बिहारी होने के नाते
बारह-तेरह साल पहले जानेमाने लेखक और पत्रकार अरविंद एन दास ने लिखा था, 'बिहार विल राइज़ फ़्रॉम इट्स ऐशेज़' यानी बिहार अपनी राख में से उठ खड़ा होगा.
एक बिहारी की नज़र से उसे पढ़ें तो वो एक भविष्यवाणी नहीं एक प्रार्थना थी.
लेकिन उनकी मृत्यु के चार सालों के बाद यानी 2004 में बिहार गया तो यही लगा मानो वहां किसी बदलाव की उम्मीद तक करने की इजाज़त दूर-दूर तक नहीं थी.
मैं 2004 के बिहार की तुलना सम्राट अशोक और शेरशाह सूरी के बिछाए राजमार्गों के लिए मशहूर बिहार से या कभी शिक्षा और संस्कृति की धरोहर के रूप में विख्यात बिहार से नहीं कर रहा था.
पटना से सहरसा की यात्रा के दौरान मैं तो ये नहीं समझ पा रहा था कि सड़क कहां हैं और खेत कहां.
सरकारी अस्पताल में गया तो ज़्यादातर बिस्तर खाली थे, इसलिए नहीं कि लोग स्वस्थ हैं बल्कि इसलिए कि जिसके पास ज़रा भी कुव्वत थी वो निजी डॉक्टरों के पास जा रहे थे.
इक्का-दुक्का ऑपरेशन टॉर्च या लालटेन की रोशनी में होते थे क्योंकि जेनरेटर के लिए जो डीज़ल सप्लाई पटना से चलती थी वो सहरसा पहुंचते-पहुंचते न जाने कितनों की जेब गर्म कर चुकी होती थी.
लगभग 60 प्रतिशत जली हुई एक 70-वर्षीय महिला को धूप में चारपाई पर लिटा रखा था और इंफ़ेक्शन से बचाने के लिए चारपाई पर लगी हुई थी एक फटी हुई मच्छरदानी!
ये वो बिहार था जहां लालू यादव 15 साल से सीधे या परोक्ष रूप से सत्ता पर काबिज़ थे.
लगभग छह सालों बाद यानि 2010 की अप्रैल में फिर से बिहार जाने का मौका मिला. काश मैं कह पाता कि नीतीश के बिहार में सब कुछ बदल चुका था और बिहार भी शाइनिंग इंडिया की चमक से दमक रहा था.
परेशानियां अभी भी थीं, लोगों की शिकायतें भी थीं लेकिन कुछ नया भी था.
अर्थव्यवस्था तरक्की के संकेत दे रही थी. हर दूसरा व्यक्ति कानून व्यवस्था को खरी खोटी सुनाता हुआ या अपहरण उद्दोग की बात करता नहीं सुनाई दिया.
दोपहर को स्कूल की छुट्टी के बाद साइकिल पर सवार होकर घर लौटती छात्राएं मानो भविष्य के लिए उम्मीद पैदा कर रही थीं.
डॉक्टर मरीज़ों को देखने घर से बाहर निकल रहे थे. उन्हें ये डर नहीं था कि निकलते ही कोई उन्हे अगवा न कर ले.
किसान खेती में पैसा लगाने से झिझक नहीं रहा था क्योंकि बेहतर सड़क और बेहतर क़ानून व्यवस्था अच्छे बाज़ारों तक उसकी पहुंच बढ़ा रही थी.
कम शब्दों में कहूं तो लगा मानो बिहार में उम्मीद को इजाज़त मिलती नज़र आ रही थी.
और एक बिहारी होने के नाते ( भले ही मैं बिहार से बाहर हूं) ये मेरे लिए बड़ी चीज़ है.
इस चुनाव में नीतीश कुमार समेत सभी राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए बहुत कुछ दांव पर है बल्कि लालू-राबड़ी दंपत्ति का पूरा राजनीतिक भविष्य इस चुनाव से तय हो सकता है.
लेकिन बिहारियों के लिए दांव पर है उम्मीद. उम्मीद कि शायद अब बिहार का राजनीतिक व्याकरण उनकी जात नहीं विकास के मुद्दे तय करेंगे, उम्मीद कि बिहारी होने का मतलब सिर्फ़ भाड़े का मजदूर बनना नहीं रहेगा, उम्मीद कि भारत ही नहीं दुनिया के किसी कोने में बिहारी कहलाना मान की बात होगी.
और मुख्यमंत्री कोई बने मेरी उम्मीद बस यही है कि जिस उम्मीद की इजाज़त बिहारियों को पिछले पांच सालों में मिली है वो अब उनसे छिन न सके.

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उपाध्यायजी, काफ़ी सटीक टिप्पणी की है आपने. बिहार शायद भारत का प्रतिबिंब है. थोड़ी देर से ही विकास का पहिया घूमना शुरू हो गया है. इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश ने जात पात, बिगड़ी हुई क़ानून व्यवस्था और घूसखोरी को एक हद काबू में किया है. सिर्फ़ पाँच वर्षों में दास बाबू की भविष्यवाणी सच होना तो चमत्कार जैसा है. लगता है कि बिहार विकास की राह पर अपने नन्हे कदम रख चुका है. नीतीश कुमार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने पाँच साल तक मिली जुली सरकार को चलाया. लेकिन सारा श्रेय नीतीश कुमार को देना भी ठीक नहीं होगा, साथ ही लालू के सिर सारी धीमे विकास का ठीकरा भी फोड़ना उचित नहीं होगा.
