बाबरी, गोधरा, जय श्रीराम
बात बहुत पुरानी नहीं है...बस 17-18 साल..मैं ग्यारहवीं में पढ़ता था. दिन के ग्यारह बजे होंगे. हम सड़क पर क्रिकेट खेल रहे थे. तभी एक रिक्शा और उसके साथ लोगों का एक गुट आता हुआ दिखा...पास आए तो हमने देखने की कोशिश की कि आखिर रिक्शा पर है क्या?
कुछ नहीं था एक ईंट थी जिसके सामने कुछ रुपए पड़े थे और साथ चलने वाले, लोगों से कह रहे थे राममंदिर के लिए दान दीजिए. लाउडस्पीकर पर घोषणा हो रही थी कि इस ईंट से मंदिर बनेगा.
कारवां गुज़र गया लेकिन उसकी धूल कुछ महीनों बाद दिखी जब पता चला कि कहीं कोई मस्जिद तोड़ दी गई है. उसके बाद कॉलोनी में जगह जगह पोस्टर लगे माथे पर भगवा कपड़ा बांधे युवकों के जिनके नीचे लिखा था कि ये शहीद हुए हैं.
मैं सोचता रहा कि भारत ने कोई लड़ाई तो लड़ी नहीं तो ये शहीद हुए कैसे और सैनिकों की तरह इन्होंने कपड़े भी नहीं पहने.
ये वो दौर था जब हमारी कॉलोनी के युवक काफ़ी उग्र होने लगे थे. चुनावों में नौजवानों को बुलाया जाता और वो बस एक ही नारा लगाते जय श्री राम मानो चुनाव राम जी लड़ रहे हों.
एक और नारा लगता था- अयोध्या तो झांकी है काशी मथुरा बाकी है..इसका अर्थ कुछ वर्ष पहले तब पता लगा जब काशी और मथुरा जाने का अवसर मिला.
साध्वी ऋतंभरा का एक भाषण भी बजता था. क्या बोलती थीं याद नहीं लेकिन इतना याद है कि जो भी बोलती थीं वह खून खौलाने वाला होता था. हिंदुओं को लड़ने के लिए उकसाने वाले ये भाषण नौजवानों में जोश भर देते थे. उमा भारती, लाल कृष्ण आडवाणी और वाजपेयी ये नाम तभी मानस पटल पर अंकित हुए अपने भाषणों से.
बाद में दंगों की ख़बर आई. छोटी कॉलोनी में कम अख़बार आते थे तो जानकारी भी कम मिलती थी. एक दिन मैदान में अचानक सुना कि मुसलमान पास की मस्जिद से लोगों को मारने आ रहे हैं. घर दूर था तो मैं पास में एक बड़े पेड़ पर चढ़कर इंतज़ार करने लगा ये सोचकर कि पेड़ पर तो कोई देख नहीं पाएगा.
हुआ कुछ नहीं..न मुसलमान आए और न दंगा देखने की मेरी इच्छा पूरी हुई....
ये बातें उस समय समझ में नहीं आती थीं..अब सोचता हूं तो याद आता है कि कैसे जय श्री राम का उदघोष करने में युवक गर्वान्वित होते थे. एक बार मंझले भाई को चुनाव वाली गाड़ी की छत पर जय श्री राम करते हुए पापा ने देखा तो जमकर पिटाई की थी. पिताजी तो जय श्री राम और चुनावी बखेड़े दोनों से नाराज़ थे.
अपने जय श्री राम, डंडे के डर से तभी भाग गए थे. लेकिन जय श्री राम ने मुसलमानों के मन में घर बसा लिया एक डर के रुप में. मुसलमान हमसे बात करने से कतराने लगे.
अब सोचता हूं तो याद आता है कि उस समय कई मुसलमान दोस्त हमने भी खोए क्योंकि हम नासमझी में उनके डर को नाराज़गी समझ बैठे.
फिर नौकरी करने लगे. 26 फरवरी 2002 को जब कारसेवकों को लेकर जा रही साबरमती एक्सप्रेस में आग लगने की ख़बर फ्लैश हुई तो मेरे मुंह से यही निकला --- ये तो बड़ी हो जाएगी ख़बर.
उस दिन जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मशाल जुलूस भुलाए नहीं भूलता. मशालों में आग और आंखों में चिंगारी. उस समय मेरे दिमाग पर बस तीन शब्द चोट कर रहे थे. जय श्री राम, जय श्री राम और जय श्री राम
ख़बर बहुत बड़ी हुई और मुझ जैसे शायद कई लोग सोचने पर मजबूर हुए. जय श्री राम के भक्तों के ग़ुस्से को गुजरात में खून से शांति मिली.
श्री राम का डर मूर्त रुप ले चुका था. वो दौर खुद से घृणा का था. क्योंकि भगवान राम तो त्याग के देवता हैं. उन्होंने कभी ख़ून बहाने की बात नहीं की. यहां तक कि उसका खून बहाने से पहले भी उससे बातचीत का प्रस्ताव रखा जो उनकी पत्नी को हर ले गया था.
लेकिन वो मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे. ये जय श्री राम थे जिनके लिए प्रतिशोध ज़रुरी था रक्तपान ज़रुरी था.
अगर किसी के भगवान इतने डरावने होते हैं तो भगवान न हों तो अच्छा है.अगर जय श्री राम इतने डरावने हैं तो मैं राम से काम चलाना अधिक पसंद करुंगा.
अब दशकों पहले की घटना का फ़ैसला आना है....कोई कहता है वहां अस्पताल बनाओ..कोई कहता है...लाइब्रेरी बनाओ....कोर्ट क्या कहेगा किसी को नहीं पता...
मैं तो बस इतना कहता हूं काशी और मथुरा में जब मंदिर मस्जिद साथ रह सकते हैं तो अयोध्या में क्यों नहीं...मंदिर भी बने और मस्जिद भी बने. दोनों की दीवारें लगती हों. अज़ान और घंटियां साथ साथ बजें क्योंकि ये दोनों आवाज़ें हम सभी ने एक साथ कहीं न कहीं ज़रुर सुनी होंगी. जिन्होंने नहीं सुनी उनसे मेरा वादा है कि दोनों आवाज़ें एक साथ बड़ी सुंदर लगती हैं...

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आशावादी होना अच्छी बात है सुशील लेकिन लफ्फ़ाजी के बजाय समाधान की जरूरत है.
मेरे दोस्त, मैं भी आपकी तरह ही सोचता हूँ. अब बस करो, धर्म को राजनीति से अलग करो. नेताजी प्लीज, देश को लज्जित ना करें.
