जाईये... वोक्सवैगन की बहुत सारी दुकानें खुली हैं.बिहार में एक्को ठो शो रूम नहीं है.

बात सोलह आने सच्ची थी. हरित क्रांति का जो लाभ पंजाब हरियाणा को हुआ वो बिहार और उत्तर प्रदेश को नहीं हुआ. वैसे आजकल पंजाब मे किसान गले तक कर्ज़े में डूबे बताए जाते हैं.

लाभ क्यों नहीं हुआ कैसे नहीं हुआ वो एक अलग ही कहानी है. फिलहाल खेती की बात. मैंन पूछा तो क्या करना चाहते हो खेती छोड़कर

बोलने लगा, खेती छोड़ने का विकल्प जिस दिन भी किसान को मिल जायेगा.. वो खेती छोड़ देगा... लोग खेती विकल्पहीनता की स्थिति में कर रहे हैं... विकल्प देकर पूछिए कि क्या वे खेती ही करना पसंद करेंगे.

इससे पहले कि मैं कुछ और पूछता उसने कहा, मेरी पूरी बात सुनिए...बाबू जी पटना यूनीवर्सिटी से पोस्ट ग्रैजुएट थे. बड़े किसान के बेटे थे. मेरे दादा जी 1200 बीघा के जोतदार थे और बड़ी कार पर चढ़ा करते थे मैंने अपने पिता को साइकिल पर चढ़ते देखा .खेती में वे असफल रहे पर जमीन बचाकर रखी. शायद मेरे लिए. मैंने स्कूल कॉलेज के समय खेती की है लेकिन अब और नहीं.

बात सोचने वाली थी. मैंने थोड़ा सोचा तो याद आया. मेरे चार मामा हैं. एक भी गांव में नहीं रहते. सब बंबई, दिल्ली रहते हैं. कोई ड्राइवर है कोई दरबान है. महीने के दो चार हज़ार मिलते हैं. आधा पेट खाते हैं आधा घर भेजते हैं. कहते हैं खेती का झंझट कौन करे. नगद है जीवन चल जाता है.

बाल बच्चों को पढ़ाएंगे. खेती कर के क्या करेगा. डॉक्टर-इंजीनियर बनेगा तो बाप का नाम रोशन होगा. कोई भी किसान नहीं चाहता उसका बेटा खेती करे क्योंकि खेती में कुछ नहीं धरा है.

हां आजकल बात बहुत होती है. एग्रीकल्चर फार्मिंग, सस्टेनेबल डेवलपमेंट, वगैरह वगैरह लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है.

मेरे पास भी नहीं. मेरे पास भी एक सवाल ही है...अगर सभी किसानों ने खेती छोड़ दी और सब डॉक्टर इंजीनियर बन गए तो अनाज कौन उगाएगा और फिर मंहगाई के मुद्दे पर पत्रकार कागज कैसे काले करेंगे.

फिर गरीब अनाज के लिए लड़ेगा कैसे. सरकार किस बात की सब्सिडी देगी, किसका ब्याज़ माफ़ करेगी और आखिरकारएक निजी सवाल - मेरा पेट कैसे भरेगा..


नोट- इस ब्लॉग के कई शब्द एक जवान किसान से उधार लिए गए हैं.


टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:03 IST, 08 मार्च 2011 MD ZAKI IQBAL:

    पहले तो मैं आपको इस ब्लॉग के लिए शुक्रिया अदा करूंगा। यह कहानी किसी जवान किसान की नहीं बल्कि सुशील जी आपकी है, क्योंकि हालात ही ऐसे हो रहे हैं। और आप स्वयं महसूस भी कर रहे होंगे। यह कहानी नहीं बल्कि हकीकत है, बिहार की हालत बिगाड़ने में हमारे बुद्धिजीवियों और नेताओं का सबसे बड़ा योगदान रहा है, जिसने भोले-भाले लोगों को बेवकूफ़ बना कर दो वक्त की रोटी के लिए मजबूर कर दिया है, उसकी हालत इतनी अच्छी नहीं है कि किसी भी इन तथाकथित नेताओं के सामने अपनी ज़ुबान खोल सकें। किसी भी प्रदेश की तरक्की वहां की शिक्षा और कृषी पर डिपेंड करती है। बिहार की स्थिति इन दोनों क्षेत्र में निगेटिव है। अगर बिहार में आप शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं तो आप शिक्षा प्राप्त नहीं कर रहै हैं बल्कि वक्त बर्बाद कर रहे हैं। अगर आपको इसमें कोई शक हो तो बिहार आकर प्राइमेरी शिक्षक से इंटरव्यू लें, और देखें कि शिक्षा का स्टैण्डर क्या है। शिक्षा की गुणवत्ता को बिगाड़ कर उसको गूलाम बनाने की कवायद चल रही है, ताकि वे शिक्षा के क्षेत्र में आगे न बढ़ सकें और उसे दास बना कर रखा जाए, और उनका शोषण करते रहें। हमारे यह नेताओं और बुद्धिजीवियों ने बिहार को इतना पीछे कर दिया कि अपने प्रदेश के भविष्य को लेकर जब भी कुछ सोचता हूं बदन कांप उठता है, हम किस तरफ जा रहे हैं? हमारा भविष्य क्या है? हमारे बच्चों का क्या होगा? क्या हम हमेशा ही पीछे रहैंगे? इस तरह के सवालात हमेशा ही आते रहते हैं। शायद हमारी किस्मत में भी यही है। आज यह सबसे अधिक निर्धनतम प्रदेशों में से एक है, सच्चाई तो यह है कि हमारे किसान विदर्भ के किसान से भी बदतर हैं। लेकिन खुशी की बात है कि हमारे किसान अपनी असफलता से घबरा कर आत्महत्या नहीं करते, अगर खेती से पेट नहीं भरता तो, कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं चाहे पंजाब व हरियाणा में खेती करना पड़े, देश के किसी भी भाग में मेहनत करके दो वक्त की रोटी के लिए कुछ भी करना पड़े या दिल्ली मुम्बई में भीख ही क्यों न मांगना पड़े, वे हमेशा ही इसके लिए तैयार रहते हैं। जिसका परिणाम आज देख सकते हैं कि दुनिया के किसी भी कोने में बिहारवासी की एक अलग पहचान बनी है। जहां तक बिहार वासियों का सवाल है, वे बहुत जागरूक हैं। वे मेहनत की कमाई करने के लिए कभी भी पीछे नहीं हटते। मैं भी बिहार का हूं, और बिहार की ये हालत देखकर मन बहुत ही दुःखी हो जाता है। मैं भागलपुर का रहने वाला हूं, जो कि बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर है, लेकिन जब में 25 साल पीछे अपने बचपन को याद करता हूं तो हमारा शहर पहले के मुकाबले में अब शहर नहीं बल्कि एक टूटा फूटा खंडहर मात्र रह गया है। पिछले 5 साल से हमारे क्षेत्र का लाखों एकड़ कृषियोग्य भूमि पानी के लिए जूझ रहा है। सरकार सूखा घोषित कर भी देती है, लेकिन किसानों को क्या मिलता है, वह सभी को पता है। पछुआ चलना शुरू हो गया है, अभी आम का सीज़न है, लेकिन वर्षा न होने के कारण आम की फसल बर्बाद होने के लिए तैयार है। लेकिन कोई पुछने वाला नहीं है। पीने के लिए पानी की किल्लत अभी से शुरू हो गई है, गर्मी आने पर क्या होगा, भगवान ही जानता है। पीने के पानी के लिए सरकार की तरफ से फंड भी मिले, लेकिन यह तथाकथित सरकारी अफसर या नेता लोग जो अपने को जनता के सेवक कहते हैं, खानापूर्ति कर फंड को हड़प जाते हैं। और काम को पूरा नहीं करते। इस हालत में लोग क्या करें। और हमारे मुख्यमंत्री जी जो कहते हैं कि बिहार को एक प्रगतिशील प्रदेश बना दूंगा, ये सिर्फ बहलावे की चीज़ है। मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि कभी भी वे इस तरह के काम को नहीं कर सकते, इसलिए की जहां की 80% जनता निर्क्षर हो वहां क्या होगा। और जो शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए कुछ भी करने को तैयार ही नहीं है। उसे पता ही नहीं की प्रदेश में शिक्षा की स्थिति कितनी बदतर है। सिर्फ अक्षर का ज्ञान मात्र से उसे हम साक्षर नहीं कह सकते। हमारे 90% प्राइमेरी शिक्षक को पूरी तरह अक्षर का भी ज्ञान नहीं होगा। अगर शिक्षक ही ऐसे होंगे तो क्षात्रों का हाल क्या होगा। सिर्फ टाइम पास करने और खाने के लिए स्कूल जाएंगे। अगर आपको गलत लगता है तो आप इसके लिए सर्वे करें, और सरकार के समक्ष इसको रखें।