बिहार के साथ संकट ये है कि उसने अराजक होने को ही अपना स्वभाव मान लिया है और यह अराजकता अब उसके जीवन का हिस्सा बन गई है. आश्चर्यजनक ये है कि यह अराजकता बिहारियों के लिए गौरव का विषय बना हुआ है. गांव में बसा हुआ बिहारी अपनी दुर्गति को नियति मान बैठा है. आज़ादी के समय के बिहार को याद करें. और आज़ादी के समय ही क्यों, उसके बाद भी लोहिया-जेपी के आंदोलनों के बिहार को देखें. लेकिन आज बिहार ने बदलाव की उम्मीद छोड़ दी है. बिहारी मेधा एक बार अगर बिहार में बदलाव की बयार के लिये सोच भर ले, यकीन मानें, तस्वीर बदल जाएगी.
ब्रजेश जी आपने सही फरमाया है, मैं आपके विचारों से सहमत हूँ.
बिहार में कोई भी सरकार बने हमें विकास चाहिए और केवल एक क्षेत्र में ही नहीं, हर क्षेत्र में चाहिए. और हम उम्मीद करते है कि जो भी सरकार बनेगी वो जातीय राजनीति से उठ कर विकास के काम ज्यादा ध्यान देगी.
यकीनन बिहार में उम्मीद की किरण नज़र आ रही है.
मैं आपके विचारों से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ. आप बिहार की मौजूदा स्थिति की तुलना 6-7 वर्ष पुराने बिहार से कर रहे हैं जबकि बिहार में पिछले 5-6 वर्ष में भारी बदलाव आया है. इसलिए हर साल तुलना करना तो ठीक है लेकिन लालू और राबड़ी से तुलना करना उचित नहीं है क्योंकि वो इतिहास की बात है. उम्मीद है जब भी आप अगला ब्लाग लिखेंगे तो इन बातों का ध्यान रखेंगे.
ब्रजेश साहब आपके ब्लाग से शत प्रतिशत सहमत हूँ. मेरा भी मानना है कि बिहारी होने का मतलब सिर्फ़ भाड़े का मजदूर बनना नहीं रहेगा. उम्मीद कि भारत ही नहीं दुनिया के किसी कोने में बिहारी कहलाना मान की बात होगी. एक बिहारी होने के नाते हमारी यही दुआ है.
मैं जानना चाहता हूँ कि क्या हम जातिवाद, भाई-भतीजावाद अथवा स्वार्थपरक अपेक्षाओं से ऊपर उठ कर समाज के पूर्ण विकास के लिए वोट देने लायक बन चुके हैं?
अरविंद एन दास जी की प्रार्थना में पूरा विश्वास व्यक्त करता हूं. वैसे भी किसी भी घड़ी में बारह बजने के बाद एक ही बजता है. बिहार के बारह तो बज चुके हैं, यानि उसकी समृद्धि से अराजकता का यह चक्र पूरा हो चुका है. अब राज्य अपने नये विकास चक्र की ओर बढ़ चुका है. इसे प्रार्थना नहीं भविष्यवाणी ही समझा जाए. ब्रजेश जी, बिहारी होने के नाते इस आशावाद को थामे रखने के लिए शुक्रिया.
बिहारी सीधे और मेहनती होते हैं और यही कारण है कि वे हर राज्य में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं. चंद मुट्ठी भर लोग उन पर राज करते हैं क्योंकि वहाँ गुंडा तत्व आरंभ से सत्ता पर काबिज हैं. बिहार तभी उठ सकता है जब ऐसे तत्वों पर लगाम लगे.
ब्रजेश जी, नितीश जी भले ही चुनावों में विकास की बातें कर रहे हों वास्तव में उन्होंने हर कदम जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उठाया है. चाहे महादलितों की बात हो या अधिकारियों की पोस्टिंग का. हाँ इतना जरुर है कि उनका शासन आम आदमी के लिए उतना बुरा नहीं रहा है जितना लालू का रहा था. लेकिन उनके शासन में नौकरशाही ने जमकर मनमानी की है और जो भी इसके चंगुल में फंसा है उनको बड़ी दुर्गति झेलनी पड़ी है. जनता दरबारों से समय और धन का अपव्यय हुआ किसी को कोइ लाभ नहीं हुआ. साथ ही उनके मंत्रिमंडल में सारी शक्तियां सिर्फ उनके हाथों में केन्द्रित हो गयी जो लोकतंत्र के लिए अच्छी प्रगति नहीं है.
नीतिश ने अच्छा काम किया है. मैं बिहार गया था. वे मिस्टर क्लीन हैं. हर नेता को उनकी तरह काम करना चाहिए ताकि सभी क्षेत्रों में विकास संभव हो.
