कौन देगा इन सवालों के जवाब
राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी इस उठापटक में आम भारतीय ख़ुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा है और खेलों की आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और खेल मंत्री एमएस गिल तक सब आलोचनाओं के निशाने पर हैं.
मगर क्या ग़लती सिर्फ़ इन्हीं की है. आज सवालों का अंबार लगा है और जवाब देने के लिए सामने आने को कोई तैयार नहीं है.
प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने 15 अगस्त को लाल किले से कहा कि इन खेलों का सफल आयोजन दिखाएगा कि भारत कितने विश्वास से दुनिया में आगे बढ़ रहा है. उस दावे का अब क्या हुआ.
प्रधानमंत्री ने अब मंत्रियों को बुलाकर एक अहम बैठक की और काम में तेज़ी लाने को कहा.
इतने दिनों तक वह कहाँ थे. जिन खेलों को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया उसकी तैयारी सही चल रही है या नहीं ये समय रहते देखना क्या प्रधानमंत्री का काम नहीं था.
खेल गाँव को 16 सितंबर को जनता के सामने रखने की कोशिश हुई और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के लोग अपने रहने की जगह देखने पहुँचे. इसके बाद खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फ़ेनेल को चिट्ठी लिखकर बताना पड़ा कि खेल गाँव में परेशानियाँ हैं.
आयोजन समिति के अधिकारी, खेल गाँव के ज़िम्मेदार अधिकारी तब तक आँखें मूँदे क्यों बैठे थे.
भारत ने जब 1982 में एशियाई खेल आयोजित किए थे तो इससे कहीं कम संसाधनों में उन खेलों का आयोजन हुआ था. इतने संसाधन झोंकने के बावजूद हासिल क्या हुआ- इतनी बदनामी और जग हँसाई.
क्या भारतीय अधिकारी अभी तक यही नहीं मान रहे थे कि अगर कुछ कमियाँ भी रह गईं तो होगा क्या. दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव के बीच किस देश की इतनी हिम्मत होगी कि वो खेलों में हिस्सा लेने से मना कर दे.
ललित भनोट ने क्या सोचकर ये बयान दिया कि भारतीय और पश्चिमी देशों के साफ़-सफ़ाई के स्तर में अंतर है.
इतने आरोप लगने से पहले तक इन्हीं अधिकारियों का बर्ताव क्या किसी तानाशाह से कम हुआ करता था. जब जिससे चाहा बात किया जब जिसको चाहा सार्वजनिक रूप से डाँट-डपटकर अपना रुतबा दिखाया.
कलमाड़ी ने इस साल की शुरुआत में बीबीसी से बातचीत में कहा था कि हर चीज़ की आख़िरी ज़िम्मेदारी मेरी है क्योंकि मैं आयोजन समिति का प्रमुख हूँ. अब हुई इतनी शर्मिंदगी की ज़िम्मेदारी लेने के लिए क्या वो तैयार हैं.
मणिशंकर अय्यर आज ये कहकर सबका दुलारा बनने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ज़रूरत ही थी ये खेल आयोजित करने की. खेलों का आयोजन उनके सत्ता में आने तक भारत को मिल चुका था.
उन्होंने देश के सामने शपथ ली थी कि वह अपने मंत्री पद के दायित्वों का शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे मगर क्या उन्होंने खेल मंत्री पद की ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभाई.
सवालों की ये सूची बढ़ती चली जाएगी मगर देश के ज़िम्मेदार मंत्रियों और अधिकारियों की शराफ़त का आलम देखिए कि अब तक किसी एक ने भी बढ़कर ये नहीं कहा कि- हाँ, हमसे ग़लती हुई है... सबकी उंगलियाँ अब तक दूसरे की ही ओर उठी दिख रही हैं.

