इस विषय के अंतर्गत रखें सितम्बर 2010

कौन देगा इन सवालों के जवाब

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मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|शुक्रवार, 24 सितम्बर 2010, 03:08

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राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी इस उठापटक में आम भारतीय ख़ुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा है और खेलों की आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और खेल मंत्री एमएस गिल तक सब आलोचनाओं के निशाने पर हैं.

मगर क्या ग़लती सिर्फ़ इन्हीं की है. आज सवालों का अंबार लगा है और जवाब देने के लिए सामने आने को कोई तैयार नहीं है.

प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने 15 अगस्त को लाल किले से कहा कि इन खेलों का सफल आयोजन दिखाएगा कि भारत कितने विश्वास से दुनिया में आगे बढ़ रहा है. उस दावे का अब क्या हुआ.

प्रधानमंत्री ने अब मंत्रियों को बुलाकर एक अहम बैठक की और काम में तेज़ी लाने को कहा.

इतने दिनों तक वह कहाँ थे. जिन खेलों को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया उसकी तैयारी सही चल रही है या नहीं ये समय रहते देखना क्या प्रधानमंत्री का काम नहीं था.

खेल गाँव को 16 सितंबर को जनता के सामने रखने की कोशिश हुई और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के लोग अपने रहने की जगह देखने पहुँचे. इसके बाद खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फ़ेनेल को चिट्ठी लिखकर बताना पड़ा कि खेल गाँव में परेशानियाँ हैं.

आयोजन समिति के अधिकारी, खेल गाँव के ज़िम्मेदार अधिकारी तब तक आँखें मूँदे क्यों बैठे थे.

भारत ने जब 1982 में एशियाई खेल आयोजित किए थे तो इससे कहीं कम संसाधनों में उन खेलों का आयोजन हुआ था. इतने संसाधन झोंकने के बावजूद हासिल क्या हुआ- इतनी बदनामी और जग हँसाई.

क्या भारतीय अधिकारी अभी तक यही नहीं मान रहे थे कि अगर कुछ कमियाँ भी रह गईं तो होगा क्या. दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव के बीच किस देश की इतनी हिम्मत होगी कि वो खेलों में हिस्सा लेने से मना कर दे.

ललित भनोट ने क्या सोचकर ये बयान दिया कि भारतीय और पश्चिमी देशों के साफ़-सफ़ाई के स्तर में अंतर है.

इतने आरोप लगने से पहले तक इन्हीं अधिकारियों का बर्ताव क्या किसी तानाशाह से कम हुआ करता था. जब जिससे चाहा बात किया जब जिसको चाहा सार्वजनिक रूप से डाँट-डपटकर अपना रुतबा दिखाया.

कलमाड़ी ने इस साल की शुरुआत में बीबीसी से बातचीत में कहा था कि हर चीज़ की आख़िरी ज़िम्मेदारी मेरी है क्योंकि मैं आयोजन समिति का प्रमुख हूँ. अब हुई इतनी शर्मिंदगी की ज़िम्मेदारी लेने के लिए क्या वो तैयार हैं.

मणिशंकर अय्यर आज ये कहकर सबका दुलारा बनने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ज़रूरत ही थी ये खेल आयोजित करने की. खेलों का आयोजन उनके सत्ता में आने तक भारत को मिल चुका था.

उन्होंने देश के सामने शपथ ली थी कि वह अपने मंत्री पद के दायित्वों का शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे मगर क्या उन्होंने खेल मंत्री पद की ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभाई.

सवालों की ये सूची बढ़ती चली जाएगी मगर देश के ज़िम्मेदार मंत्रियों और अधिकारियों की शराफ़त का आलम देखिए कि अब तक किसी एक ने भी बढ़कर ये नहीं कहा कि- हाँ, हमसे ग़लती हुई है... सबकी उंगलियाँ अब तक दूसरे की ही ओर उठी दिख रही हैं.

बीबीसी हिंदी अब राष्ट्रमंडल खेलों पर अलग ब्लॉग लेकर आया है और इन खेलों से जुड़े ब्लॉग अब वहाँ उपलब्ध होंगे. उस ब्लॉग पर जाने के लिए क्लिक करें.

