ब्लेयर की मैं-ही-मैं में कितना सच?
टोनी ब्लेयर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन के सबसे करिश्माई प्रधानमंत्रियों में से एक हैं. वो अपने देश को ऐसे युद्धों में धकेल कर ले गए जिन्हें उनके अनेक देशवासी कम से कम नहीं चाहते थे.
इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता और साख उनके पद छोड़ने तक कमोबेश बरक़रार रही. हाल ही में प्रकाशित अपने संस्मरणों - 'द जर्नी' - में उन्होंने बताया है कि वो किस तरह से ऐसा कर पाए.
स्वर्गीय राजकुमारी डायना स्पेंसर की तरह ब्लेयर भी अपने आपको बहुत तिकड़मी इंसान मानते हैं जिन्हें इस बात की महारत हासिल है कि दूसरों से अपनी बात किस तरह मनवाई जाए. इस किताब में ब्लेयर मोहक पर चतुर, विवेकहीन, ज़रुरत से ज़्यादा आत्म-केंद्रित और बेबाक इंसान के रुप में सामने आते हैं.
टोनी ब्लेयर ने ब्रिटेन में तीन आम चुनाव किसी तुक्के में नहीं जीते. वो एक महा जुगाड़ू इंसान थे जैसा कि वो ख़ुद स्वीकार करते हैं. अपनी किताब में वो एक हद तक ही चीज़ों को स्वीकार करते हैं और आत्मालोचना भी वहीं करते हैं जहां वो बहुत ज़रुरी हो गई हो.
जब वो जीतकर आए थे तो उनके पास बहुत बड़ा बहुमत था, लोगों की ज़बरदस्त सदभावना थी और करदाताओं का बेइंतहा धन था. उन्होंने ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में पहले से दोगुना धन ख़र्च किया लेकिन उससे देश के स्वास्थ्य में बरायेनाम ही फ़र्क आया.
उनके ज़माने में शिक्षा का बजट भी आसमान चढ़ा और पहले से कहीं ज़्यादा ब्रिटेनवासी सामाजिक कल्याण के दायरे में खींचे गए. लेकिन इसके साथ ही साथ हिंसक अपराध भी बढ़े, अप्रवासन बेक़ाबू हो गया और ब्रिटेन इस हद तक कर्ज़ के दवाब में आ गया कि उसे चुकाने के लिए पीढ़ियां ख़र्च हो जाएंगी.
ब्लेयर कहते हैं कि उनकी मंशा देश को आगे ले जाने की थी लेकिन उनके नंबर दो गॉर्डन ब्राउन ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया. एक अच्छे कहानीकार की तरह ब्लेयर को पता है कि एक अच्छी कहानी में एक मज़बूत खलनायक होना चाहिए.
वो पूरी कोशिश करते हैं कि हीरो टोनी ब्लेयर की तुलना में गॉर्डन ब्राउन को एक खलनायक के रुप में पेश किया जाए. ब्लेयर इस हद तक जाते हैं कि कहते हैं - 'ब्राउन की भावनात्मक रुप से सोचने की ताक़त बिल्कुल ज़ीरो है.'
ब्लेयर को इसका अंदाज़ा ही नहीं है कि वो इसलिए असफल हुए क्योंकि उनमें वास्तविक सुधार लाने के लिए ज़रुरी दूर दृष्टि और साहस का आभाव था. वो ब्राउन के सुझावों को नामंज़ूर कर सकते थे, उनको बर्ख़ास्त कर सकते थे लेकिन घरेलू एजेंडा अपने नंबर दो के हवाले करते हुए उन्होंने अपना रुख़ किया इराक़ और अफ़गानिस्तान के दु:साहसी अभियानों की तरफ़.
उनकी किताब का हर एक पन्ना उनके अहंकार की झलक दिखलाता है. ब्लेयर की महान व्यक्तिगत 'यात्रा' में बस वो ही वो छाए हुए हैं.....उनके मंत्री, सलाहकार, परिवारजन और यहां तक कि महारानी भी सिर्फ़ हाशिए पर ही हैं. इराक़ के युद्ध के लिए उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है.
लोगों के मरने का दुख उन्हें ज़रुर है लेकिन वो तब भी युद्ध को सही ठहराने की कोशिश करते हैं, और इस चक्कर में कई बार ग़लत बयानी भी कर जाते हैं.
लंदन के अख़बार में एक दिलचस्प कार्टून छपा है जिसमें किताब की दुकान का एक परेशान कर्मचारी अपने मालिक से पूछ रहा है कि वो ब्लयेर की किताब को 'फ़िक्शन' की श्रेणी में रखे या 'नॉन-फ़िक्शन' की श्रेणी में?...फ़ैसला आप करें

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आपने क्या ब्लॉग लिखा है रेहान साहब. हम और भी इसी तरह के ब्लॉग पढ़ने की उम्मीद करते हैं. इस ब्लॉग की आखिर पंक्ति काफ़ी उम्दा है, बेचारा दुकानदार!
