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कितना समझदार हो गया भारत 21 साल में !

रामदत्त त्रिपाठीरामदत्त त्रिपाठी|शुक्रवार, 01 अक्तूबर 2010, 02:23 IST

अब से 21 साल पहले जब अयोध्या में राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद का मुक़दमा हाईकोर्ट ने फ़ैजाबाद की ज़िला अदालत ने अपने पास मंगवा लिया था, उस समय तीन जजों - जस्टिस केसी अग्रवाल, जस्टिस यूसी श्रीवास्तव और जस्टिस सैयद हैदर अबास राजा ने सर्वसम्मति से यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था.

उस आदेश के अंत में उन्होंने यह टिप्पणी की थी: 'इसमें संदेह है कि मुक़दमे में शामिल कुछ सवालों को न्यायिक प्रक्रिया से हल किया जा सकता है.' हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने यह टिप्पणी सात नवंबर 1989 को विवादित ज़मीन पर राम मंदिर के शिलान्यास से ठीक पहले की थी.

फिर 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सर्वसम्मति से केंद्र को इस मुद्दे पर राय देने से इनकार कर दिया था कि क्या वहाँ पहले स्थित कोई हिंदू मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायी गई थी ?

सरयू तट से शुरू हुआ विवाद गंगा, गोमती और यमुना की दहलीज़ पर जाकर भी अनिर्णीत रहा. मगर अभी कुछ रोज़ पहले इस आशंका से हाईकोर्ट का फ़ैसला टलवाने की कोशिश हुई. लेकिन अदालत ने इस कोशिश को ठुकरा दिया.

उसी लखनऊ हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के जजों ने 21 साल बाद चारों मुकदमों के हर बिंदु पर पूरे विशवास के साथ बेहिचक अपना-अपना फै़सला दिया. फ़ैसले के अनेक बिंदुओं पर सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट को इस फ़ैसले को उलटने का भी अधिकार है.

क़ानून के तहत भारतीय जनता की चुनी हुई संसद भी हस्तक्षेप कर सकती है.
लेकिन हाईकोर्ट ने फै़सला देकर समूची न्यायपालिका को इस आरोप से बरी कर दिया कि वह इस जटिल मुक़दमे पर फ़ैसला देने में ढुलमुल रवैया अपना रही है.

हाईकोर्ट अपना स्पष्ट फ़ैसला इसलिए दे सका क्योंकि इस समय 1989, 1990, 1992, 1993 जैसे तनावपूर्ण दंगे फ़साद और धार्मिक भावनाएं भडकाने वालों को जनता ने हाशिए पर डाल दिया है.

आज पूरे देश में लगभग आम सहमति है कि अगर विवाद आपसी सहमति से नहीं सुलझ सकता तो अदालत ही फै़सला करे.

भारतीय नागरिक समाज का यह विश्वास ही अदालत की शक्ति है. कितना समझदार हो गया है भारत 21 साल में! अनुभव से हर कोई सबक लेता है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 08:21 IST, 01 अक्तूबर 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    देर आये दुरुस्त आये ! यह फैसला एक स्वस्थ मानसिकता का द्योतक है ! कम से कम न्यायपालिका पर फिर से आम आदमी भरोसा करने लगा है ! अब द्वेष ,बैर, साम्प्रादायिक और अवसरवाद की आंच पर राजनीती की रोटियां सेंकने वालों को भी मुहं तोड़ जवाब मिल चुका है ! क्योंकि काठ की हंडिया बार -बार नहीं चड़ा करती है! अदालती फैसला तो हो चुका है और यह पहले से ही तय था की यह फैसला सबको मान्य होगा तो अब सर्वोच्च न्ययालय जाने की बात क्यों हो रही है? वैसे तो सर्वोच्च न्ययालय जाने का हर पक्ष का हक़ है कोई रोक नहीं सकता? लेकिन कितना अच्छा हो अगर सब पक्ष मिलबैठकर फैसला लें कि इस ज़मीन पर एक अव्वल दर्जे का शिक्षण संस्थान बनाया जाए जो कि विश्व स्तरीय सुविधाओं से परिपूर्ण हो? वैसे भी अयोध्या को आज तक वहां मंदिर या मस्जिद होने से क्या मिला है? अगर ऐसा कदम उठा जाए तो आने वाली पीड़ियाँ तहेदिल से हर पक्ष की शुक्रगुजार होंगी ! और हो भी क्यों न? अगर उच्च शिक्षा संस्थान के बलबूते अयोध्या विश्व के नक़्शे पर पूर्ण स्थान हासिल करे तो सही मायनों में अयोध्या में ए विकास की बयार बहेगी!