बाबरी, गोधरा, जय श्रीराम

सुशील झासुशील झा|रविवार, 19 सितम्बर 2010, 20:29

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बात बहुत पुरानी नहीं है...बस 17-18 साल..मैं ग्यारहवीं में पढ़ता था. दिन के ग्यारह बजे होंगे. हम सड़क पर क्रिकेट खेल रहे थे. तभी एक रिक्शा और उसके साथ लोगों का एक गुट आता हुआ दिखा...पास आए तो हमने देखने की कोशिश की कि आखिर रिक्शा पर है क्या?

कुछ नहीं था एक ईंट थी जिसके सामने कुछ रुपए पड़े थे और साथ चलने वाले, लोगों से कह रहे थे राममंदिर के लिए दान दीजिए. लाउडस्पीकर पर घोषणा हो रही थी कि इस ईंट से मंदिर बनेगा.

कारवां गुज़र गया लेकिन उसकी धूल कुछ महीनों बाद दिखी जब पता चला कि कहीं कोई मस्जिद तोड़ दी गई है. उसके बाद कॉलोनी में जगह जगह पोस्टर लगे माथे पर भगवा कपड़ा बांधे युवकों के जिनके नीचे लिखा था कि ये शहीद हुए हैं.

मैं सोचता रहा कि भारत ने कोई लड़ाई तो लड़ी नहीं तो ये शहीद हुए कैसे और सैनिकों की तरह इन्होंने कपड़े भी नहीं पहने.

ये वो दौर था जब हमारी कॉलोनी के युवक काफ़ी उग्र होने लगे थे. चुनावों में नौजवानों को बुलाया जाता और वो बस एक ही नारा लगाते जय श्री राम मानो चुनाव राम जी लड़ रहे हों.

एक और नारा लगता था- अयोध्या तो झांकी है काशी मथुरा बाकी है..इसका अर्थ कुछ वर्ष पहले तब पता लगा जब काशी और मथुरा जाने का अवसर मिला.

साध्वी ऋतंभरा का एक भाषण भी बजता था. क्या बोलती थीं याद नहीं लेकिन इतना याद है कि जो भी बोलती थीं वह खून खौलाने वाला होता था. हिंदुओं को लड़ने के लिए उकसाने वाले ये भाषण नौजवानों में जोश भर देते थे. उमा भारती, लाल कृष्ण आडवाणी और वाजपेयी ये नाम तभी मानस पटल पर अंकित हुए अपने भाषणों से.

बाद में दंगों की ख़बर आई. छोटी कॉलोनी में कम अख़बार आते थे तो जानकारी भी कम मिलती थी. एक दिन मैदान में अचानक सुना कि मुसलमान पास की मस्जिद से लोगों को मारने आ रहे हैं. घर दूर था तो मैं पास में एक बड़े पेड़ पर चढ़कर इंतज़ार करने लगा ये सोचकर कि पेड़ पर तो कोई देख नहीं पाएगा.

हुआ कुछ नहीं..न मुसलमान आए और न दंगा देखने की मेरी इच्छा पूरी हुई....

ये बातें उस समय समझ में नहीं आती थीं..अब सोचता हूं तो याद आता है कि कैसे जय श्री राम का उदघोष करने में युवक गर्वान्वित होते थे. एक बार मंझले भाई को चुनाव वाली गाड़ी की छत पर जय श्री राम करते हुए पापा ने देखा तो जमकर पिटाई की थी. पिताजी तो जय श्री राम और चुनावी बखेड़े दोनों से नाराज़ थे.

अपने जय श्री राम, डंडे के डर से तभी भाग गए थे. लेकिन जय श्री राम ने मुसलमानों के मन में घर बसा लिया एक डर के रुप में. मुसलमान हमसे बात करने से कतराने लगे.

अब सोचता हूं तो याद आता है कि उस समय कई मुसलमान दोस्त हमने भी खोए क्योंकि हम नासमझी में उनके डर को नाराज़गी समझ बैठे.

फिर नौकरी करने लगे. 26 फरवरी 2002 को जब कारसेवकों को लेकर जा रही साबरमती एक्सप्रेस में आग लगने की ख़बर फ्लैश हुई तो मेरे मुंह से यही निकला --- ये तो बड़ी हो जाएगी ख़बर.

