इन खेलों का स्वर्णिम सुख
पिछले दिनों जब राष्ट्रमंडल खेल एक के बाद एक विवाद में फंसते जा रहे थे तो मेरे एक दोस्त ने बहुत ही वाजिब सवाल रखा कि क्या इन खेलों पर क़रीब दस हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च करना रुपए की बर्बादी और फ़िज़ूलख़र्ची नहीं है?
हो सकता है कि स्टेडियम और खेल गांव बिल्कुल आख़िरी मौक़े पर आयोजन समिति के हवाले किए गए हों या खेलों से मात्र एक सप्ताह पहले मुख्य स्टेडियम के पास दर्शकों के चलने का फ़ुट ओवरब्रिज धराशायी हो गया हो या दिल्ली में आई बाढ़ के पानी से जूझ रहे खेल गांव में सांप निकल आया हो लेकिन जिस तरह के खेल अब तक हुए हैं और जिस तरह का प्रदर्शन भारतीय खिलाड़ियों का रहा है, उसने इन सभी अवरोधों और खिजाने वाली चीज़ों को भुलवा दिया है.
खरबों रुपए की अर्थव्यवस्था में दस हज़ार करोड़ रुपयों की बिसात क्या है? और फिर क्या 'फ़ील गुड फ़ैक्टर' का मोल रुपयों में लगाया जा सकता है?
देश के एथलीटों के प्रदर्शन के बारे में अख़बारों में पढ़ने और उन्हें अपनी आँखों के सामने या टेलीविजन पर 'लाइव परफ़ोर्म' करते देखने में ज़मीन आसमान का फ़र्क है.
अलका तोमर द्वारा एथेंस ओलंपिक की रजत पदक विजेत तोन्या वरबीक को पटखनी देने या विजेंदर के नामिबियाई मुक्केबाज़ को मात्र 98 सैकंडों में स्टेडियम की छत दिखा देने के थ्रिल को सिर्फ़ देख कर ही महसूस किया जा सकता है.
स्टेडियम में दर्शक भले ही नदारद हों( सौजन्य कलमाडी ऐंड कंपनी) लेकिन टेलिविजन पर जितने लोग इन खेलों का आनंद ले रहे हैं, उसने क्रिकेट के एकाधिकार को ( मोहाली में रोमांचक जीत और सचिन तेंदुलकर के 49 वें शतक के बावजूद) फीका किया है.
दूसरी सबसे बड़ी बात भारतीय खिलाड़ी उन खेलों में पदक ला रहे हैं जो ग्लैमरस स्पर्धाएं नहीं कहलातीं हैं.
तीरंदाज़ी, जिमनास्टिक, और पैरा स्विंमिंग में भारत को इससे पहले कभी राष्ट्रमंडल खेलों में पदक नहीं मिला. इन खेलों में कई पदक विजेता बड़े शहरों से न होकर भारत के अनजान गांवों और क़स्वों से आए हैं.
तीरंदाज़ी में सोना जीतने वाली 16 वर्षीय दीपिका कुमारी झारखंड के रतुचेती गांव की रहने वालीं हैं जिनके पिता रांची में ऑटो रिक्शा चलाते हैं. लंबी कूद में रजत पदक लेने वाली प्रजुषा के पिता त्रिचूर में रसोइया थे. और इस समय बेरोज़गार हैं.
जिमनास्टिक में रजत और कांस्य पदक जीतने वाले आशिष कुमार और हॉकी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गोल करने वाले दानिश मुज़्तबा इलाहाबाद के हैं और बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. ये भी सोचने वाली बात है कि हरियाणा जिसका कि कन्या भ्रूण हत्या में बहुत ख़राब रिकॉर्ड है, किस तरह से बार-बार इतनी महिलाओं को विजेता पोडियम पर भेज रहा है.
हरियाणा के पुरुष खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी चाहे वो योगेश्वर दत्त हों या रविंदर सिंह या संजय कुमार, महिला खिलाड़ियों से कम नहीं रहा है.
