सरकार बेचारी है या जनता?
लंदन में पतझड़ की भूरी उदासी छाए उसके पहले ही क्रिसमस की रौनक़ दिलों को बहला लेती है.
मगर इस बार बहार में भी मंदी की मायूसी थी, अप्रैल में लोग आँकड़ों के जंगल में रिकवरी के कोंपल खोज रहे थे, अब सदाबहार समझे जाने वाले 'सरकारी वटवृक्ष' से भी पतझड़ में नौकरियाँ पत्तों की तरह झड़ रही हैं.
20 अक्तूबर को जब वित्त मंत्री जॉर्ज ऑस्बर्न ने लगभग पाँच लाख सरकारी नौकरियों को अलविदा किया तो इससे सीधे प्रभावित न होने के बावजूद मैं एक अजीब सोच में घिर गया.
लंदन के अंडरग्राउंड रेल की यात्री-संस्कृति है कि कोई किसी से आँख नहीं मिलाता, सब अख़बारों-पत्रिकाओं में खोए होते हैं. रेल के आधे घंटे के सफ़र में मैं हर नौकरीपेशा टाइप चेहरे को देखता रहा और 'गेसिंग गेम' खेलता रहा, बचेगा/बचेगी, नहीं बचेगा/ नहीं बचेगी.
जिन पाँच लाख 'सरकारी कुर्सियों' को अब ग़ैर-ज़रूरी समझा जा रहा है उन पर बैठने वाले ज्यादातर लोग लंदन में ही रहते हैं. कोई भी सरकार हो, वह कुर्सियों के बारे में ही सोचती है, उन पर बैठने वाले लोगों के बारे में सोचना उसके सॉफ्टवेयर का हिस्सा नहीं है, ख़ास तौर पर हटाते वक़्त.
वित्त मंत्री ने बहुत सारे आँकड़े बताए जिसमें पाँच लाख का आँकड़ा भी था, ज़ाहिर है, वे पाँच लाख लोगों के नाम तो नहीं ले सकते थे.
मैं लोगों के चेहरे पर पसरी मायूसी को पढ़ने की कोशिश कर रहा था. गेसिंग गेम में बहुत ज्यादा ग़लती के आसार नहीं थे क्योंकि लंदन की लगभग 75 लाख की आबादी में अंदाज़न 15 लाख नौकरीपेशा (सरकारी-प्राइवेट दोनों) लोग होंगे, उनमें से पाँच लाख लोगों की नौकरी जाने का मतलब है, हर तीन में से एक नौकरीशुदा का बेरोज़गार होना.
जब लीमैन ब्रदर्स के बंद होने पर लोगों की नौकरियाँ जा रही थीं तो एक अख़बार ने प्रभावित लोगों के बीच सर्वे करके बताया था कि नौकरी जाने का अफ़सोस परिवार में किसी के गुज़रने के सदमे जैसा ही होता है.
जिन बैंकों ने जुआ खेला उन्हें सैकड़ों करोड़ पाउंड देने के लिए सरकार के पास पैसे थे? जिस चक्र की शुरुआत आर्थिक मंदी से हुई और अब सरकारी ख़र्च में एक चौथाई कटौती हो रही है उसे शुरू करने और यहाँ तक लाने में इन पाँच लाख लोगों का कितना कसूर था?
ज्यादा वक़्त नहीं बीता जब कुछ लोग शैम्पेन में नहा रहे थे, उन्हें मिलियन से बिलियन के बीच दूरी मामूली लगती थी, प्राइवेट जेट में, प्राइवेट आइलैंड पर मॉडलों के साथ प्राइवेट पार्टी करने वाले ये पाँच लाख लोग नहीं थे.
दलील है कि सुनहरे दौर का फ़ायदा इन पाँच लाख लोगों को भी तो मिला, ज़रूर मिला-- आसानी से ढेर सारा कर्ज़, जिसे चुकाने के लिए अब नौकरी नहीं बची है इसलिए घरों से बेदख़ल किए जाएँगे.