उस दिन जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मशाल जुलूस भुलाए नहीं भूलता. मशालों में आग और आंखों में चिंगारी. उस समय मेरे दिमाग पर बस तीन शब्द चोट कर रहे थे. जय श्री राम, जय श्री राम और जय श्री राम

ख़बर बहुत बड़ी हुई और मुझ जैसे शायद कई लोग सोचने पर मजबूर हुए. जय श्री राम के भक्तों के ग़ुस्से को गुजरात में खून से शांति मिली.

श्री राम का डर मूर्त रुप ले चुका था. वो दौर खुद से घृणा का था. क्योंकि भगवान राम तो त्याग के देवता हैं. उन्होंने कभी ख़ून बहाने की बात नहीं की. यहां तक कि उसका खून बहाने से पहले भी उससे बातचीत का प्रस्ताव रखा जो उनकी पत्नी को हर ले गया था.

लेकिन वो मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे. ये जय श्री राम थे जिनके लिए प्रतिशोध ज़रुरी था रक्तपान ज़रुरी था.

अगर किसी के भगवान इतने डरावने होते हैं तो भगवान न हों तो अच्छा है.अगर जय श्री राम इतने डरावने हैं तो मैं राम से काम चलाना अधिक पसंद करुंगा.

अब दशकों पहले की घटना का फ़ैसला आना है....कोई कहता है वहां अस्पताल बनाओ..कोई कहता है...लाइब्रेरी बनाओ....कोर्ट क्या कहेगा किसी को नहीं पता...

मैं तो बस इतना कहता हूं काशी और मथुरा में जब मंदिर मस्जिद साथ रह सकते हैं तो अयोध्या में क्यों नहीं...मंदिर भी बने और मस्जिद भी बने. दोनों की दीवारें लगती हों. अज़ान और घंटियां साथ साथ बजें क्योंकि ये दोनों आवाज़ें हम सभी ने एक साथ कहीं न कहीं ज़रुर सुनी होंगी. जिन्होंने नहीं सुनी उनसे मेरा वादा है कि दोनों आवाज़ें एक साथ बड़ी सुंदर लगती हैं...

दीमे चरसी की बकवास

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 14 सितम्बर 2010, 17:17

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दीमे (नदीम) के चार मुख्य शौक़ हैं. हर पांच छह महीने बाद अब्बा की छोड़ी हुई ज़मीन का एक एकड़ बेच देना, अख़बार चाटना, चरस पीना और नॉन स्टॉप बकवास करते करते दोस्तों के सामने ही सो जाना.

दीमे के अलावा सारे दोस्त इस बात पर सहमत हैं कि उसकी महफ़िल में लोहे के कान फ़िट किए बिना बैठना मुश्किल है. दीमे समसामायिक घटनाओं पर एकतरफ़ा बहस का बादशाह है, ख़ुद ही सवाल करता है ख़ुद ही जवाब देता है. और दोस्त सिर्फ़ वाह जी वाह जी करने पर लगे रहते हैं.

और अब दीमे की बकवास....

"यार ये अपना रहमान मलिक चमड़े की पेटी पर उस्तरा तेज़ करने से कब बाज़ आएगा. कहता है बलूचिस्तान वाले प्यार की भाषा नहीं समझेंगे तो हम उन्हें डंडे से समझाएंगे. कोई मुझे बताए कि बलूचों के सर से डंडा हटा कब था.

रहमान मलिक क्या समझता है कि डंडे पर बलूचिस्तान के हित का तेल मल लेने से चोट कम लगती है. पांच हज़ार नौकरियों की हड्डी देख कर क्या बलूची नाचना शुरू कर देंगे.

ओ याद आया कल ईद थी. पर इस बार पता नही चला कि दो नंबर ईद किसकी थी. पेशावर वालों की या इस्लामाबाद वालों की.

लगता है दोनों में से किसी एक ज़रूर चीन का चाँद ख़रीदा हुआ है.

मगर ये ईद भी सादगी से मनानी पड़ी. कभी किसी ने सुना है कि दीपावली सादगी से मनाई गई. क्रिस्मस सादगी से मनाया गया. नौरोज़ पर नए कपड़े नहीं पहने गए.

