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ईद, सेवइयां और मुसलमान

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 08 सितम्बर 2010, 08:44 IST

आजकल जब जब ईद आती है तो दिल में टीस से उठती है. दिल्ली में कोई घर पर सेवइयां खाने के लिए नहीं बुलाता. यहां इतनी बेतकल्लुफ़ी भी नहीं कि बिन बुलाए चले गए.

सेवइयां इसलिए क्योंकि हमारे लिए तो ईद का मतलब सेवई ही है. मुझे याद है जब छोटे थे तो ईद के दिन सुबह सुबह अपने मुसलमान दोस्त के घर के चक्कर तब तक लगाते रहते थे जब तक चचीजान सेवइयां न खिला दें.

बच्चों को पानी वाली सेवइयां और बड़ों को दूध वाली लच्छा सेवइयां.. जब पहली बार दिल्ली से पढ़ कर वापस गए और लच्छा सेवइयां मिली तो सच में लगा बड़े हो गए हैं.

मुझे धर्मनिरपेक्षता, सेकुलरिज़म, हिंदू मुस्लिम भाईचारा, इस्लामी चरमपंथ जैसे बड़े बड़े शब्द समझ में नहीं आते. मुझे सेवइयां, बिरयानी, क़व्वाली, चचीजान की आंखों का सूरमा, उर्दू ज़बान, गंडे-तावीज़ और वो मौलवी समझ में आते हैं जो बीमार पड़ने पर मेरी झाड़ फूंक किया करते थे.

मेरे पिताजी बहुत अधिक पढ़े लिखे नहीं हैं. उनको शायद ही धर्मनिरपेक्षता का मतलब समझ में आता है. लेकिन उनके कई मुसलमान दोस्त थे. वो उनके यहां गोश्त नहीं खाते थे. सेवइयां खाने में उनको कोई परेशानी नहीं थी.

ये बातें टीवी आने से पहले की हैं. टीवी आया तो रामायण देखने के लिए हम एक मुसलमान दोस्त के घर जाते थे क्योंकि हमारे घर में टीवी नहीं था. और हां....हमारे बड़े भाई साहब के पसंदीदा क्रिकेटर हमेशा से वसीम अकरम ही रहे.

आज भी मुझे शाहरुख खान और आमिर खान किसी और हीरो की तुलना में अधिक पसंद हैं. किशोरावस्था में अपने बाल शाहरुख के जैसे करवाने के लिए हमने भी बहुत पैसे खर्च किए हैं.

बात यहीं तक नहीं है. मुझे याद है कि हमारी कॉलोनी में सिर्फ़ एक मुसलमान युवक के पास अमिताभ बच्चन की ऑटोग्राफ़ की हुई तस्वीर थी. हारुन हमसे काफी बड़े थे और अमिताभ बच्चन से मिलने के लिए वो घर से भागकर मुंबई गए थे. वापस लौटे तो अपने घर में पिटाई से बचने के लिए हमारे घर में दो दिन छिपे रहे.

मेरे लिए मुसलमान कोई अलग क़ौम नहीं है जिससे मैं धर्मनिरपेक्षता के आधार पर दोस्ती करुं. वो बचपन से मेरा हिस्सा हैं इसलिए उनके बारे में किसी और आधार पर सोचना मेरी समझ से परे है.

हां नौ साल पहले 11 सितंबर की घटना के बाद बहुत बहसबाज़ी हो रही है मुसलमानों पर. उन्हें कैसे रहना चाहिए या फिर उनके साथ और लोगों को कैसे रहना चाहिए. ऐसी बहस मेरे बारे में हो तो मुझे भी ग़ुस्सा आएगा. फिर वो अगर नाराज़ हैं तो क्या ग़लत हैं.

कहते हैं पूरी दुनिया में वो बहुत नाराज़ हैं. मेरे दोस्त भी थोड़े नाराज़ हैं लेकिन वो मुझसे नाराज़ नहीं हैं. वो आज भी मुझे अपने घर खाना खिलाते हैं और आज भी मैं कभी बीमार होता हूं तो मेरी मां फ़ोन पर ही कहती है.. कोई मौलवी साहब हों तो उनके पास चले जाना.