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मुझे तो लगता है बाहरी खिलाड़ी तो भारत आएंगे नहीं, मनमोहन, सोनिया गाँधी,राहुल गाँधी, कलमाड़ी और गिल ही मैराथन में दौड़ेगे. हमें शर्म है कि हमने ऐसे प्रतिनिधियों को चुना ग़लती हमारी भी है. भारत के लिए ये राष्ट्रीय शर्म की बात है?
आज हर भारतीय शर्मिन्दगी महसूस कर रहा है किन्तु इन महानुभावों को शर्म नहीं आती. इनका बस चले तो ये देश को बेचने में भी न हिचकें.
भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला है. जो कोई जितना लूट सकता है, लूट रहा है. लोग मन्दिर-मस्जिद के लिए लड़ते हैं, पहले देश से भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता को दूर करें, यही देश और दीन-धर्म का सबसे बड़ा काम होगा.
मुकेश जी अपने देश के लोगों में जिम्मेदारी का भाव है ही नहीं. न तो हम किसी काम करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हैं और न ही काम बिगड़ने पर. पूरा-का-पूरा सरकारी तंत्र ध्वस्त हो चुका है, नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए हैं. नेता और अफसर मिल गए हैं और दोनों हाथों देश को लूटकर खोखला कर रहे हैं,राष्ट्रमंडल खेल तो सिर्फ बानगी-भर हैं.
मैं भारत से बाहर हूं. जब लोग यहां फैले भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हैं, तो मुझे बड़ा ही दुख होता है. देश के लोगों से मेरी अपील है कि वे जागरूक बनें और देश हित के लिए काम करें.
खेल के आयोजन से जुड़े अधिकारी जमकर पैसा कमा रहे हैं. उनके लिए तो मानो कोई लाटरी ही खुल गई है. यह बड़ा ही शर्मनाक है.
सबसे पहले मैं बीबीसी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं. आपने खेल गांव की असली तस्वीर पेश की है. आयोजकों के कृत्य को देखकर शर्म आती है. इन सबके लिए हमारी सरकार जिम्मेदार है.
अपने देश में भ्रष्टाचार की हालत को देखकर बड़ा ही रोना आता है.
यह बड़ी विडंबना है कि इतने सारे संसाधनों के होते हुए भी आयोजन में इतनी कमियां रह गईं. जग हंसाई हो रही है, सो अलग. भारत की जनता को जागना ही होगा.
सही बात तो यही है कि राष्ट्रमंडल खेलों में फैले अव्यवस्था के लिए भारत के प्रधानमंत्री ही जिम्मेदार हैं. मेरा स्पष्ट मानना है कि इन खेलों के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कटघरे में खड़ा करना चाहिए.
इस घटना ने बता दिया कि भारत में भ्रष्टाचार किस सीमा तक है. अब कभी किसी सेमिनार वगैरह में विदेश जाना पड़ा तो कितने तंज़ इस घटना को लेकर मिलेंगे यह सोच कर भी डर लगता है.
मैं आपके सवालों से इत्तेफाक रखता हूँ,पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये सवाल पूछा किससे जाय?लोकतांत्रिक देश और देशवासियों को या उन भ्रष्ट अधिकारियों से और आयोजन समिति को? भारत का विकास राष्टमंडल खेलों की वजह से नहीं है, इसके कई पहलू हो सकते हैं. अन्य देशों के खेल समिति के अध्यक्ष ने जो कहा वो राष्ट्रमंडल खेलों की भावना को आहत करता है.गलत जगह और लोगों से सवाल करने से सही जवाब या सही परिणाम नहीं आ सकेगा.
कॉमनवेल्थ के लिए बनाए गए स्टेडियम की हालत को दिखाती बीबीसी की खास तस्वीरों को देखकर लगता है कि ये बाथरुम और बिस्तर कुत्तों और बिल्लियों के रहने के लिए ही बनाए गए हैं. भारत इकलौता ऐसा देश होगा जो जानवरों को इतनी आलीशान सुविधाएं देता होगा. बढ़िया लेख के लिए मुकेश जी आपको धन्यवाद देता हूं.