  • 2. 17:47 IST, 08 मार्च 2011 Sandeep Sharma:

    ऐसा क्यों है की ऐसा फायदा सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसानो को ही पहुँचता है क्या ये सवाल किसी के दिमाग में नहीं आता

    मै गाहे बगाहे उत्तर प्रदेश जाता रहता हूँ और वहा देखता हूँ की पानी की कोई कमी नहीं है एक सामान्य tubewell से आप सिंचाई कर सकते हैं लेकिन साल में सिर्फ दो फसले ली जाती है जबकि पंजाब में साल में ४ फसले भी उगा ली जाती है

    मै खुद देखता हूँ की उत्तर प्रदेश में किसान मेहनत नहीं करना चाहता लेकिन ये चाहता है की उसे आमदनी पूरी मिले उतनी ही जितनी की पंजाब या हरियाणा के किसानो को मिलती है तो ऐसा तो गलत है न


    मेरे साढू भाई की थोड़ी जमीन है उत्तर प्रदेश में जिसमे वो खेती करते हैं और उस खेती से हर साल जमीन का एक नया टुकड़ा खरीद लेते हैं

    उनके बगल में ही उनके नजदीकी रिश्तेदार की जमीन है हर साल दो साल में वो लोग खेती की जमीन का एक टुकड़ा बेच देते हैं अब इसे कोई ये कहे की जमीन कम उपजाऊ है या पानी कम मिलता है या ऐसी कोई बात तो वो बहाना नहीं तो क्या होगी. दोनों में सिर्फ एक ही अंतर है एक मेहनत करता है दूसरा मक्कारी

    ये मात्र मेरी राय है और हो सकता है की मै गलत हूँ लेकिन मैंने सिर्फ मेरा अनुभव लिखा है

  • 3. 19:33 IST, 08 मार्च 2011 Saptarshi:

    बिचौलियों को हटाएं. सब ठीक हो जाएगा. वैसे आप पेट भरने की चिंता न करे.हम प्रकृति का हिस्सा हैं और प्रकृति अपना ख्याल खुद रखती है.

  • 4. 20:14 IST, 08 मार्च 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    हिंदुस्तान के रहनुमाओं ने बंटा धार कर दिया है. खेती की ज़मीन को लोग बेचकर मकान में तब्दील कर रहे हैं तो खेती तो खत्म हो ही जाएगी. सुशील जी अगर आप पूरे भारत की बात करते तो और भी अच्छा होता.

  • 5. 20:18 IST, 08 मार्च 2011 braj kishore singh.hajipur,bihar:

    सुशीलजी इस दुनिया में हमारे पास जो कुछ भी है सब उधार का ही तो है.क्या ये शब्द जन्म से हमारे साथ हैं?सुशीलजी भारत में खेती की जो स्थिति है उसे आपने पूरी तरह से बेपर्दा करके रख दिया.किसानों के पास सिर्फ मजबूरी और गरीबी है तो सरकार के पास कृषि-क्षेत्र से जुड़े आकर्षक आंकड़े हैं.पहले जहाँ बजट में कृषि-क्षेत्र की प्रधानता रहती थी अब सेवा और उद्योग-क्षेत्र की प्रधानता रहती है.सरकार को सेवा और उद्योग-क्षेत्र में दहाई में वृद्धि-दर चाहिए लेकिन खेती के लिए सिर्फ ४% ही उसकी नजर में पर्याप्त है और बिडम्बना तो यह है कि यह ४% भी प्राप्त नहीं हो पाता.सरकारी नीति ऐसी ही बनी रही तो एक न एक दिन वह भी आएगा जब सारे किसान खेती छोड़ देंगे और अनाज सुनार की दुकान में मिला करेगा.