कुछ हल्कों में तो राष्ट्रमंडल खेलों को हरियाणा के खेल कहा जा रहा है.
और जिस तरह से इन खेलों ने दिल्ली का काया-पलट किया है वो भी क़ाबिले-तारीफ़ है. चौड़ी साफ़ सड़कें, ख़ूबसूरत फ़्लाई ओवर, दूरदराज़ के इलाक़ों तक मैट्रो ट्रेन ने दिल्ली की छवि को भारत वासियों के साथ विदेशियों की निगाह में भी उठा दिया है.
साइकिलिंग स्पर्धा के दौरान जब हेलीकॉप्टरों पर रखे कैमरे ऊपर से दिल्ली के दृश्य दिखा रहे थे तो लग ही नहीं रहा था कि ये वही गंदी अनियोजित दिल्ली है. अपने पूरे वैभव में दिल्ली दुनिया के किसी भी सुंदर नगर से टक्कर ले रही थी.

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मानना पड़ेगा रेहान फज़ल की पारखी नज़रों को. यही बातें राष्ट्रमंडल खेलों के ख़त्म होने के बाद तो सभी लिखेंगे या कहेंगे. इन्होंने खेलों के बीच में ये भांप लिया कि कैसे भारत के लिए पदक दिलाने वाले ये जांबाज़ ग्लैमरस खेलों से नहीं बल्कि कम कहे सुने जाने वाले खेलों से नाता रखते हैं. बहुत ही अच्छा लेख है रेहान फज़ल का और बीबीसी को इन्ही तरह के मुद्दों को बढ़ाना चाहिए.
दस हज़ार करोड़ इसलिए ख़र्च हुए हैं क्योंकि पहले ख़र्च नहीं हुए थे. अगर आज़ादी के बाद खेलों पर ख़र्च देखा जाए तो यह कुछ नहीं है. कहीं न कहीं से तो शुरू करना था. अब भारत सरकार को इन सुविधाओं को देश के अन्य भागों में फैलाना चाहिए. इस से एक नए भारत का निर्माण होगा जिस की नई सोच होगी. हरियाणा आज इस लिए आगे है क्योंकि उनके शहरों में सारी खेल सुविधाएँ हैं.
रेहान साहब, आप का ब्लॉग काफ़ी अच्छा है. आप ने जिन बातों का ज़िक्र किया है वे सच्ची हैं. आज से पहले दिल्ली कभी भी इतनी ख़ूबसूरत नहीं लगी जितनी की कॉमनवेल्थ गेम्स की बदौलत लग रही है. रही बात अपने हिंदुस्तानी खिलाड़ियों के परफ़ॉर्मेंस की तो यहाँ पर चाँद और सितारों की कमी नहीं है बस उनको निखारने वाली सुविधाएँ चाहिए. जो कि हमारी सरकार ने दीं. क्या हो गया जो करोड़ों रुपये ख़र्च हो गए. आम हिंदुस्तानियों का सिर भी तो फ़ख़्र से ऊँचा हो गया. मैं अपने सभी खिलाड़ियों को उनकी कामयाबी पर मुबारकबाद देता हूँ और साथ में सरकार का भी शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने इतना अच्छा इंतज़ाम किया.
राष्ट्र-मंडल खेलो के नोंवे दिन मैंने पहेली बार किसी आंतरराष्ट्रिय न्यूज़ (आपके ब्लॉग) में निष्पक्ष रूप से पढ़ा कि इन खेलो ने भारत को और भारतीय खेलो को क्या दिया है, बेहतरीन जगह, सुविधा और दर्शको में जागरूरकता और साथ ही में खेल और खिलाड़ियों को मिला उनका भव्य समर्थन. कई विवाद और कई अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ संपादको की तरह से एकतरफा और निराश व हताश करनेवाली और अर्ध-सत्य से भरी हुई रिपोर्ट्स के बावजूद ये खेल अच्छी तरह से हो रहे है, पर पूरे तभी होंगे जब भ्रष्टाचारियों को सजा मिले और ये खेल खिलाड़ी और दर्शको का संगम आगे भी चले.