मैं आपकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ. ब्लेयर ने वो करने की कोशिश की है जिसे हम भारतीय मरणोपरांत करते रहते हैं. अपने मुँह मिया मिठ्ठू बनते रहना. बहुत अच्छा लेख लिखा आपने. बीबीसी को धन्यवाद देना चाहूँगा की पाठकों को इतनी मंहगी किताबों का सार तो समझा रहे हैं.
टोनी ब्लेयर दूसरे दरजे के शैतान हैं. बुश के बाद वाले दरजे में उन्हें रखा ही जा सकता है.
जार्ज बुश के प्लेयर यानि टोनी ब्लेयर को इराक युद्ध का अफ़सोस नहीं है, जबकि पूरी दुनिया ने इसकी निंदा की थी. इंग्लैंड में उन्होंने क्या किया इस पर दुनिया ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जिस तरह से बुश कि हाँ में हाँ मिलते हुए उन्होंने अफगानिस्तान और इराक पर हमला किया उसकी जितनी निंदा की जाए कम है. जिस तरह सद्दाम हुसैन पर मुकदमा चलाया गया था, उसी तरह लाखों अफगानी और इराकियों के हत्या के आरोप में बुश और ब्लेयर पर भी मुकदमा चलना चाहिए.
मैंने बुश और ब्लेयर से ज़्यादा बुरे व्यक्ति कभी नहीं देखे.
टोनी ब्लेयर जार्ज बुश के छोटे भाई की तरह रहे और वे बड़े भाई की नीतियों को लागू करते थे. बुश को पता था कि ब्लेयर उनको हर मुद्दे पर अपना समर्थन देंगे. आप सही है कि किताब में आत्म प्रवंचना के सिवाय कुछ नहीं है.
असल में सबसे बड़े आतंकवादी यही लोग हैं. इराक़ में तेल के कुँए पर कब्जा जमाना इनका मकसद था. इन नेताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए. अमरीका और ब्रिटेन की वजह से दुनिया में आंतकवाद बढ़ा है.
मेरी समझ में अफ़ग़ानिस्तान युद्ध ग़लत नहीं था, लेकिन इराक़ युद्ध का निर्णय ठीक नहीं था. यह निर्णय ब्लेयर की छवि को दुनिया भर में धूमिल किया.
मुझे ये ब्लॉग अच्छा लगा. आपका शुक्रिया.
मुझे खुशी है कि बीबीसी कह रहा है कि ब्लेयर अपनी किताब में सच नहीं दिख रहे. मुझे याद है कि बीबीसी ने ही एक बार कहा था कि वो चर्चिल की श्रेणी के प्रधानमंत्री हैं. लेकिन मुझे अच्छा लग रहा है कि बीबीसी किसी की तारीफ़ के बाद उनकी आलोचना भी कर सकता है.
रेहान फज़ल का कहना की ब्लेयर अपने आप को पाक-साफ़ दिखाना चाहते हैं, शायद ठीक ही लगता है. इन जनाब ने सोचा था की ब्रिटेन को फिर से इराक और मध्य पूर्व में युद्धों में धकेल कर एक महाशक्ति बन जाएँगे. लेकिन हुआ उसका विपरीत. घर आने लगीं अपने ही सैनिकों की लाशें. बाद में हुए जांच की रिपोर्ट को दबा दिया गया. सच यही है जो रेहान कह रहे हैं कि ब्लेयर अपने आप को बेदाग़ करना चाहते हैं.
रोमन पोलंस्कि की फ़िल्म भी इसी विषय पर है. ब्रिटेन के एक पूर्व प्रधानमंत्री अमरीका में रह रहे हैं और अपनी स्मृतियों को लिखना चाहते हैं. इस बीच अंतरराष्ट्रीय अदालत उनके कार्यकाल में हुई मौतों का मुक़दमा शुरू कर देती है. अगर कोई इस फ़िल्म को देखे तो, उसे वहाँ टोनी व्लेयर के अलावा कोई और नहीं दिखाई देगा. पोलंस्कि की फ़िल्म और रेहान के ब्लॉग की समझ एक सी है. बहुत अच्छा लिखा गया ब्लॉग है.
श्रीमान रेहान जी ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री पर आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है. लेकिन दुर्भाग्य से यहाँ कुछ लोगों ने जो प्रतिक्रियाएँ दी हैं वे सही नहीं हैं. आपके ब्लॉग पर टिप्पणी कर युद्ध को जायज नहीं ठहराया जा सकता है. इन लोगों को मानवीय आधार पर सोचने की ज़रूरत है न कि उनके अपनी पसंद पर.