मुद्दा ये है कि ऐसे हालात क्यों पैदा हुए? क्या बिहारी समाज आत्मनिरीक्षण करेगा? शायद कभी नहीं. बिहारी युवक, बिहार से बाहर उत्कृष्ट और बेहतर परिणाम देते है. ये उन सभी महत्वपूर्ण जगहों पर हैं जो नीतियाँ बनाते हैं या पालन करवाते हैं- मीडिया, ब्यूरोक्रेसी, सिनेमा, राजनीति, शिक्षा. पर फिर भी 'बिहारी' एक गाली क्यों है? है न परेशान करनेवाली बात? कारण मेरी समझ से क्रूर सामंती, जातीय सोच ने उन्हें अपने गौरवशाली इतिहास से फटेहाल बना दिया और फिर ये जहाँ भी आर्थिक उन्नति की संभावना दिखी वे पलायन कर गए चाहे वो झारखंड, असम या पूर्वोत्तर हो, सूरत या मुंबई. पर ये अपने साथ उसी गंदगी को ढोते रहे जिसके कारण ये परदेसी हुए थे. जैसे ही हालात सुधरे इन लोगों ने उन्हीं चीजों को फिर से शुरू कर दिया जिसके वजह से वे परदेसी हुए थे. एक कहावत है कि पूर्वोत्तर में जब तक एक बिहारी अकेला है तब तक बहुत ही नेक और अच्छा इन्सान होगा पर जैसे ही कुछ और आ गए तो फिर उनका गैंग बन कर दादागिरी शुरू करेगा. जब तक बिहारी सामंती सोच से बाहर आकर बुद्धा और अशोक की परम्परा को जारी नहीं रखेगा तब ही बिहार का भला नहीं होगा.
उपाध्यायजी, काफ़ी सटीक टिप्पणी की है थोड़ी देर से ही विकास का पहिया घूमना शुरू हो गया है. इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश ने जात पात, बिगड़ी हुई क़ानून व्यवस्था और घूसखोरी को एक हद काबू में किया है. विकास की राह पर अपने नन्हे कदम रख चुके हैं. नीतीश कुमार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने पाँच साल तक मिली जुली सरकार को चलाया. बिहारी मेधा एक बार अगर बिहार में बदलाव की बयार के लिये सोच भर ले, यकीन मानें, तस्वीर बदल जाएगी. मैं जानना चाहता हूँ कि क्या हम जातिवाद, भाई-भतीजावाद अथवा स्वार्थपरक अपेक्षाओं से ऊपर उठ कर समाज के पूर्ण विकास के लिए वोट देने लायक बन चुके हैं,
जैसाकि आपना लिखा है “2004 में बिहार गया तो यही लगा मानो वहां किसी बदलाव की उम्मीद तक करने की इजाज़त दूर-दूर तक नहीं थी.” बात बिलकुल सोलह आने सही है, और आज स्थिति वही की वही है, सिर्फ़ रोड बन जाने मात्र से क्षेत्र का कायाकल्प नहीं हो सकता, इसलिए शिक्षा के स्तर में सुधार सबसे महत्वपूर्ण है. अपनी यात्रा सुविधा और असुविधा के आधार को आपने बिहार की तरक्की को पैमाना मान लिया. लेकिन शिक्षा की हालत क्या है, आपने नही देखा. आज बिहार में शिक्षा का स्तर इतना गिर गया है कि बदन कांप उठता है, सिहर जाता है कि हमारे प्रदेश के बच्चों का भविष्य क्या होगा. आओ हम आपको बिहार की शिक्षा के स्तर को गिराने वालों के बारे में बताऊं. लालू जी ने चरवाहा विद्यालय खोला तो नीतीश जी ने तो हरवाहा शिक्षकों की भर्ती कर बिहार को गर्क में डाल दिया. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आने वाले 50 साल तक बिहार के लोगों का भला नहीं हो सकता क्योंकि जिन शिक्षकों की भर्ती नीतीश जी ने की थी, वो बिहार को गर्क में डालने की एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. किसी भी प्रदेश की तरक्की शिक्षा के स्तर से करनी चाहिए न कि वहां रोड या कारखाने लगने से. कोई भी नेता बिहार की तरक्की के लिए संजीदा नहीं है, वे सिर्फ़ बिहार के लोगों को एक मज़दूर के रूप में ही शोषण करना जानते हैं, इसलिए कि वे मेहनती होते है.
उपाध्याय साहब आपने सही कहा है- बाहुबलियों, बड़ी जोतवाले खेतिहरों और अपराधिक वारदातों का यह प्रांत पुरानी तानाशाही की याद दिलाता है. हालत आज भी बहुत बेहतर नहीं है लेकिन उम्मीद की किरण दिखाई पड़ती है कि शायद नीतीश जी की तर्ज़ पर प्रयास जारी रहा तो एकाध दशक में यहाँ के हालत कुछ बेहतर हों. इस प्रांत में बहुत जीवट वाले नेता की ज़रुरत है. जनता को खुली आँखों से अपना प्रतिनिधि चुनना चाहिए.
बिहार पर एक बढ़िया और ठोस टिप्पणी के लिए शुक्रिया. नीतीश जी ने बहुत अच्छा काम किया है लेकिन वह लालू से अच्छे नेता नहीं. लालू को एक मौका और मिलना चाहिए.
आपके ब्लाग से पूरी तरह सहमत हूँ. मैं चीन में रहता हूँ. इधर जब भी बिहार जाना हुआ वहाँ एक बदलाव नज़र आया है.
अगर धन बल और बाहुबल चुनाव से दूर रहे तो बिहार इसी रफ्तार से तरक्की करता रहेगा.
मैं पिछले तीन सालों चेन्नई और बंगलौर में रहा हूँ. यहाँ के लोग भी नीतीश राज में बिहार के विकास की बात करते रहे हैं और सबके दिल में बिहारियों के लिए सम्मान है.
बिहार के पिछड़ेपन के लिए जितना नेता दोषी हैं उतने ही हम. अगर उन्होंने अपराध किए तो हमने उन्हें पनाह दिया. जो हुआ सो हुआ अब चेत जाएँ.