असल में पूरी दुनिया को भारत से सीखना चाहिए लेकिन उस भारत से नहीं जो धर्मनिरपेक्षता, मुसलमानों के अधिकार और वोट बैंक की सांप्रदायिक राजनीति की बात करता है बल्कि उस भारत से जहां मुसलमान गलबहियां डाल कर सदियों से दूसरी क़ौमों के साथ रहता आया है.

बहुत सारे दंगों की बातें सुनी हैं लेकिन याद नहीं पड़ता कि किसी गांव देहात में दंगे की ख़बर सुनी हो. दंगे अधिकतर शहरों में होते हैं जहां तथाकथित रुप से पढ़े लिखे या कहिए धर्मनिरपेक्ष लोग रहते हैं.

मेरी समझ में धर्मनिरपेक्षता बीसवीं इक्कीसवीं सदी की अवधारणा है. उस कसौटी पर उन रिश्तों को परखना शायद उचित नहीं जो सदियों पुराने हैं. इन रिश्तों को परखने के लिए कोई और कसौटी होनी चाहिए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 22:23 IST, 09 सितम्बर 2010 Neeraj Kumar Sharma:

    काफ़ी अच्छा ब्लॉग है. मेरे गांव में एक ही परिवार मुसलमान का है और हमारा उनसे बड़ा लगाव है. हम सभी मिलकर एक दूसरे के त्योहारों में बड़े ही उत्साह के साथ शामिल होते हैं. आपकी एक बात सचमुच ही सोचने वाली है कि कभी भी किसी गांव में दंगा नहीं हुआ, अगर हुआ तो पढ़े-लिखे लोगों के शहर में.

  • 2. 22:40 IST, 09 सितम्बर 2010 Ghulam Akhtar:

    मन को छूने वाली अभिव्यक्ति है. मुझे भी अपने गैर मुसलमान बड़े ही याद आते हैं, उनके साथ भी मेरा यही आत्मीय संबंध है. आइए, हम सभी समाज में भाईचारा बढ़ाने का संकल्प लें. सभी को ईद मुबारक!

  • 3. 00:43 IST, 10 सितम्बर 2010 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    बिलकुल सही कहा आपने. हमारे गांव का भी यही माहौल है. शहरों में लोग ज़्यादा जानकार होते हैं यानि अपने पड़ोसी का हाल भी समाचार चैनल पर सुनते हैं, उन्हीं के दिलों के बीच में दूरियां होती हैं. निमंत्रण की ज़रूरत तो शादी ब्याह में होती है, त्योहार में तो लोग ऐसे ही मिलने जाते हैं.

  • 4. 01:15 IST, 10 सितम्बर 2010 गंगा सहाय मीणा :

    बेहतरीन अभिव्‍यक्ति. प्रो. हरवंश मुखिया का भाषण सुनकर आ रहा हूं. उन्‍होंने एक दिलचस्‍प बात बताई. वे नास्तिक हैं. 1992 से पहले उनका मानना था कि एक नास्तिक व्‍यक्ति ही धर्मनिरपेक्ष हो सकता है. लेकिन 1992 के दंगों में बहुत से मुसलमानों ने हिन्‍दुओं की और बहुत से पक्‍के हिन्‍दुओं ने मुसलमानों को 15 दिन तक अपने घरों में सुरक्षित रखा. यानी धार्मिक होकर भी हम धर्मनिरपेक्ष हो सकते हैं.
    सच में भारत इस मामले में अनूठा है. भारत में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास ज्‍यादा पुराना नहीं है. प्रो. मुखिया ने कहा कि पहली बार 17वीं सदी में अहमदाबाद में दंगे हुए. 18वीं सदी में कुल 5 बार दंगे हुए.
    आपने सही रेखांकित किया सुशील जी कि ज्‍यादातर दंगे शहरों में होते हैं. गांव के लोग अभी भी धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को जाने बिना पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हैं. मेरे गांव में हिन्‍दुओं के तमाम धार्मिक कार्यक्रमों में तुरी (देवता को रिझाने के लिए बजाया जाने वाला एक वाद्य) बजाने का काम एक मुसलमान करता है. यह सच में दिलचस्‍प है.