  • 2. 09:07 IST, 01 अक्तूबर 2010 singh keshav muri:

    देश अब आगे बढ़ चुका है यह देश की जनता ने साबित कर दिया है.

  • 3. 09:24 IST, 01 अक्तूबर 2010 pratap shankar:

    इस फ़ैसले के आने के बाद भारतीय जनता ने जिस तरह संयम का परिचय दिया, वह तारीफ के काबिल है.

  • 4. 11:18 IST, 01 अक्तूबर 2010 sanjay kumar:

    कोर्ट का फ़ैसला सभी पक्षों के लिए ठीक है. लेकिन कुछ मुसलमान भाइयों को इससे निराशा हुई है. लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि देश के कई हिस्से में मंदिर और मस्जिद साथ-साथ हैं, तो अयोध्या में भी ऐसा हो तो कोई बुरा नहीं.

  • 5. 11:51 IST, 01 अक्तूबर 2010 anand:

    आपकी प्रतिक्रिया स्वागत योग्य है.

  • 6. 12:24 IST, 01 अक्तूबर 2010 Farid Ahmad khan , Saudi Arabia:

    त्रिपाठी जी, आपका ब्लॉग पढ़ा और यह मुझे अच्छा लगा. उम्मीद करता हूं कि देश की जनता कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करेगी. अब, इस मसले पर विवाद का अंत होना ही चाहिए.

  • 7. 12:46 IST, 01 अक्तूबर 2010 vikas kushwaha:

    मेरा मानना है कि बीबीसी की पत्रकारिता अब निष्पक्ष नहीं रह गई है.

  • 8. 13:05 IST, 01 अक्तूबर 2010 Uday Kumar:

    सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सर्वमान्य है, लेकिन फिर भी मुझे महसूस होता है कि इससे अच्छा फ़ैसला भी दिया जा सकता था. इस विवादित स्थल, जिसे जान बूझकर कुछ राजनीतिज्ञ और धार्मिक समूह मान- सम्मान और मर्यादा का प्रश्न बना दिए हैं, पर अगर दोनों समुदाय अपने - अपने धर्मस्थल बनाते हैं तो मुझे डर है कि कुछ असामाजिक तत्व इसे एक अवसर की तरह देखेंगे और भविष्य में कभी भी ये तनाव का माहौल पैदा कर सकते हैं.

  • 9. 13:16 IST, 01 अक्तूबर 2010 Devesh Kumar Pandey:

    अब जनता को मंदिर-मस्जिद के नाम पर बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. हमें चाहिए ऊंची तालीम, रोजगार और विकास न कि मंदिर-मस्जिद.

  • 10. 13:19 IST, 01 अक्तूबर 2010 rajeev gupta:

    हालांकि कोई भी इसे सबसे अच्छा फ़ैसला नहीं मान सकता, लेकिन फिर भी इस पर उंगली भी नहीं उठाई जा सकती है. यहां पर समझदारी भरे फ़ैसले के बजाय एक चालाकी भरे फ़ैसले की कहीं अधिक ज़रूरत थी.

  • 11. 13:25 IST, 01 अक्तूबर 2010 Badre Alam Khan:

    देश के वर्तमान हालात को देखते हुए कोर्ट का फ़ैसला प्रशंसनीय है. यह फ़ैसला नहीं बल्कि समाधान है. मुसलमानों को चाहिए कि बड़प्पन का परिचय देते हुए इसे हिंदुओं को सौंप दें क्योंकि यह उनके लिए पवित्रततम स्थानों में से एक है.

  • 12. 13:34 IST, 01 अक्तूबर 2010 ankiet:

    हमने अपने आप को समझाने में अच्छी तरक्की की है, लेकिन कई समस्याएं और विवाद जस के तस हैं. हम ऐसी समस्याओं को ज़्यादा समय तक टाल भी नहीं सकते.

  • 13. 13:34 IST, 01 अक्तूबर 2010 chandra kant :

    प्रेस वाले बहुत जल्दी निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं...अभी बहुत ही जल्दी आपने बता दिया कि लोग समझदार हो गए हैं. इतना आसान नहीं है डगर पनघट की...इतिहास के पन्ने गवाह हैं.