मार्मिक अभिव्यक्ति. हममें से अधिकांश के अनुभव हिन्दुस्तान की साझा संस्कृति के गवाह हैं. 1992 का वर्ष हर व्यक्ति की स्मृति के एक कोने में अंकित है. उस वक्त मेरी उम्र 10 के आसपास थी. कुछ खास याद नहीं, कुछ ज्यादा समझता भी नहीं था. दीवारों और लोगों की जुबान पर एक नारा उन दिनों बहुत प्रचलित रहा- 'कसम राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनायेंगे'. एक और नारा था, जो उसके बाद भी काफी दिनों तक चला- 'बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का'. इन नारों के मतलब जेएनयू आने के बाद समझ में आए. 2002 का वो एबीवीपी का जेएनयू में जुलूस भी स्मृति का एक हिस्सा बन चुका है. अयोध्या पर फैसला आना है. लोग काफी उत्साहित है. पता नहीं मुझे क्यों कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही, इसलिए कोई उत्साह भी नहीं है. गुजरात नरसंहार के हम सब साक्षी हैं. भोपाल त्रासदी सहित कई बहुत सारी घटनाओं के साक्षी हैं. जिस तरह उन पर आए फैसले राजनीतिक लाभ की कोशिशों के अलावा कोई दूरगामी प्रभाव नहीं छोड पाए, मुझे लगता है उसी तरह अयोध्या पर आने वाला फैसला भी अपने साथ कुछ खास बदलाव नहीं लाने वाला है.
बहुत पहले एक कहानी सुनी थी. किसी दौड़ में दो व्यक्ति दौड़ रहे थे, अंत में उदघोषक ने कहा, राम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है किन्तु वह अंतिम व्यक्ति से दूसरे स्थान पर आया है. सुहैल ने उससे अच्छा प्रदर्शन किया है, वह ऊपर से दूसरे स्थान पर आया है, इसके बाद वह शांत हो गया. जो उदघोषक ने कहा वो कथन सत्य था, लेकिन वो उससे भी बड़ा सत्य छिपा गया कि उस खेल में दो ही व्यक्ति थे और राम प्रथम था. ".न मुसलमान आए और न दंगा देखने की मेरी इच्छा पूरी हुई" , आपकी बात में कितना सत्य है या बात सभी पाठक जानते हैं. और रही बात मथुरा काशी या अन्य धर्मस्थलों की तो कभी आप एक ब्लॉग लिखिएगा किसी मस्जिद के पास, एक नया मंदिर बनाने के बारे में, आप कभी दोबारा गलती नहीं कर पाएंगे. भारत की परंपरा और श्रीराम को आपने अच्छा व्यक्त किया है , क्योंकि आप हिंदुओं के बारे में दुष्प्रचार करके महान बन सकते है , लेकिन कभी किसी और के बारे में भी लिखने की हिम्मत कीजिए. हमें उसकी प्रतीक्षा रहेगी.
बड़ी अजीब विडम्बना है सुशील जी हमारे समाज में एक मुहावरा बड़ा प्रसिद्ध है बहती गंगा में हाथ धोना ....बात कुछ यों है कि मैं करीब तीन या चार वर्षों से बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम को पढ़ता आ रहा हूँ और और 96 से सुनता भी आ रहा हूँ. संस्मरण तब भी सुनाई पड़ता था और अब भी लेकिन इधर जबसे अयोध्या मुद्दे पर फैसले की घोषणा हुई है तब से बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम पर मनगढ़ंत और भावुकता से भरे संस्मरण पढ़ने को मिल रहे हैं.| दरअसल सारा मुद्दा राजनीतिक रूप से सही होने का है. बाबरी विवाद को लेकर जितनी चिंता चचा हासिम अंसारी और भास्कर दास को नहीं है उससे ज्यादा मीडियाई चिंता कर रहे हैं. दरअसल 2002 के बाद किसी धार्मिक सांप्रदायिक मुद्दे पर तड़के भरी ख़बर आप लोगों को नहीं मिल रही है. खैर पता चला कि आप कभी जेएनयू भी आए थे मशाल जुलूस के समय. लगता है उसके बाद आप ने जेएनयू आना छोड़ दिया है. फिर कभी आइए जेएनयू काफी बदल चुका है.| आप मीडिया वालों में युधिष्ठिरी सत्य बोलने का बड़ा फैशन है. आप भूल जाते हैं कि इतिहास का यह कितना बड़ा झूठ है. बीबीसी वाले ही नहीं पूरे मीडिया वालों को अपना संस्मरण एक सम्पादित पुस्तक में छपवा देना चाहिए इससे साहित्य और समाज को बड़ा फ़ायदा होता और पाठक कपोलकल्पित संस्मरणों के बोझ से बच पाते.
ब्लॉग तो आपने बहुत ही अच्छा लिखा है. लेकिन देखना है कि कितने लोगों को ये बात समझ में आती है. अभी राजनाथ जी का बयान देखा तो लगा कि कुछ राजनीति अभी बाकी है अपने देश में.
साबरमती एक्सप्रेस में जलने वालों के प्रति आपकी कोई सहानूभूति नहीं है. जलाने वालों के प्रति कोई द्वेष नहीं है. द्वेष है तो उन छात्रों के प्रति जिन्होंने भगवान के नाम पर जुलूस निकाला. जिहाद और अल्लाह के नाम पर लाखों लोग मारे जा चुके है लकिन क्या आप उनके बारे में भी कुछ लिखेंगे. उस अल्लाह से आपको डर नहीं लगता?
दंगे तो दोनों तरफ़ से होते हैं. आप किसी को मासूम और किसी तो कातिल कैसे बोल सकते हैं. दोनों तरफ के लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं.
सुशील जी, हम बस उम्मीद ही कर सकते है, आपकी ब्लॉग की अंतिम पंक्तियां सच हो. लेकिन इस संदेश को देखें जो आजकल योजनाबद्ध तरीके से हिंदी पट्टी में फैलाया जा रहा है. "राम मंदिर के लिए प्रार्थना करो 24 सितम्बर को कोर्ट का फैसला है. इस संदेश को आग के तरह फैला दो जो हिन्दू राम का नहीं वो किसी काम का नहीं.'' यह संकेत 'ईंट' से कम ख़तरनाक तो नहीं.
सुशील भाई अगर हर हिन्दुस्तानी आपके तरह हो जाए तो फिर मंदिर और मस्जिद का विवाद ही नहीं रहे.
आज से 18 साल की घटना जिसे भी याद हो, उनकी स्मृति सुशील झा से अलग नहीं होगी, हां! उनकी प्रतिक्रिया कल भी अलग रही होगी और आज भी अलग हो सकती है.
ये वो घटना थी जिससे देश की ज़मीन तो नहीं बंटी, लेकिन दिलों को ज़रूर बांटा. ग़ैर मज़हब के दोस्त अचानक पराये लगने लगे. कल तक बराबरी के साथ रहने वालों में एक बलवान हो गया, तो दूसरा डरपोक. एक के नौजवानों का खून खौला, तो दूसरे के नौजवानों का खून जला. शक और बेगानेपन ने जन्म लिया. उसके बाद धीरे-धीरे दूरियां पटने ही शुरू हुई थी 10 साल बाद अचानक एक और घटना ने दिलों को दूर कर दिया. आज आठ साल के बाद एक बार फिर कोई अनहोनी हमारे छोटे बच्चों को डरा रही है, जैसे 1992 में मैंने अडवाणी का नाम एक डराने वाले के रुप में ही सुना था. जयपुर में इंजीनियरींग की पढ़ाई कर रहा मेरा भांजा मुझसे पूछ रहा है कि मामू 24 सितंबर को क्या होगा.