  • 5. 02:21 IST, 10 सितम्बर 2010 अब्दुल वाहिद आजाद:


    झा जी एक बेहतरीन ब्लॉग लिखने के लिए साधूवाद. आठ साल से दिल्ली में रह रहा हूं, यानी 9/11 की घटना के बाद से ही राजधानी मेरा बसेरा है. यहां काफ़ी धूल फांके हैं, सेमिनार, लेक्चर, गोष्ठियों और जल्से जुलूस में धर्मनिरपेक्षता, धर्मों (सभ्यताओं) का भविष्य, धर्मों के बीच संवाद और धार्मिक दृष्टिकोण से शांति का मतलब जैसे विषयों पर बहसबाजी सुन रहा हूं. और सच पूछिए तो सुन सुन कर पक गया हूं. अपने गांव में भी मेरे अनेक हिंदू दोस्त हैं और उनसे दोस्ती का आधार कतई तौर पर धर्म नहीं है. लेकिन हम गांव से आए लोग भी मोटी किताबों में सैमुअल हंटिंगटन के विचार को पढ़ते हैं तो बिना खोपड़ी पर ज़ोर दिए ही हां में हां मिलाते हैं. फोकोयामा की इतिहास का अंत, बर्नार्ड लुइस को भी इसमें शामिल कर लें. मेरा मानना है कि जिन्हें लगता है कि वाकई धर्मों के बीच खाई बहुत है तो उन्हें अपने आसपास नज़र डालनी चाहिए और फिर देखना चाहिए कि लोग बदल गए हैं, उनके देखने का नज़रिया ही बदल गया है.

  • 6. 02:26 IST, 10 सितम्बर 2010 ALTAF HUSAIN, AMBEDKAR NAGAR, UP:

    आंखों में आंसू आ गया, आख़िर क्या से क्या हो गया.

  • 7. 04:48 IST, 10 सितम्बर 2010 Salim:

    मन को छूने वाला जबर्दस्त ब्लॉग है. हमें ऐसे ही भारत बनाने की ज़रूरत है. मैं एक भारतीय मुसलमान हूं और मुझे इस पर गर्व है.

  • 8. 06:27 IST, 10 सितम्बर 2010 N.Z.Malick:

    बहुत ही सही लिखा है आपने. यह ज़मीन से जुडी हकीक़त है जिसको झुठलाया नहीं जा सकता. मैं खुद एक गांव का रहने वाला हूं , बचपन में मैं अपने दादा के साथ होली और दीवाली में हिन्दू पड़ोसियों के यहाँ जाकर हलवा और पूड़ी खाता था और ईद में में वो लोग मेरे यहाँ आकार खूब मज़े से सेवइयां खाते थे. सुशील झा को इतना अच्छा ब्लॉग लिखने पर मुबारकबाद.

  • 9. 06:43 IST, 10 सितम्बर 2010 aftab fazil:

    देश में अमन और चैन को कुछ स्वार्थी तत्वों ने ख़त्म करने की कोशिश की, दिलों के बीच दीवारें खड़ी कर दी गयीं. कुछ राजनीतिक दलों ने दोनों भाइयों को अपने लालच के लिए दुश्मन के तौर पर दिखाया सिर्फ सत्ता के लिए. अपने देशवासियों से अपील है कि नफरत फैलाने वाले इन लोगों का सामूहिक बहिष्कार करें ताकि देश में हर तरफ प्यार ही प्यार हो.

  • 10. 07:31 IST, 10 सितम्बर 2010 Ravi kumar dixit , fatehpur U.P.:

    बीबीसी को मेरा नमस्कार. आपकी ख़बरों में जो निष्पक्षता और दूरदर्शिता है, वह कहीं और नहीं.

  • 11. 10:21 IST, 10 सितम्बर 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सुशील भाई, आपने कितना शानदार और समझने वाला लेख लिखा है! बड़ा ही अपनापन है कि इस लेख में. लेकिन मेरा मानना है कि अगर मुसलमान की दोस्ती पर शक किया जा रहा है तो उसे भी इस पर कुछ आत्ममंथन करना होगा. काश मेरे वतन भारत में हिंदू-मुसलमानों के बीच मुहब्बत हमेशा कायम रहे और इसे किसी की नजर न लगे.