  • 14. 14:01 IST, 01 अक्तूबर 2010 rajesh mandhotra:

    यह बदलते भारत की ओर एक इशारा है. सांप्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब लद चुके हैं.

  • 15. 14:25 IST, 01 अक्तूबर 2010 Chander Singh Bora, Dehradun, Uttarakhand.:

    सभी पक्षों को एकता और भाईचारे का परिचय देना चाहिए अन्यथा असामाजिक तत्व इसका फायदा उठाएंगे.

  • 16. 14:47 IST, 01 अक्तूबर 2010 Bhaskar Karn:

    इसे फ़ैसले से साबित हो जाता है कि भारतवासी परिपक्व हो चुके हैं. विभिन्नता में एकता पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी. भारतीय होने पर हमें गर्व है.

  • 17. 15:43 IST, 01 अक्तूबर 2010 SOURABHA SUMAN:

    इस फ़ैसले से अगर किसी की जीत हुई है तो वह है भारत की जनता. इससे नए भारत को नया संदेश मिला. आइए इस भारत की तस्वीर में एकता का रंग भरें.

  • 18. 16:29 IST, 01 अक्तूबर 2010 sanjiv vajyapyee:

    फ़ैसले पर संतुष्टि है.

  • 19. 17:14 IST, 01 अक्तूबर 2010 E.A.Khan :

    जमीन का एक तिहाई हिस्सा मुसलमानों को दिया गया है. क्या हिंदू भाई बेहिचक वहां खूबसूरत मस्जिद के निर्माण की मंजूरी देंगे? भारत के धर्म निरपेक्षता का असल परीक्षण वही होगा.

  • 20. 18:47 IST, 01 अक्तूबर 2010 Shailendra Khandelwal:

    समझदार है या नहीं यह तो एक दिन में नहीं पता चलेगा. यह तो आने वाला समय बताएगा.

  • 21. 19:47 IST, 01 अक्तूबर 2010 vikram:

    बीबीसी अब निष्पक्ष मीडिया नहीं रह गया है. पाकिस्तान में इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया से हमारा कोई लेना देना नहीं है. यह फ़ैसला सिर्फ़ भारत से संबंधित है.

  • 22. 21:14 IST, 01 अक्तूबर 2010 ALTAF HUSAIN, SIKANDERPUR, AKBARPUR, AMBEDKAR NAGAR, UP:

    मुसलमानों को यह फ़ैसला मान ही लेना चाहिए. इस विवाद को और आगे बढ़ाने का कोई फायदा नहीं. हिंदू भाइयों को भी चाहिए कि अब काशी और मथुरा की बात न उठाएं.

  • 23. 21:27 IST, 01 अक्तूबर 2010 Saptarshi:

    अगर भारत समझदार हो गया होता तो चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों की ज़रूरत नहीं होती.

  • 24. 22:50 IST, 01 अक्तूबर 2010 subhash bose:

    भारत की जनता ने जिस तरह से संयम का परिचय दिया है, उससे तो यही साबित होता है कि हम 21 सालों में समझदार हो गए हैं.

  • 25. 07:34 IST, 02 अक्तूबर 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    अयोध्या विवादित ज़मीन पर उच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद जहाँ आम जनता ने समझदारी का परिचय दिया वहीं अब कुछ मीडिया चैनल कानूनी विशेषज्ञों की अदालतें सजाकर वैमनस्य का ज़हर घोलने का काम कर रहे हैं. सब पक्षों ने न्यायालय के फ़ैसले को मानने का निर्णय लिया था! अब ये मीडिया चैनल बुझी हुई आग में चिंगारियां क्यों फूंक रहे हैं ?

  • 26. 10:58 IST, 02 अक्तूबर 2010 Ashish Srivastava :

    वाकई भारत के लोग तब और अब में काफी बदल गए हैं, फ़ैसला आने के दूसरे दिन कुछ सियासी नेता भडकाऊ बयान बाजी से बाज नहीं आ रहे हैं, टी वी चैनलों ने भी गजब का संयम का परिचय दिया है, लोगो ने वो खून खराबा देखा है और फ़ैसला आने के बाद शांति से सभी की जिंदगी बिना समय गंवाए पटरी पर है, अब लोग शांति का स्वाद चख चुके हैं. किसी के बहकावे में कोई भी आने वाला नहीं है, वाकई अब विकास की बातें हो सकती हैं, निश्चित ही काफ़ी बदल गया है भारत.

