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अब भी हिलती है पूँछ

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 02 नवम्बर 2010, 15:02 IST

डार्विन ने मानव विकास के बारे में कहा था कि पहले मानव की भी पूँछ होती थी लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल न होने की वजह से वह धीरे-धीरे ग़ायब हो गई.

वैज्ञानिक मानते हैं कि रीढ़ के आख़िर में पूँछ का अस्तित्व अब भी बचा हुआ है. वे ऐसा कहते हैं तो प्रमाण के साथ ही कहते होंगे क्योंकि विज्ञान बिना प्रमाण के कुछ नहीं मानता.

तो अगर पूँछ है तो वह गाहे-बगाहे हिलती भी होगी. अगर आप पूँछ को हिलता हुआ देखने की इच्छा रखते हों तो ऐसा अब संभव नहीं है. लेकिन कई बार ज़बान हिलती है तो इसके संकेत मिलते हैं कि पूँछ हिल रही है.

वैसे तो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे. प्रोफ़ेसर के सामने कुछ छात्र ऐसी बातें कहते हैं जिससे दूसरे छात्रों का पता चल जाता है कि भीतर छिप गई पूँछ हिल रही होगी. बॉस से कुछ लोग जब 'ज़रुरी बात पर चर्चा' कर रहे होते हैं तो दफ़्तर के बाक़ी लोग महसूस करते हैं कि पूँछ हिल रही है. इश्क में पड़े लोग तो जाने अनजाने कितनी ही बार ऐसा करते हैं.

लेकिन व्यापक तौर पर इसका पता अक्सर राजनीतिक बयानों से चलता है.

कांग्रेसियों को इसमें विशेष महारत हासिल है. नीतीश कुमार ने कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री बनकर शासन-प्रशासन को समझना चाहिए. तो कांग्रेस से जवाब आया, "जब अटल बिहारी वाजपेयी मुख्यमंत्री बने बिना प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो राहुल गांधी क्यों नहीं?"

जो लोग अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी राजनीति को जानते हैं वो समझ गए कि पूँछ हिल रही है.

इससे पहले बिहार में ही कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा था, "जेपी (जयप्रकाश नारायण) और राहुल गांधी में समानता है."

कांग्रेस का बड़ा तबका जानता और मानता है कि 70 के दशक में कांग्रेस का सबसे बड़ा दुश्मन कोई था तो वे जेपी ही थे. लेकिन बिहार में किसी से तुलना करनी हो तो जेपी से बड़ा व्यक्तित्व भी नहीं मिलता. इसलिए पूँछ हिली तो ज़बान से जेपी से तुलना ही निकली.

इससे पहले एक सज्जन 'इंदिरा इज़ इंडिया' कह चुके थे. कहते हैं कि वह 'मास्टर स्ट्रोक' था. पता नहीं क्यों वैज्ञानिकों ने जाँचा परखा नहीं लेकिन उस समय पूँछ हिलने का पुख़्ता प्रमाण मिल सकता था.

वैसे ऐसा नहीं है कि पूँछ हिलाने पर कांग्रेसियों का एकाधिकार है. भारतीय जनता पार्टी भी अक्सर इसके प्रमाण देती रहती है.

किसी नाज़ुक क्षण में एक भाजपाई सज्जन का दिल द्रवित हुआ तो उन्होंने कहा, "लालकृष्ण आडवाणी लौह पुरुष हैं, वल्लभ भाई पटेल की तरह."

समाजवादियों ने भी अपने एक दिवंगत नेता को 'छोटे लोहिया' कहना शुरु कर दिया था.

'जब तक सूरज चाँद रहेगा फलाँ जी का नाम रहेगा' वाला नारा जब लगता है तो सामूहिक रुप से पूँछ हिलती हैं.

आप कह सकते हैं कि सबकी अपनी-अपनी पूँछ है, जिसे जब मर्ज़ी हो, हिलाए. लेकिन संकट तब खड़ा होता है जब पूँछ को अनदेखा करके लोग नारों को सही मानने लगते हैं.

इतिहास गवाह है कि इंदिरा जी ने अपने को इंडिया मानने की ग़लती की तो वर्तमान में प्रमाण मौजूद हैं कि आडवाणी जी ख़ुद को लौह पुरुष ही मान बैठे. अब नज़र राहुल जी पर है वे भी अगर हिलती हुई पूँछें न देख सके तो पता नहीं जेपी हो जाएँगे या अटल. या कि वे इंतज़ार करेंगे कि कोई कहे, "राहुल ही राष्ट्र है."

वैसे तो ज्ञानी लोग कहते हैं कि विकास का क्रम कभी उल्टी दिशा में नहीं चलता इसलिए कोई ख़तरा नहीं है.