  • 6. 20:18 IST, 08 मार्च 2011 Pramod Shukla:

    मैं संदीप भाई से सहमत हूं. मेरे पूर्वज उत्तर प्रदेश के अमेठी से हैं. मेरा जन्म और परवरिश दिल्ली में हुई और अब मैं भारत से बाहर रहता हूं. कभी कभार अमेठी जाता हूं. गांव में या तो महिलाएं रहती हैं या बच्चे. 95 प्रतिशत आदमी शहर चले गए हैं. शहरों में चाहे मज़दूरी करनी पड़े पर वो खेती नहीं करना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि उसके पास ज़मीन नहीं है. ज़मीन सबके पास है लेकिन शहर की चकाचौंध अलग है. कुछ लोग अभी भी खेती करते हैं लेकिन उतनी जितनी उन्हें ज़रुरत है. लोग काम नहीं करना चाहते हैं. बैठ कर राजनीति पर गांधी परिवार पर बात कर लीजिए लोग खूब बतियाएंगे. उनकी दिनचर्या सड़क किनारे चाय की दुकान से गांधी परिवार से शुरु होती है. कुछ काम नहीं करते. दिन भर बैठे रहते हैं. मेरे कुछ मित्र पंजाब में हैं. वहां लोग मेहनती हैं. वो एक दूसरे की मदद करते हैं तो वहां तरक्की हुई है. हां ये ज़रुर है कि पंजाब का हर किसान कनाडा और अमरीका जाना चाहता है और इसी चक्कर में कर्ज लेता है. सामूहिक रुप से किसानों की स्थिति दयनीय है इसमें दो राय नहीं . सरकार की नीतियों का या तो उन्हें पता नहीं या फिर फायदा ग़लत लोग उठा रहे हैं. सरकार को पारदर्शिता के साथ कुछ करना चाहिए. लोग खेती के नाम पर कर्ज़ लेकर दूसरा काम भी तो करते हैं. बाद में सरकार ने कर्ज़ भी माफ कर दिया. मैं जो लिख रहा हूं उससे कुछ लोग परेशान होंगे लेकिन मेरा मानना है कि भगवान उसी की मदद करते हैं जो अपनी मदद खुद करता है.

  • 7. 22:36 IST, 08 मार्च 2011 शशि सिंह :

    जो तस्वीर आपने पेश की है वो निश्चित ही भयावह है. अगर हर किसान खेती छोड़ दे तो दुनिया में लोग खायेंगे क्या? गाड़ी, सिनेमा हॉल, मॉल, फ्लैट या आलिशान मकान तो खाया नहीं जा सकता? दिल पे हाथ रखकर कह रहा हूं, ऐसी हालत में निश्चित तौर पर किसान बनना चाहूंगा. कोई जन सेवा या समाज सेवा का हवाला मैं नहीं दूंगा बल्कि शुद्ध रूप से यह एक शानदार व्यवसायिक फैसला होगा। यकीन मानिये, जो तस्वीर आपने पेश की है उसमें अनाज की कीमत मुझे सोने से ज्यादा दीख रही है. ऐसे में मैं किसान बनकर सोने की खान का मालिक बनना चाहूंगा. अब यहां थोड़ी देर के लिए मेरी इस इच्छा को बड़े कॉरपोरेट घरानों की इच्छा मान लीजिये. अब आपको तस्वीर थोड़ी साफ होती दीख रही होगी कि आज क्यों खेती को घाटे का सौदा बनाकर रखा गया है इसलिए कि किसानों का अपने खेतों से मोह भंग हो जाय और वो इसे छोड़कर हट जाय तभी तो शुरू होगी मेरी सोने की खुदाई.

  • 8. 23:14 IST, 08 मार्च 2011 गंगा सहाय मीणा:

    सुशील जी, इसमें राजस्‍थान के किसानों का दर्द भी जोड लीजिए. जमीन तो उनके पास है लेकिन न तो उसमें खेती करने के लिए पर्याप्‍त पानी है और न ही वो जमीन खरीदने के लिए कोई MNC या SEZ ही वहां पहुंच रहा. अब किसान करे तो क्‍या करे? इस बार लगभग 15 साल बाद ठीक-ठाक बारिश हुई. शेष वर्षों में खेती राजस्‍थान के किसानों के लिए घाटे का सौदा ही रही है. सही सवाल उठाया आपने- अगर विकल्‍प मिले तो कोई भी किसान खेती छोडने को तैयार हो जाएगा, कोई भी किसान अपने बच्‍चों को किसान नहीं बनाना चाहता, अधिकारी बनाना चाहता है, या कम से कम एक सरकारी नौकरी.
    आपकी चिंता जायज है कि अगर सभी किसान खेती छोड देंगे तो क्‍या होगा- वैसे निकट भविष्‍य में ऐसा होने की संभावना नहीं है क्‍योंकि किसानों के पास कोई विकल्‍प नहीं है. लेकिन अगर ऐसी ही स्थितियां रहीं तो वो दिन भी दूर नहीं जब सारे किसान खेती छोड देंगे, उन्‍हें छोड देनी भी चाहिए ताकि शहरी लोगों को महसूस हो सके कि हमारा पेट कैसे भरता है और पेट भरने वाले को हमें उसके श्रम का सही मूल्‍य देना चाहिए.
    हमारे परिवार में भी फिलहाल यही द्वंद्व चल रहा है (बहुत सारे अन्‍य परिवारों में भी चल रहा होगा). हम दोनों भाई शहर में नौकरी करते हैं गांव में घाटे की खेती को करने वाला कोई नहीं है, इसके बावजूद मां, भैया-भाभी का खेती से मन हटता नहीं. जैसे-तैसे खेती में लगे हैं. मैं कहते-कहते थक गया कि हमारा खर्चा नौकरी से चलता है खेती से नहीं. तो वे कहते हैं कि तुम्‍हें हमने खेती से पाल-पोसकर बडा किया और पढाया-लिखाया. इसी तरह के कई तर्क (!) गांव वालों के पास होते हैं और उनका खेती से मन हटता नहीं. खेती भले ही घाटे का सौदा हो, लेकिन किसान को अन्‍न पैदा करने में जो संतुष्टि मिलती है, शायद उसी संतुष्टि के लिए सारे किसान इस घाटे के सौदे में फंसे हैं.

    खैर, एक संवेदनशील और सरोकारी पोस्‍ट के लिए बहुत शुक्रिया.