  • 27. 10:59 IST, 02 अक्तूबर 2010 Mohd Saleem :

    यह धर्मनिरपेक्ष भारत की जीत है और रूढ़िवादी ताकतों की हार. भारत की न्यायपालिका को सलाम.

  • 28. 18:42 IST, 02 अक्तूबर 2010 qutubuddin:

    हिंदू और मुसलमान अपने-अपने धर्म को ठीक से समझे होते और सच्चे हिंदू या सच्चे मुसलमान होते तो ये मुद्दा कभी उठता ही नहीं, न खून खराबा होता, न अदालत होती न फ़ैसले की ज़रूरत पड़ती.

  • 29. 20:03 IST, 02 अक्तूबर 2010 Dinesh:

    आपके विचार और आपका लेख मुझे अच्छा लगा.

  • 30. 20:52 IST, 02 अक्तूबर 2010 himmat singh bhati:

    राजनीतिक लोगों और समाज के ठेकेदारों को अब ये मौका नहीं मिलना चाहिए कि लोगों को मरवा कर उनकी जलती लाशों पर रोटियों सेंकें. न्यायालय ने अपने फ़ैसले के ज़रिए एक मिसाल कायम की है अब दोनों समाज को मिलकर खासकर भारतीय मुसलमानों को इस बात की मिसाल कायम करनी चाहिए कि अपनी-अपनी ज़मीनें एक दूसरे के हित में छोड़ दें.
    दुनिया के कई देश हिंदू-मुसलमानों की इस एकता से जलेंगे लेकिन हमारे लिए सच ये है कि दोनों ही कौम के लोगों को यहीं जीना है और यहीं मरना है. यह एकता स्थापित हो जाए हमारी यही इच्छा है.

  • 31. 22:28 IST, 02 अक्तूबर 2010 विनीता:

    स्वतंत्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था में अगर न्यायपालिका स्वतंत्र न होती तो आज हिंदुस्तान में शांति का माहौल होता, इसमें संदेह है. 'अयोध्या और रामलला विराजमान' जैसे अति संवेदनशील प्रकरण में न्यायपालिका ने जैसा फ़ैसला दिया उससे देश के दोनों वर्गों के समझदार और संवेदनशील लोगों को ज़रूर संतोष हुआ होगा. हमारे माननीय जजों ने ऐतिहासिक, पुरातात्विक और पौराणिक तथ्यों का सर्वांगीण अध्ययन कर देश के हिंदुओं और मुसलमानों की भावनाओं का मान रखा है. जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस डीवी वर्मा के साथ ही ख़ासतौर पर जस्टिस एसयू खान की टिप्पणी पढ़कर मैं उनकी न्यायिक परिपक्वता और दूरदर्शिता की कायल हो गई. उन्होंने इतिहास की ओर इंगित करते हुए वर्तमान में हिंदुस्तान में मुस्लिमों के सम्मानजनक स्थान की ओर भी इशारा किया है. साथ ही, विश्व फलक पर सामाजिक, आर्थिक,शैक्षिक स्तर पर अपनी हैसियत को बढ़ाने के रास्ते अपनाने का भी सुझाव दिया है.कोरी जेहादी सोच से आम लोगों को कुछ भी हासिल नहीं होता, इसलिए समय आ गया है कि हिंदुस्तान में हिंदू-मुसलमान भाई-भाई की तरह रहें और अदालती आदेश का मान रखें. मैं देश के मुसलमान भाइयों को भी तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहती हूं कि उन्होंने अदालती फ़ैसले को खुले दिलोदिमाग से स्वीकार किया है और क्षणिक आवेश,जुनून और जज़्बे के हाथों खुद को नहीं सौंपा. ईश्वर करे, देश में क़ानून-व्यवस्था के साथ ही धार्मिक भाईचारा बना रहे. आने वाले महीनों, सालों,दशकों और शताब्दियों तक!