बिहार के बारे में लिखते हुए मीडियाकर्मियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि नीतीश जिस ज़मीन पर खड़े हैं उसकी रुपरेखा लालू की तैय़ार की हुई है. सामाजिक बदलाव का ऐसा सशक्त उदाहरण शायद और किसी राज्य में देखने को नहीं मिलता. हाँ लालू से कुछ गलतिय़ाँ ज़रूर हुई थीं लेकिन उन्हें एक मौक़ा ज़रुर दिया जाना चाहिए ताकि रेलवे जैसा प्रर्दशन वह फिर दुहरा सकें.
प्रिय ब्रजेश जी, आपका ब्लाग पढ़ा मन को संबल मिला शायद आप पहले व्यक्ति हैं जिसने इस विषय पर चर्चा करना मुनासिब समझा. ईश्वर की कृपा से आज सब कुछ नहीं फिर भी बिहार में बदलाव की शुरुआत हो चुकी है. हमारी पहचान स्थापित हो रही है. बिहारी का अर्थ भी बदल गया है क्योंकि बिहार बदल रहा है.
मैं ब्रजेश से पूरी तरह से सहमत हूं. मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि बिहार के लोग नीतीश कुमार को वोट दें ताकि बिहार तरक्की होती रहे.
बिहार के विकास की गाड़ी धीरे धीरे ही सही पटरी पर चलने लगी है. आपका ब्लॉग बिहार का बहुत सटीक चित्रण कर रहा है.
राज्य के गाँव की हालत आज भी उतनी ही बदतर है जितनी लालू के समय थी. इसपर भी तवज्जो दी जानी चाहिए.
ब्रजेश जी, ऐसा लगता है कि बीबीसी सिर्फ़ बिहारियों की ही सेवा बनकर रह गई है इसीलिए आपने बिहार पर इतना समय लगाया है. जबकि मेरा दावा है कि किसी भी दूसरे राज्य की तुलना में वहाँ बीबीसी कम सुनी जाती है. क्योंकि यहाँ मेरे साथ रहने वाला कोई भी बिहारी आपकी सेवा नहीं सुनता. अपना कीमती वक्त पूरे भारत के लिए दें.
ब्रजेश जी, राजनेता बिहार को केवल एक अच्छी शिक्षा व्यवस्था दे दें फिर उसे बदलने के लिए किसी की ज़रूरत नहीं होगी.
मुझे लगता है कुछ तो देश के साथ साथ बिहार भी आगे बढ़ रहा है, और कुछ आप जैसे मीडिया वाले जो नितीश में सब कुछ अच्छा और लालू में सब कुछ ख़राब देखने के आदी हो गए हैं; के चलते बिहार काफ़ी बदला नजर आ रहा है. पर क्या ये हकीकत है? नीतीश कुमार ने जो अच्छा काम किया है उसमें लोगों की बदली मानसिकता का भी हाथ है. क्योंकि इन्हीं नीतीश के समय रेलवे घाटे में थी. जब लालू रेलवे को मुनाफे में ले गए तो नीतीश कहने लगे कि यह मेरी योजनाओं के क्रियानवन का नतीजा है. तो क्या यही तर्क बिहार पर लागू नहीं होता? ख़ैर मैं तो केवल इतना ही कहूँगा कि बिहार तभी विकास करेगा जब हम बिहारी, राजनेताओं से कहेंगें विकास दो वोट लो.
मेरी समझ में नहीं आता कि मीडिया आम बिहारियों के फोटो गंजी और लुंगी में ही क्योँ दिखाता है. ये तो सरासर एक तरह का गलत चित्रण है. उदाहरण के तौर पर बीबीसी हिंदी का यह पेज https://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/10/101019_bihar_1stphase_ac.shtml देखें. मुझे बीबीसी से ये उम्मीद नहीं थी.
प्रिय उपाध्याय जी, मुझे लगता है आपका ब्लॉग बिहारियों के मन को ठंडक पहुँचाएगा लेकिन यह बिहारियों की समझ पर है कि वे इसे किस नज़र से देखते हैं.
तरक्की का मेयार शिक्षा से होता है न कि रोड बन जाने से. नीतीश जी अपने पाँच साल के कार्यकाल में शिक्षकों की भर्ती नहीं करा सके. पहले लालू जी ने तो बिहारवासियों की यह हालत कर दी थी कि वह घर छोड़ने को मजबूर हो गए थे. पलायन करने वाले बिहारियों की ज़िंदगी लड़ाई के कारण मूल्क बदर हो गए लोगों से बदतर है. वह जहां भी रोज़ी रोटी के लिए जाते हैं उन्हें घटिया शिक्षा व्यवस्था की वजह से रूसवाई का सामना करना पड़ता है. जब तक शिक्षा का स्तर नहीं सुधरेगा तब तक बिहार का विकास नहीं हो सकता. चाहे आप रोड बनवा दें या कारख़ाने खुलवा दें. आज बिहार में सिर्फ़ मज़दूर पैदा हो सकता है कोई अब्दुल कलाम नहीं.
चुनाव के समय ऐसा लेख लिखना ब्रजेश उपाध्याय और बीबीसी दोनों के लिए शर्मनाक है.
हालत आज भी बहुत बेहतर नहीं है लेकिन उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ती है कि शायद नीतीश जी की तर्ज़ पर प्रयास जारी रहा तो एकाध दशक में बिहार के हालात कुछ बेहतर हो जाँए. अब राज्य अपने नये विकास चक्र की ओर बढ़ चुका है. ब्रजेश जी, बिहारी होने के नाते इस आशावाद को थामे रखने के लिए शुक्रिया.