जी हाँ, हमारे खिलाड़ियों ने पदक और अच्छे प्रदर्शन से यह भ्रष्टाचार का दाग धो दिया है. अब हमें इन सब बातों से सीख लेते हुए आगे बढ़ना चाहिए और आगे होने वाले खेलों की तैयारी करनी चाहिए. अभी से खेल प्रतिभाओं की खोज की जानी चाहिए. उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निखारना चाहिए. पैसे और वक़्त का सदुपयोग यही होगा.
मैं आपसे सौ प्रतिशत सहमत हूँ.
रेहान जी, मान गए भाई. आप जैसे पत्रकारों की पैनी दृष्टि ही बीबीसी को जनमानस का समाचार वाहक बनाती है. बहुत ही अच्छा, संतुलित और निष्पक्ष लिखा है. ईश्वर आपको दीर्घायु करे.
राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े विवादों को भूल जाएं तो ये सुनहरा समय है जब हम अपने खिलाड़ियों और खेलों को अच्छी सुविधा और प्रशिक्षण देकर और बेहतर बनाया जाए. यदी यह काम ईमानदारी से किया जाता है तो अगले दशक में भारत खेलों के मामले में नंबर एक पर होगा. इस मौक़े को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए.
यह बहुत खुशी की बात है कि गांवों में रहने वाले खिलाड़ियों ने जिनके पास कोई सुविधा नहीं है, उन्होंने पदक जीता है. लेकिन मुख्य समस्या यह है कि खेलों के बाद हम उन्हें फिर भूल जाएंगे और वे फिर अपनी दिनचर्या में व्यवस्त हो जाएंगे.
भारत सरकार को चाहिए कि इन खिलाड़ियों को अच्छी सुविधा देकर इन्हें ओलंपिक के लिए तैयार करे. इस काम में निजी क्षेत्र की भी मदद ली जा सकती है.
वाह रेहान साहब, ऐसा महसूस होता है कि आप और साथ में बीबीसी दोनों ने ही इन गुलामी वाले खेलों को प्रचार और प्रसार करने का ठेका लिया हुआ है. काश इन खेलों के बारे में बीबीसी या आप पूरी कहानी बताते तो बेहतर होता. क्या अभी भी हमने महारानी को खुश करने लिए इतना पैसा ख़राब नहीं किया है. दुख होता है आप जैसे पत्रकार इस तरह सच्चाई को छुपा कर कुछ और लिखते हैं.
दिल्ली भी यहीं है, खेल भी यहीं हो रहे हैं और भारत का और दुनिया के मीडिया के साथ बीबीसी हिन्दी भी यहीं है. यही वह मीडिया है, जब जैसे जैसे खेल का समय आता गया भारत की छवि को तार तार दुनिया के सामने करता गया जिसमें हमारे कुछ बड़बोले नेता भी शामिल रहे हैं. उसे लगता यहा था कि भारत इस बदनामी से कभी उबरेगा. पर खेलों के मैदानों से यही साबित होता है कि मीडिया को कुछ तो सबर रखना चाहिए था. भारत के गांवों से जुड़े खिलाड़ियों ने भारत की लाज रखी है और पहली बार इतने मेडल पाए है.
कोई इन रेहान जी से पूछे कि कलमाड़ी ने इन्हें कितना दिया ये लिखने के लिए कि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था में दस हज़ार की कोई क़ीमत नहीं है. और हां आपकी जानकारी के लिए ये बता दूं कि कलमाड़ी, मनमोहन, श्रीमती दीक्षित, सोनिया एंड कंपनी इन खेलों में पचास हज़ार करोड़ रुपये डकार गई है न कि सिर्फ़ दस हज़ार करोड़.
