ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है?
न्यूज़ीलैंड के स्टार टीवी एंकर पॉल हैनरी ने जो कुछ किया उससे आप चकित हैं? मैं नहीं हूँ.
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ जिस तरह के शब्दों का प्रयोग उन्होंने किया वह असभ्य, अभद्र और असंवेदनशील है.
इसे सुनने-देखने के बाद मैं भी अपमानित महसूस कर रहा हूँ. नाराज़ भी हूँ. लेकिन चकित मैं बिल्कुल भी नहीं हूँ.
चकित इसलिए नहीं हूँ क्योंकि यह एक व्यक्ति की ग़लती भर नहीं है. यह एक मानसिकता का सवाल है. जिसके दबाव में पॉल हैनरी शीला दीक्षित की खिल्ली उड़ाते हैं. इस मानसिकता से हज़ारों भारतीय हर दिन पश्चिमी देशों और अमरीका में रुबरू होते हैं.
यह मानसिकता पूंजीवादी और सामंतवादी मानसिकता है.
इस मानसिकता से ग्रसित व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को अपनी बराबरी पर नहीं देखना चाहता जो कभी उससे कमतर रहा हो. सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक, किसी भी स्तर पर. अगर कोई उसकी बराबरी पर या उससे ऊँचा खड़ा दिखे तो महसूस होने लगता है मानों जूती सर पर चढ़ गई हो.
जो भारतीय उनके ज़हन में अनपढ़, गँवार और ग़ुलाम के रुप में बसे हुए हैं वे आगे निकलते दिख रहे हैं. चाहे वह पेशेवरों के रुप में व्यक्ति हों या फिर अर्थव्यवस्था के रुप में देश.
यह बात आसानी से गले उतर भी नहीं सकती.
ठीक उसी तरह से जिस तरह से भारत में ही दलितों और पिछड़ों का सामाजिक उत्थान अभी भी बहुत से लोगों को अखरता है.
बाबू जगजीवन राम के राजनीतिक रास्ते में कितने कांटे बोए गए. मायावती का राजनीति में उदय उनके समकालीनों के गले में गड़ता रहा है.
बात सिर्फ़ दलित और पिछड़ों भर की नहीं है. यह मामला सामाजिक-आर्थिक उत्थान से भी जुड़ा है. पद और ओहदों से भी जुड़ा है. कहीं-कहीं यह भाषा के स्तर पर भी दिखता है.
ग़ालिब ने उस्ताद ज़ौक के गले में ऐसी ही किसी फाँस पर कहा होगा,
हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है
इसे नस्लभेदी कह देने से मामला आसान दिखने लगता है. लेकिन यह उतना आसान नहीं है. यह उससे कोई महीन चीज़ है.
भारत ने न्यूज़ीलैंड के उच्चायुक्त रुपर्ट हॉलबोरो को तो तलब करके नाराज़गी जता दी.
लेकिन सीएनएन आईबीएन नाम के एक टेलीविज़न चैनल पर साइरस बरुचा ने जो कुछ किया और कहा उसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
शीला दीक्षित के नाम को लेकर जिस तरह का मज़ाक उन्होंने उड़ाया वह कम अपमानजनक नहीं था.
मनोरंजन को लेकर हर देश काल में अलग-अलग प्रतिमान होते हैं. ये प्रतिमान सभ्यता और समाज के साथ भी बदलते हैं. लेकिन एक सीमा रेखा तो खींचनी ही होगी.
पॉल हैनरी के लिए भी और साइरस बरुचा के लिए भी.

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अच्छा लिखा है लेकिन कुछ भाषाई जटिलता भी है.
विनोद जी मैंने हेनरी वाली क्लिप देखी है. उनकी हंसी असभ्यतापूर्ण थी. थोड़ा और सर्च किया तो पता लगा की वो वहां बहुत लोकप्रिय हैं. समझ मे ही नहीं आया कि एक असंवेदनशील व्यक्ति को लोग इतना पसंद करते हैं. खुलेपन और मॉडर्न बनने की भी कुछ तो हदें होती हैं.