वित्त मंत्री ने काफ़ी बेचारगी के साथ कहा, हमें शौक़ नहीं है लोगों को नौकरी से निकालने का, मजबूरी है.
सरकार अपनी बेबसी बता रही है--तनख़्वाह के लिए पैसे नहीं हैं, हटाने पर मुआवज़ा मुश्किल है, पेंशन में भी टेंशन है इसलिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ानी पड़ेगी.
दयनीय दशा किसकी है? जिन पर मार पड़ेगी या सरकार की?

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राजेश जी, गलती जिसकी होती है यदि वक्त की मार उन्हीं पर पड़ती तो हालात बद से बदतर होने के बजाय दिनोंदिन बेहतर होते चली जाती. दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं होता. अमूमन हाशिए पर वे ही धकेले जाते हैं, जहां से प्रतिरोध की आशंका कम होती है. तकरीबन तमाम देशों की सरकारें कॉरपोरेट जगत एवं ऊंचे तबके पर बैठे लोगों को नाराज करने की स्थिति में नहीं होतीं लेकिन आम जनता को ठगना आसान होता है. मसलन, भारत सरकार यहां के उद्योग जगत को लाखों करोड़ रुपये की रियायत चुटकी में दे देती है, जिसका जिक्र शायद ही कहीं होता है, लेकिन किसानों को दी गई छोटी सी कर्ज राहत का जबरदस्त तरीके से ढोल पीटा जाता है. थोड़ी सी तफसील में जाएं तो किसानों पर कर्ज का बोझ भी गलत नीतियों की वजह से बढ़ता है. किसान पूंजी का क्या करेगा यदि उसके पास सिंचाई, बीज और उर्वरकों की उपलब्धता नहीं होगी. फिर उनकी उपज भी कौड़ी के भाव बिकती है.
राजेश जी हमें ब्रिटेन में नौकरी रहे या ना रहे, से क्या मतलब है. ऐसा लगता है कि आपने तो नमक हलाल कर दिया है क्योंकि आप बीबीसी में नौकरी करते हैं. अच्छा होता आप अपना समय भारत की समस्याओं पर ध्यान दें ना कि ब्रिटेन पर. हकीकत ये है कि इसी ब्रिटेन के कारण आज भी भारत में अमन-चैन, शांति-भाईचारा सब कुछ बर्बाद हो रहा है. इस लेख से आप बीबीसी श्रोताओं को क्या पैगाम देना चाहते हैं, समझ से बहुत दूर है.
मेरा अभी भी मानना यही है कि ये पूंजीवाद का मॉडल पूरी दुनिया को बर्बादी के मुहाने पर ले जाके ही छोड़ेगा. इसके पिछले नतीजों पर अगर गौर किया जाए तो हम पाएँगे कि सारे विकसित देश आज की तारीख में कर्ज के मुहाने पर बैठे हुए हैं. इस कर्ज को चुकाने के लिए अब ऐसी-ऐसी नीतियां बनेंगी कि विकासशील देशों और ग़रीब देशों में ग़रीबी और भुखमरी जैसे हालात पैदा होंगे और फिर यही विकसित देश इन्हीं दूसरे देशों पर ज़्यादा खाने और ज़्यादा बच्चे पैदा करने जैसे दोषारोपण फिर से शुरू करेंगे. जैसा कि कुछ समय पहले अमरीका और यूरोप हमारे देश पर लगा चुके हैं. हमारे पास अभी भी मौक़ा है कि हम गाँधी जी के मॉडल (हर गाँव को विकसित करने का) को नए सिरे से फिर से सोंचे और अपनी नीतियों में बदलाव के लिए तैयार हों.
राजेश जी, सरकार अगर पहले से ही बेहतर नीति लेकर चले तो मंदी में लोगों को निकालना ही नहीं पड़ेगा....फिर बाद में मार तो आम आदमी ही झेलता है...