मुझे ख़ुशी होती है बिहार की तरक़्क़ी देख कर. मगर बिहार अभी बहुत पीछे है.
बहुत अच्छी टिप्पणी है.
प्रिय ब्रजेश जी मै आपके विचारॊं से सहमत हूं और दावा करता हूं कि अब खुद कॊ बिहारी कहने में संकॊच नहीं हॊगा। मैं किसी पार्टी का प्रचारक नहीं हूँ फिर भी यह विश्वास के साथ कह सकता हूं कि बिहार में अब उम्मीदों का कमल खिलने वाला है या खिल रहा है । लेकिन इसमें अभी भी बहुत गुंजाइश है जॊ शायद भविष्य में पूरा हॊ सके।
नितिश कुमार ने जिस तरह से विकास कॊ गति देने का काम किया है उससे प्रदेश की जनता कॊ काफी उम्मीद है।
शांत हो जाइए सबका बात सुना जाएगा. जो चाहिए मिलेगा...और नहीं मिलेगा तो आप छीन न लीजिएगा जी. वाह क्या बात है लालू का बिहार अच्छा था कि नीतीश का...सब बिहारी लोग ही न वोट किया था...
चोटी वाला बिहारी, दाढ़ी वाला बिहारी, गाय वाला बिहारी...बिहारी को शिक्षा नहीं मौका चाहिए. फिर वह सीख भी लेगा और सिखा भी देगा. लालू और नीतीश भी तो बिहारी ही हैं न...
बहुत सही टिप्पणी की आपने. कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री का वक्तव्य सुना कि बिहार को एक हज़ार करोड़ रुपये हर साल मिलते हैं विकास के लिए. काश यह राष्ट्रमंडल खेल वाले सत्तर हज़ार करोड़ भी मिल जाते तो बिहार भी दिल्ली बन जाता.
बिहार के विकास की गाड़ी धीरे धीरे ही सही पटरी पर चलने लगी है.
ब्रजेश जी आपने बिलकुल सही फ़रमाया है. लालू के राज की त्रासदी से आज भी कलेजा कांप जाता है . एक विशेष जाति के लोगो का आतंक था. सड़क खोज का विषय बन गया था. लोग याद करते थे किसी ज़माने में यहाँ पक्की सड़क थी. मुजफ्फरपुर से सीतामढ़ी जो लोग गए हो उन्हें याद होगा किस तरह की सड़क थी. कटौझा पुल के पास बारिस के समय प्रति साल 100 से 150 लोग डूब जाते थे. नीतीश जे ने आते ही उसे बनाया और आज बढ़ का बाबा भी आ जाये तो रोड पर पानी नहीं आएगा. साहब हम लोग यहाँ गुवाहाटी में रहते है मैं जानता हूँ की किस तरह यहाँ के लोग लालू का नाम लेकर चिढाया करते थे. आज वो बात नहीं है. लोग बिहार के बारे में प्यार से नितीश की चर्चा करते है, उदाहरण बताते हैं. एक बात सही है की बिहारियों को एस चुनाव में अपना भविष्य गढ़ना होगा. जाति से ऊपर उठ कर वोट डालना होगा अन्यथा उनकी किस्मत मुंबई और असम में मार खाने की ही बनी रहेगी.
यक़ीनन लालू राज के बाद बिहार नई शक्ल ले रहा है.... लेकिन अभी भी बहुत बड़े बदलाव की ज़रुरत है...। गांव में बिजली और सड़कों की समस्या जस की तस बनी हुई है। अस्पताल और स्कूलों में अब भी विकास की जरुरत है.
सच कहा ब्रजेशजी, अब बिहारियों की आँखों में उम्मीद की किरणें जरूर चमकने लगी हैं और वो एक नए बिहार के अभ्युदय के प्रति आशान्वित भी है. सत्ता की कुर्सी वही संभाले, जो जनमानस की इन उम्मीदों पर खरा उतरे:
उम्मीद एक नए विहान की
उम्मीद चौमुख विकास की
उम्मीद विपुल विभव की
उम्मीद विकसित बिहार की I
ब्रजेश जी शायद आज तक राशन और कैरोसिन आम जनता को हर महीने नहीं मिलता था, इससे आप समझ सकते हैं कि बदल हुआ है.
यह बात सही है कि नीतीश कुमार ने लालू के जाने के बाद अच्छा काम किया है. जब मैं महज 15 साल का था, तभी से बीबीसी सुन रहा हूं. आपका ब्लॉग काफ़ी अच्छा और दिलचस्प है.
जी हां, हर कोई बदलाव महसूस कर रहा है. लेकिन मुझे उन लोगों को लेकर दुख होता है जो बिहार की बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं और लालू के जाने के बाद नीतीश के साथ भी मिलकर बैठे हैं. सो, यह सब कुछ लालू की टीम बी ही लगती है. हालांकि मेरा मानना है कि नीतीश कुमार को एक बार फिर पांच साल के लिए मौका देना चाहिए.
ब्रजेश जी, आज ही बिहार से वापस लौटा हूं, चुनाव गर्मी चरम पर है. इस बीच आपका ब्लॉग बिल्कुल सच बोल रहा है. बिहार और बिहारी दोनों ही अब जाग चुके हैं. वहां, विकास के मुद्दे पर बात हो रही है. लेकिन बदलाव के लिए समय की ज़रूरत है.