पता नहीं क्यों भारतीय मीडिया इस मुद्दे पर शोर मचा रहा है. दुनिया भर में आप किस किस का मुंह बंद करते रहेंगे. अगर देखें तो लोगों ने इंदिरा गांधी को भी बुरे भले नाम से पुकारा. मेरा अपना अनुभव ये है कि मध्यपूर्व के देशों में भारतीयों को ग़ुलामों के तौर पर देखा जाता है. ऐसी बातें तो सामान्य है.
इन सब घटनाओं के बावजूद हमारा "गोरा" प्रेम घट नहीं रहा है. अभी भी हम उन्ही को ख़ुश करने में लगे रहते हैं और उनकी हां में हां मिलाने की कोशिश करते रहते हैं.
विनोद जी, देश की असली शक्ल पर आपके ब्लॉग पर जो सूरत बनी है, वह देश और विदेश में लगभग एक जैसी है. शीला जी दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं तो बात ज़रा भारी हो गई पर देश की सुदूर बस्ती की दलित और पिछड़े घरों की शीला रोज़ इसी देश के 'दबंगों' की गलियां खा-खा कर .......काश उनकी भी शिकायत किसी उच्चायोग के अधिकारी से करने की व्यवस्था हो पाती!
आपने तस्वीर के एक ही रुख़ को बयान किया है. यानी वे आज भी हमें उसी तरह हक़ीर समझते हैं और हमारा आगे बढ़ना उनको अच्छा नहीं लगता है. लेकिन तस्वीर का दूसरा रुख़ भी तो देखिए, आज़ादी को कितने दिन गुज़र जाने के बवजूद आज भी हम उनके ज़ेहनी ग़ुलाम हैं और अपने हर अमल से यह साबित कर रहे हैं कि वह हमसे ऊंचे और बेहतर हैं, फिर तो वह जो भी करें कम है. ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने गरेबान में देखें और ख़ुद को ज़ेहनी ग़ुलामी से भी आज़ादी दिलाएं.
पॉल हेनरी न्यूज़ीलैंज के सरकारी टीवी चैनल के काफ़ी लोकप्रिय मनोरंजन करने वाले हैं. हालांकि उनकी टिप्पणी घटिया और ख़राब है लेकिन इसे न्यूज़ीलैंड की आम जनता की टिप्पणी नहीं कहा जा सकता है. ये टिप्पणियां न्यूज़ीलैड के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं. यह उनकी ज़ाती हरकत है. अगर आपने ग़ौर से देखा हो तो आप पाएंगे की उनके साथी प्रोग्राम पेश करने वाले के चेहरे पर शर्मिंदगी का पूरा भाव नज़र आएगा.
हालांकि कुछ लोग पॉल को मनोरजक कह कर छूट दे रहे हैं लेकिन ज़्यादातर लोगों ने उनकी भ्रत्सना की है. न्यूज़ीलैंड एक बहुसंस्कृति समाज है और यहां के मूल निवासी मौरी हैं. बाक़ी सारे लोग बाहर से यहां आकर बसे हैं. ज़्यादातर भारतीय इस समाज का हिस्सा होने में गर्व महसूस करते हैं.