  • 32. 00:36 IST, 03 अक्तूबर 2010 Javed-Sana'a (Yemen):

    फ़ैसला क़ानूनी तथ्यों पर आधारित नहीं है ये सभी जानते हैं. ख़ैर, ये सब तो सुप्रीम कोर्ट में जाने ही वाला है. मगर राजनीतिक दलों को सबक सीख लेना चाहिए कि जनता आख़िर जाहती क्या है.आम आदमी फ़ैसले पर नहीं बल्कि देश की शांति पर ख़ुश है, और यही सबसे बड़ी जीत है. राष्ट्रमंडल खेलों से पहले ही भारतीय जनता ने गोल्ड मेडल जीत लिया है.

  • 33. 06:17 IST, 03 अक्तूबर 2010 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    हमेशा की तरह एक बार फिर मुसलमानों के साथ नाइंसाफी ही हुई, पिछले 60 सालों से वहाँ मूर्ती पूजा हो रही है, लेकिन नमाज़ पढ़ने की इजाज़त नहीं थी, जबकि ये माना कि मूर्ती 1949 में रखी गयी थी. जिस अदालत ने ये फ़ैसला सुनाया है, उसी के पास लखनऊ में कमिश्नर ऑफ़िस के गेट पर ही सड़क को घेर कर मंदिर बनी हुई है. क्या हाईकोर्ट उस सरकारी ज़मीन को खाली करा सकती है? देश की कोई भी अदालत छह साल पुराना मंदिर भी नहीं हटा पाती और 600 साल पुरानी मस्जिद की जगह दूसरों को दे दी. आख़िर कथित रूप से हजारों साल पहले जन्मे व्यक्ति की जन्मभूमि की इतनी सटीक निशानदेही कैसे हो गयी. अब तो न्यायपालिका पर से भी भरोसा उठ गया, जिसने सबूतों के बजाय आस्था को देखा और वो भी सिर्फ एक पक्ष की.

  • 34. 09:20 IST, 03 अक्तूबर 2010 aniruddh dwivedi:

    सचमुच भारत समझदार हो गया है. एक परिपक्व लोकतंत्र. एक समझदार नागरिक समाज. इतना विवादास्पद मामला और न्यायपालिका का बेहतरीन निर्णय. न्याय सिर्फ प्रक्रियागत नहीं होता है. न्याय ऐसा होना चाहिए जिसमें सामाजिक समरसता भी बनी रहे. नागरिक समाज ने जिस समझदारी का परिचय दिया उसके लिए वो बधाई का हक़दार है.

  • 35. 12:48 IST, 03 अक्तूबर 2010 braj kishore singh:

    रामदत्त जी, बाकि मामले में जनता की परिपक्वता की क्या स्थिति है, नहीं बता सकता क्योंकि नेताओं द्वारा उनको ठगा जाना बदस्तूर जारी है. लेकिन अयोध्या मामले में उसने पूरी समझदारी का परिचय दिया है. नेता भी समझ चुके हैं कि इस मुद्दे पर नकारात्मक रवैया अपनाने से उन्हें घाटा भी हो सकता है. समय बदलने के साथ मुद्दे भी बदल चुके हैं और विकास को मुद्दा मानने से इंकार करनेवाले लोग भी अब विकास का राग अलापने को बाध्य हैं.

  • 36. 13:11 IST, 03 अक्तूबर 2010 ZIA JAFRI:

    21 सालों में भारत में बहुत बड़ा राजनीतिक और वैचारिक मंथन हुआ है. सभी दलों के शीर्ष नेताओं ने अपनी भाषा और अपने विचारों में संयम बरता है.ये वो लोग थे जो समाज में उन्माद पैदा करते थे. क़ानून को कठपुतली माननेवाले आज क़ानून के सम्मान की बात करते हैं. और ये भी सिद्ध हो गया कि अगर सरकारें नहीं चाहें तो कोई दंगा फ़साद नहीं हो सकता.

  • 37. 15:19 IST, 03 अक्तूबर 2010 ashiq dubai:

    हमें इनसे और कुछ ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए. अब भी भारत में बहुत सी मस्जिदें हैं जहाँ नमाज़ नहीं होती है तो अब मुसलमानों को पहले अल्लाह के घर आबाद करने चाहिए. अल्लाह अपने घर की हिफ़ाज़त ख़ुद करेगा. अगर हम लोग अल्लाह के घर को वीरान रखेंगे तो ऐसा ही होता रहेगा.