पहले तो मुझे इस बात का दुख है कि इन कटौतियाँ का आपपर निजी तौर पर असर पड़ेगा. मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ. दुनिया के सभी देश आर्थिक मंदी के दौर से उबर रहे हैं और ब्रिटेन में भी यही हो रहा है. ब्रिटेन में जो कटौतियाँ हुईं हैं उसका रिश्ता सरकार में बदलाव से ज़्यादा है ना कि वहाँ की आर्थिक व्यवस्था से.ये विचारों के स्तर पर लिया गया फ़ैसला है.मैं इस इंतज़ार में हूँ कि आनेवाले हफ़्तों और महीनों में और कौन से नीतिगत फ़ैसले होते हैं. i
राजेश जी, सरकार को चाहिए कि एक ऐसी नीति बनाए कि सभी की नौकरियाँ सलामत रहे. दूसरे देशों को दान देने के लिए पैसों की कमी नहीं है. पहले अपने मुल्क को देखना चाहिए, फिर किसी और के बारे में सोचना चाहिए.बहुत ऐसे मुल्क हैं जो ललचायी नज़र से उस देश की ओर देखते हैं जहाँ से कुछ मिलने की उम्मीद होती है.
राजेश जी, यह एक दिन में पैदा हुई समस्या नहीं है, और न ही लोगों को सरकारी नौकरी से निकाल देना इसका समाधान है. अब समय है कि क्रेडिट पॉलिसी पर नए सिरे से विचार करना चाहिए, अंधाधुंध लोन ने बाज़ार भाव को वास्तविक स्थिति से कहीं बहुत ऊपर पहुँचा दिया है जिसके कुचक्र में आम आदमी फँस गया है. लोन लेने की स्थिति में नियोक्ता चाहे प्राइवेट हो या सरकारी, उसे लोन का गारेंटर होना चाहिए. या फिर इंश्योरेंस होना चाहिए कि नौकरी जाने की स्थिति में कर्ज़दार पर उसका इतना बुरा असर न पड़े.
मैंने हमेशा ही कहा है कि विश्व की सभी समस्याओं की जड़ में पूंजीवाद है.अगर हम ज़रा देर के लिए आतंकवाद के मसले को नज़रअंदाज़ कर दें तो पूंजीवाद ही दुनिया की 95%समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार है. पूंजीवाद वो लालच पैदा करता है जिससे समाज अपनी नैतिकता को भूल जाता है.अमरीका में सरकार अप्रवासन को बेरोज़गारी के लिए दोष देती है जबकि उसकी कुल जनसंख्या का महज़ एक प्रतिशत अप्रवासी हैं. ब्रिटेन अपनी अकुशलता छुपाने के लिए कटौतियाँ कर रहा है. कोई ये नहीं सेच रहा कि उन बच्चों का क्या होगा जिनके माँ-बाप बेरोज़गार हो जाएँगे.अगर लोगों के पास पैसे नहीं होंगे तो वो अपराध की दुनिया में जाएँगे. ये एक सिलसिला है. किसी एक देश की घटना पूरी दुनिया को प्रभावित करेगी.