लेकिन हमें उस वक़्त शर्मिंदगी होती है जब दलजीत सिंह (ऑकलैंड काउंसल के उम्मीदवार) जैसे लोगों पर एक ही पते पर 30-50 लोगों का वोट के लिए पंजीकरण करने का आरोप लगता है. हमें उस वक़्त शर्म आती है जब सीडब्लूजी गेम्स में भ्रष्टाचार और ग़ैरपेशेवराना ढंग की ख़बरें आती हैं. उस वक़्त शर्म आती है जब कुछ भारतीय कामगार न्यूज़ीलैंड में रहने कि इजाज़त सिर्फ़ इस बुनियाद पर मांगते हैं कि अगर उन्हें इजाज़त नहीं मिली तो उन्हें जालंधर की झुग्गियों में जाना पड़ेगा जहां बुनियादी सहूलियतें नहीं हैं. जब मैं पहले पहल न्यूज़ीलैंड आया तो मैंने वहां के बहुत से निवासियों के नाम के सही उच्चारण न जानने के कारण उनका दिल दुखाया होगा और आज भी यह ग़लती होती रहती है. और हम अपने न्यूज़ीलैंड के दोस्तों के साथ इसपर ख़ूब हंसते हैं. लेकिन हेनरी ने जानबूझ कर मज़ाक़ किया है और इसलिए उसे जाना चाहिए.
आप सच कह रहे हैं कि ये टिप्पणी नस्ल भेद वाली नहीं हैं बल्कि भारत के लोगों की न्यूज़ीलैंड बढ़ते प्रभाव या कुल मिलाकर तरक़्क़ी का नतीजा है. आजकल ये आम बात है कि किसी समुदाय से संबंधित किसी घटना को नस्लभेद का रंग दे दिया जाता है. लेकिन न्यूज़ीलैंड के एक नागरिक के तौर पर मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि पॉल हेनरी जैसे लोग मुठ्ठी भर हैं.
विनोद जी, आपका ब्लॉग इस विषय पर देखा तो तुरंत ही खोल बैठा, इसी अभिलाषा के साथ कि फिर से कोई नया या भिन्न पहलु सीखने को मिलेगा, लेकिन अफ़सोस, वही घिसी पीटी बात. मुझे क्षमा करें. ज़रा नज़रिया बदल के देखिए. मैं हेनरी की वकालत नहीं कर रहा हूँ, बल्कि उसके कथन की घोर निंदा करता हूँ. लेकिन उसका दिल्ली की बुज़ुर्ग मुख्यमंत्री के नाम पर यह निहायत बचकाना तरीक़े से मज़ाक़ बनाना उसकी गुरुता ग्रंथि का परिचायक होने से पहेले एक और बात की तरफ़ इशारा करता है. पश्चिम और ख़ासकर के ऑस्ट्रलियन और कुछ हद तक न्यूज़ीलैंड के पॉप कल्चर मैं यह मानसकिता देखी जाती है जो कि पश्चिमी की बोलने की आज़ादी का एक फूहड़ स्वरुप है. इस बोलने की स्वतंत्रता के मायने यह हैं कि, "किसी को चाहे बुरा लगे या भला, मैं तो अपनी फूहड़ बकवास सारी दुनिया के समक्ष कर के ही रहूँगा ".
आज का शासक अपने राज्य में 'आदर और अनादर' का मायने भूल गया हो, तब उसे विदेशी चैनलों से अपमान की 'बू' आती है. आपने ठीक ही लिखा है 'पूरी दुनिया में भारतियों को रोज़ अपमान और हसीं का पात्र बनना पड़ता है?
इसकी वजह क्या है, सदियों से जब इस देश का नज़रिया हम नहीं बदल पाए, निरंतर लूट खसोट में लगे है, आपके ब्लॉग की ये लाईनें "बात सिर्फ़ दलित और पिछड़ों भर की नहीं है. यह मामला सामाजिक-आर्थिक उत्थान से भी जुड़ा है. पद और ओहदों से भी जुड़ा है. कहीं-कहीं यह भाषा के स्तर पर भी दिखता है." कितना सच कहती है यदि यही बात आप भारत के किसी अख़बार में लिखते तो अख़बार का मालिक आपसे जवाब तलब कर लेता, पहले तो संपादक जाने ही न देता.
रंग भेद मिटाना है तो घर से शुरू करना होगा.
ख़ुमार बाराबंकवी के शब्दों में-
इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से...ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं.