  • 38. 20:09 IST, 03 अक्तूबर 2010 JS RANDHAWA:

    ये हिंदू-मुस्लिम भाईचारा दिखाने का बिल्कुल सही समय है. मंदिर और मस्जिद दोनों बनने चाहिए और ये दोनों समुदायों के लोगों की कार सेवा से बनने चाहिए.

  • 39. 13:46 IST, 04 अक्तूबर 2010 feroz agha:

    ये सही है कि हिंदुस्तान की अवाम समझदार हो गई है लेकिन अदालत के इस फ़ैसले को हिंदुस्तान के मौजूदा हालात के मद्देनज़र अच्छा कहा जा सकता है, लेकिन क़ानून के एतबार से मुसलमानों के साथ नाइंसाफ़ी हुई है. आस्था के नाम पर अदालतें अगर फ़ैसला करने लगीं तो आने वाले वक़्त में सांप्रदायिक ताक़तों के हौसले और बढ़ जाएंगे.

  • 40. 14:57 IST, 04 अक्तूबर 2010 diwaker kumar:

    सही मायने में भारतीय समाज ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया है. यह फ़ैसला न केवल एक विवादस्पद मुद्दे को ख़त्म करेगा बल्कि भारत में मन्दिर मस्जिद के नाम पर राजनीति करने वालों की भी दुकान बंद करेगा.

  • 41. 17:16 IST, 04 अक्तूबर 2010 Neeta Kumari, Madhubani, Bihar:

    रामदत्त त्रिपाठी जी, सबसे पहले आपको स्पेशल धन्यवाद करना चाहुंगी कि आपने हमारे लिए अयोध्या मामले पर बहुत सारी रिपोर्टिंग की है. हम तो निर्णय की एक-एक पंक्ति को आपकी लाइव कमेंट्री के माध्यम से प्राप्त कर रहे थे लेकिन जो निर्णय होगा वह मान्य होगा ये मानते हुए.
    कल का जो फ़ैसला था वह हिंदू पक्ष की तरफ़ ज़रा झुका हुआ लगता है परनतु कुल मिला कर इस ऐतिहासिक फ़ैसले जिसके लिए सैकड़ों भारतवासियों ने आपस में ख़ून की नदी बहाई उसी भारतवासी ने अपनी सूझ बूझ का परिचय देते हुए आपस में मैत्री का भाव रखते हुए दुनिया को ये बता दिया है कि विश्वास के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्यायपालिका पर इस क़दर विश्वास करते हैं.
    1989, 1990, 1992, 1993 के धार्मिक दंगों ने तो फ़ैसले को टालने तक पर मजबूर कर दिया था लेकिन न्यायपालिका ने अपना निष्पक्ष फ़ैसला देकर लोकतंत्र में अपनी जगह को संतुलित बनाया है. फ़ैसला जो भी आ गया है हमारा भारत एक धर्मनिर्पेक्ष राज्य कहलाता है. हम तो उम्मीद करते हैं कि अयोध्या में मंदिर और मस्जिद दोनों बने और शांति के साथ लोग ज़िंदगी गुज़ारें. अंत में हमारा भारत महान और आल इज़ वेल है.

  • 42. 17:16 IST, 04 अक्तूबर 2010 raashid:

    फ़ैसला सही है और सबको इसका सम्मान करना चाहिए.

  • 43. 17:59 IST, 04 अक्तूबर 2010 E.A. Khan:

    मौजूदा हालात में जो फ़ैसला हाईकोर्ट से आया है उससे ज़्यादा की अपेक्षा नहीं कर सकते. सारे जटिल क़ानून सिर्फ़ ग़रीब किसानों, मज़दूरों और आम नागरिकों के लिए हैं जो अपनी ज़मीन का टुकड़ा पाने या अपना घर हासिल करने के लिए सारी ज़िंदगी लगा देते हैं जिसे किसी ने अवैध तरीक़े से हड़प रखा है. हम लोगों को हाईकोर्ट की तारीफ़ करना चाहिए कि कम से कम उसने फ़ैसला सुनाने की हिम्मत तो की.