सुशील जी, आपका ब्लॉग पढ़ कर अच्छा लगा. अभी भी आप जैसी सोच रखने वाले बहुत लोग मौजूद हैं. ये मुट्ठी भर फसाद करने वाले लोग देश का कुछ नहीं बिगाड़ सकते.
सुशील जी शायद यह आपका सबसे अच्छा लेख है. हो सकता है कि जहाँ बाबरी मस्जिद थी वहीँ राम का जन्म हुआ हो लेकिन क्या पूरी अयोध्या राम की जन्मभूमि नहीं है? कहीं भी मंदिर बना लो. असली भक्ति के लिए तो किसी प्रतीक की भी आवश्यकता नहीं है. उधर मैं मुसलमान भाइयों से भी कहना चाहता हूँ कि भारत में अनगिनत मस्जिदें हैं क्या उनमें भगवान नहीं रहता? क्या भगवान का निवास सिर्फ़ बाबरी मस्जिद में ही था? अगर नहीं तो फिर क्यों नहीं छोड़ देते जिद? क्या वे बता सकते हैं कि 1526 से पहले उस जगह पर क्या था, जब वहां मस्जिद नहीं थी.
आपका ब्लॉग दिल को छू गया. आखिरी पंक्ति पढ़ कर अनायास मैं बोल उठा, काश हम सभी समुदाय के लोग ऐसा करते. कोई भी धर्म हिंसा का पाठ नहीं पढ़ाता. लेकिन आज का मानव उसे भूल चुका है. मैं सभी धर्म के लोगों से आग्रह करता हूँ कि प्रेमभाव रहे और अपने धर्म की इबादत करे.
किसी ने ठीक ही टिप्पणी की है, कृपया एक पुस्तक छपवा दीजिए, रोज़ रोज़ ब्लॉग लिखने से बहुत बेहतर होगा.
आप लोग कुछ ज्यादा ही उदारवादी दिखते हैं. कृपया भारत का इतिहास भी पढ़े. उदारवादी विचार अच्छे होते हैं आप धरातल पर काम नहीं करते. ऐसा लगता है कि सारी गलती हिंदुओं की है, मुस्लिम तो सिर्फ मार खाते रहे हैं.
धर्म निरपेक्ष होने में अपना क्या जाता है.
"मंदिर भी बने और मस्ज़िद भी बने. दोनों की दीवारें लगती हों. अजान और घंटियां साथ साथ बजें क्योंकि ये दोनों आवाज़ें हम सभी ने एक साथ कहीं न कहीं ज़रुर सुनी होंगी. जिन्होंने नहीं सुनी उनसे मेरा वादा कि दोनों आवाज़ें एक साथ बड़ी सुंदर लगती हैं..."
अनमोल वचन सुशील जी.
साहब, आपने बहुत अच्छा कहा कि काशी में मंदिर और मस्जिद साथ रह सकते हैं तो अयोध्या में क्यों नहीं. बाबरी मस्जिद का मामला सिर्फ हिंदु-मुस्लिम का मामला नहीं रह गया है. यह पूरी तरह से राजनीतिक मामला हो गया है. अयोध्या और फैजाबाद के लोग शांति चाहते हैं लेकिन कुछ लोग अपना स्वार्थ साधना चाहते हैं. हिंदु और मुसलमान दोनों को मिल कर फ़ैसला करना होगा. एकता बनी रहे.
बहुत अच्छा लेख. बधाई. हमें आज के माहौल में ऐसी कोशिशों की जरूरत है. आपने डर और नाराजगी का भी अच्छा इस्तेमाल किया है, मन को छू गया.
सुशील जी, हज पर जाकर वहां आजान के साथ घंटी बजाने की मेरी इच्छा को आपने दबाने का प्रयत्न किया। यह बात आपके लेख की मूल भावना से मेल नहीं खाती।
पंद्रह वर्ष पहले मैंने ये लिखा था जो आज भी मुझे ठीक लग रहा है:
कौन जाने लोग धर्म को कहां ले जाएँगे
है ये मानव के लिए मानव को खा जाएँगे
जिसको अपनी आत्मा में खोज ना पाए कभी
उसको ज़मीन के टुकड़े में ये पा जाएँगे.
आस्था के दीप हृदयों में जला कर देखिए
मस्जिदों में राम आपको नज़र आएँगे.
सुशील जी, आज के माहौल में इतनी सटीक लेख लिखने के लिए बधाई और उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में भी इसी तरह के मार्मिक लेख पढ़ने को मिलेंगे. भगवान के नाम पर रोटियाँ सेंकने वाले भगवान को भी बदनाम करने की ठानी है. कुछ स्वार्थी लोगों को छोड़ दे तो हर धर्म के लोग शांति चाहते हैं. फैसला किसी के हक़ में जाए उसका स्वागत करना चाहिए.
बाबरी मस्जिद टूटने के बाद वाले दंगों से हिंदुस्तान के समाज कितना बदल गया है इसका पता पाठकों की प्रतिक्रिया से भी मिलता है.
कोई क्या कर सकता है जब हिंदू खुद अपने धर्म की परवाह नहीं करें. माफ़ कीजिएगा लेकिन आप भी अपने धर्म का आदर नहीं करते हैं. क्या आप मक्का के पास मंदिर की कल्पना कर सकते हैं. यदि हां, तो फिर क्या प्रतिक्रिया होगी इसकी कल्पना कीजिए.
झा जी, आपका लेख पढ़ने और सुनने में बहुत अच्छा है लेकिन सत्य के धरातल से कोसों दूर है. सत्य लिखने की कोशिश करें बेशक उसकी आलोचना ही क्यों ना हो۔
बहुत सही कहा सुशील जी. जब काशी और मथुरा में मंदिर मस्जिद साथ रह सकते हैं तो अयोध्या में क्यों नहीं....जी मक्का को क्यों भूल गए वहां भी ऐसा करवा दें प्लीज़ ....
बीबीसी की खास अदा है हमेशा हिन्दू विरोधी लिखने की. आप एक मस्जिद के लिए इतने भावुक हुए जा रहे है ..अगर इतिहास देखें तो अनगिनत मंदिर तोड़े गए हैं.कभी उन पर आप लोग क्यों नहीं लिखते? जो लोग रेल में जल के मरे क्या वो इन्सान नहीं थे?
वह सुशील जी....बहुत उत्तम विचार....क्या साम्प्रदायिक सद्भाव का नज़ारा होगा अगर ऐसा ही कुछ जामा मस्जिद के पास भी हो. या फिर ताज महल के बारे में क्या ख़याल है? उसे भी कुछ विद्वान, तथ्यों के साथ तेजो महालय, मंदिर होने की बात करते हैं...क्या अच्छा होता अगर वहां भी साथ-साथ एक अच्छा मंदिर बना दिया जाता. है ना?
सुशील जी, ऐसा महसूस होता है कि भारत में वो दिन कभी भी नहीं आएगा जब यह मुद्दा बैठ कर मंदिर या मस्जिद एक जगह बनाने की बात पर तय होगा. बदक़िस्मती यह है कि यह मुद्दा 24 तारीख़ को देश के लिए बरबादी ले कर आएगा. मेरे ख़्याल से कोई भी इलाज नहीं बचा है सिवाय देश की बरबादी के.