शायद गोरे देशों के कुछ लोग चीन-भारत-ब्राज़ील जैसे देशों की उन्नति को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. भविष्य में दुनिया का नेतृत्व भी इन्ही देशों के हाथों में आनेवाला है. चाहे गोरे लोगों को यह अच्छा लगे या बुरा लेकिन यह अवश्यम्भावी है. जहाँ तक भारत में दलित-पिछड़े नेतृत्व को सवर्णों द्वारा स्वीकार-अस्वीकार करने का सवाल है तो मेरे सांसद लम्बे समय तक रामविलास पासवान रहे हैं और मैं राजपूत हूँ फिर भी मुझे उन पर गर्व है.
विनोद वर्मा जी, इस बार आप उतना अच्छा नहीं लिख सके जितना आप औसतन लिखते हैं. मुद्दा बेहद अहम चुना आपने मगर... बात में तर्क भी सही है. पर इसी चीज़ को और ख़ूबसूरती से पेश किया जाना चाहिए था, जिसमें आप थोड़े चूक से गए. पर कोशिश की तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी.
विनोद जी यहाँ चकित होने का तो सवाल ही नहीं उठता है. अपने ही देश में विभिन्न टी. वी.चैनलों पर आये दिन कॉमेडी के नाम पर फूहड़ किस्म की टीका - टिप्पणी, असभ्य व्यंग्य, द्विअर्थी संवादों का दौर सा चल रहा है. ऐसे में दूसरे देशों के लोग क्यों पीछे रहें ?
हमारे देश में हर बात को नस्लवाद से जोड़ कर देखा जाता है. मेरा मानना है कि इनकी टिप्पणियां हमारे यहां लालू यादव जैसे लोगों की टिप्पणी की तुलना में कुछ हद तक ठीक ही होते हैं. याद करें कि राज ठाकरे जैसे लोग जब क्षेत्रीय नफरत फैलाने वाले बयान देते हैं, तो हम उनका कितना विरोध करते हैं, गोवा में किसी विदेशी युवती के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के प्रति कितने संवेदनशील होते हैं.
शीला दीक्षित को लेकर नस्लवादी टिप्पणी वाकई बहुत बुरी थी और वो भी जब देश में कॉमनवेल्थगेम्स हो रहे हों. हमारी सरकार को इस पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए. मैं इस टिप्पणी का विरोध करता हूं.
मुझे समझ में नहीं आता कि भारतीय मीडिया इस मामले में तिल का ताड़ बनाने पर क्यों तुली है. अक्सर हमारे देश के नेता अपने विरोधियों पर काफ़ी गैर जिम्मेदार और दुखद टिप्पणी करते रहते हैं, उस समय तो हम उतना हाय तौबा नहीं मचाते.
आम जनता को इसमे उत्तेजित होने जैसी बात नहीं है. जो भी करना था वो विदेश मंत्रालय कर रहा है. जातिगत बयान -नस्ल भेद को समझने की ज़रूरत है. ये हर देश में है, क्यूंकि ये सस्ते प्रचार का सबसे आसन तरीका है, हमारे देश में भी होता है, ज़रूरी नहीं कि दो देशो के राजकीय रिश्ते की तरह ही दोनों देशो की जनता के बीच भी ऐसे ही रिश्ते हों.
अपमान उनका किया जाता है जो अपमान सहन कर सकते हैं या जो जवाब नहीं दे सकते या फिर अपमान करने वाले का कुछ बिगाड़ा नहीं जा सकता. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. न्यूज़ीलैंड के उचौक को लाइन हाज़िर करके भारत ने बता दिया मज़ाक़ और अपमान में क्या अंतर है. पॉल हेनरी जैसे लोगों के लिए जवाब है अपनी ज़बान और हरकतों पर लगाम रखें. अब नया भारत इन लोगों के जवाब के लिए तैयार है.