मैंने तो जब भी सुना है यही सुना है कि ज़लज़ला आ गया है ईद सादगी से मनाएं. सैलाब आ गया है ईद सादगी से मनाएं. जंग हो गई है ईद सादगी से मनाएं. फ़लस्तीनियों पर ज़ुल्म हो रहा है ईद सादगी से मनाएं. कश्मीरियों के साथ सदभावना में ईद सादगी से मनाएं.

भुट्टो को फांसी हो गई है ईद सादगी से मनाएं. बेनज़ीर क़त्ल हो गई है सादगी अपनाएं. आत्मघाती हमलों में हज़ारों लोग मर गए हैं सादगी को मत भूलें. क्रिकेट टीम ने रुस्वा किया है सादगी को याद रखें

ईद की ख़रीदारी में सादगी अपनाएं. सादा मेंहदी लगाएं. सादा ज़ेवर पहनें, सादा मेक-अप करें, सादा घड़ी और जूते ख़रीदें. सादा उपहार दें, सादा ज़रदा-पुलाव और शीरमाल उड़ाएं, सादी सिग्रेट पीएं....

यार वो दिन कब आएगा जब हम ईद सादगी से नहीं मनाएंगे. कब आएगा वो दिन. मुझे तो नहीं लगता है कि आएगा. तुम्हें लगता है क्या. मुझे नहीं लगता कि तुम्हें भी लगता है.

मुझे तो लगता है कि किसी को नहीं लगता. बताओ ना लगता है किसी को."

ये तकरार करते करते वहीं सोफ़े पर दीमे सो गया. मैंने अध-जली सिग्रेट उसके उंगलियों से अलग कर ऐश-ट्रे में बुझा दी. लाइट ऑफ़ कर दी. कमरा धीरे धीरे ख़ाली होने लगा. कल फिर यही दरबार होगा. यही दीमा और वही उसकी बकवास...

मूर्खता, समझदारी और मीडिया

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 12 सितम्बर 2010, 16:23

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लेखक रॉबर्ट हेनलिन ने लिखा था-- 'नेवर अंडरएस्टीमेट द पावर ऑफ़ ह्यूमन स्टुपिडिटी' यानी मानवीय मूर्खता की ताक़त को कभी कम नहीं आँकना चाहिए.

दुनिया भर के टीवी चैनलों, अख़बारों और बराक ओबामा समेत अनेक नेताओं ने टेरी जोंस के बारे में शायद यही महसूस किया.

पादरी कम और शिकारी अधिक दिखने वाले ईसाई धार्मिक नेता की धमकी से जो क्षति हो सकती थी वह टल गई, इस पर सबने राहत की साँस ली.

'डव आउटरीच वर्ल्ड सेंटर' में कुछ भी सही नहीं था, डव यानी शांतिदूत कपोत. वर्ल्ड आउटरीच सेंटर यानी दुनिया की ओर हाथ बढ़ाने वाला केंद्र, जिसके कुल जमा पचास अनुयायी थे.

सारे टीवी चैनलों ने अंदाज़ा लगाया कि कुरान के जलाए जाने पर दुनिया भर में क्या प्रतिक्रिया होगी मगर किसी ने यह नहीं सोचा कि जो आग लगाई जा रही है उसे प्रचार का ऑक्सीजन न दिया जाए.

सोचा भी होगा तो दूसरे चैनलों को देखकर अपनी क्षणिक समझदारी से डोल गए.

एक टीवी चैनल पर आए अमरीकी प्रशासन के सलाहकार से पूछा गया कि टेरी जोंस को ओबामा ने इतना भाव क्यों दिया, उनका जवाब था- 'मीडिया ने उन्हें मजबूर कर दिया.'

जिस अनजान पादरी को कल तक कोई नहीं पूछ रहा था वह 'ग्लोबल मीडिया सेलिब्रिटी' बन गया, हो सकता है कि अब टेरी जोंस कोई दूसरा हंगामा खड़ा करें तो आप ये भी नहीं कह सकेंगे कि उनके सिर्फ़ पचास सिरफिरे चेले हैं.

पागलपन के पुरज़ोर असर पर किसी को शक नहीं है, मगर समझदारी की ताक़त से सबका विश्वास उठता जा रहा है.

दुनिया भर में न जाने कितनी उत्पाती खोपड़ियों में किन-किन चीज़ों को तोड़ने और जलाने के मसूंबे बन रहे होंगे.