मंदिर, मस्जिद दोनों बने. इस समस्या का यही सर्वश्रेष्ठ हल है. जब तक दोनो नहीं बनेंगे राजनेताओं को राजनीति करने के लिए मुद्दे मिलते रहेंगे.
कोई भी धर्म ये नहीं कहता कि खून खराबा करो, शांति कायम नहीं रहे. लेकिन सच बोलने का साहस किसे है.
सुशील जी, अगर लोगों की सोच आप के पिताश्री की तरह हो जाए तो ज़रूर एक दिन अज़ान और घंटियाँ एक साथ सुनने को मिलेंगी.
बहुत अच्छा लिखा सुशील जी.
सुशील झा, यदि आपको हिंदू होने में तकलीफ है तो मुसलमान हो जाइए. हिंदुओं के ख़िलाफ़ लिखने से अच्छा है कि मुसलमान हो जाइए. आप लोगों को ना इतिहास का पता होता है ना देश का, बस मशहूर होने के लिए कुछ भी बोलना है. हिंदू धर्म के बारे में उलटा-पुलटा बोलते हैं. आप ऐसा ही इस्लाम और उनके मानने वालों के बारे में क्यों नहीं लिखते.
मस्जिद की वकालत करने वाले साहबों, भारत में हज़ारों मस्जिद हैं एक मस्जिद मक्का में बना लेने दे.
आपने बिलकुल सही लिखा है “जय श्री राम” सुन कर मुसलमान डर जाते हैं. आँखों के सामने बाबरी मस्जिद और अनगिनत दंगों का दृश्य आ जाता है. लेकिन अब तो मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों का चर्चा करना भी गुनाह हो गया है. यानि मार खाओ और रोवो भी मत.
सुशील जी, बहुत अच्छा लिखा है आपने. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के नाम पर यह बहुत ही अमर्यादित कार्य है. कब हम हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई के अतिरिक्त सबसे पहले भारतीय बनेंगे. और कब हममे अपने देश के लिए सर्वस्व त्याग करने की भावना आयेगी. हमारे सभी महापुरुषों ने सर्वदा युद्ध से पहले शांति की बात की है और युद्ध तभी किया है जब शांति के सारे मार्ग बंद हो चुके हैं.
मस्जिद ख़ुदा का घर है, इसमें बटबारा नहीं हो सकता. हम सिर्फ़ अदालत का फ़ैसला मानेंगे.
बीबीसी धर्म निरपेक्ष नहीं है. सुशील जी, इतिहास पढ़िए. काशी, मथुरा में मंदिर के बगल में मस्जिद बनी थी या मस्जिद के बगल में मंदिर. हमारे मुसलमान भाई को इसमें उदारता का परिचय देना चाहिए.
24 को क्या होगा यह मैंने नहीं सोचा या मेरे दोस्त नसीर या समीम ने, पर लगता है ये मीडिया हमको जरूर यह याद दिलाता रहेगा.
देश में कई हिंदू मंदिर तोड़े गए, कई हिंदूओं को मुसलमान बनाया गया लेकिन जैसे ही हम इस्लाम की आलोचना करते हैं वे मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं. उन्होंने ही ये फसाद खड़ा किया है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.
सुशील जी ताली एक हाथ से नहीं बजती हें, दोनों तरफ के लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं.
मंदिर कही भी बने, मस्जिद कही भी बने बस लोगो का खून न बहे.
साहब, आपने बहुत अच्छा कहा कि काशी में मंदिर और मस्जिद साथ रह सकते हैं तो "मक्का" में क्यों नहीं?
सुशील जी, आपने मस्जिद के लिए इतना सब कुछ लिखा है. मुसलमान भाइयों को मासूम लिखा है. लेकिन भारत में जितनी सुविधा उनको दी जा रही है उतनी हिंदुओं को नहीं. क्या कभी कैलाश मानसरोवर के लिए हिंदुओं को सब्सिडी मिलेगी जैसा कि मुसलमानों को हज के लिए दी जाती है. मुसलमान हमेशा शिकायत करते हैं कि उन्हें कुछ नहीं मिलता.
हो सकता है आपके लेख से सबक ले लोग.
काश कोई दिलों से ज़हर को मिटा दे
बीती हुई बात को दिल से भुला दे
मस्जिद कहां टूटी थी
एक मर्यादा टूटी थी
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम
जो रावण ने भी नही किया वह राम के नाम पर किया गया
रावण भी शर्माए ऐसा काम कारसेवक कर गए.
सुशील जी, ये सारी समस्या नेता लोगों ने खड़ी की हैं. ये धर्म की राजनीति कर रहे हैं. यदि हमारे राजनेता ईमानदार होते तो मस्जिद शहीद नहीं होती. अब तो कुछ लोग काशी, मथुरा, मक्का और ताद महल को भी मंदिर बनाने की बात कर रहे हैं. ये मामला मुसलमानों के ख़िलाफ़ साजिश है.
क्या आप मुसलमानों से जुड़े मसलों पर इसी तरह से लिखेंगे. क्या आप बांग्लादेश से आए मुसलमानों के बारे में लिखेंगे. क्या भरतीयों को आप मूर्ख समझते हैं.
सुशील झा जी, आपके मंदिर और मस्जिद के बारे में विचार बहुत सटीक है, हिन्दू होने का वास्तविक मतलब तो सहिष्णु होना है. हिन्दू कोई धर्म नहीं बल्कि एक विचारधारा है, जिसमें सबके लिए सम्मान और विश्वास है. वसुदेव कुटुम्बकम तो जीवन का जैसे हिस्सा लगता है.
अगर मंदिर और मस्जिद साथ साथ बने तो सम्पूर्ण विश्व के लिए इससे अच्छा उदहारण कहीं और नहीं होगा.
धर्म निरपेक्ष होना फैशन हो गया है. आप बेहद फ़ैशनेलबल है. राम भारतीय संस्कृति के अंग हैं. जो यह नहीं समझते वे पाकिस्तान जा कर रहें.
अच्छा लिखा है झा सर आपने, शायद विषमता को दूर करने के लिए राम को फिर वनवास भोगना पड़ेगा.
मुद्दा बेहद संवेदनशील है, लेकिन शब्दों में झोल ने स्क्रिप्ट का मजा खराब कर दिया, आपको पहले भी पढ़ा है इसलिए हिदायत समझिए कि आप और बेहतर लिख सकते हैं. लेकिन लेख का मूल अतिउत्तम है, जो हर किसी को समझना चाहिए. आशा है कि आप अन्यथा नहीं लेंगे.
भारतीय युवकों को भड़काया जाता है, इस पर मुझे एक शायर की चंद लाइनें याद आ रही हैं, 'उनके इशारे पर लड़ते रहे जमाने से, वह तो रहे पर्दे में, मतलब रखा कमाने से, जब वक्त आया तो फरे ली नज़रें हमसे, जब मिलने गए तो लगे अनजाने से, उन्होंने बहुत कुछ पा लिया, पर हमने भी कुछ खोया नहीं, हमें भी मतलब था कुछ जिंदगी का सच दिखाने से, आपना मकसद पूरा किया, अपनी जिदगी को आजमाने से.' सभी भारतवासियों से मैं अपील करता हूँ कि संयम और समझदारी से काम लें. अदालत में जो मामला चल रहा है, वह दो धर्मों का नहीं बल्कि विवादित जगह के मालिकाना हक को लेकर है. इसलिए आप सब लोगों से अपील है, ' अब न तो राम आएँगे, न रहीन आएँगे, बस इंसान ही इंसान के काम आएगा.