बिहार में भ्रष्टाचार और अपराध अपने चरम पर रहे हैं और यही उसके विकास में सबसे बड़ी बाधा थी. यह बात सही है कि बिहार की बदहाली के लिए लालू की सरकार बड़ी हद तक जिम्मेदार है. नीतीश कुमार की सरकार ने राज्य में विकास की एक अच्छी नींव डाली है.
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद बिहार के ही रहने वाले थे. ईमानदारी और योग्यता में उनकी मिसाल दी जाती है.
ब्रजेश जी आपने अपने यात्रा के दौरान बिहार का जो खाका खिंचा है वो सही है. दरअसल आज की राजनीति में ये बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर विकास होता है तो जनता जागरूक होगी जिससे वो तय करना शुरू कर देगी कि हमारा नेता कौन होगा. ऐसा लग रहा है कि जनता ने तय करना शुरू भी कर दिया है, अब बिहार की राजनीति में प्रमुख मुद्दा होगा विकास और सिर्फ विकास ...
बहुत बढ़िया लिखा. कौन कहता है कि कलम में अब वो ताकत नहीं रही. ऐसा लगा जैसे आपका लेख बिहार के विकास का आईना हो और आपने सही फ़रमाया. नीतrश ने काम तो किया ही है. बहरहाल, डार्विन के मुताबिक विकास एक सतत प्रक्रिया है..थोड़ा वक्त तो लगेगा. बस दुआ करें कि लालू जी वापस ना आ जाएं.
बिहार एक अच्छा विषय बनकर रह गया है. इस विषय पर सभी अपने विचार दर्ज कराकर समझते हैं कि उनका योगदान हो गया. हम सब ने ही बिहार को दबाया है, चाहे वो हमारे प्रत्यक्ष कर्म हों या अप्रत्यक्ष.
आपकी बातें पढ़कर अच्छा लगा, कुछ कटु- कुछ सुखद अनुभव लिखे आपने. बिहार अपने इतिहास से ज्यादा वर्तमान में समृद्ध हो सकता है अगर आंकड़ों की बाजीगरी से आगे भी कुछ किया जाए. विकास की धुरी वही है, पहिये स्थिर हैं.
यह बात सही है कि नीतीश कुमार ने लालू के जाने के बाद अच्छा काम किया है. मेरा मानना है कि नीतीश कुमार को एक बार फिर पांच साल के लिए मौका देना चाहिए.
बिल्कुल सही कहा है आपने. बिहार अब जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर विकास के लिए आगे बढ़ेगा.
मेरा मानना है कि बिहार में देश को न सिर्फ़ राजनैतिक तौर पर बल्कि आर्थिक तौर पर आगे ले जाने की क्षमता है. बस ज़रूरत है लोगों को सही दिशा पर आगे बढ़ने की.
बिहार की स्थिति का बिलकुल सही विश्लेषण है. बदलाव दिख रहा है, चीज़ें बदल रही है.
ब्रजेश जी, साधुवाद देना चाहता हूँ आपको इस लेख के लिए. अब तो लोगों के जेहन में सिर्फ एक छलावा बन के रह गया है विकास. आखिर ये अभागी जनता करे तो क्या करे. वो बस विकास के नारों के बीच एक गेंद बनकर रह गयी है जहाँ सिर्फ दो प्लयेर है. न तो गोलकी है न ही रेफरी. काश दिनकर और जेपी ये देख पाते अपनी संतानों की करतूत.
ब्रजेश जी, बिहार की आपकी यात्रा के लिए धन्यवाद, और ख़ासतौर पर पटना से सहरसा सड़क के माध्यम से जाने के लिए. यही नीतिश बाबू की एकमात्र उपलब्धि है.मैं अगवा करने की घटनाओं पर क़ाबू पाने की बात तो मानता हूँ. पाँच वर्ष का वक़्त बहुत लंबा समय होता है किसी भी राज्य में बदलाव लाने के लिए. जाति की राजनीति अभी भी मुख्य नीति है.जनता के लिए प्रगति का पैमाना एक मानसिक स्थिति है.
आपका ये विचार मुझे बहुत अच्छा लगा. अगर सही कहें तो आपकी तरह मैं भी बिहार से बाहर हूँ पर समय-समय पर मैं भी अपने घर सासाराम जाता रहता हूँ.सोच काफ़ी मिलती है आपसे इस विषय पर. मैंने तो ये भी देखा है कि लोगों का पलायन अब अपने घर की तरफ़ शुरू हो गया है. रोज़गार के नए नए अवसर पैदा हो रहे हैं.अच्छा लगता है जब अपने प्रदेश में रोज़गार की संभावनाएँ दिखती हैं.
बिहार की परिस्थितियाँ बिहार को हर क्षेत्र में प्रगति करने के लिए दबाव बनाएँगी. अगर बिहारी ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं तो बिहार क्यों नहीं. भगवान बिहार की मदद करे.
ब्रजेश जी यह शत प्रतिशत सही है कि नितीश जी का शासन लालू जी के शासन से कम बुरा है, और इस समय बिहार में काफी बदलाव आया है, लेकिन अभी भी हमलोग अन्य राज्यों की तुलना में बहुत पीछे है. लालू जी ने अपने कार्यकाल के शुरू के पांच सालों में दलित और पिछड़ों को जो सम्मान के साथ जीने का आधिकार दिया उसकी भी तो अनदेखी नहीं की जा सकती है. चुनाव के समय में आपका लेख थोडा और संतुलित होना चाहिए था.