खन्ना जी, मुझे लगता है कि आपको अपने लिखे पर एक बार फिर से विचार करना चाहिये. राजेश जी की तारीफ करने की बजाय आप उन पर न जाने अपनी कौन सी खीज निकाल रहे हैं. आप राजेश जी पर व्यंगय कर रहे है कि वे बीबीसी में नौकरी करके नमक हलाली कर रहे हैं. दरअसल वे ब्रिटेन की उस समस्या के माध्यम से हमे बताना चाहते है कि किस तरह लोगों को नौकरी चले जाने पर समस्या होती है. शासन की क्रूरता कैसे आम लोगों के जीवन को प्रभावित करती है. आप लेखक की दृष्टि को समझने का प्रयास क्यों नहीं करते. यदि आपको लगता है कि राजेश जी ने कुछ ठीक नहीं लिखा है तो आप इसे परिष्कृत रूप से पढक़र क्यों नहीं समझ पाते. अफसोस तो इस बात का है कि कई लोग करते तो देशप्रेम की बातें है लेकिन रहते सउदी अरबिया में है. हां मैं आपके बारे में ही बात कर रहा हूं. क्योंकि जिस तरह आपने कमेंट किया है, मुझे बुरा लगा. काश आप समझ पाते. राजेश जी हमें मानवता का पाठ पढ़ा रहे हैं और मानवता सिखा रहे हैं. आप को यदि अपने देश की इतनी चिंता होती तो यहां के शांति, भाईचारे की रक्षा के लिए आप अपने देश में होते, दूसरे देश में नहीं, यदि आज हम अशांत है, भाईचारा खत्म हो रहा है, इसके लिए हम सभी इसके लिए जिम्मेदार है चाहे मेरे जैसे लोग जो यहां रहते है या फिर आप जो विदेश में रहते हैं. .मेरी बातों का बुरा लगा होगा तो क्षमा चाहता हूं, जिस तरह आपने अपने विचार रखे, मैंने भी अपने विचार प्रस्तुत किये. मेरी बातों को अन्यथा न लेते हुए आपको अपने लिखे पर फिर से विचार करना चाहिये. और एक बात और शायद आप भूल गए है की हमारी भावना विश्व बंधुत्व की है यानि वसुधैव कुटुम्बकम, सारा संसार हमारा कुटुम्ब है.
धन्यवाद.आपका ही- सुनील शर्मा, छत्तीसगढ़, भारत
देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने या बिगाड़ने में आम जनता की कोई भूमिका नहीं होती है, इसलिए जब देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ी हो तो उसकी सज़ा आम जनता को क्यों दी जाती है. लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा देश के लोगों को इससे प्रभावित लोगों की सहायता करनी चाहिए. शायद बेहतर तरीक़ा ये हो कि लोगों को नौकरी से निकालने के बदले एक निश्चित परिमाण में उनके वेतन में कटौती कर दी जाए जिसे लोग ये मानकर स्वीकार कर लेंगे कि उनकी भी नौकरी जा सकती थी क्योंकि वेतन में कटौती हर हालत में नौकरी गँवाने से तो बेहतर है ही.
Randhir from Bihar
उत्पादन के जितने भी अंग होते हैं उसमें मज़दूरों कामगारों की स्थिथि सब से कमज़ोर और दैनीये होती है. यह अंतरराष्ट्रीय सच आज तक ज्यों का त्यों बना हुआ है. अब समय आ गया है कि संसार के सभी लोग एकजुट होकर नौकरी जाने वाली पीड़ा से निजात पाने का रास्ता निकालें. इंसान के लिए रोज़ी रोटी का मसला सब से पहले आता है. मानवजाति चाहे जितनी तरक्क़ी कर ले लेकिन अगर अपने काम करने के अधिकार को नहीं बचा पता तो हम कभी दावा नहीं कर सकते कि हम पूरी तरह से सभ्यता के सोपान पर चढ़ गए हैं. आज जब हम चाँद सूरज और ग्रहों कि खोज का अभियान चला रहे हैं तो बेरोज़गारी ऐसी मूल समस्या सुन कर मन खिन्न हो उठता है.
झुट बोलकर लड़ाई शुरू करने और ग़रीब देशों पर बुरी नज़र रखने वालों पर ऐसी ही बला आनी चाहिए, ताकि उसे भी पता चले कि ग़रीबी क्या चीज़ है. ब्रिटिश सरकार ने दुनिया भर में अमन-चैन को ख़तरे में डाल दिया है. उसी ने ईराक़ और अफ़ग़ानिस्तान की अवाम को नर्क में धकेल दिया. जंग में जान माल का भारी नुक़सान भुगतना पड़ता है, जिसका ख़मियाज़ा अब ब्रिटेन के लोगों को नौकरी गंवा कर चुकाना पड़ रहा है. आने वाला दिन और भी बुरा हो सकता है, इसके लिए तैयार रहना चाहिए. इन देशों को चाहिए कि अपनी दादागिरी छोड़ कर देश की जनता की भलाई के लिए सोचें ना कि दुसरों के बीच फूट डालने की जुगत में लगे रहें.
