नहीं चलेगी 'चलता है' संस्कृति
राष्ट्रमंडल खेलों के समापन के बाद एक वर्ग है जो जश्न में डूबा है और कह रहा है कि देखा हम न कहते थे सब ठीक ढंग से हो जाएगा.
मगर इस जश्न का ख़ुमार उतरता उससे पहले ही जाँच के आदेश देकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक अच्छा संकेत दिया है.
इस पूरे आयोजन को दो हिस्सों में देखना होगा. एक खेल शुरू होने से पहले और दूसरा खेलों के दौरान.
खेल शुरू होने से पहले तक ख़ुद दिल्ली के लोग इसे लेकर उत्साहित नहीं थे मगर खेलों में जैसे-जैसे भारत का प्रदर्शन अच्छा हुआ, इन ख़बरों ने पहले पन्ने पर जगह बनाई लोगों की रुचि खेलों में बढ़ती गई.
अंत में जब टिकट नहीं मिल रहे थे तो लोग सिर्फ़ ख़ूबसूरत स्टेडियम देखने नहीं बल्कि भारतीय एथलीट्स का प्रदर्शन देखने जाना चाह रहे थे.
भारतीय खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन ने इन खेलों में लोगों का विश्वास जगाया न कि आयोजकों ने.
मगर इस जश्न में ये नहीं भूला जा सकता कि कुछ लोगों के कारनामों ने महज़ तीन हफ़्ते पहले ही दुनिया भर में देश का नाम बदनाम कर दिया था.
लाखों-करोड़ों भारतीयों ने अपनी मेहनत से दुनिया में भारत को जो पहचान दी थी वो चंद लोगों ने कुछ ही समय में धो दी.
जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में मौजूद लोगों ने उदघाटन समारोह में भी सुरेश कलमाड़ी की हूटिंग की थी और समापन समारोह में भी उनकी हूटिंग हुई.
भले ही वो अकेले इस पूरी स्थिति के लिए ज़िम्मेदार न हों मगर लोगों में उस बात का जो ग़ुस्सा है वो उन्हीं को प्रतीक मानते हुए निकला है.
खेल हो चुके हैं मगर पैसा हज़म नहीं होना चाहिए.
इस स्थिति के सभी ज़िम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए और प्रधानमंत्री के इस क़दम से संभव है कि आम लोगों में इस बात के प्रति विश्वास बढ़े कि इस देश में ' सब चलता है' संस्कृति नहीं चलेगी.

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सही लिखा है, कलमाडी आज अव्यवस्था और हेर फेर के प्रतीक बन गए हैं.
जवाबदेही को लेकर देश में एक क्रांतिकारी माहौल बनाने की ज़रूरत है. देश का आम आदमी भ्रष्ट तंत्र से उब गया है. यह एक अच्छा ब्लॉग है.
खेलों को तभी सफल कहा जा सकता है जब उसपे से भ्रष्टाचार की कालिक साफ हो. एक और बात भी सोचनी होगी की क्या अकेले एक व्यक्ति इतने वक़्त तक सरकार और राष्ट्र-मंडल कमिटी को बेवकूफ बना सकता है? ये भी स्पष्ट होना चाहिए कि खेलों को मिली धनराशि किसी अति आवश्यक योजना से तो नहीं लिए गए?
जब तक भारत 'चलता है' की संस्कृति से स्वयं को मुक्त नहीं करेगा उसका पूर्ण विकास नहीं हो सकता है. प्राचीन भारत अपनी सत्यप्रियता और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध था, परन्तु आज ठीक इसके उल्टा हो रहा. यदि हमारे राजनीतिज्ञ और देश के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों सहित हम स्वयं अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उनका पालन ईमानदारी पूर्वक करे तो इस देश को महाशक्ति बनने से कोई भी नहीं रोक सकता है. कब हम अपने कर्त्तव्य को सर्वोपरि समझेंगे. प्रधानमंत्री जी ने जाँच का आदेश दे कर अच्छा कार्य किया है, परन्तु अभी यह भी ध्यान देने की बात है कि कहीं इसमें विलम्ब या लीपापोती न हो. हमारे देश में प्रतिभा, क्षमता और संसाधन की कोई कमी नहीं है, जरुरत बस जौहरी की है जो इन्हें काट-छांट कर सुन्दर, सुयोग्य और सर्वोत्तम बनाए.