बिहार के खोए सम्मान को वापस लाने के लिए हमारे कथित नेताओं के पास दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, निश्चित योजना का होना पहली शर्त है.
आज बिहार सही मायने में उठ खड़ा हुआ है. आज विकास की जो लहर चली है वो हर जगह देखने को मिल रही है. आज महिलाएं सुरक्षित हैं. 15 सालों में जो एक अंतर बना था उसने बिहार को 1947 के समय में भेज दिया था. आज सही मायने में बिहार को उस दौर से बहार निकला गया है. अभी केवल बिहार खड़ा हुआ है. अभी इसका देश के साथ क़दम मिलकर चलना बाक़ी है और हम उम्मीद करते हैं कि नितीश जी वापस सत्ता में आएं और बिहारियों को एक नए बिहार की तस्वीर देखने को मिले.
ब्रजेश जी की बात अपनी जगह पे सही है, लेकिन क्या बिहार को खड़ा करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ नीतीश जी और लालू-राबड़ी पर ही टिकी हुई है. क्या हम में से किसी ने थोड़ी भी कोशिश की है. हम सिस्टम नहीं बदल सकते, ये फ़िल्मों में सिर्फ़ सुपर हीरो ही कर सकता है. लेकिन हम ख़ुद को तो बदल सकते हैं न, वहीं एक बिहारी अगर अपने देश से बाहर कहीं है तो वह सड़क पर थूकने से भी डरता है. कहीं कुछ कचड़ा नहीं फेंक सकता. लेकिन जैसे ही वह अपनी जगह पर पहुंचता है उसकी वही हरकत शुरू हो जाती है. हम टिकट लेकर यात्रा करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं. अगर टिकट लिया भी तो ये सोचते हैं कि अगर टीटीई ने देखा तो पैसा वसूल हुआ वरना टिकट का पैसा बेकार ही गया. अपने मकान और दुकान से कूड़ा निकाला और सामने सड़क पर लगा दिया. अब न तो नीतीश जी आएंगे वह कूड़ा उठाने न लालू जी. राजनेताओं को दोष देने से अच्छा है कि पहले ख़ुद को थोड़ा सा सुधार लें. इंसान की तरह रहना सीखें. बस दो टूक बात ये है कि हम अच्छे तो सब अच्छा. हमें ख़ुद से भी कोशिश करनी चाहिए जितना हम कर सकते हैं. किसी के साथ ज़बर्दस्ती करके नहीं. बस हम ये बातें ख़ुद पर लागू कर लें. पूरे यक़ीन के साथ कहता हूं कि बिहार उठ खड़ा होगा अपनी राख से.
शायद नीतीश जी की भी हालत अटल बिहारी वाजपेयी और चन्द्र बाबु नायडू की तरह न हो जाए.....अटल जी "भारत उदय "और" शाइनिंग इंडिया "का कहकर अपनी सत्ता गंवा बैठे कि कभी दोबारा लौटे ही नहीं. यही हाल चन्द्र बाबु नायडू ने भी आंध्रा प्रदेश में "विकास पुत्र" का ठप्पा अपने सिर बंधा ही था कि ये हाल हो गया कि आज आन्ध्र प्रदेश में दूर-दूर तक कोई जानता ही नहीं. मुझे तो लगता है कि अटल जी और चन्द्र बाबु नायडू के बाद अब शायद सुशासन बाबु यानि हमारे नए "विकास पुत्र" नीतीश बाबु की बारी है.....हमारा देश दुनिया का पहला ऐसा देश है जंहा देश या राज्य को ज़रुरत से ज़्यादा चमकाने पर उसकी सत्ता छीन ली जाती है ....इसलिए नीतीश बाबु आप भी तैयार रहिए..अटल जी और चन्द्र बाबु जी की श्रेणी में शामिल होने के लिए.
जब भी बिहार की दुर्दशा की चर्चा होती है तो मुझे बड़ा अजीब लगता है. बिहार की अवस्था के लिए कोई और नहीं बल्कि बिहारी लोग ही ज़िम्मेवार हैं. अगर हमारी सोच सामंती, भ्रष्ट, पितृसत्तावादी, संकीर्ण और स्वार्थपरक नहीं होती तो हम ऐसे न होते. हम में सामुहिकता, उदारता, सौन्दर्यबोध और बौद्धिकता का नितांत अभाव है. यही वजह है कि हम लोग कला, संस्कृति, साहित्य, खेल और विज्ञान हर मामले में फिस्सडी हैं. नीतीश जी हर मामले में लालु जी से बेहतर हैं. लेकिन बिहार की ऐतिहासिक विडम्बना यह है कि यहाँ जिस सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व नीतीश जी जैसे व्यक्ति को करना चाहिए था उसे लालु जी ने किया. नीतीश जी की राजनीति की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि उन्हें राजनीतिक बाध्यताओं की वजह से समाज के उसी तबक़े का सहयोग लेना पड़ रहा है जो यहाँ के पिछड़ेपन के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेवार हैं. मेरी समझ में बिहार को अपने उद्धार के लिए अभी उस सामाजिक राजनीतिक आन्दोलन का इंतिज़ार करना पड़ेगा जिसमें नेतृत्व और राजनीतिक वर्गीय आधार की ऐसी विसंगति न हो.