कितने ही उत्पाती-उन्मादी टेरी जोंस को एक झटके में मिली इतनी 'शोहरत' पर जल रहे होंगे, मन मसोस रहे होंगे कि यह जलाने वाला आइडिया उन्हें क्यों नहीं आया.

एक और सूक्ति- 'लीव इडियट्स अलोन सो दे हार्म देमसेल्व्स ओनली' यानी बेवकूफ़ों को अकेला छोड़ देना चाहिए ताकि वे सिर्फ़ अपना ही नुक़सान करें, दूसरों का नहीं.

लाइव टीवी के दौर में ऐसा संभव नहीं दिख रहा है.

सब भारत की ज़िम्मेदारी है!

रेणु अगालरेणु अगाल|बुधवार, 08 सितम्बर 2010, 17:33

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भारतीय उपमहाद्वीप में जो कुछ ख़राब हो रहा वो भारत की वजह से हो रहा है.

देखिए ना, पाकिस्तान में खिलाड़ी लालच में फंस गए, खेल खेल में मैच फ़िक्स कर गए. बेचारे क्या करते ..वे एसा करने को मजबूर हुए क्योंकि वो भारतीय खिलाड़ियों जैसे लकी नहीं है, उनके पास आईपीएल समान कमाऊ गाय नहीं है.

फिर उनकी भी तो ज़रुरतें हैं- उन्हें भी तो बड़ी कार, बंगला, मोटा बैंक अकाउंट चाहिए. शोहरत और फ़ैन्स से कोई ये ज़रुरतें पूरी होती हैं भला.

युवाओं की नज़र में भी वो हीरो हैं...पर भाई सबसे बड़ा तो है रुपैय्या. और रुपये के तार भारत से जुड़े हैं.

सबसे बड़े सटोरिए यहां हैं और उनको कोई कुछ नहीं कह रहा, पकड़ नहीं रहा. बड़ी नाइंसाफ़ी है.

और तो और पाकिस्तानी खिलाड़ियों को निलंबित भी भारत के पावरफुल पवार के कहने पर किया गया!

सच, पाकिस्तान में इसकी चर्चा है. भारत में, हाल में बंग्लादेश को एक अरब डॉलर ऋण पर सहमति की तो विपक्षी नेता खालिदा ज़िया का कहना था कि शेख़ हसीना सरकार ने देश हित भारत को बेच दिया.

चुनाव के वक़्त भी उन का आरोप था कि खालिदा ज़िया भारत की कठपुतली हैं. नेपाल में भी चर्चा है कि भारत का हाथ हर ओर है.

प्रधानमंत्री नहीं चुना जा रहा क्योंकि भारत से जुड़ी ताक़तें मधेसी पार्टियों को वोट देने से रोक रही हैं.

अब श्रीलंका में देखिए तमिल टाइगरों ने भारत की मदद से कितने दिनो तक अस्थिरता बनाए रखी. और तो और मूलत: तमिल भारत के निवासी हैं. ये अलग बात है कि भारत ने एक पूर्व प्रधानमंत्री उनके हाथ खोया भी है.

तो कुल मिला कर बात ये कि भारत है सबसे बड़ा दोषी. शायद उसका सबसे बड़ा दोष ये है कि वो यहां है!

पर एक अच्छी बात इस सारी बहस में ये हो सकती है कि भारतीय ये सोच के संतुष्ट हो जाएँ कि वो कितने महत्वपूर्ण हैं, कि उनके इशारे पर उपमहाद्वीप की दुनिया घूम जाती है. अब भला अंधेरे में रोशनी खोजने में क्या बुराई है.

ईद, सेवइयां और मुसलमान

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 08 सितम्बर 2010, 08:44

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आजकल जब जब ईद आती है तो दिल में टीस से उठती है. दिल्ली में कोई घर पर सेवइयां खाने के लिए नहीं बुलाता. यहां इतनी बेतकल्लुफ़ी भी नहीं कि बिन बुलाए चले गए.

सेवइयां इसलिए क्योंकि हमारे लिए तो ईद का मतलब सेवई ही है. मुझे याद है जब छोटे थे तो ईद के दिन सुबह सुबह अपने मुसलमान दोस्त के घर के चक्कर तब तक लगाते रहते थे जब तक चचीजान सेवइयां न खिला दें.