बीबीसी को हिंदू और भारत विरोधी प्रतिक्रिया के लिए जाना जाता है. हमेशा हिंदुओं को ही दोषी ठहराया जाता है.
सुशील जी, कहानी तो अच्छी सुना लेते हैं, कश्मीर की समस्या के पीछे भी कहीं श्रीराम का हाथ तो नहीं. आप इस पर भी एक ब्लॉग लिख दें. केवल कहानी ही तो लिखनी है, लिख डालिए.
बहुत ही अच्छा लिखा है आपने, बिल्कुल सही. भारत में दंगे होते हैं तो मुसलमान भी डर जाते हैं क्योंकि वे ही मारे जाते हैं.
ईश्वर हर इंसान और श्रृष्टी के हर कण में विद्यमान है. वह हम ही हैं जो स्वार्थ बस आपस में लड़ते रहते हैं. आइए एक पल के लिए ही सही एक दूसरे की अंतरआत्मा को जानें. एक अच्छा इंसान बनने की ओर आगे बढ़ें.
हिंदुओं की आलोचन करना, सेक्युलर बनने का सबसे आसान तरीका है.
क्या बकवास लिखा है आपने.
लगता है कि आपको इतिहास की जानकारी नहीं है. इसलिए कृपया अपनी जानकारी दुरुस्त करें.
इस बार राजनीतिक लोगों से ज्यादा आप जैसे मिडिया वाले इसे हौवा बनाने पर तुले हैं.
कहानी अच्छी है. इसमें सच्चाई भी हो सकती है. लेकिन ताली एक हाथ से नहीं बजती.
सुशील जी, यदि साबरमति एक्सप्रेस में आपके परिजन या आपके रिश्तेदार रहते तब भी क्या आप यह ही कहते? अगर दंगे के बीच आपके परिवार के लोग फँस जाते तब भी क्या आपको दंगा देखने का इरादा रहता?
इतनी उदारता ठीक नही है।
यह सही है कि क्या मक्का- में मंदिर और मस्जिद हैं. केवल त्याग ही इसका हल नहीं है.
मैं इंटरनेट पर आ रही प्रतिक्रियाओं से डरा हुआ हूँ. इसमें एक साफ़-साफ़ बंटवारा नज़र आ रहा है. मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि यह बंटवारा देश के लोगों के बीच न हो.
झा जी, ये हिंदू और हिंदुस्तान ही हैं जहाँ आप जैसे लोग हिंदुओं के खिलाफ कुछ भी लिख देते हैं. गोधरा क्यों हुआ था. आप जैसे आधे-अधूरे लोग जिन्हें इतिहास की जानकारी ही नहीं है, आप जैसे लोगों के कारण ही तो देश गुलाम हुआ था.
झा जी, कृपया यह बताएँ कि क्या हम अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएँ. क्या आपने यह नहीं सोचा कि गोधरा में शुरुआत किसने की थी. इस देश में हर कोई अल्पसंख्यकों की बात करने वाला है और जो लोग हिंदुओं की बात करते हैं उन्हें आप जैसे लोग सांप्रदायिक कह देते हैं. राम हमारी संस्कृति के कण-कण में बसे हुए हैं.आप जिनकी बात कर रहे हैं उन्हें यहाँ की संस्कृति से क्या मतलब. उनकी संस्कृति तो मक्का-मदीना है.
आप कह रहे हैं कि काशी और मथुरा में हिंदू-मुसलमान मंदिर-मस्जिद साझा कर रहे हैं, ऐसे में आपकी मक्का-मदीना को साझा करने के बारे में क्या राय है.
आज पता चला बीबीसी अपनी विश्वस्नीयता क्यो खो रही है. कारण है उसके नाबालिग रिपोर्टर. उनका एक रिपोर्टर जब 11वीं कक्षा में पढ रहा हो और उसे यह नहीं मालूम कोई मंदिर विवाद भी भारत में है, उसके आईक्यू का लेबल क्या होगा यह तो समझ में आ ही गया है. अगर इतने कम आईक्यू लेबल के लोग बीबीसी के संवाददाता हैं तो बीबीसी पर मुझे तरस आ रहा है. और शहीद की जो परिभाषा इन्होंने गढी है उसके हिसाब से माहत्मा गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी भी शहीद नही हैं. वे लोग कौन से देश की रक्षा करते हुए सीमा पर मरे थे.
ये सब लिखना ज़रूरी नहीं है. आपका सुनने वाला बी यहाँ कोई होना चहिए.
आप मुसलमानों से डरे हुए हैं. आप इस बात पर रोशनी क्यों नहीं डालते हैं कि कैसे एक मस्जिद अस्तित्व में आई. आपके पास उन लोगों के खिलाफ कुछ कहने का साहस नहीं हैं जिन्होंने ट्रेन जलाई थी. मैं आपकी सभी बातों के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन ऐसा लगता है कि आप और बीबीसी हिंदू विरोधी हैं. यह ठीक नहीं है.
किसी भी हिंदू आंदोलन के लिए मुसलमान या इसाई बड़ी बाधा नहीं है, अगर बाधा हैं तो सुशील झा जैस हिंदू. हिंदू ही हिंदुओं के असली दुश्मन हैं. अगर हिंदू एक नहीं हुए तो इनके जैसे लेखक और नेता हमारे धर्म को तोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं. भारत, अमरीका या इजराइल में बम धमाका होने पर मुसलमान गर्व महसूस करते हैं, वहीं सभी हिंदू पीडितों के के साथ सहानुभूति जताते हैं.
सुशील जी, मुझे लगता है कि आज की दुनिया में आप सच्चाई सामने रखने की तुलना में आप हिंदुओं को बदनाम कर अधिक मशहूर हो सकते हैं. दुर्भाग्य से आपने प्रसिद्धी पाने का बहुत ही घटिया रास्ता चुना है. अगर आप इतिहास पर नज़र डालेंगे तो पाएंगे कि मुसलिम अताताइयों ने 80 लाख हिंदुओं की हत्या कर दी, अनिगिनत हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार किया और हज़ारों मंदिरों को तोड़कर लूटपाट की. राम मंदिर केवल एक मंदिर नहीं है बल्कि हिंदू भावनाओं का प्रतीक है. हिंदू पृथ्वी के सबसे उदार और धर्मनिरपेक्ष जाति है. क्या आपको इतिहास में किसी हिंदू-सिख राजा का मुसलमानों पर किया गया कोई अत्याचार मिलता है. अगर आप यह देखना चाहते हैं कि इस्लाम शांति का धर्म है तो आप कृपया पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर से हिंदुओं का पलायन देखें. आपको कश्मीरी पंडितों के पलायन पर भी लिखना चाहिए जिन्हें उनकी ही ज़मीन से मुसलमानों ने भगा दिया.