  • 44. 08:21 IST, 05 अक्तूबर 2010 maneesh K Sinha:

    "बिन भय होहु न प्रीत". सरकार क ज़रिए की गई पुख़ता सुरक्षा व्यवस्था ही इस परिपक्वता का कारण है, ये एक पर्व मात्र है. मुस्लिम वैमनस्य कभी ख़त्म नहीं होने वाली है क्योंकि मुस्लिम समाज को इस बात के लिए कोई ग्लानी नहीं है कि पूर्व में हिंदू और सिख धर्म स्थानों पर जबरिया क़ब्ज़ा किया गया और उन्हें अपवित्र किया गया. ये फ़ैसला क़ानून का है हिंदू और मुस्लिम समाज का नहीं.

  • 45. 21:17 IST, 05 अक्तूबर 2010 tara chandra gupta :

    त्रिपाठी जी को बहुत शुक्रिया. ये तो सच है कि भारत बदल गया है, लेकिन अभी भी कुछ साक्षर लोग हैं जिनकी आंखें खुली नहीं हैं. कोर्ट के फ़ैसले को आव़ाम ने सलाम किया लेकिन समाज विरोधी तत्वों ये पच नहीं रहा है.

  • 46. 21:48 IST, 05 अक्तूबर 2010 atul dube:

    यह हमारे देश में बढ़ती शिक्षा का असर है कि देशवासी परिपक्व हो गए हैं। फैसले के पूर्व लगभग हर एक राष्ट्र हितैशी की सांसे रुकी हुई थी, लेकिन फैसला आया तो हर एक का दिल खुशी से झूम उठा न किसी की जीत न किसी की हार बस राष्ट्र की जीत और राष्ट्र विरोधियों की हार सामने आई। पूरी तरह सधा हुआ और न्याय के सिद्धांतो से आत्मसात फैसला उच्च न्यायालय ने दिया। कानूनी तर्कोँ पर भले ही फैसले में कमी रही हो लेकिन व्यावहारिक स्तर पर फैसला पूरी तरह ख़रा उतरा, देश के हर नागरिक ने इसे स्वीकारा। ये फ़ैसला राष्ट्र विरोधी ताकतों और मौका परस्त नेताओं के मुंह पर तमाचे की तरह रहा, फैसले के पूर्व देश की सांसे थम सी गई थीं लेकिन फैसले के बाद देश की रगों में दुगनी गति से रक्त दौड़ने लगा। जनता द्वारा दी गई समझदारी भरी प्रक्रिया को विश्व भर ने सराहा साथ ही सराहा गया न्यायालय का फैसला। देश की धर्म निरपेक्ष सूरत में निखार तो आया ही न्यायपालिका में भी लोगों का विश्वास बढ़ा है। परिपक्व फैसले पर परिपक्व प्रतिक्रिया से यह सिद्ध हो गया है कि भारत अब विश्व का नेतृत्व करने के लिए तैयार हो गया है।

  • 47. 23:21 IST, 05 अक्तूबर 2010 Harishankar Shahi:

    भारत समझदार हो गया है से कहने से बेहतर ये होगा की भारत अब इस मुद्दे का अभ्यस्त हो चुका है, जैसे भ्रष्टाचार के लिए हो गया है. कभी 60 करोड़ के घोटाले ने देश में हल्ला मचा दिया था वहीँ आज 60 करोड़ के घोटाले आम नौकरशाह कर लेते हैं. यह कहना की अब राम मंदिर आंदोलनों का दौर का जूनून नहीं उभरा तो यह भारत की जनता के अनुभवी होने के कम उन आंदोलनों के अगुआ रहे दलों के आपसी स्वार्थो में टकराव के चलते नहीं हुआ. भारत की जनता तो किसी भी मुद्दे को भूलने में माहिर है यहाँ तो गुंडे और मवाली भी नेता हो जाते हैं. भारत के लोग विषय के बारें में कम विषयवस्तु के बारे में ज्यादा बात करते हैं.

  • 48. 04:51 IST, 06 अक्तूबर 2010 ANIL MISHRA:

    कोर्ट का फैसला सही है. जीओ और जीनो दो, यही भारत का संदेश है और हमें इसी पर अमल करना है.