महज़ इसलिए हमें इस भ्रष्टाचार को नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय खिलाड़ियों ने बड़ी मात्रा में स्वर्ण पदक जीते हैं. देश के सबसे भ्रष्टाचार की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए.
रेहान जी, आपकी टिप्पणी ठीक है, लेकिन मैं कहता हूं कि एथलेटिक्स और दूसरे ताक़त वाले खेलों में हमें उन्हीं जगहों से ही खिलाड़ी मिलेंगे जहां के लोगों में ताक़त ज़्यादा है. मैं ये नहीं कहता कि और लोग इसके क़ाबिल नहीं हैं, लेकिन अच्छे खिलाड़ी के लिए गांव में जाना पड़ेगा. इस देश का बेड़ा गर्क इस राजनीति और नौकरशाही ने कर दिया और कुछ पत्रकारों का भी इसमें हाथ है. वैसे मीडिया और न्यायपालिका और पूरी व्यवस्था में इन पंद्रह प्रतिशत लोगों का ही बोलबाला है. भ्रष्टाचार तो बहुत ज़्यादा हुआ है लेकिन रेहान जी हमने इसे स्वीकार कर लिया है. वो लोग ही हल्ला कर रहे हैं जिन्हें इसमें हिस्सा नहीं मिला है.
अब ज़रूरत इस बात की है कि बाकी की राज्य सरकार हरियाणा से कुछ सीख लें
बहुत अच्छा ब्लॉग. आपकी बातों से शत प्रतिशत सहमत हूं.
मतलब ये है कि अगर खेल सफल हो जाएं तो इनके नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार को भुला दिया जाए....वैसे ऐसा ही होने वाला है....भुला दिया जाए सर्दी में सड़कों पर सोते अधनंगे जिस्मों को...इस दिल्ली की बस्तियों की बजबजाती नालियों को....डेंगू से बिना इलाज मर रहे लोगों को....ऊंची इमारतों के पीछे की गिरावट को....कमाल है....खेल की बात....तो देख लीजिएगा यही खिलाड़ी या तो ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाएंगे...या वहां फिसड्डी साबित होंगे....अंधों में काना राजा....फ़ज़ल भाई....वैसे भी ग़ुलामों का संगठन है तो पूंजीवाद की बात करेगा न....किसे मतलब है रोज़ भूखी सोती 30 करोड़ की आबादी से....गेंहू गोदामों से सड़ता है...और राजकोष राष्ट्रमंडल और स्मारकों में बर्बाद होता है....
जय हो....
रेहान भाई खेलों का आयोजन सफलतापूर्वक हो गया लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा तभी संभव हो पाया जब प्रधानमंत्री ने स्वयं हस्तक्षेप किया. खेलों के पीछे जो धन का खेल हुआ है अब उसकी लीपापोती भी कर दी जाएगी यह भी प्रायः निश्चित है. खेलों के बहाने दिल्ली का भी विकास हुआ.क्या यह खेल किसी पिछड़े इलाके में नहीं हो सकता था?देश की 37 प्रतिशत जनता भुखमरी की शिकार है तब ऐसे आयोजन को फिजूलखर्ची कैसे न माना जाये? भूखों के लिए देश की शान बढ़ने का क्या औचित्य है? पहले इनका पेट भरने का इंतजाम होना चाहिए था बाद में खेलों का आयोजन.
भारत में यही हो रहा है. देश की अस्सी प्रतिशत जनता गरीबी रेखा के नीचे जी रही है इसको किसकी परवाह है. घर फूँक कर तमाशा देखना भारत की पुरानी आदत है.
मुझे अब तक यह पता नहीं चला कि इन खेलों में 10,000 हज़ार करोड़ खर्च हुए या 70,000 करोड़ रुपए. अब, सरकार को इतना ही पैसा खेलों को बढ़ावा देने के लिए खर्च करना चाहिए.