बच्चों को पानी वाली सेवइयां और बड़ों को दूध वाली लच्छा सेवइयां.. जब पहली बार दिल्ली से पढ़ कर वापस गए और लच्छा सेवइयां मिली तो सच में लगा बड़े हो गए हैं.

मुझे धर्मनिरपेक्षता, सेकुलरिज़म, हिंदू मुस्लिम भाईचारा, इस्लामी चरमपंथ जैसे बड़े बड़े शब्द समझ में नहीं आते. मुझे सेवइयां, बिरयानी, क़व्वाली, चचीजान की आंखों का सूरमा, उर्दू ज़बान, गंडे-तावीज़ और वो मौलवी समझ में आते हैं जो बीमार पड़ने पर मेरी झाड़ फूंक किया करते थे.

मेरे पिताजी बहुत अधिक पढ़े लिखे नहीं हैं. उनको शायद ही धर्मनिरपेक्षता का मतलब समझ में आता है. लेकिन उनके कई मुसलमान दोस्त थे. वो उनके यहां गोश्त नहीं खाते थे. सेवइयां खाने में उनको कोई परेशानी नहीं थी.

ये बातें टीवी आने से पहले की हैं. टीवी आया तो रामायण देखने के लिए हम एक मुसलमान दोस्त के घर जाते थे क्योंकि हमारे घर में टीवी नहीं था. और हां....हमारे बड़े भाई साहब के पसंदीदा क्रिकेटर हमेशा से वसीम अकरम ही रहे.

आज भी मुझे शाहरुख खान और आमिर खान किसी और हीरो की तुलना में अधिक पसंद हैं. किशोरावस्था में अपने बाल शाहरुख के जैसे करवाने के लिए हमने भी बहुत पैसे खर्च किए हैं.

बात यहीं तक नहीं है. मुझे याद है कि हमारी कॉलोनी में सिर्फ़ एक मुसलमान युवक के पास अमिताभ बच्चन की ऑटोग्राफ़ की हुई तस्वीर थी. हारुन हमसे काफी बड़े थे और अमिताभ बच्चन से मिलने के लिए वो घर से भागकर मुंबई गए थे. वापस लौटे तो अपने घर में पिटाई से बचने के लिए हमारे घर में दो दिन छिपे रहे.

मेरे लिए मुसलमान कोई अलग क़ौम नहीं है जिससे मैं धर्मनिरपेक्षता के आधार पर दोस्ती करुं. वो बचपन से मेरा हिस्सा हैं इसलिए उनके बारे में किसी और आधार पर सोचना मेरी समझ से परे है.

हां नौ साल पहले 11 सितंबर की घटना के बाद बहुत बहसबाज़ी हो रही है मुसलमानों पर. उन्हें कैसे रहना चाहिए या फिर उनके साथ और लोगों को कैसे रहना चाहिए. ऐसी बहस मेरे बारे में हो तो मुझे भी ग़ुस्सा आएगा. फिर वो अगर नाराज़ हैं तो क्या ग़लत हैं.

कहते हैं पूरी दुनिया में वो बहुत नाराज़ हैं. मेरे दोस्त भी थोड़े नाराज़ हैं लेकिन वो मुझसे नाराज़ नहीं हैं. वो आज भी मुझे अपने घर खाना खिलाते हैं और आज भी मैं कभी बीमार होता हूं तो मेरी मां फ़ोन पर ही कहती है.. कोई मौलवी साहब हों तो उनके पास चले जाना.

असल में पूरी दुनिया को भारत से सीखना चाहिए लेकिन उस भारत से नहीं जो धर्मनिरपेक्षता, मुसलमानों के अधिकार और वोट बैंक की सांप्रदायिक राजनीति की बात करता है बल्कि उस भारत से जहां मुसलमान गलबहियां डाल कर सदियों से दूसरी क़ौमों के साथ रहता आया है.

बहुत सारे दंगों की बातें सुनी हैं लेकिन याद नहीं पड़ता कि किसी गांव देहात में दंगे की ख़बर सुनी हो. दंगे अधिकतर शहरों में होते हैं जहां तथाकथित रुप से पढ़े लिखे या कहिए धर्मनिरपेक्ष लोग रहते हैं.