  • 12. 10:49 IST, 10 सितम्बर 2010 Rohit:

    याद आता है बचपन में जब हम अपने नईम अंकल के घर सेवइयां खाने जाते थे. हम लोग गुजराती शाकाहारी हैं तो बकरीद पर भी वो हमारे लिए सेवइयां ही बनवाते थे. ऐसे ही हमारे कई सिख दोस्त भी थे, जिनके साथ हमने बचपन में बड़े ही मज़े के साथ दिन गुजारे. लेकिन 1984 के दंगों के बाद हमने बहुत से सिख दोस्तों को स्कूल में नहीं देखा. सेठी अंकल का परिवार हमारे साथ कई दिनों तक रहा. कौर अंकल की मदर डेयरी वाली दुकान जला दी गई. उस समय हम बहुत छोटे थे, लेकिन बड़ा दुख होता है वह सब सोचकर.

  • 13. 15:29 IST, 10 सितम्बर 2010 Syyed Faizan Ali:

    लाजवाब झा साहब, आपने इतनी ख़ूबसूरती से अपनी बात को पेश किया. हिन्दू मुस्लिम एकता भारत की सभ्यता को दर्शाती है मगर आज ऐसे कितने लोग हैं जो इसकी बात करते हैं. क्या कोई ऐसा संगठन है जो हिन्दू मुस्लिम एकता की बात करे, लोगो के दिलों में एक दूसरे के लिए बेहद ज़हर भरा हुआ है. हमें चाहिए एक ऐसा वतन जहाँ हर धर्म, हर जाति, हर तबके के लोग खुली हवा में सांस ले सकें.

  • 14. 18:51 IST, 10 सितम्बर 2010 alok bajpai:

    अच्छी भावनाएं और जबरदस्त अभिव्यक्ति.

  • 15. 18:55 IST, 10 सितम्बर 2010 IDREESH:

    काश! हर शख्स के दिल में यही भावनाएं हो तो ये धरती किसी स्वर्ग से कम नहीं होगी.

  • 16. 19:15 IST, 10 सितम्बर 2010 Harish Chandra Nainwal:

    बड़ी और महान सोच. मानवीय जीवन को कभी भी धर्म के आधार पर बांटा नहीं जा सकता है. हम सभी एक ही ईश्वर की संतानें हैं. हमारी स्वार्थी प्रकृति हमें अलग-अलग खांचों में बांटती है. आज़ादी के आंदोलन से लेकर कारगिल के संघर्ष तक समूचे भारत ने एकजुटता का परिचय दिया है. असल में, एक सच्चा इंसान कभी भी धार्मिक भेदभाव के बारे में नहीं सोचता, उसके लिए मानवता सर्वोपरि है.

  • 17. 20:37 IST, 10 सितम्बर 2010 saeed ahmed:

    सुशील भाई जान, आदाब! आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से नफरत की आग पर ऐसा पानी फेरा कि आग तो बुझी ही, पढ़ने वाले के आंखों में आंसू आ गए. आपके विचारों को प्रणाम, आपकी लेखनी को सलाम.

  • 18. 21:22 IST, 10 सितम्बर 2010 Prakash Singh:


    झा, साहब आपका ब्लॉग आपके महान विचारों का सूचक है. ये तो सच है कि बीबीसी की ख़बरें हमेशा से धार्मिक एकता और एकजुटता की मिसाल पेश करतीं हैं. मैं एक ब्राह्मण परिवार से हूं, याद आता है कि मेरे दादा जी डबल रोटी इसलिए नहीं खाते थे कि उसे मुसलमान बनाते हैं. लेकिन आज जब मैं बड़ा हो गया हूं तो उन पर तरस आता है. मुझे मुसलमान भाई बड़े अपने से लगते हैं. यह मेरे अंतरआत्मा की आवाज है.

  • 19. 21:46 IST, 10 सितम्बर 2010 Harish Joshi:

    धर्म हमेशा से व्यक्तिगत मसला है और इसे दो धर्मों के लोगों या देशों के बीच अच्छे संबंधों में बाधक नहीं बनाया जा सकता. हमें सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखना चाहिए.