  • 9. 00:48 IST, 09 मार्च 2011 पृथ्‍वी :

    बहुत अच्‍छा सवाल उठाया है. लेकिन अगर हमसे कोई पूछे कि इस नौकरी से समय मिले तो अपन क्‍या करना चाहेंगे.. पहला और दिल से जवाब यही है कि खेती बशर्ते घर की जमीन हो.खेती करना निसंदेह खाला जी की बाड़ा नहीं है. माटी में माटी होना पड़ता है. थार जहां सालों साल अकाल पड़ता है वहां खेती की विकटता अलग तरह की है. फिर भी मौका मिलने पर खेत लौट जाने की ललक दिल में रहती है क्‍योंकि शहर इतने शहर हो गए हैं कि अलग दुनिया लगती है. आपने अपनी जगह बहुत सही बात कही है. खेती घाटे का सौदा हो गई है. लेकिन यहां एक बात यह भी है कि फायदे के लिए खेती कौन करता है सर, फायदे के लिए तो व्‍यापार किया जाता है. उसके लिए बणिए भाई हैं ना. आपने जिन युवा का जिक्र किया वे सही हैं. उनका दर्द अपनी जगह सही है. जमीन बेचकर सूदखोरी से अगर ऐश की जा सकती है तो उससे एतराज किसको होगा. फिर खाने के लिए लिट्टी चोखा तो ना होगा .. खाइगा बर्गर और पित्‍जा, दो ठू गर्लफ्रेंड के साथ बैठकर. मां के हाथ की रोटी ना होगी बाबू.
    संवेदनशील मुद्दा उठाया है.. यह बहस जारी रहनी चाहिए और बहस यह भी होनी चाहिए कि खेतीबाड़ी के मुद्दे को सरकार और अधिकारियों के भरोसे छोड़ना कितना जायज है.

  • 10. 11:03 IST, 09 मार्च 2011 Satya:

    सुशील जी, आपने प्याज़ 40 रुपए होने पर दिल्ली सरकार को गिरते देखा है. पर कभी प्याज़ के दो रुपए किलो होने पर किसी को आवाज़ उठाते हुए सुना है. कोई ये सोचता है कि उस किसान की लागत कहां से आएगी. सच ये है कि भारत में राजनीति, मीडिया सब के सब केवल शहरों की आवाज़ सुनते हैं
    ऐसा नहीं है कि खेती में फ़ायदा नहीं है लेकिन ज़रुरत है सरकार को सही फ़ैसला लेने की.


  • 11. 13:38 IST, 09 मार्च 2011 namrata:

    मुझे समझ में नहीं आता कि बीबीसी संवाददाता सुशील झा गाँवों की वे बातें उजागर करने पर क्यों तुले हुए हैं जबकि अब उससे किसी का कोई लेनादेना ही नहीं है. गाँव बदल चुके हैं. हो सकता है आपका गाँव कोई अपवाद हो लेकिन आज गाँव झलक दिखला जा जैसे कार्यक्रम और मोबाइल फ़ोन को जानते हैं. यहाँ तक कि वे बीबीसी हिंदी भी मोबाइल पर सुनते हैं. आगे बढ़िए झा जी. भारत आगे निकल चुका है. अपने पाठकों को कन्फ़्यूज़ करने के लिए ऐसी बातें मत लिखिए.

  • 12. 13:41 IST, 09 मार्च 2011 abhinav yadav:

    आजकल तो वही लोग किसानी कर रहे हैं जो मजबूर हैं. बहुत सही ब्लॉग आया है.

  • 13. 18:05 IST, 09 मार्च 2011 नवीन भोजपुरिया:

    सुशील जी

    आपके इस ब्लाग पे एक बहुत ही तगडी बहस फेसबुक पे छिडी है जिसका लिंक और वहा पे पोस्ट किये गये कुछ शब्द हम यहा पे रखना चाहते है !

    लिंक - https://www.facebook.com/#!/anjulem/posts/138973659501962

    हम मध्यमवर्गीय किसान की बात कर रहे है .बडे बडे फार्महाउस की बात तो हमे मालुम नही लेकिन हम जिस परिवार के रहने वाले है वह एक किसान का परिवार है लेकिन उत्पादन मे असंतुलन , बाजार मे... उचित भाव न मिलना , कुछ रुढिवादे तौर तरीके खेती के , वैज्ञानिक उपकरणो का अभाव आज के कृषि व्यवसाय को कुन्द कर दिया है ( खासकर पुर्वांचल और बिहार मे , जो हमने देखा है ) जबकि यह वह क्षेत्र है जहा की मिट्टी बहुत ही उपजाउ है. हम लोगो की खुद की जमीन , दोमट वाली भी है, काली भी है और चिकनी भी मतलब आलु प्याज मक्का , गेँहु के साथ साथ दाल की भी फसले जोरदार हो सकती है लेकिन कभी बाढ , कभी सूखा , कभी अधिक उत्पादन किसानो को मजबूर कर रहा है खेती न करने के लिए. साथ ही साथ मे उत्पादन होने के बाद बिचौलियो का प्रतिरोध , गतिरोध और अवरोध किसानो की सहन क्षमता को भी तोड और निचोड डाला है.

    अब तो एक सोच बन गई है की नौकरी मे 5 हजार ही सही हर महीने तो आता है लेकिन खेती मे बीज डालने के बाद ( 3,4, महीने के बाद ) लागत भी आयेगा की नही मालूम नहीं.

    नतीजा घर वाले शहर भेजते है पढने के लिये , कुछ कमाने के लिये और धीरे धीरे खेती कम हो रही है.खेती को अब तक व्यसाय का रुप नही मिल सका है.

    वैज्ञानिक तरीके से खेती मे केवल उपकरण ही नही और भी बहुत सारी चीजे है

    1- नियमित रुप से मिट्टी की जांच
    2- उस मिट्टी के हिसाब से बीज का चयन
    3- बीज और मिट्टी को हिसाब से दबाना
    4- जैविक खादो का प्रचुर मात्रा मे उपयोग
    5- समय समय मे खेती मे बदलाव

    अब स्थिति यह है की हमारा जो कोराड का खेत है उसमे सदियो से आलू बोया जाता है और आज भी वही हिसाब किताब है , कभी बदलाव की जरुरत नही देखी गई , बीज भी लगभग उसी क्षेत्र से उत्पाद आलू का होता है. मसूर चना मटर तेलहन आदि मे भी यही हाल है.