मेरी समझ में धर्मनिरपेक्षता बीसवीं इक्कीसवीं सदी की अवधारणा है. उस कसौटी पर उन रिश्तों को परखना शायद उचित नहीं जो सदियों पुराने हैं. इन रिश्तों को परखने के लिए कोई और कसौटी होनी चाहिए.

ब्लेयर की मैं-ही-मैं में कितना सच?

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|सोमवार, 06 सितम्बर 2010, 12:41

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टोनी ब्लेयर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन के सबसे करिश्माई प्रधानमंत्रियों में से एक हैं. वो अपने देश को ऐसे युद्धों में धकेल कर ले गए जिन्हें उनके अनेक देशवासी कम से कम नहीं चाहते थे.

इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता और साख उनके पद छोड़ने तक कमोबेश बरक़रार रही. हाल ही में प्रकाशित अपने संस्मरणों - 'द जर्नी' - में उन्होंने बताया है कि वो किस तरह से ऐसा कर पाए.

स्वर्गीय राजकुमारी डायना स्पेंसर की तरह ब्लेयर भी अपने आपको बहुत तिकड़मी इंसान मानते हैं जिन्हें इस बात की महारत हासिल है कि दूसरों से अपनी बात किस तरह मनवाई जाए. इस किताब में ब्लेयर मोहक पर चतुर, विवेकहीन, ज़रुरत से ज़्यादा आत्म-केंद्रित और बेबाक इंसान के रुप में सामने आते हैं.

टोनी ब्लेयर ने ब्रिटेन में तीन आम चुनाव किसी तुक्के में नहीं जीते. वो एक महा जुगाड़ू इंसान थे जैसा कि वो ख़ुद स्वीकार करते हैं. अपनी किताब में वो एक हद तक ही चीज़ों को स्वीकार करते हैं और आत्मालोचना भी वहीं करते हैं जहां वो बहुत ज़रुरी हो गई हो.

जब वो जीतकर आए थे तो उनके पास बहुत बड़ा बहुमत था, लोगों की ज़बरदस्त सदभावना थी और करदाताओं का बेइंतहा धन था. उन्होंने ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में पहले से दोगुना धन ख़र्च किया लेकिन उससे देश के स्वास्थ्य में बरायेनाम ही फ़र्क आया.

उनके ज़माने में शिक्षा का बजट भी आसमान चढ़ा और पहले से कहीं ज़्यादा ब्रिटेनवासी सामाजिक कल्याण के दायरे में खींचे गए. लेकिन इसके साथ ही साथ हिंसक अपराध भी बढ़े, अप्रवासन बेक़ाबू हो गया और ब्रिटेन इस हद तक कर्ज़ के दवाब में आ गया कि उसे चुकाने के लिए पीढ़ियां ख़र्च हो जाएंगी.

ब्लेयर कहते हैं कि उनकी मंशा देश को आगे ले जाने की थी लेकिन उनके नंबर दो गॉर्डन ब्राउन ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया. एक अच्छे कहानीकार की तरह ब्लेयर को पता है कि एक अच्छी कहानी में एक मज़बूत खलनायक होना चाहिए.

वो पूरी कोशिश करते हैं कि हीरो टोनी ब्लेयर की तुलना में गॉर्डन ब्राउन को एक खलनायक के रुप में पेश किया जाए. ब्लेयर इस हद तक जाते हैं कि कहते हैं - 'ब्राउन की भावनात्मक रुप से सोचने की ताक़त बिल्कुल ज़ीरो है.'

ब्लेयर को इसका अंदाज़ा ही नहीं है कि वो इसलिए असफल हुए क्योंकि उनमें वास्तविक सुधार लाने के लिए ज़रुरी दूर दृष्टि और साहस का आभाव था. वो ब्राउन के सुझावों को नामंज़ूर कर सकते थे, उनको बर्ख़ास्त कर सकते थे लेकिन घरेलू एजेंडा अपने नंबर दो के हवाले करते हुए उन्होंने अपना रुख़ किया इराक़ और अफ़गानिस्तान के दु:साहसी अभियानों की तरफ़.