  • 20. 21:54 IST, 10 सितम्बर 2010 Devesh Kumar Pandey:

    सुशील जी, मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूं.

  • 21. 01:16 IST, 11 सितम्बर 2010 Farid Ahmad khan :

    आपका ब्लॉग पढ़कर बहुत अच्छा लगा. हमारा देश भारत महान है. कुछ लोग जो हमारे समाज को नुक़सान पहुंचाना चाहते हैं, उनकी तादाद बड़ी थोड़ी है. हम सभी को मिलकर भारत को तरक्की की राह पर बहुत आगे ले जाना है. धन्यवाद.

  • 22. 05:58 IST, 11 सितम्बर 2010 Maharaj Baniya:

    हमारे देश के राजनेताओं को धर्मनिरपेक्षता की भाषा समझ में आती. आप अपने इस लेख के लिए बधाई के पात्र हैं. ऐसे लेख लिखते रहिए!

  • 23. 12:02 IST, 11 सितम्बर 2010 santosh:

    सुशील जी, आपने बहुत अच्छा लिखा है. आपके ब्लॉग को पढ़कर मैं अपने बचपन की यादों में खो गया. याद आता है जब मेरी दीदी की आकस्मिक मौत हुई थी और मेरे मुसलमान दोस्तों ने राम नाम सत्य है, कहकर उन्हें कंधा दिया था. बचपन में जब भी हम बीमार होते, तो मौलवी साहब की मदद लेते. काश हमारे देश की जनता स्वार्थी नेताओं और अन्य बुरे तत्वों के जाल से निकल पाती! हिंदू और मुसलमान इस देश में मिलजुलकर ईद और दीवाली मनाएं, यही मेरा सपना है.

  • 24. 15:38 IST, 11 सितम्बर 2010 प्रमोद कुमार तिवारी :

    सुशील भाई ईद, तीज और गणेश चतुर्थी की मुबारकवाद, ये जज्‍बा बना रहे. सियासत ने बहुत कुछ बदला है, शहरों की आंच अब गांवों तक पहुंचने लगी है और भले ही हम बाहर से पहले की तुलना में कहीं ज्‍यादा लिबरल दिखने की कोशिश करते हैं पर भीतर से लगातार कट्टर होते जा रहे हैं.

  • 25. 22:12 IST, 11 सितम्बर 2010 prashant mehrishi:

    काश ऐसी ही सोच चरमपंथी भी रखते!

  • 26. 23:08 IST, 11 सितम्बर 2010 harsh kumar:

    धर्मनिरपेक्षता पर सिर्फ भाषण देने से काम नहीं चलेगा, इसे अमल में लाना जरूरी है. दुर्गा पूजा के मेले में अगर किसी गुब्बारे वाले से उसका नाम पूछें तो पता चलेगा कि वह तथाकथित बुद्धिजीवियों से ज़्यादा धर्म निरपेक्ष होता है.

  • 27. 02:14 IST, 12 सितम्बर 2010 mohammed:

    बेहतरीन ब्लॉग !

  • 28. 05:55 IST, 12 सितम्बर 2010 Ritesh:

    हमें सहिष्णुता की रक्षा उसी प्रकार करनी है जैसे हम अपने दूसरे मूल्यों की करते हैं. बड़े शहरों में हमारे सभी मूल्यों का ह्रास देखने को मिलता है शायद इसलिए वहां पर सहिष्णुता भी कम दिखाई पड़ती है.

  • 29. 07:39 IST, 12 सितम्बर 2010 gurpal singh:

    सुशील भाई, सेवइयां याद दिलाने के लिए धन्यवाद. मैं बचपन में उर्दू सीखता था, उस दौरान मेरे ढेर सारे मुसलमान दोस्त और टीचर रहे. मेरा गांव पाकिस्तान की सीमा के नजदीक है और यहां कभी भी किसी तरह की समस्या नहीं रही. गांवों में विभिन्न धर्म के लोगों के बीच भाईचारा शहर के लोगों के लिए मिसाल है.