मुकेश जी वाह, लेख लिखकर आप और बीबीसी दोनों दूध के धुले नहीं हो जाते. बीबीसी ने तस्वीर दिखाकर कोई बहादुरी का काम नहीं किया है बल्कि सवाल ये है कि बीबीसी इतने दिनों तक क्या सो रही थी. मेरे ख़्याल से मीडिया भी उतनी ही ज़िम्मेदार है जितने नेता और अधिकारी और ख़ासकर बीबीसी क्योंकि बीबीसी से करोड़ों लोगों का नाता है. मैं नहीं मानता कि बीबीसी ने तस्वीर दिखा कर अपने मीडिया-धर्म को निभाया है बल्कि इतने दिनों तक बीबीसी क्यों सच्चाई के पास नहीं जा सकी. यही सवाल श्रोताओं के दिल में है.
देखा जाए तो कोई ईमानदार नहीं है. भांग सभी जगह घुली हुई है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि भारत ने इन खेलों को लेकर 72 देशों को रिश्वत दी और भारत सरकार और मीडिया को ख़बर तक नहीं हो सकी हो, ऐसा नहीं हो सकता. रही बात भारत के ज़रिए खेल आयोजन की कमियों की तो क्या पहले ऐसी कमियां कहीं नहीं रही थीं. हां यह मानता हूं कि व्यापक भ्रष्टाचार हुआ है और नेताओं और खेल आयोजकों ने पैसा बनाया है. पर सभी ये कह रहे हैं कि रहने की सुविधाओं में कमियाँ हैं. कोई ये नहीं बता रहा है कि खेल के मैदान और उनको लेकर किए जाने वाले अभ्यास में कमियां हैं. शर्म तब आती है जब पहले हो चुके खेलों में रहने वाली कमियों को लेकर इतना बवाल नहीं मचा है तो भारत में इन खेलों को लेकर इतना बवाल क्यों. सही में भारत में कुकुरमुत्तों की तरह खुल रहे टीवी चैनलों के कारण आज भारत बदनाम हो रहा है.
मेरे विचार से इसमें भ्रष्टाचार का पता लगाने के लिए एक कमेटी बनानी चाहिए और दोषियों को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. अगर यह चीन में हुआ होता तो अबतक कई लोगों को मौत की सज़ा मिल जाती.
जहां भारत विकासशील देश है वहां इस तरह के विकास पर सवाल ज़रूर उठेगा. और ये कि प्रबंधन के ठेकेदार देश को खाए जा रहे हैं. उम्मीद कर रहा हूं कि खेल हो जाएंगे पर ये कलंक हमेशा के लिए रहेगा.
मुकेश जी, आज से चार साल पहले जिस खेल की मेज़बानी पाकर हम फूले नहीं समा रहे थे उस दिन किस भारतवासी को मालूम था कि इतने बड़े आयोजन जिसमें ग़रीबों तक की राशी लगाने के बावजूद हमें शर्मिंदगी ही उठानी पड़ेगी, हम दिल्ली से कोसों दूर हैं हमें इस खेल से लाभ के रूप में कुछ मिले न मिले एक देशप्रेमी होने के नाते हमारे देश को भ्रष्टाचार के जो तमग़े मिले हैं वह किसी खेल में हारने के दुख से कई गुना ज़्यादा है.
सौ फ़ीसदी सही लिखा है.
सौ फ़ीसदी सही लिखा है....
कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर देश के चेहरे पर सरासर कालिख पोती गई है और कुछ नहीं है....
खेल तो अब देर-सबेर हो जाएँगे. जहाँ तक देश की इज्जत का सवाल है एक सच्चा भारतीय सच का सामना करने से नहीं डरता. जिस भ्रष्टाचार की चर्चा दबी जुबान से करते रहे हैं उसे खेल से जुड़े अधिकारियों ने चरितार्थ कर दिया है. अच्छा है कि इससे कच्चा चिट्ठा सामने खुल कर आ जाएगा.