लेकिन उपयोग न होने से पूँछ ग़ायब हो सकती है तो अतिरिक्त उपयोग से अगर किसी दिन फिर बढ़नी शुरु हो गई तो?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:08 IST, 02 नवम्बर 2010 Dhananjay:

    विनोद वर्मा जी उत्कृष्ट लेख के लिए धन्यवाद .

  • 2. 18:07 IST, 02 नवम्बर 2010 Saptarshi:

    वैसे पूंछ का सही इस्तेमाल चाहे पहले कांग्रेसियों ने ही शुरू किया हो लेकिन इसका प्रचार-प्रसार बहुत व्यापक रहा है, और पूंछ हिलाने वालों को इसका काफ़ी फ़ायदा भी मिला है. बाक़ी दल भी अब इस कला में निपुण होते जा रहे हैं लेकिन कांग्रेसी तो अब और 'परफ़ेक्शन' की तलाश में हैं.

  • 3. 18:58 IST, 02 नवम्बर 2010 ZIA JAFRI:

    विनोद जी आपकी बात में बहुत दम है. पूंछ हिलाना सिर्फ़ राजनीतिक पार्टियों में ही नहीं होता. पूंछ को आप घर से शुरू होकर समाज के सभी भागों में हिलती देख सकतें हैं. ये पूंछ सरकारी कर्मचारी और राजनीतिक पार्टियों में ज़रुरत से ज़्यादा हिलती है. कुछ साहब के सामने हिलाते हैं कुछ अकेले में. लेकिन सबका एक ही लक्ष्य होता है - सामने वाले की चापलूसी.

  • 4. 20:34 IST, 02 नवम्बर 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह विनोद जी, ख़ूब शानदार तरीके से आपने सभी नेताओं की पूंछ के हिलने के बारे में समझाया है. लेकिन क्या पूंछ सिर्फ़ आपकी नज़रों में कांग्रेसियों और बीजेपी की ही है? बाक़ी पार्टियां क्या बिना पूंछ के ही जनता को लूट रही है?

  • 5. 22:04 IST, 02 नवम्बर 2010 satish sharma:

    वर्मा जी, ठीक ही आपने बहुत से लोगों के विचारों को कलम से बता दिया है. वैसे आप इस आर्टिकल का नाम 'कैसे कैसे टॉमी' रखते तो ज़्यादा ठीक था.

  • 6. 22:45 IST, 02 नवम्बर 2010 डॉ.लाल रत्नाकर, गाजियाबाद /जौनपुर :

    विनोद जी, पूँछ की बात आपने की और उसके हिलाने की आपकी उक्ति वाजिब लगी. कौन कहता है 'पूँछ' का इस्तेमाल कम हुआ. जितना सही डार्विन का मत है उतना ही हिन्दुस्तानी प्रोफेसर का भी,पर पूँछ से चन्द्र-बिंदी निकालकर देखिये सबमें अपनी अपनी पूछ बढ़ाने और बढ़वाने की होड़ लगी है. राहुल को प्रधानमंत्री तक ले जाने की होड़ लगी है, इसलिए नहीं की राहुल 'जे-पी' हो सकते है या 'अटल' पर ऐसा कहने से राहुल के यहाँ या 10 जनपथ में उनकी पूछ बढ़ेगी. और अगर ये पूँछ बढ़ गयी तो हिलाने में कितनी सुविधा होगी क्योंकि इन्ही पुन्छ्धारियों ने भले ही हनुमान जैसी लंका न जलाई हो पर 'इंदिरा इज़ इंडिया' वाली इंडिया का कितना हिस्सा जला चुके है और 'राहुल ही राष्ट्र है' की कितनी झुग्गियां जलाएँगे 'उसके लिए आखिर पूछें तो हिलानी ही पड़ेगीं. आख़िर जलाने के लिए तो पूँछ होनी ही चाहिए .

  • 7. 07:23 IST, 03 नवम्बर 2010 Sunil Thalor:

    आपकी पूँछ में दम है विनोद जी, बहुत अच्छा लिखा है आपने. कोटि कोटि धन्यवाद.

  • 8. 10:17 IST, 03 नवम्बर 2010 Mohammad Alamgir, Kapia, Siwan, Bihar:

    आपने सही फ़रमाया. आजकल सबसे पहले हमारे नेताओं के पूँछ निकलना शुरू हो गया है. इसका प्रमाण बिहार चुनाव में दिख रहा है.

  • 9. 11:46 IST, 03 नवम्बर 2010 Ajeet S Sachan:

    वर्मा जी, आदर्श घोटाले पर भी कुछ लिखिए. मैं देख रहा हूँ कि कांग्रेस की तरह बीबीसी भी आदर्श घोटाले पर कुछ भी नहीं कह रही है. अभी तो यह मामला अदालत में भी नहीं है कि आप इस पर कुछ कहने से मुकर जाएँ.