आपने सही विश्लेषण किया है लेकिन इतनी सारी प्रतिक्रिया मिलने के बाद भी बिहार के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिपेक्ष में कोई और ब्लॉग नहीं लिखा गया और न ही बिहार की ख़बर को अपडेट किया जा रहा है.
मुझे लगता है कि आने वाले समय में हम 'सर्वश्रेष्ठ' होंगे. ब्रजेश जी को धन्यवाद. मैं आपसे सहमत हूँ.
मैं यही चाहता हूँ कि बिहार में फिर से नीतीश कुमार का राज हो वरना बिहार फिर अंधेरे में चला जाएगा.
ब्रजेशजी ने काफी अच्छा चित्रण किया है. आपको जानकर शायद ख़ुशी हो कि प्रवासी बिहारियों को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए सरकार ने बिहार फ़ाउंडेशन का गठन किया है. ये पहली सरकार है जिसने न सिर्फ बिहार में रहने वाले बिहारियों के बारे में सोचा बल्कि बिहार से बाहर जाने वाले बिहारियों के बारे में भी सोच रही है.
मैं इस लेख से समहत नहीं हूँ. बिहार रहने के लिए आज बहुत अच्छा स्थान है. मुझे अपनी राजगीर और नालंदा की हाल की यात्र के दौरान ऐसा ही लगा.
बिहार की तक़दीर कैसे बदलेगी? क्या नितीश , लालू , पासवान और सुशिल मोदी बदलेंगे बिहार की तक़दीर, या बिहार के बाहर बसे पढ़े लिखे, क़ाबिल और दर्मंद बिहारी लौट के आएंगे और बिहार में फिर किसी सम्पूर्ण करांति के नायक बनेंगे और बनायेंगे जैसा कि 1975 में हुआ था, जब बिहार के नौजवानों ने ही देश को नई दिशा देखाई थी. बिहार से बाहर रहने वाले बिहारी नौजवानों तुम कब जागोगे.
बिहार विधानसभा चुनाव शुरू हो चुके हैं. आपके लिए यह सही समय है अपने बिहार की आवाज़ को बुलंद करने का. अपनी आवाज़ बुलंद करें और बताएं क्या चाहते हैं आप अपने बिहार में.
लिखिए आपको क्या चाहिए अपनी सरकार से? आपको कैसा नेता चाहिए? आपको अपने राज्य में क्या-क्या चाहते है? आपके शहर में क्या-क्या समस्याएं हैं? आप से अनुरोध है कृपया सही नेता को ही चुने, तभी बिहार विकास रूपी पटरी पर चलेगा अन्यथा बिहार का विकास संभव नहीं है. किसी भी राज्य या देश के लिए नेता वही अच्छा है, जो युवाओं के बारे में सोचे उन्हें आगे बढ़ाए. अगर युवा निराश तो समझिए नेता फ़ेल.
मैं बिहार के युवाओं से कहना चाहूंगा कि ज्यादा से ज्यादा युवा वोट डालने के लिए आगे आएं. यही नहीं राजनीति में आने का भी मन बनाएं, क्योंकि हम सबको मिलकर युवाओं की वो छवि सुंदर बनानी है, जो राजनेताओं ने बिगाड़ कर रख दी है. बिहारवासियों नेता चुनते वक़्त ये ज़रूर ध्यान में रखें, कि कौन से नेता ने युवाओं के उत्थान के लिए सबसे ज्यादा कार्य किये हैं.
ब्रजेश जी दो अंतरालों के बीच बिहार का तुलनात्मक विश्लेषण कर अपने ब्लाँग में तथ्य प्रस्तुत करने हेतु साधुवाद । एक तथ्य तो निर्विवाद है कि जो कुछ भी विकास की झलक सी अभी बिहार में परिलक्षित हो रही है, अथवा जिसे आपने उम्मीद की किरण स्वरूप देखा, उसमें नितीश जी के अपने व्यक्तित्व और ईमानदार प्रयास की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता । आज यदि बिहारी होने पर हम पूर्व की भांति एक अपराधबोध वाले एहसास से ग्रस्त होने से बच पा रहे हैं, तो यह भी नितीश जी की ही देन है । अब अगली सरकार चाहे जिसकी भी बने, उसे अगर इस विकासोन्मुखी धारा को बरक़रार रखना है, तो नितीश जी के नक्शेक़दम पर चलकर ही अभीष्ट की उपलब्धि हासिल की जा सकेगी । यदि बिहार की जनता फ़िर से लालटेन युग में ही वापसी की पक्षधर है, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य बिहार और बिहारियों का कोई और नहीं हो सकता । धन्यवाद ।
मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ. बिहार बिहारियों की वजह से है. ऐसा लगता है कि आपने बिहार ठीक से घूमा नहीं. सच है कि यह राख से फिर से जी उठा है. बिहारियों में ताकत है कि वह फिर से उठ खड़े हों. मीडिया को बिहार के बारे में अच्छी चीज़ें लिखनी चाहिए.
गांधी की कर्मभूमि बिहार इसे मत भूलिए. हर भारतीय को बिहार पर गर्व है.
ब्रजेश जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह असहमत हूँ. आप मीडिया वाले नीतीश का गुणगान करते हैं. जबकि वास्तविकता क्या है आप बिहार के किसी ज़िले के गाँव में जा कर देखिए. स्थिति कितनी भयावह है. जातिवाद का जो बीज नीतीश ने बोया है वह कभी ख़त्म नहीं होगा.