    वैज्ञानिक तरिके से खेती केवल उपकरणो या नये नये किस्म के बीज बोने से ही नही होता है ( आपने कौन सी विधी अपनाई हमे पता नही लेकिन ) , बल्कि मिट्टी की जांच से लेकर उसमे कौन से खाद , कौन से बीज , कितना पानी , किस समय आदि चीजो पे भी ध्यान देना होता है.

    अगर इसे व्यवसाय के रुप मे बनाना है तो फिर एक व्यवसायी की तरह की कार्य करना पडेगा तभी सब कुछ सही जा सकता है.

    सब्जी आज भी लोगो को पता नही है की बारहोमास के लिये सब्जी के बीज आने लगे है.चावल के उन्नत किस्म के बीज बाजार मे उपलब्ध है लेकिन किसान इन सब चीजो से अनभिज्ञ है.

    सरकार के तरफ से बहुत सारे उपकरण कम दामो पे उपलब्ध है लेकिन किसानो को पता नही है और अधिकारी बेच के खा जाते है या फिर उसका पैसा खा जाते है.

    बैंक से कम ब्याज पे ऋण मिलता है इस बात की जानकारी बहुत कम किसानो को है.

    इसके बाद की कहानी और भयंकर है , उत्पादन के बाद किसानो को सही बाजार ( खरीददार ) नही मिल पाता है और बिचौलिये खरीदकर ऐश करते है.

    खेती मे इंश्योरेंश अभी तक हमारे क्षेत्र मे नही पहुंचा है जिसकी वजह से किसानो को कभी कभी अपनी लागत भी खोनी पडती है.

    एक बेहतरीन , सटीक और जबरदस्त मुद्दे को उठाने के लिये आपको धन्यवाद !

  • 14. 22:15 IST, 09 मार्च 2011 करुण कुमार विद्यार्थी:

    इतना भी मजबूर नहीं हैं हमारे किसान. हाँ जिनके पास जमीन ही कम है वो बेचारे क्या करें?? अब परिवार के साथ खेतीहर जमीन तो नहीं बढेगी नहीं. भूमि वितरण प्रणाली में सुधार एक विकल्प हो सकता है. एक किसान का बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना बुनता है और उसमे सफल होता है तो इसमे कोई बुराई नहीं है.परिवर्तन तो सार्वभौमिक सत्य है.

  • 15. 10:12 IST, 10 मार्च 2011 deepak kumar:

    सुशील जी मैंने आपका ब्लॉग पढ़ा ,कुछ लोगो की प्रतिक्रिया भी पढ़ा पर मैं आपको ये बता दूं कि मैं अभी 22 वर्ष का युवा और किसान का बेटा हूँ और बिहार का रहने वाला हूँ हम लोग खेती क्योँ करे 2001-10 में धान का सरकारी रेट 1050 रूपये था जबकि 2010-11 में केवल 1000.
    महंगाई काफी बढ़ चुकी है हम लोग एक बोरा खाद जिसपर सरकार सब्सिडी देती है वो मार्केट से सरकार द्वारा तय की गई रेट से कम से कम 100रूपये ज्यादा खरीदते हैं.
    दो साल हो गए न तो नहर में पानी आता है न बारिश होती है ,एक लीटर डीज़ल का रेट भी 40 से ऊपर जा चुका है बिज़ली रहती नहीं तो हम लोग क्या करे.
    अब रही सरकार और किसान क्रेडिट कार्ड की बात तो आपके पास सारे चीजे रहने पर भी बिना बैंक में चढ़ावा चढाये क्रेडिट कार्ड नहीं मिलेगा. चढ़ावा भी कोई 10, 20, 50 रूपये नहीं, पूरे 15000 एक लाख के कार्ड के लिए ,
    ये तो हुई बैंक की बात, मैंने 2010 में एक पम्प सेट ख़रीदा जिस पर बिहार सरकार द्वारा 50 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा था. अनुदान की प्रक्रिया के द्वारा मैंने आवेदन जमा किया तो प्रखंड कृषि पदादिकारी ने मुझसे अनुदान का 50 प्रतिशत देने की बात की (जो की कुल मूल्य का 25 प्रतिशत होता है) मैंने जब देने से मना किया तो उन्होंने मेरा आवेदन रद्द कर दिया.
    ऐसा केवल मेरे साथ ही नहीं हुआ ऐसा बहुत से लोगो के साथ हो रहा है तो क्या इसी लिए खेती कर्रे की अनाज हम पैदा करे और मुनाफा बाबू लोग खाए.
    मैंने एक पाठक की प्रतिक्रिया पढ़ी जो लिखते है कि गाँव अब बदल गया है जी हाँ गाँव अब बदल गया है ,गाँव में मोबाइल फ़ोन आ गया है पर क्या कभी आपने गाँव में भूखे बच्चे और लोगो के पास फटे कपड़े नहीं देखे है आप लोगो के बच्चो के ऊपर जो अभी 10 साल का है हर महीने पांच हज़ार से दस हज़ार रूपये खर्च होते है. आज भारत में किसी भी सरकारी नौकरी में लगे लोगो को दस हज़ार से कम वेतन नहीं है जबकि एक साधारण किसान की कुल आमदनी साल में 20000 रूपये होती है तो क्या गाँव बदल नहीं रहा है.

  • 16. 14:38 IST, 10 मार्च 2011 Bhim Kumar Singh:

    झा जी, मैं भी गांव का रहने वाला हूं और गांव से मुझे उतना ही लगाव है, जितना 18 साल के किशोर को अपनी गर्लफ्रेंड से होता है। जाहिर है, मैं गांव और किसानों की मानसिकता से वाकिफ हूं। आपने इस ब्लॉग में जो कुछ भी लिखा है, उसमें सच्चाई नजर नहीं आती। हमने अपने गांव समेत कई अन्य गांवों में भी देखा है कि कुंभारों ने मिट्टी के बरतन बनाने नहीं छोड़े, मोची जूता सिलना नहीं छोड़ा और धोबी घाट पर तो अब फिल्में भी बनने लगी हैं। फिर किसान खेती करना छोड़ देंगे, यह आशंका बेबुनियाद है। आपने एक किसान के बेटे के हवाले से अपनी कोरी कल्पना जाहिर की है। आप समझते हैं कि ब्लॉग की अवधारणा यही है। लेकिन आप गलत समझते हैं। ब्लॉग लिखते समय इंसान सबसे ज्यादा स्वभाविक होता है और शायद इसी में इस मंच की प्रासंगिकता भी है। मैं समझता हूं आपने मेरी बात समझी होगी।

  • 17. 15:36 IST, 10 मार्च 2011 damodar kumar:

    सुशील जी, उस जवान किसान से कृ्पया मुझे मिलवाएं. उसके सभी सवालों का जवाब मेरे पास है. मैं भी बिहार का हूं लेकिन मैं जयपुर में रह रहा हूं क्योंकि मेरे पास ज़मीन नहीं है. खेती से बिहार में विकास किस तरह होगा, उसका हल मेरे पास है. लेकिन मैं बिना ज़मीन के बिहार में नहीं रह सकता हूं. बिहार के किसान हर जगह के किसानों से ज़्यादा मेहनती हैं लेकिन शिक्षा और तकनीक में पीछे हैं. इसलिए वहां खेती से लाभ नहीं हो पा रहा है.