उनकी किताब का हर एक पन्ना उनके अहंकार की झलक दिखलाता है. ब्लेयर की महान व्यक्तिगत 'यात्रा' में बस वो ही वो छाए हुए हैं.....उनके मंत्री, सलाहकार, परिवारजन और यहां तक कि महारानी भी सिर्फ़ हाशिए पर ही हैं. इराक़ के युद्ध के लिए उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है.

लोगों के मरने का दुख उन्हें ज़रुर है लेकिन वो तब भी युद्ध को सही ठहराने की कोशिश करते हैं, और इस चक्कर में कई बार ग़लत बयानी भी कर जाते हैं.

लंदन के अख़बार में एक दिलचस्प कार्टून छपा है जिसमें किताब की दुकान का एक परेशान कर्मचारी अपने मालिक से पूछ रहा है कि वो ब्लयेर की किताब को 'फ़िक्शन' की श्रेणी में रखे या 'नॉन-फ़िक्शन' की श्रेणी में?...फ़ैसला आप करें

क्रिकेट का सबसे काला दिन?

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|बुधवार, 01 सितम्बर 2010, 16:17

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जबसे कुछ पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप सामने आए हैं, कहा जा रहा है कि यह क्रिकेट के इतिहास का सबसे काला दिन है.

मीडिया का कवरेज हो, राजनेताओं के बयान हों क्रिकेट से प्यार करने वालों का गुस्सा, ऐसा लगता है जैसे कोई अनहोनी हो गई हो. कुछ ऐसा हो गया है जो पहले कभी नहीं हुआ या जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.

पाकिस्तानी खिलाड़ी 90 के दशक से मैच फ़िक्सिंग के आरोपों से घिरे रहे हैं. साल 2000 में दक्षिण अफ़्रीका और भारत के कुछ खिलाड़ियों की भूमिका भी बेनकाब हुई और ऑस्ट्रेलिया जैसी दूसरी टीमों के कुछ खिलाड़ियों के नाम भी समय-समय पर बुकीज़ से संबंधों के सिलसिले में लिए गए हैं.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि इतना हंगामा क्यों हो रहा है? बुनियादी बात यह है कि क्रिकेटर्स भी उसी समाज का हिस्सा हैं जिसमें हम और आप सांस लेते हैं और उसकी अच्छाइयों और बुराइयों से वे उसी तरह प्रभावित होते हैं, जैसे बाकी लोग.

इन बाकी लोगों में कौन आता है? राजनेता? सरकारी कर्मचारी? खिलाड़ी? जिन लोगों पर भ्रष्टाचार की वजह से पाकिस्तान से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा था, उनकी सूची कितनी लंबी थी? कितने लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई?

भारतीय उपमहाद्वीप में कितने नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुक़दमे दर्ज हैं? कितने लोगों को सज़ा दी गई? और सेना के अधिकारियों का क्या? उन्होंने तो पाकिस्तान में लंबे समय तक देश और क्रिकेट दोनों की बागडोर संभाली है.उनकी कारस्तानियों से क्यों किसी का सिर शर्म से नहीं झुकता है?

क्रिकेट खिलाड़ियों को भी इसी पैमाने पर तौला जाना चाहिए. सिर्फ उनसे ही पाक-साफ़ होने की उम्मीद करना कहाँ तक उचित है?

मेरा मानना यह है कि इस मामले को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए, क्योंकि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ भ्रष्टाचार को अब उस घृणित निगाह से नहीं देखा जाता, जैसे शायद चालीस-पचास साल पहले देखा जाता था.

अगर खिलाड़ी कसूरवार साबित हों तो सख्त सज़ा मिले. लेकिन इसके साथ ही यह पैगाम भी दिया जाए कि निजी प्रतिष्ठा और दौलत के लिए खेलने वाले कुछ खिलाड़ियों को राष्ट्रीय सम्मान का ध्वजवाहक नहीं माना जा सकता है.

उनके एक छक्का लगाने से देश का सिर गर्व से ऊँचा नहीं हो जाता और उनकी बेईमानी से शर्म से झुकना नहीं चाहिए. मेरे लिए यह क्रिकेट के इतिहास का सबसे काला दिन नहीं था. ऐसा पहले भी कई बार हुआ है और अगर ये आरोप दुरुस्त हैं कि बात खिलाड़ियों से आगे तक जाती है तो, यह भविष्य में भी होता रहेगा.

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