वाह बहुत खूब, छह दिसंबर 1992 को में भारत छोड़कर दुबई आ गया था. अब मेरा पूरा परिवार यहाँ बस गया है. लेकिन आपका लेख पढ़कर फिर उम्मीद जगी है कि असल में हालात इतने बुरे नहीं हैं और वापस जाना चाहिए.
सुशील जी, भारत की यह दुर्दशा सिर्फ सेकुलर बनने के कारण हुई है. आपको यह जानकर दुख होगा कि आपको इतिहास की जानकारी नहीं है. आप इतने बड़े सेकुलर हैं अबतक ढाई हज़ार मंदिर पूरी दुनिया में तोड़े गए आपको कोई दुख नहीं हुआ. गोधरा में 59 लोगों को जिंदा जला दिया गया आपको कोई दुख नहीं हुआ. पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत में हो रहे बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण जो समस्याएँ पैदा हुई हैं, वे जो जो धार्मिक उन्माद फैला रहे हैं, उनकी आपने कभी आलोचना नहीं की. पूरे देश में धर्मांतरण की जो आंधी चल रही है उसकी आपने कभी आलोचना नहीं की. कश्मीर में पांच लाख कश्मीरी हिंदुओं को एक ही रात में निकाल दिया गया आपको कोई दुख नहीं हुआ. क्योकि आप भूल गए हैं कि आप क्या है. क्यों न भूलें पहले तो आप सेकुलर हैं, वैसे भी आपको को अपनी रोज़ी रोटी चलानी है, बीबीसी में बैठकर जो कि पूर्वाग्रह से पीड़ित है. कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणा नंद की हत्या हुई आपको दुख नहीं हुआ न ही आपको याद होगा. आपको याद होगा कंधमाल, नरेंद्र मोदी का एक घंटे का भाषण ( 59 मिनट ) जो पूरा का पूरा विकास पर आधारित था, केवल अंतिम पंक्ति आपको याद होगी मौत के सौदागर, और गंगा सहाय मीणा पहले आपने भीतर झांके की उन्होंने जेएनयू में क्या किया है. मीडिया का वैसे भी कोई चरित्र नहीं है. सेकुलर बनकर आप किसको क्या दिखाना चाहते हैं. इसी सेकुलर बनने की चाहत में आप खुद को भूल गए हैं कि आप क्या हैं. इसलिए देश की यह हालत है कि हिंदुओं को जमकर गरियाओ मुनाफ़ा कामाओ, नाम कामाओ यही आपका और मीडिया का चरित्र रह गया है. एक बात जेएनयू से पढ़कर कोई पंडित नहीं हो जाता है. वैसे आपको सेकुलर बनने पर बधाई.
"आप ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ते थे?" आप तो बिलकुल पढ़े हुए नहीं लगते.
इंसानों की जान से ज्यादा कोई भी चीज किमती नहीं है. चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान. जब भी कोई फसाद हुआ है तो केवल बेगुनाह लोग ही मारे गए हैं. इसमें फ़ायदा किसी का नहीं है लेकिन नुक़सान सबका है.
देश में इस प्रकार की घटनाएं और व्यवहार इसलिए होते हैं क्योंकि नेहरुवादी सेकुलर शिक्षा का मैकालेकरण, प्रशासनिक-राजनीतिक व्यवस्था की रग-रग में बस चुका है. सिर्फ़ एक बार राष्ट्रवाद की अवधारणा की कल्पना कीजिए और उसे अमल में लाने का प्रयास कीजिए. फ़िर देखिए अपने-आप देश की रीतियाँ-नीतियाँ, परिस्थितियाँ, यहाँ तक कि मानसिकता भी, सब बदल जाएंगी.
गोधरा हमारे दोस्तों को कुछ ज्यादा ही याद है, गोधरा की घटना का कारण क्या था इस क बारे में तो कोई भी बात नहीं करता. अगर हमलावर लोग मुसलमान के इलावा किसी और वर्ग के होते और उनकी बेटी को यह राम भक्त (जो राम भक्ति से कोसों दूर हें ) उठा के ट्रेन के अन्दर करते तो फिर उनकी ऐसी पर्तिकिर्या एक आम सी घटना होती. लेकिनं वो मुस्लमान थे तो बदला लेना ज़रूरी था. वोटर लिस्ट लेके उनका सफाया करना ज़रूरी था. गैस सिलिंडर उनके घरों को जलाने के लिए थे. अगर कोई ऐसी मानसिकता का विरोध करे तो तो मुजरिम कहलायेगा ही. बंगलादेश से आये हुए हिन्दू तो शरणार्थी हें लेकिन मुस्लमान जो मूलतः यहीं से गए थे अच्छे भविष्य की खोजज में, जब थक हार के घर लौटे तो वोह घुसपैठिये हुए. राम भक्तों को मुद्दा नहीं मिलता तो वलेंतिने डे पर महिलाओं की पिटाई करते हें और अपने आप को बहुत सूरमा समझते हें. रही धर्मांतरण की बात तो यह भी ध्यान में रखिये की किसी को पिस्तोंल के बल पर कोई ईसाई या बोध नहीं बना रहा. हिन्दू समाज जब अपने ही लोगो क साथ भेद भाव की निति रखता है तो लोग उस से अलग होंगे ही..
सौ की सीधी बात! मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना.
इस मामले में मुसलमान भाइयों को बड़प्पन का परिचय देना चाहिए और मंदिर बनाने में हिंदुओं का सहयोग करना चाहिए.
आइए, इस धरती पर मानवता को हम अपना पहला धर्म बनाएं. हम पहले इंसान हैं, हिंदू, मुसलमान और ईसाई बाद में हैं. जब यह धरती बनी थी तो पहले कोई भी धर्म नहीं था, तो फिर मजहब के नाम पर हम क्यों लड़ते हैं?
मंदिर के बगल में मस्जिद की बात तो आप बहुत आसानी से कर देते हैं, कभी मस्जिद के बगल में मंदिर बनाने के लिए अपनी कलम चलाएं.
मेरे मन्दिर तेरी मस्ज़िद का हो इक दरवाज़ा,
पास से चर्च की घण्टी सुनाई दे मुझको
घर बिरहमन के कुराने पाक़ पढ़ी जाए
मौलवी दे दीवाली की बधाई सबको
मुझे इसका समाधान इतना आसान नहीं दिखता. अयोध्या या कश्मीर मामले में जिस किसी के पक्ष में फैसला जाएगा, तो दूसरा पक्षपात का आरोप लगाएगा.
सुशील जी, काफ़ी अच्छा विचार है.