  • 18. 10:41 IST, 11 मार्च 2011 santosh:

    में सारी प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद केवल एक पर ही अपना मत रखना चाहूँगा जिसमे कहा गया है की गांव आज कल मॉडर्न हो गये है और मोबाइल डिश टीवी घर-२ में पहुँच गया है,
    ज़रा उनसे पूछिए क्या यह खेती करके संभव हुआ है,उनके घर में यह रौनक बाहर के पैसे से नही आई है.आज ज़रूरत है कृषि की व्यवसायकिता की जो के लोग एक बिज़्नेस की तौर पर ले सके,
    ज़रूरत है अच्च्ची नीति की जिससे कृष में प्रगती हो सके.Shri Lalbahadur Shastriji के बाद खेती पर किसी ने ध्यान नही दिया एक केवल वही तीए जिन्हीने जे जवान और जे किशन का नारा दिया और भारत को स्वालंबी बनाया.
    जाऊरत है तो केवल एक सही नीति की सही बयवस्था की जिसमे यह सुनिश्चित किया जा सके की किशानो को समय पर बेज मिल रहये या नही समय पर खाद और नहर में समाए से पानी आत अहैइ की न्नाही.
    अगर नहर की सुविधा नही है बिजली की सुविधा मूहाय्या कराई जे.हर ब्लॉक लेअवेल पर कृष Engineer और सलाहकार रहये जो को उस ब्लॉक में लोगों को सही स्लह दे सके की क्या बोए और कब बोए और समय -२
    पर मिटतिकी जान्हक कर उनकी को उचित सलाह दे की कैसे मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारा जाय.और एन सब के बाद उनको एक बेहतर बाजार मुहया कराया जे जान्हा पर वो अपनाई फसल को बिना बिच्चोलिए के बेंच सके..
    अगर एक इंदुस्ट्रिला जोने बनाकर बिजली पानी और उनके उत्पाद को बेचनाए के लिए सही बाजार मूहाय्या क्राव जा सकता है तो कृष के लिए क्यूँ नही..क्या एस देश में अब कोई श्री लालबहादुर शास्त्री नही आएँगे जो की कृष ब्यवसायकीता की क्रांति ला सके.......

  • 19. 15:17 IST, 12 मार्च 2011 harikrishnalalverma:

    सुशील जी, आपने जैसा लिखा है, ग़रीब किसान की हालत बिलकुल वैसी ही है. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

  • 20. 23:22 IST, 12 मार्च 2011 poonam solia:

    झा जी आपने ब्लॉग लिखा सबने पढ़ा और अपनी -अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त क. आपने लिखा, लोगो ने पढ़ा, लिखा बात खत्म. हमारे देश में लिखने और बोलने वालो की संख्या बहुत है लेकिन करने वालो की बहुत कम. ये हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सभी अपने किसान भाइयों का दर्द नहीं समझे और न ही हम शहरी लोग कभी उनके दुःख को महसूस कर सकते हैं. आज से कई साल पहले की एक बुढ़िया जो हमारे घर में बर्तन माजने का काम कर रही थी, उसने मजबूरी में अपनी कई बीघा ज़मीन मात्र ३ लाख में बेच दी थी और वो शहर में बर्तन माज रही थी. आज भी जब मैं गांव से आए ऑटो वालों से या किसी मज़दूर से बात करती हूं, तो सब निराशाजनक उत्तर देते है. मैं अकसर गांव से आए लोगों को गांव में रह कर ही संघर्ष करने की सलाह देती हूं. उनमें अपनी तरफ से उत्साह और जोश भरने की कोशिश करती हूं. ये कड़वा सत्य है. आज हमारे किसान भाइयो की हालत ठीक नहीं है. अपवाद स्वरूप कुछ को छोड़ कर. हिंदी के महान कवि प्रेमचंद जी के उपन्यास 'गोदान ' में किसान की जो दशा है वो आज भी भारत के बहुत से गांव की है. जिन्हें इस बात पर यकीन नहीं है, उन्हें ' गोदान ' पढ़ना चाहिए. और अगर फिर भी यकीन न हो तो भारत के पिछड़े हुए गांवों में जाकर देखें. मेरे शादी का रिश्ता ऐसे ही एक पिछड़े इलाके से १९९८ में आया थी जिसे मेरी माँ और भाई देखने गए. वहां से आकर मेरी मां बीमार पड़ गई और भाई में वहां मेरा रिश्ता नहीं किया. आज भी हमारे देश के किसान की स्थिति गोदान के किसान जैसी ही है. यहाँ कुछ पंक्तियां दाऊ कृष्ण वर्मा की लिखना चाहूंगी क्योंकि मैं भी आप लोगों की तरह यही कर सकती हूं.
    ठिठुरे किसान को तारों की छाया में जाते देखा है ,
    और तपते सूरज के नीचे , खेतो से आते देखा है ...
    यद्यपि देखे हैं हरदम आंसू , आहें सुनती आई हूं ,
    पर कभी -कभी सब कुछ बिसरा कर उनको गाते देखा है....
    फसलों के कटने पर मैंने उनकी मस्ती भी देखी है ,
    कभी-कभी नहीं कुछ भी मेहनत का फल पाते देखा है....
    अक्सर मैने उनकी खेती लुटती और बिकती देखी है ,
    धरती के बेटो की आखों में देखी है कसक पुरानी ....