लोकतंत्र में आपका स्वागत है... माफ़ कीजिएगा, वास्तव में पूंजीपति तानाशाही में....
पूंजीवाद का मूलमंत्र ही है मुनाफ़ाख़ोरी और मुनाफ़ा तभी हो सकता है जब दूसरे लोगों को हानि हो. इस व्यवस्था में जिनके पास जितना ज्यादा पैसा होता है सरकार उनका उतना ही ज्यादा ख्याल रखती है. जब दिन अच्छे थे तब ग़रीबों को भी कुछ-न-कुछ मिल जाता था. अब जब समय विपरीत हो गया है तो जबरन सरकार ने ग़रीबों पर ग़रीबी और जेहालत का बोझ डाल दिया. सरकार को भी पता था कि अर्थव्यवस्था का स्थाई विकास क़र्ज के बल पर नहीं उत्पादन के बल पर ही संभव है फिर वो क्यों जान बूझकर सोती रही? वहां की आम जनता को देशहित को सर्वोपरि रखते हुए यथासंभव सरकारी क़दमों का विरोध करना चाहिए.
किसी की नौकरी जाना बहुत दुःख की बात. प्रभावित परिवार पर क्या गुजरती है ये वो ही जानते हैं..
लेकिन मैं सोच रहा था की पश्चिमी देशों में सरकारी नौकरी का मतलब उम्र भर की पक्की नौकरी नहीं होता..
मुश्किल वक्त में लोगो को निकलते भी हैं.. निकम्मे लोगों को भी अक्सर निकाल दिया जाता है..
ऐसा भारत में क्यों नहीं होता. सरकारी नौकरी मतलब उम्र भर के लिए पक्की नौकरी, चाहे काम करें या ना करें.. ऐसा भारत में क्यों है? अगर हम भारत में निकम्मे और भ्रष्ट लोगों को निकलना शुरू कर दें तो शायद भ्रष्टाचार भी थोडा कम हो और लोग काम भी करने लगें..
असली दिक़्क़त की तरफ़ किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है. दर असल ये अंग्रेज़ लोग सारी दुनिया से लूट-लूट कर पैसे ले गए, औद्योगिक क्रांति की. अब जब अपने दम पर देश और जनता चलाने की बारी आई है तो इनकी हालत ख़राब हो गई है.
राजेश जी आपके आलेख ने द्रवित कर दिया. नौकरी जाने का दुख क्या होता है, इसे जानने के लिये अपनी नौकरी का चला जाना आवश्यक नहीं है, मात्र नौकरीपेशा होना ही काफ़ी है. इस स्थिति को प्राप्त होने में उन निरीह पांच लाख लोगों का कोई हाथ नहीं है. अमरीका के सिरदर्द को आज के ज़माने में भी अपना सिरदर्द समझकर अपने लोगों के हितों की अनदेखी करने का खामियाज़ा आज ब्रिटेन झेल रहा है. आज मुझे पता नहीं क्यों आपका आलेख पढ़कर अपने भारतीय होने पर कुछ ज़्यादा ही गर्व की अनुभूति हो रही है. अर्थव्यवस्था के मामले में आज पूरी दुनिया के गड्डमड्ड होने के बावज़ूद मेरे देश ने अपने बूते पर ऐसी स्थिति में पहुंचने से खुद को बचा लिया, और अब सीना ताने आगे बढ़ने को तैयार है. हमें अपने अंग्रेज़ भाइयों से पूरी हमदर्दी है, जिसमें निश्चय ही भारतीय भी होंगे. हुक्मरानों को चाहिए कि मजबूरियां रोने के अपने बेढब अभिनय से खुद को ऊपर उठाकर जनता के कंधे से कंधा मिलाकर उबरने का उद्यम करें. भूखी नंगी जनता कितनी खतरनाक हो सकती है, शायद ब्रिटेन को अभी इसका कोई अनुभव नहीं है.
ब्लॉग पढ़ा, बढ़िया लगा.