सुशील जी, शायद आप खुश हो रहे होंगे कि आपके आलेख पर कितने सारे लोगों ने प्रतिक्रियाएं भेजी हैं, लेकिन आप भूल रहे हैं कि आप भी उन्हीं लोगों में से एक हैं. एक तरह से आलेख में आप खुद भी निशाने पर हैं. अच्छा होता कि आप अपनी आंखों पर लगे सिर्फ एक ही सच को देखने वाला चश्मा उतार फेंकते. इस देश में हिंदूओं को भला-बुरा कह कर तत्काल प्रभाव से चर्चित हो जाना एक फैशन हो गया है, लेकिन यही बात इस्लाम के बारे में आप नहीं करते. यही वजह है कि भारत के गृहमंत्री भी हिंदूओं को भगवा आतंकवाद पर गाली देने से बाज नहीं आते. कम से कम आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि आप बीबीसी के पत्रकार हैं. बीसीसी की एक प्रतिष्ठा है, लेकिन आपके आलेख से लगा कि आप सिर्फ पत्रकारिता की नौकरी कर रहे हैं वैचारिक खूंटे से आज़ाद होकर. चश्मे का एंगल बदलकर सोचेंगे तो शायद सच्चाई दिख जाए. धन्यवाद.
आपने वो सब कह दिया जो एक आम मुसलमान सोचता है. मैं इसके लिए आपका आभार व्यक्त करता हूं.
इस मामले पर आपके विचार बहुत अच्छे लगे.
अल्लाह ख़ैर करे, हम सिर्फ़ मंदिर-मस्जिद के लिए लड़ रहे हैं. मैं ये पूछना चाहता हूं कि इस्लाम में ये कहां लिखा है कि मंदिर तोड़ के मस्जिद बनाओ. ये सब ढोंग है बस, सच क्या है यह दुनिया जानती है. पिछले दिनों ताजमहल पर भी सवाल उठा था कि वहां भी तेजेश्वरी मंदिर था. मुझे ये बताएं कि इसका जवाब क्या हो सकता है जबकि सब जानते हैं कि ताज किसने बनवाया.
बेहतरीन सुशील जी. शांति की ज़रूरत है इस समय.
श्रीमान जहा हज होता है वह सिर्फ मुसलमान रहते है वो देश हमारे देश की तरह नहीं है जहा सरे धर्म के लोग मिल जुल कर रहते है कभी हमारे देश की लोग प्रशंशा किया करते थे
कश्मीरी हिंदू इस देश में अपना घर छोड़ कर टेंट में रह रहे हैं. कुछ उनका भी सोचिए.
सुशील जी, हिंदू और मुसलमान कोई बुरे नहीं है. उनमें से कुछ ही ऐसे हैं जो सांप्रदायिकता के लिए खतरा बनते हैं.
सुशील जी, मैं आपके विचारों से सहमत हूँ पर मंदिर और मस्जिद दोनों बने जिससे एकता का संदेश पूरी दुनिया में फैले.
सुशील जी आधा सच पूरे झूठ से ख़तरनाक होता है. कृपया पूरा सच बोलने की हिम्मत करें या फिर कोई मेहनत वाला दूसरा व्यवसाय चुने.
मैं इस बात से सहमत हूँ की राम और रहीम एक जगह और ज्यादा अच्छे लगेंगे और फिर मंदिर और मस्जिद कोई मुद्दा ही नहीं रह जाएगा .
सुशील जी, आपको भारत में मुसलमानों के आक्रमण से जुड़ी किताबें पढ़नी चाहिए.
सुशील जी, कृपया मुसलमानों को ख़ुश करने वाली पत्रकारिता बंद कीजिए. आंकड़ों के सहारे बात करें. मुझे बताइए कि गोधरा क्यों हुआ था और कौन इसके पीछे था. कितने लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई है.
काश आप बाबर के समय में होते, तो राममंदिर न टूटता. यदि औरंगजेब के समय में होते, तो मथुरा और काशी अपमानित न होती. बामियान में बुद्ध की विशाल मूर्तियां टूटीं, तब आप चुप रहे. अब बोले हैं, तो कश्मीर घाटी चले जाएं, जहां मंदिर वीरान पड़े हैं, चूंकि अजान वालों को घंटी और आरती सुनना पसंद नहीं है.
लिखने और कहने में ये बातें अच्छी लगती हैं. कभी किसी मस्जिद में जाकर हनुमान चालीसा पढ़ा जा सकता है. नहीं. मुसलमान कभी भी किसी विधर्मी से समझौता नहीं कर सकते. पूरी दुनिया में कहीं पर भी इन्होंने समझौता किया हो तो बताएं. कोरी क़लम घिसने की जगह यथार्थ पर ध्यान देने की कृपा करें.
सुशील जी, पूरा देश जेएनयू नहीं है. लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि काशी में आपने कहां मंदिर मस्जिद एक साथ देख लिया. मैं तो ढूंढता रहा मस्जिद में जाने का रास्ता ही नहीं मिला. अयोध्या पर फ़ैसला कोर्ट को ही करने दीजिए और संभव सीमा तक एकतर्फ़ा लिखना छोड़िए.
सुशील जी कम से कम एक हिंदू होने के नाते श्रीराम के प्रति इतना विद्वेश मत रखिए.
कृपया हिंदुस्तानी की तरह सोचना शुरू करें. दूसरों धर्मों के साथ-साथ भगवान राम की इज्जत करें. बाबर एक विदेशी हमलावर था जिसने लाखों हिंदुओं की हत्या की थी और हजारों मंदिरों को तहस-नहस कर दिया था. कृपया सुशील झा पर विश्वास न करें, उन्हें दूसरों को भ्रमित करने के लिए पैसे मिलते हैं.
बहुत घटिया लिखा हैँ, मीडिया का पूर्वाग्रह साफ़ पता चलता है आपके लेख से.
न जाने क्यों लोग हिंदुओं को गाली देते रहते हैं. गुजरात का दंगा 60 हिंदुओं को जलाने के बाद हुआ था. लेकिन उसके लिए भी कोई मुसलमानों को दोषी नहीं कहता है. क्या उन 60 हिंदुओं का जीने का हक़ नहीं था. हिंदुओं को बदनाम करने के लिए मीडिया अपने अनुसार कहानी बनाती है. गुजरात दंगों के लिए हिंदुओं को दोषी बता दिया और यह भुला दिया कि दंगे क्यों हुए थे. कुछ वैसा ही रामजन्म भूमि के साथ हो रहा है. क्या इतिहास 1992 से ही शुरू होता है? यह क्यों नहीं कहते हैं कि जिस मस्जिद को बाबर ने मंदिर तोड़कर बनाया था. उसे 1992 में तोड़ दिया गया. कहानी पूरी बतानी चाहिए. क्या कोई कल्पना भी कर सकता है कि मक्का-मदीना में मस्जिद के बगल में कोई और धर्मस्थल मुस्मिल स्वीकार कर लेंगे. रामजन्मभूमि पर केवल मंदिर बनना चाहिए.
सुशिल जी , आप एक लेख लिखिए जिसमे जय श्री राम की जगह अल्लाह हो लेकिन जिसमें भारतीय मुसलमानों की जिम्मेदारियों का जिक्र हो. अयोध्या मैं मस्जिद, मंदिर बने से ज्यादा शर्मनाक है भारत में रहके भारत से वैर.