  • 21. 01:48 IST, 13 मार्च 2011 Ashwani Singh:

    लेख की ज़्यादा तारीफ़ नहीं करूंगा, वजह ये नहीं कि समझ नहीं पाया. वजह ये है कि ये लेख से ज़्यादा जो आज की सच्चाई है, जिसे हम सभी जानते तो है पर न तो कोई इसके बारे में बात करना चाहता है और न ही सोचना. मुझे एक पुराना नारा याद आ रहा है.... जय जवान, जय किसान. आज स्थिति ये है कि हर युवा जवान तो बनना चाहता है क्योंकि वहाँ अच्छा वेतन है, सम्मान, सुख-सुविधाए हैं और भी बहुत कुछ है. जबकि किसान के लिए तो शायद दो वक़्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो. कई बार तो स्थिति इतनी भयावह होती है कि घर का एकलौता कमाऊ भी अपनी जान देकर सारी समस्याएं पीछे छोड़ जाता है. समस्या गंभीर है पर इसका हल समझना थोड़ा सा मुश्किल. ख़ास तौर पर मेरे लिए.

  • 22. 20:06 IST, 13 मार्च 2011 अजीत:

    सुशील जी, आप की बात सोलह आने सही है. आज की तारीख मे यह हर किसान का दर्द है. जो लोग 'झलक दिखला जा' को गाँव की प्रगती और किसानो की समस्या का अंत समझ रहे हैं वो समाज की नब्ज़ को पढ़ने मे ग़लती कर रहे हैं. किसानो की यह दशा पिछले दो दशकों के आर्थिक उदारवादी नीतियों का दुष्परिणाम है जिसमे कृषि क्षेत्र की अनदेखी की गयी है. १९९१ के बाद जहाँ सेवा क्षेत्र को हर तरह की सहायता और नीतिगत सहूलियत प्रदान की गयी कृषि क्षेत्र उपेक्षा का शिकार बना रहा. चूँकि सेवा क्षेत्र का विस्तार सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित है हमारे महानगर तेज़ी से प्रगती करते रहे और आर्थिक प्रगती की इस चका-चौंध ने लाखों की संख्या मे गाँव के बेरोज़गार युवकों को शहर की ओर आकर्षित किया. सरकारी उपेक्षा का यह आलम रहा है की अब कृषि क्षेत्र मे केंद्रीय निवेश सूखे हुए पानी के सोते की तरह हो गया है. किसानो को बिजली और पानी बहुत ही कम उपलब्ध हो पा रहा है. खाद और डीजल के दाम ग़रीब किसानो की पहुँच से बाहर हो चुके हैं. इस सब के बावज़ूद भी जो फसल उगती है उसका उचित दाम नही मिल पा रहा है. आय से ज़्यादा लागत की स्थिति साल-दर-साल बनी हुई है. ऐसे मे यह उचित ही है की हमारे किसान भाई कृषि के बाहर अन्य अवसर की तलाश मे हैं. लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है की क्या हम इस स्थिति को स्वीकार कर लें या फिर इसे बदलने के लिए कुछ किया जाए. खाद्यान की माँग तेज़ी से बढ़ रही है. कृषि क्षेत्र के विकास दर को देख कर यह लगता है की अगले १० वर्षों मे देश को खाद्यान की बड़ी समस्या का सामना करना पर सकता है. अतः आवश्यकता इस बात की है की केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र मे एक नया जीवन फूँकने के लिए बड़ी योजना बनाए. जब देश की अर्थव्यवस्था ९% की दर से बढ़ रही हो तो सरकार के पास इतना रेवेन्यू है जिस से कृषि क्षेत्र मे निवेश को बढ़ाया जाए. इस से ना केवल खेती को फिर से एक लाभप्रद व्यवसाय बनाया जा सकेगा बल्कि किसान भाइयों के हतोत्साह को भी ख़त्म करने मे सफलता मिलेगी. खाद्यान की समस्या का निवारण हो सकेगा और सेवा एवं औद्योगिक क्षेत्र को भी लाभ मिलेगा. अतः, चूँकि कृषि अर्थव्यवस्था का आधार है इसकी उपेक्षा कर के हम देश की आर्थिक प्रगती पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं. इसी को अगर दूसरे तरीके से कहें तो कृषि क्षेत्र मे निवेश को बढ़ा कर हम पूरी अर्थव्यवस्था की प्रगती दर को बढ़ा सकते हैं.

  • 23. 14:31 IST, 14 मार्च 2011 प्रांशु प्रियदर्शी :