  • 30. 11:33 IST, 12 सितम्बर 2010 Mohammad Alamgir, Siwan, Bihar:

    सबसे पहले आपको और पूरे बीबीसी को ईद मुबारक! आपके लेख से मैं बिल्कुल सहमत हूं. गांवों में हिंदू-मुसलमान सभी भाई मिलजुलकर रहते हैं, दुख-दर्द में शामिल होते हैं, तीज-त्योहार मिलकर मनाते हैं. यही तो हमारे हिंदुस्तान की पहचान है.

  • 31. 15:13 IST, 12 सितम्बर 2010 SHAMIM(SAUDIA):

    आपका ब्लॉग मन को छू गया. सभी को ईद मुबारक!

  • 32. 19:01 IST, 12 सितम्बर 2010 braj kishore singh:

    सुशील जी असली भारत का वर्णन करने के लिए धन्यवाद. असली भारत आज भी गांवों में बसता है. गांवों में आज भी मजहब का झगडा नहीं है,सबके सुख एक और सबके दुःख भी एक हैं.

  • 33. 19:05 IST, 12 सितम्बर 2010 himmat singh bhati:

    शानदार लिखने के लिए बधाई! आगे भी ऐसे ही लिखते रहिए, हम इंतजार करेंगे.

  • 34. 02:49 IST, 13 सितम्बर 2010 Syed Saleem:

    यह बात शत-प्रतिशत सही है कि भारत में हिंदू-मुस्लिम संबंधों में दरार राजनेताओं की वजह से पैदा हुई है. हमें ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए.

  • 35. 02:59 IST, 13 सितम्बर 2010 gaurav tamrakar:

    गाँव के दोस्तों की याद आ गई.

  • 36. 11:06 IST, 13 सितम्बर 2010 bhagyanarayan jha:

    सुशील बाबू आपका ब्लॉग दिल और मन को छू गया. ईद मुबारक!

  • 37. 11:35 IST, 13 सितम्बर 2010 Intezar Hussain:

    सुशील जी, आपका ब्लॉग दिल को छू गया. काश ऐसा होता. मैं सिवान का रहने वाला हूँ. में बचपन से आज तक ईद-होली-दीवाली साथ मिल कर मनाया है. लेकिन आज राजनेताओं ने हिंदू-मुस्लिम को बांट कर रख दिया है.

  • 38. 14:18 IST, 13 सितम्बर 2010 रजनीश कुमार :

    गाँव को रोमैंटिसाइज़ करने से काम नहीं चलने वाला है. गुजरात में गाँव भी हिंसा की चपेट में आए. क्यों ?

  • 39. 15:26 IST, 13 सितम्बर 2010 faisal :

    मैं देश से बाहर नौकरी कर रहा हूँ. यहाँ लोग जाति या धर्म से नहीं बल्कि देश के नाम से पहचाने जाते हैं. देश में कुछ लोग हिंदू-मुस्लिम को अलग करने की कोशिश करते हैं. लेकिन नापाक इरादे कामयाब नहीं होते.

  • 40. 23:53 IST, 13 सितम्बर 2010 Muhammad Asad:

    आह सुशील झा, अब मुझे ऐसा लगता है की कुछ ऐसे लोग भी हैं जो हमारे जज्बात को समझते हैं. वरना जगह जगह हम से हमारी एक एक बात की सफाई मांगी जाती है. तुम ने हमारे दिल के दर्द को बड़े अछे तरीके से बयान किया है. " हां नौ साल पहले 11 सितंबर की घटना के बाद बहुत बहसबाज़ी हो रही है मुसलमानों पर. उन्हें कैसे रहना चाहिए या फिर उनके साथ और लोगों को कैसे रहना चाहिए. ऐसी बहस मेरे बारे में हो तो मुझे भी ग़ुस्सा आएगा." वाह भाई. यही बात मेरे दिल में भी थी मगर उसको व्यक्त करने के लिए मुझे मुनासिब शब्द नहीं मिल रहे थे. तुम ने सही कहा सुशील. धर्मनिरपेक्षता, सेकुलरिज़म, हिंदू मुस्लिम भाईचारा, इस्लामी चरमपंथ ; ये बड़े बड़े और उलझावे वाले शब्द हैं. सेवइयां, बिरयानी, क़व्वाली, चचीजान की आंखों का सूरमा, उर्दू ज़बान, गंडे-तावीज़. ये सब ऐसे शब्द हैं जिनको बिना पढ़ा भी भली भांति समझता है.