मुकेश भाई हमारे देश में हर कोई गैरजिम्मेदार है.जनता से लेकर प्रधानमंत्री तक चलता है सिंड्रोम से ग्रस्त है.पडोसी के यहाँ डाका पड़ता है तो हम अपने-अपने घरों में दुबके रहते हैं.हम जब तक अपने देश से प्यार नहीं करके अपने-आप से प्यार करेंगे ऐसा होता रहेगा.हमारा देश एक देश नहीं है यह तो एक बहुत बड़ा परिवार है जिसके हम सभी सदस्य हैं.सार्वजनिक धन या संपत्ति को होनेवाली क्षति में कहीं-न-कहीं हमारी भी हिस्सेदारी है,यह हमारी भी क्षति है.जिन लोगों ने खेल के नाम पर सार्वजनिक धन का गबन किया है उन पर शीघ्रातिशीघ्र कार्रवाई होनी चाहिए.साथ ही जिन लोगों पर निर्माण की निगरानी थी उनको भी उनकी लापरवाही के लिए दण्डित करना चाहिए.यह इसलिए भी जरुरी है क्यों इससे तंत्र में जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी.अगर ऐसा नहीं हो पाया तो असर उल्टा होगा और चलता है और भी ज्यादा चलने लगेगा.
मात्र ये कहने से क्या भारत से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा?
मुकेश जी, आपने कल की इंडिया बोल की बहस में कहा कि देश में गरीबी, भूखमरी के होते हुए भी क्या सुरक्षा के के लिए खर्च नहीं किया जाता। देश की सुरक्षा और राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को एक तराजू से तौलना एकदम हास्यास्पद है। क्या दुनिया की मुल्कों की सरकारें अपने बजट में शिक्षा, सुरक्षा आदि की कोई वरीयता नहीं तय करतीं। रही बात खेल के प्रति माहौल बनाने की तो माहौल अरबों रुपयों की फिजुलखर्ची से नहीं बनता बल्कि यह तो स्कुल लेबल पर खेल प्रतिभाओं की पहचान और उनका संरक्षण, सभी जिलों में आधुनिक खेल-सुविधाओं की स्थापना और पारदर्शी प्रबंधन और प्रोत्साहन से बनता है।
दूसरे आप मेरी इस बात से भी असहमत थे कि भारत के खेल महाशक्ति के रुप में उभर रहा है। मैं आपसे यह पूछना चाहूंगा कि क्या किसी भी क्षेत्र में कोई भी देश एक रात में महाशक्ति तो नहीं बन जाता? इस प्रक्रिया में दो-चार द्शकों का समय लगता ही है। खेल-संपादक की हैसियत से आपको यह पता ही होगा कि एक-दो द्शक पहले देश ओलंपिक में एक मेडल को किस तरह तरसा करता था। कर्णम मल्लेश्वरी, राठौर और पिछली बार अभिनव ने देश के खिलाडियों में जो हौसला पैदा किया है, इससे अब यह सिलसिला रूकनेवाला नहीं। अगले 2-3 ओलंपिक के बाद देश पदक तालिका में टॉप-टेन में आ ही जाएगा और सन पचास तक चीन के बाद दूसरी बड़ी खेल महाशक्ति होगा भारत।
मुकेश जी आपने सही कहा है कि इंडिया चलता है सिंड्रोम से ग्रस्त हैं. पारदर्शिता हमारी सिस्टम से नदारद है.
कलमाड़ी को बलि का बकरा बनाना ठीक नहीं है. सब कुछ पीएमओ और दस जनपथ की नाक के नीचे हो रहा था. अजीब है कि खेल मंत्री कहते रहे कि सब ठीक हो जाएगा.
इसके पीछे कलमाड़ी जी का हाथ नहीं है और भी कई लोग इसके पीछे हैं. परदा उठना जरूरी है. फिर भी सफल खेलों का आयोजन करवाने के लिए कलमाड़ी जी बधाई के पात्र हैं.
मुकेश भाई जिस देश में करोड़ों रूपए चुनावों में खर्च होते हैं वहाँ कभी राजनीतिक पार्टियों ने क्या खर्च का हिसाब दिया? हमाम में सब नंगे हैं. कुछ लोग हवालात जाएँगे बाकी मौज करेंगे.
अगर सब चलता है तो देश नहीं चलता है. सबकी जिम्मेदारी निर्धारित होनी ही चाहिए चाहे वह कोई भी हो.
चार दिन में हम सब भूल जाएँगे.
बेईमानी करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी ही चाहिए.