    सुशीलजी बहुत दिनों के बाद आप एक मजेदार टोपिक दिए हें चर्चा करने के लिए. बहुत सारे लोगों को सुनने के बाद मैं ये लिखना चाहूँगा की जब भारत आज़ाद हुआ था तब जीडीपी में एग्रीकल्चर का योगदान 69% था जो की अभी घटकर 14% हो गया है,जबकि लोगों की संख्यां कहीं ज्यादा हो चुकी है.कहा जाता है कि भारत गाँव का देश है.56% लोगों को अभी भी रोज़गार खेती से ही मिल रहा है लेकिन हमारी सरकार इनके जान लेने पर तुली हुई है.सरकार ने 1999 में सारे पब्लिक सेक्टर के खाद के कारखाने बंद कर दिए अब 29 % खाद हमलोग इम्पोर्ट करते हें जो कि बिहार जैसे स्टेट में दो दो गुना ज्यादा दाम देने पर सही खाद, सही समय पर नहीं मिलता है क्युकि एक तो जितना मांग है उससे कहीं कम भेजा जाता है दूसरा उपर से निचे तक सबका कमिसन बंधा हुआ है और ये लोग ज्यादा दम पर नेपाल में भेज देते हें जिसके कारण कालाबाजारी कि धंधा भी खूब फलफूल रही है.यहाँ पर हम एक रियल कहानी बताना चाहूँगा कि 2007 में खाद की किल्लत थी जबकि मेरे ही गाँव के एक खाद बिक्रेता ब्लैक में बेच रहे थे वो भी डुप्लीकेट खाद जब मैंने इसकी सिकायत विडियो साहब से कि तो वो बोले कि वो तभी छापे मारेंगे जब कम से कम दस दो हज़ार बोरा खाद हो मैं वापस आ गया.डीजल का रेट कई गुना बढ़ने से पटवन भी बहुत 80 से 100 रुपया घंटा हो चूका है.बिजली का तो आप्शन ही नहीं है.आपको जानकर ये आस्चर्य होगा की सरकार ने पहली बार खेती के लिए कोई अधिनिअम 2007 में बनाया है.कुछ अगर मिलता था तो मजदुर लेकिन नरेगा के आने के बाद ये भी ख़त्म. मजदुर 120 रुपेया डेली मांगते हें लेकिन किसान के पास इतना पैसा कहाँ है.सरकार चाहे कितना भी खुद की पीठ थपथपाले लेकिन सच्चाई तो यही है की नरेगा ने कृषी को तो चौपट ही कर दिया है भ्रष्टाचार बढ़ा अलग. अब तो सरकार किसान के पम्पसेट को खेत से उठ्बा लेती है ये कहकर की पानी का लेयर निचे जा रहा है इन सब नौटंकी के बाद जब फसल ख़राब हो तो किसान खेती करने के लिए भी जमीन बेचे,बेटी की सादी के लिए भी जमीन बेचे बच्चे को पढाना हो तो भी किसी गंभीर बीमारी का इलाज करना हो तोभी. यही कारन है की लोग लरकि नहीं चाहते हे अपने घर में.अगर पैदावार अच्छी हो गयी तो आत्महत्या कीजिये क्युकी आपका फसल कोई लेने वाला ही नहीं है.जो रेट सरकार तय करती है वो किसानो के लगत से भी कम होता है.भारतीय खाद्य निगम का एक अपना अलग नौटंकी है जब किसान धान या गेहूं को बेचने जाते हें तो वो खुले आस्मां के निचे परा होता है जिसका फायदा कुत्ता और चूहा को मिलता है.अगर बर्षा हो गया तो किसान का फसल गया.ये फसल ऐसे ही परे रहते हें क्युकि भारतीय खाद्य निगम का कहना है की उनके पास बोरा नहीं है फसल खरीदने के लिए ,हाँ अगर आप दलाल के माध्यम से कम रेट पैर दे तो फिर सब ठीक है.अब आप ही बताइए की क्यों किसान खेती करे. मुझे तो लगता हैकि मेरे देश के किसान ही नोबेल के सही लायक हें.अभी तो बिहार में जो किसान मबेसी रखे हें वो अपने मवेशी को औने पौने दाम में बेच रहे हें क्युकि भूसा की कीमत 350 रुपया प्रति क्विंटनल हो चुका है जिसमे की किसान सक्षनहीं हें .मतलब रोटी पर जो नमक मिलती थी उसपे भी आफत.
    अब आप ही बताइए सुशिल जी कोई क्यों खेती करे.हमारे देश को अभी एक तानासाह की जरुरत है तभी सब ठीक हो सकता है ये जो नेता लोग हें ये सब के सब चोर हें उन्हें जेब भरने से फुर्सत ही नहीं मिलती है.आमलोगों को कौन देखता है

  • 24. 19:30 IST, 14 मार्च 2011 virendra Rajwar:

    मैं भी किसान का बेटा हूं.. किसानों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पात है. सरकारी योजनाओं का लाभ करोड़पति लोग उठा रहे हैं. उनका ऋण माफ हो जाता है. गरीब किसान को कुछ नहीं मिलता है.

  • 25. 00:48 IST, 16 मार्च 2011 Akash Tiwari:

    सुशील जी,
    आपकी इस पोस्ट(आर्टिकल)में मुझे समस्याओं का अंबार पढने में आया। मैने जितने भी पत्रकारों के पोस्ट पढे उन सभी में एक समान बात थी - समस्याओं का भयंकर चित्रण। मैं आपसे पूछ्ता हूं कि आप लोग कब तक समस्याओं के भयंकर चित्रण में अपनी ऊर्जा लगाते रहेंगे? ऐसा करने से समस्याओं का समाधान नही होने वाला। या ऐसा लगता है जैसे आप लोगों ने समाधान ढूंढने का प्रयास नहीं किया।
    आपने बताया "ये बात एक किसान के जवान बेटे की है जो अब खेती नहीं करना चाहता है. ज़मीन बहुत है लेकिन कहता है कि खेती से पेट नहीं भरता." परंतु आपने इसके वास्तविक कारण का ज़िक्र ही नहीं किया -कि ज़मीन बहुत है लेकिन उपजाऊ नहीं है,क्योंकि कुछ लोगों के कारण विदेशी कंपनियों ने हाइब्रिड बीज और जहरीले कीटनाशक पर्याप्त मात्रा में हमारे देश की ज़मीनों तक पहुंचा दिये हैं, अब मिट्टी में उर्वर क्षमता तो बची नहीं है तो फसल कहां से होगी?
    और अगर किसानों के मन में ऐसे विचार क्यो आने लगे कि मेरे पास भी कार होना चाहिये, मुझे भी शहर में रहना चाहिये, मुझे भी माल में खरीदारी करना चाहिये इत्यादि। इन सब के पीछे केवल एक मानसिकता का होना कारण हो सकता है कि -"पैसा से सब समस्याओं का समाधान हो जायेगा" जो कि मेरे अनुसार बिल्कुल गलत है। ये हम सब जांच सकते हैं।
    आगे आपने कहा - "हां आजकल बात बहुत होती है. एग्रीकल्चर फार्मिंग, सस्टेनेबल डेवलपमेंट, वगैरह वगैरह लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है." तो शायद आपने खोजा नहीं है, नेचुरल फर्मिंग पर हजारों किसान(छत्तीसगढ,महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश,उत्तरप्रदेश,पंजाब,बिहार) काम कर रहे हैं, आप उनके पास जा कर नेचुरल फर्मिंग और फसलों से लाभ कैसे? ये पूछ सकते हैं।
    आशा करता हूं कि आपके और आपके साथियों के आने वाले पोस्ट में समाधान की बात ज़रूर होगी।

  • 26. 22:54 IST, 06 सितम्बर 2012 usha pandey:

    सुशील जी आपने सही कहा है. हमारे गाँव, खेकसा करछना इलाहाबाद में तो आज कि तारीख में 20 लड़के सिर्फ़ इस लिए कुँवारे रह गए क्योंकि वो खेती करते हैं और कोई भी लड़की का बाप उनसे अपनी बेटी ब्याहने को तैयार नहीं है. जबकि दूसरे जो लड़के नोएडा या गुजरात में मजदूरी कर रहे हैं उनकी शादी हो जा रही है.
    खेतिहर लड़कों को लड़की वाले ये कह कर खारिज कर दे रहे हैं कि लड़का कुछ नहीं करता है. आपका ब्लॉग पढ़ कर तसल्ली हुई.

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