  • 49. 10:04 IST, 06 अक्तूबर 2010 virendra pathak:

    जब भी किसी एक वस्तु पर दो पक्षों के स्वार्थ टकराते हैं और तीसरा निर्णय करता है तो दोनों में किसी न किसी एक को अपने साथ न्याय न होने का मलाल रहता है। लोग लिखते है कि यह फैसला भावनाओं के अधीन किया गया है! माननीय तीनों न्यायमूर्ति कानून के विशेषज्ञ हैं। आम आदमी से ज्यादा कानून जानते हैं। वह यह भी जानते हैं यह फैसला नजीर बनेगा आगे के लिए और इसे सुप्रीम कोर्ट में भी परखा जा सकता है। ऐसे में वह सिर्फ भावनाओ के आधार पर ही फैसला देगें यह सुसंगत नही लगता।
    उपर वाले ने दो आंखे जरूर दी है लेकिन दोनों से एक ही वस्तु को देखने का तोहफा दिया है। ऐसा नही है कि एक आंख से बाएं की और दूसरी से दांएं की वस्तु देखी जाय। जो ऐसा करता है वह कुदरत के खिलाफ चलता है। विसंगतियां हो सकती हैं अपवाद हो सकता है लेकिन अन्याय नही। कुछ लोग पहले कहते थे कोर्ट के फैसले को मानेगें। फैसला सुनाया तो कहने लगे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट जाना उनका अधिकार है जाना भी चाहिए लेकिन देश और समाज को बरगला कर नही। इस देश ने हिसां और आक्रामकता कभी नही स्वीकारी। ऐसा लगता है कि आगे भी नही अपनायेगा। स्तुत्य है अयोध्या के हिन्दू और मुस्लिम जो इस विवाद को समझौते से खत्म करने के प्रयास में लगे है जिससे भारत में दो कौमें मिलकर रह सकं तरक्की कर सकें। इसमें नाजिम अंसारी साहब की तारीफ होनी चाहिए कि उन्होने पक्षकार होने के बावजूद अमन का रास्ता पसन्द किया। एक उदाहरण है सामन्जस्य का।
    फूट डालने की राजनीति अंग्रेजों से आयी भारत में। 1857 के गदर में इलाहाबाद ने एक इतिहास रचा। महगांव के एक छोटे से कस्बे में फौज से हटाये गये बाद में मौलवी बने लियाकत हुसैन ने बगावत का झण्डा बुलन्द किया और हिन्दू-मुस्लिम को मिलाकर एक बड़ी बगावती सेना तैयार की। 15 दिन तक पूरे इलाहाबाद को आजाद रखा। यह कारनामा मौलवी लियाकत अली इसलिए करने में सफल हुए कि दोनों कौमें एक साथ रहीं। हमारे अन्दर यह समझदारी जितनी जल्दी आ जाय वह हमारे और हमारे देश के लिए उतना ही अच्छा है।

  • 50. 17:42 IST, 07 अक्तूबर 2010 Free Classifieds India:

    कोर्ट का यह फैसला काफ़ी सराहनीय है.

  • 51. 16:23 IST, 12 अक्तूबर 2010 Sabir:

    बहुत हो चुका अब और नहीं. राजनीति में भी तो कोई मर्यादा होगी? कितने राजनेता हैं जिनके अपने दंगे या आतंकवाद का निशाना बने हैं? हे राजनेताओ! ज़रा भी शर्म हो तो सुधर जाओ. नहीं तो जनता को सुधारना भी आता है. उसके संयम की परीक्षा न लो.

  • 52. 08:50 IST, 13 अक्तूबर 2010 ajit kumar:

    आपने एक विचारोत्तेजक मुद्दा उठाया है. हालांकि इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए काफ़ी मुश्किल हो रही है क्योंकि आपने इस संवेदनशील मुद्दे को पूरे आत्मविश्वास के साथ उठाया है. बधाई हो. लखनऊ उच्च न्यायालय ने मामले को बिल्कुल हिंदुस्तानी तहज़ीब के हिसाब से सुलझाया है. हिन्दू और मुस्लिम समुदाय ने राजनीतिज्ञों की चिंता को ख़ारिज कर दिया है. मैं देश के नागरिकों को सलाम करता हूं और मुझे भारतीय होने पर गर्व है. देश के नेताओं को इससे सबक लेना चाहिए कि हमारी भावनाओं से वे न खेलें. .

  • 53. 20:25 IST, 14 अक्तूबर 2010 Yogesh Dubey:

    काफ़ी अच्छा ब्लॉग है.

  • 54. 14:02 IST, 04 अक्तूबर 2012 condo st laurent:

    मैं सिर्फ़ ये कहना चाहता हूं कि आपकी वेबसाइट बहुत अच्छी है. स्टाइल और डिज़ाइन में ये बहुत शानदार है.

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