  • 41. 11:54 IST, 14 सितम्बर 2010 owais Bulkhi:

    आँखे नम हो गई...ईद मुबारक.

  • 42. 13:15 IST, 14 सितम्बर 2010 Mohd Javed Ansari:

    मुझे यह लेख काफ़ी पसंद आया. इसी तरह के और भी लेख लिखते रहिए.

  • 43. 12:21 IST, 15 सितम्बर 2010 Amit Shahi:

    बीबीसी के समाचार मैं बहुत दिनों से पढ़ता हूँ, बहुत सारी बातों के साथ एक बात और समझ में आती है कि बीबीसी भी धर्मनिर्पेक्ष होने का स्वांग बहुत बेहतरीन तरीक़े से प्लान करता है और इसमें साथ देने वाले आप जैसे लोगों के ही ब्लॉग होते है, जो हमेशा भारत की सारी समस्याओं के लिए हिन्दुओं को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. बीबीसी के लिए इतिहास 1600 शताब्दी से शुरू होता है जब अयोध्या में मंदिर की जगह मस्जिद का निर्माण हो चुका होता है. हिन्दू मुस्लिम दंगो में उसे हमेशा दुखी मुस्लिम ही दिखाई देते हैं. उन लाखों हिन्दुओं का दर्द कहीं अनुभव नहीं होता, वो उस विश्वास को नहीं समझ पाते जो बचपन से अयोध्या की कहानिया पढ़ कर बड़ा होता है, जो उनके लिए आस्था से आगे की बात है. अगर चर्च में क़ुरान जलने की अफ़वाह सुनकर दंगे हो सकते है, तो अयोध्या के लिए आन्दोलन होना स्वाभाविक ही है. कृपया अपना इतिहास बोध सुधारिए, मुर्ग़े के बांग देने से सुबह नहीं होती, सुबह तो शास्वत है, मुर्ग़ा बांग दे या न दे. इतिहास की पुनरावृति स्वाभाविक है, कृपया अपने समाचार में एक पाठक कोना रखिए जहां आप के ब्लॉग के अतिरिक्त अन्य समाचारों पर भी प्रतिक्रिया दी जा सके.

  • 44. 16:17 IST, 15 सितम्बर 2010 Kamran Zaidi Allahabad:

    आपका ब्लॉग मन को छू गया. सभी को ईद मुबारक.

  • 45. 23:03 IST, 15 सितम्बर 2010 atul panwar:

    बहुत ही अच्छा लेख है आपका. बात सीधी मेरी आत्मा को लगी है. कितना अच्छा होता कि आपके जैसे लोग हमारे बकवास नेता की जगह लेते. आपका लेख पढ़ कर ये लगा कि अब भी कुछ लोग इंसानियत की बात करते हैं.

  • 46. 04:08 IST, 16 सितम्बर 2010 bharat:

    बड़े भोले हैं आप झा जी, कभी किसी मुस्लिम देश में रह कर देख लेते! आप जो कह रहे हैं सही है लेकिन यह सिर्फ़ सनातनधर्मी भारत में ही संभव है, जिस दिन मुसलमान अधिक संख्या में हो जाएंगे आप भी नहीं बच पाएंगे.

  • 47. 13:27 IST, 16 सितम्बर 2010 Intezar Hussain:

    हम चाहते हैं कि भारत में सभी लोग मुहब्बत और भाईचारे से रहे. गंगा-जमुनी संस्कृति बहती रहे.

  • 48. 00:35 IST, 18 सितम्बर 2010 A Tulahi:

    आपका ब्लॉग पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. शानदार

  • 49. 14:59 IST, 30 अक्तूबर 2010 Dahar Mujavar:

    बहुत सही. आजकल इस प्रकार की सोच देखी जा रही है. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं.

  • 50. 15:59 IST, 31 अगस्त 2011 Ajay Kishore:

    इस प्रकार के विचार भारतीय एकता के लिए एक बहुत बड़ा क़दम है.अगर ऐसे ही सभी सोचते तो हिंदु-मुस्लिम के बीच में कोई विवाद ही नहीं होगा.

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