खेलों के पहले हमें माहौल को ठीक रखना चाहिए. भ्रष्टाचार का बार-बार जिक्र कर हम अपने देश का नुकसान कर रहे हैं. लापरवाह अफसरों को अनकी करतूतों के लिए सजा मिलनी चाहिए. लेकिन सफल खेलों के लिए हम सबका योगदान बेहद जरूरी है.
इस सब सवालों का जवाब माननीय प्रधानमंत्री जी को देना चाहिए. उनकी सरकार ने अपने चेलों-चमचों को लूट-खसोट के लिए इन खेलों का काम सौंपा और उन्हें खुली छूट दी.
मुकेश जी, आप एक पत्रकार हैं और अपना धर्म निभाते हैं. पर आपने क्या सुझाव दिया है इन कमियों को दूर करने के लिए. जो करता है कि मालूम है कि तकलीफ़ कहां है. बीबीसी के ठंडे दफ़्तर में बैठ कर लिखना आसान है. यह वक्त है भारत की छवि को बचाने का.
मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि इतना बड़ा आयोजन और इतनी छोटी तैयारी. हर जगह भ्रष्टाचार है, कम से कम इसमें तो नहीं होता. आज हम दुनिया में अपना चेहरा दिखाने में शर्म महसूस करते हैं.
हम जैसे देश से बाहर काम करने वाले लोगों को भ्रष्टाचार की इन कहानी से बेहद शर्मिंदगी महसूस होती है. भ्रष्ट नेताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए.
ख़तरनाक वो घड़ी होती है आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो आपकी नज़र में रुकी होती है/ सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है/ सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है. कुछ ऐसे ही हाल है हमारे नेताओं के.
हमारे नेता बड़े मज़ाहिया हैं. एक ओर तो वे अपनी तुलना पश्चिमी देशों से करते हैं और दूसरी ओर ये कहते हैं कि हम तीसरी दुनिया के हैं. एक भारतीय होने के नाते मुझे ऐसा लगता है कि हम लोग किसी बड़े आयोजन के लिए तैयार नहीं हैं और हम क्वालिटी, स्वास्थ, क़ानून और व्यवस्था जैसे बुनियादी मूलभूत ढांचे को भी पूरा नहीं कर सकते. ज़रा सोचिए कि जिस देश में कुंए के लिए पैसा पश्चिम के सेवानिवृत्त लोगो के ज़रिए इकठ्ठा किया जाए और वहीं लोग करोड़ों रुपए राष्ट्रमंडल पर ख़र्च करें. किती शर्म की बात है.
खेलों के बाद सभी दोषी लोगों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाना चाहिए. ये जगहंसाई काफ़ी वर्षों तक हमें शर्मिंदा करेगी.
भ्रष्टाचार के हमाम में सब नंगें हैं? नेता तो ढीठ थे पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने भी अपना कर्तव्य सही से नहीं निभाया. सांप के जाने के बाद लाठी पीटने का काम किया! जब भारत इन खेलों की मेज़बानी के बारे में सोच रहा था तभी से यह सोचा जाना चाहिए था कि हमारी मानसिकता, हमारा मूलभूत ढांचा त्यार है कि नहीं? अब जो काम मीडिया कर रहा है वह आसमान की ओर थूकने समान है. दुनिया में हमारे देश की चमकती हुई छवि पर यह कभी न मिटने वाला दाग़ साबित होगा!
राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में मीडिया इसलिए इतनी बातें कर रहा है कि उसे बंदरबांट में हिस्सा नहीं मिला, अगर हिस्सा मिल गया होता तो राष्ट्रमंडल खेलों की तस्वीर ही कुछ और होती. अभी भी इंटरनेट पर वो तस्वीरें मौजूद हैं जिसमें राष्ट्रमंडल खेलों की बेहतरीन तस्वीर पेश की जा रही है. लेकिन उसे दिखाए कौन? मीडिया को जब तक हिस्सा नहीं मिलेगा तब तक वो सही तस्वीर कैसे पेश करेगा. सिक्के के दो पहलू हैं लेकिन मीडिया एक ही पहलू दिखा रहा है. बीसीसीआई क्रिकेट को दिखाने के एवज मैं कितना पैसा देता है इस बात का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर टीवी चैनल पर क्रिकेट के लिए कुछ घंटे की न्यूज़ का स्लाट बना दिया गया है. टीवी सीरियल मैं क्या चल रहा है ये भी ऐसे दिखाया जाता है जैसे कोई बड़ा समाचार हो. आपको लगता है की टीवी सीरियल की कहानी बताना कोई समाचार है? न्यूज़ चैनल पर चुटकुले सुनना कोई समाचार है? सास बहु कि कहानी मैं अभी तक क्या हुआ ये कोई समाचार है? लेकिन दिखा रहे हैं क्योंकि टीवी सीरियल वाले पैसा दे रहे हैं. कलमाड़ी बेवक़ूफ़ और गुनाहगार इसलिए हैं क्योंकि उन्हें कोई मैनेजमेंट आता हो या न आता हो मीडिया मैनेजमेंट नहीं ही आता है.
सवाल तो यह है कि कौन माँगेगा जवाब. खेलों के बाद कुछ तालियाँ बजेंगी, जो लूट की इस गंगा में डुबकी नहीं लगा पाए वो गाली देंगे. मीडिया अपनी टीआरपी के लिए कोई नया मुद्दा उछालेगा. सरकार और प्रशासन हाँफ कर सो जाएँगे और दिल्लीवासी उधड़ी हुई दिल्ली का दर्द झेलते रहेंगे. क्या कोई ये माँग करेगा कि देश की पगड़ी और जनता की गाढ़े पसीने की कमाई उड़ाने वालों को बरसों अदालतों के चक्कर के बाद निर्दोष घोषित करने के बजाय उनसे पाई-पाई वसूली जाए और जुर्माना लिया जाए. मुकेश जी याद रहेगा ये सवाल उठाना?
मुकेश जी, सवाल चाहे जितने उछाल लें, जवाब नदारद है. खैर, अभी तो हमारा सारा ध्यान राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन पर ही केंद्रित होना चाहिए. लेकिन उसके बाद, भारत की जनता इन सारे सवालों के जवाब जरूर जानना चाहेगी कि आखिरकार हज़ारों करोड़ों रुपए फूंकने के बाद भी ऐसी भद क्यों पिटी? एक कवि ने क्या खूब कहा है: सीधे रस्ते पर चलने का हुनर, तो सारी दुनिया जानती है, हम तो सीधे रस्ते भी जाए तो, पहले कांटे बिखेर, बाद में चुनते हुए जाते हैं.
कॉमनवेल्थ गेम्स की अपनी एक पहचान, मंत्री खा गए सुबकुछ, खिलाड़ी हैं परेशान.टोटी में पानी नहीं, ना बिस्तर न गद्दे, दीवारें गिरती जाएँ और टूटी खिड़की, यह मनोहरी दृश्य तो सबको भाए, खिलाड़ियों के बिस्तर पर कुत्ते सोते पाए. पैसा खाने की इनमें इतनी मची है चूल, उद्घाघाटन के दिन ही भैया गिर गए दो पुल, अब छोड़ो भी बना लेने दो, इनको अपनी हेल्थ, सभी हैं हिस्सेदार, ये तो सबका है कॉमन बेल्थ.
एक दम ठीक कहा आपने.
ये हैं हमारे देश की इज्जत रखने वाले नेता जिन्होंने देश की जनता से देश की इज्जत बचाने की अपील की थी.