कम्युनिस्टों को एक और विचार. काशी विश्वनाथ मंदिर, सोमनाथ...झा जी लगता है आपने इतिहास नहीं पढ़ा है. आप देश भर के मदरसों के बारे में क्या सोचते हैं. हम सबके लिए एक जैसा ड्रेस कोड नहीं लागू कर सकते हैं. हम शाहबानों को न्याय नहीं दिला पाए और समानता की बात करते हैं. यह सुनिश्चित करिए कि मदरसे का हर छात्र वंदे मातरम गाएगा. फिर देखिए शांति कैसे आती है.
सच में आपका ब्लॉग बेहद अच्छा है. ये युवाओं को रास्ता दिखाता है.
आपका आपके मुसलमान भाइयों के प्रति प्रेम देख कर अच्छा लगा , ओर आप जैसे ही लोगों ने नफरत का डर दिखा कर हर बार सच का गला घोंटा है, मात्र इसलिए कि आप दूसरे धर्म के लोगों कि आँखों में एक बुद्धिजीवी दिखे.
मंदिर वालो मस्जिद वालो एक पाठशला बनवा लो.
आपकी राय की बहुत सारे लोगों ने आलोचना भी की. यह देख कर दुख हुआ कि वे किस तरह सच्चाई का गला घोंटने पर तुले हुए हैं. लेकिन दोस्त, जवाँमर्द तो वही है जो विपरीत हालात में भी सच बोलने का हौसला रखे.
मैं तो ये लिखते हुए बस यही कहना चाहूंगा कि टिप्पणी करना आसान है, मगर खुद अपने विचार व्यक्त करना मुशकिल है.
जो लोग धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं मैं उनसे कहना चाहूँगा कि हम हिंदू लोगों ने किसी देश को लूटा नहीं, किसी धर्म के लोगों को ज़बरदस्ती धर्मपरिवर्तन करने के लिए बाध्य नहीं किया. एकता की बात करने वाले पाखंडी हैं. हाथ मिला कर क्या होगा यदि दिल ही न मिले.
सुशील जी आप का ब्लॉग दिल को छू जाने वाला है. आपने सत्य कहा है और सत्य कभी पराजित नहीं होता है. आप हमेशा सत्य लिख कर हमें प्रोत्साहित करें और मार्गदर्शन करें. बीबीसी के लेख निष्पक्ष होते हैं जो धर्म पर आधारित नहीं होते.
सबसे पहले सच को साधुवाद !!
देश का दुर्भाग्य है कि आज भी लोगों में इतिहास की समझ कम है तभी रह- रह कर मक्का और मदीना में मंदिर की बात करते रहते हैं.
इस शोर में जस्टिस ख़ान का वो सवाल भुला दिया गया है जो जस्टिस ख़ान ने लिखा है कि बहस के दौरान जब पूछा गया कि जन्मस्थान या जन्मभूमि का मतलब क्या है तो वकील यह साफ़ नहीं कर पाए कि उनका मतलब उस भूमि से है जहां महारानी कौशल्या ने राम को जन्म दिया था (यह भूमि बामुश्किल दस से पंद्रह वर्गगज होगी) या फिर उस कमरे से है जहां राम का जन्म हुआ था अथवा उस महल को वह जन्मस्थान कह रहे हैं जिसमें जन्म हुआ था. याचिकाकर्ता ने उस ज़मीन का उल्लेख नहीं किया था जहां भगवान राम ने जन्म लिया था. ज़मीन के किसी ख़ास टुकड़े को लेकर यह नहीं कहा गया कि यहीं पर भगवान राम का जन्म हुआ था. इसके लिए जस्टिस ख़ान ने रामायण, रामचरित मानस और तुलसीदास का उल्लेख किया है. उन्होंने कहा है कि रामचरित मानस मुग़लकाल में लिखी गई थी. ऐसे में इसके लेखक तुलसीदास से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह भगवन राम के जन्म के सटीक स्थान का अपनी रचना में उल्लेख करते. खुद जस्टिस ख़ान ने कई लेखों की मदद से यह भी साबित किया कि तुलसीदास उस दौर के सबसे निर्भिक लेखकों में से एक थे, जिनके किसी भी लेख में मुग़ल सल्तनत का भय नहीं दिखता. जब उन पैरोकारों को ही नहीं पता है जो इस मामले की पैरवी कर रहे है, तो क्या तो राम मंदिर और क्या मुद्दा.
किसी के घर में मूर्तियां रख देने से वो मंदिर नहीं हो जाता है और किसी जगह पर जन्म लेने से उस जगह पर क़ब्ज़ा. ऐसा होता तो पता नहीं आज के अस्पतालों की क्या हालत होगी हर कोई अपना कब्ज़ा जमाने में लग जाता.
यहाँ भारत की बात हो रही है और मक्का-मदीना भारत में नहीं है. अगर मुस्लिम शासक मंदिर तोड़ते तो 1000 साल की हुकूमत में कोई भी मंदिर बाकी न रहता. अयोध्या की हनुमान गढ़ी, लखनऊ का हनुमान मंदिर और स्वर्ण मंदिर के लिए किसने ज़मीन दी थी? जिनको आक्रमणकारी और लुटेरा कहा जा रहा, असली भारत उन्होंने ही बनाया, इस्लाम के आने से पहले भारत देश नहीं था बल्कि छोटे छोटे राज्यों में बंटा था और खूनखराबा होता था, मुसलमानों ने देश को एकता के सूत्र में बांधा, शांति और खुशहाली कायम की. किले, महल, सड़कें और सरायें बनवाई, जितना उन्होंने भारत को दिया है, उतना किसी ने नहीं दिया. आज उनका एहसान मानने के बजाय उन पर आरोप लगाया जा रहा है.
सुशील जी, न्यायालय का फ़ैसला आया.... जो पूरे देशवासियों का मान्य है... सिवाए राजनेताओं के..... आपने अच्छा लिखा है. इसके लिए बधाई देता हूं.
मैं आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूं. भारतीय अब पहले की तुलना में अधिक परिपक्व हो चुके हैं और राजनीतिक उद्देश्य से भड़काने वाली बातों से प्रभावित नहीं होते.
अयोध्या पर फैसले के बाद ‘शांति’ शायद कुछ लोगों को रास नहीं आ रही. फैसले के आलोक में क्या ऐसा मंदिर निर्माण नहीं हो सकता जिसमें नमाज भी अता की जा सके. क्यों दोस्तों क्या ख्याल है? मेरे ख्याल से तो धर्मस्थल ऐसे होने चाहिए जहां हर व्यक्ति अपनी पद्धति से ईश वंदना के लिए स्वतंत्र हो. सुशील जी, कुछ ऐसे वक़्त की पहचान हो...
मंदिरों में जब-जब अजान होगी,
ए कता हमारे दरमियान होगी।
गूंजे मस्जिदों में आरती-स्वर,
यही सभ्यता की पहचान होगी।
-कुमार पीयूष
शारीर का अंग गल जाए तो उसे काट कर हटा देना ही अच्छा होता है. वैसे भी दुनिया में आप सब को खुश नहीं कर सकते. एक को मनाओगे तो दूसरा रूठ जायेगा. इसलिए मेरा मानना है, गलतियों को सही मान कर चुप रहो या बोलो तो सही बोलो. भले वो कितना भी सुनने में कड़वा लगे. हमें किसी भी जाती को खुश करने के लिए कुछ भी नहीं करना चाहिए.