  • 10. 12:58 IST, 03 नवम्बर 2010 Sarfaraz Hjipur:

    बहुत अच्छा लिखा है आपने. पढ़कर मंद-मंद मुस्कुराता रहा. आपने तो आशिकों की पूँछ में भी रस्सी बाँध दी. मैं समझता हूँ कि कोई ख़ुद से पूँछ नहीं हिलाना चाहता, जब तक सामने वाला पूँछ हिलाने से ख़ुश न होता हो. राहुल जी जैसे लोगों से गुज़ारिश है कि पूँछ हिलाने वालों को भाव देना बंद करें तो पूँछ ख़ुद-ब-ख़ुद छोटी हो जाएगी.

  • 11. 13:53 IST, 03 नवम्बर 2010 अजय:

    समकालीन राजनीतिक परिदृश्य पर इससे बेहतर कटाक्ष नहीं किया जा सकता.

  • 12. 18:32 IST, 03 नवम्बर 2010 तेजपाल सिंह हंसपाल:

    इन लोगों को क्या-क्या उपाधियाँ देगें हम. इनके बारे में जितना कहो कम है. पूरे विश्व में ही ऐसा ही हाल है. राजनैतिक विश्लेषकों का अब मानना है कि - ओबामा ने 'वी कैन विन' कहकर लोगों को ठग लिया. राजनीति में सेवा भाव अब मर गया है लोग अपना करियर बनाने राजनीति में आते हैं. इन्हें कोई नहीं सुधार सकता ना ही ये सुधरेगें क्योंकि जब तक सूरज चांद रहेगा इनका यही हाल रहेगा.

  • 13. 19:41 IST, 03 नवम्बर 2010 braj kishore singh:

    विनोद जी यह लेख निश्चित रूप से आपके विनोदी होने की पुष्टि करता है. चापलूसी में कुत्तों का जवाब नहीं. उनका पूँछ-नृत्य तो इस कला की पराकाष्ठा है. इसलिए जहाँ भी चापलूसी है हम मान सकते हैं कि उस आदमी की अवश्य अदृश्य पूँछ भी होगी.

  • 14. 23:05 IST, 03 नवम्बर 2010 aftab:

    आपका जवाब नहीं.

  • 15. 15:50 IST, 05 नवम्बर 2010 Deepak Bhatt:

    आपका ब्लॉग पढ़ा. आज के ज़माने में अपने विकास के लिए हर आदमी या औरत को कभी छोटी तो कभी बड़ी जीभ, माफ़ कीजिएगा, पूँछ का इस्तेमाल करना ही पड़ता है. आपका लेख सचमुच धन्यवाद का पात्र है.

  • 16. 22:17 IST, 05 नवम्बर 2010 NARESH DOTASRA:

    राहुल गाँधी बड़े माँ-बाप के बेटे हैं इसलिए मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. जिसके सामने समन्दर हो वह नदी से चुल्लू नहीं भरता.

  • 17. 22:20 IST, 05 नवम्बर 2010 bindu jain:

    आदमी जब आदमियत से गिरता है और उसे अपना ही स्वार्थ दिखता है तब उसमें जानवर के गुण (पूंछ) आ जाते हैं.

  • 18. 11:22 IST, 06 नवम्बर 2010 RAJKUMAR:

    विनोद जी, आनंद से पूँछ ही हिल गई. बढ़िया लेख के लिए साधुवाद.

  • 19. 17:38 IST, 06 नवम्बर 2010 गुंजन:

    वाह! आपकी लेखनी से हमारी पूंछ हिली.

  • 20. 18:57 IST, 06 नवम्बर 2010 arun sharma:

    बहुत ख़ूब साहब. लेकिल इस पूँछ में अगर मनमोहन सिंह का नाम भी जोड़ देते तो बात बन जाती. हाल ही में कांग्रेस अधिवेशन में सोनिया जी पर बोलते वक्‍त वह पूँछ हिलाने के सारे रिकॉर्ड तोड़ कर हटे हैं.

  • 21. 05:56 IST, 07 नवम्बर 2010 Aavaj:

    विनोद वर्मा के आलेख में जिस पूंछ का ज़िक्र डार्विन के आधार पर किया गया है, उसके लिए हिंदुस्तान में तो अपने पूर्वजों में श्री हनुमान जी का स्मरण किया ही जाता है, श्री हनुमान जी अपनी पूंछ का इस्तेमाल आज के अपने वंशजों जैसा संभवतः नहीं करते थे बल्कि पूंछ को मूंछ की तरह रखते थे यद्यपि श्री हनुमान जी मूंछ नहीं रखते थे. आज भी बहुत सारे लोग मूंछ नहीं रखते लेकिन वह पूंछ के लिए बेचैन रहते हैं. आपके इस 'ब्लॉग' से एक ख़तरा नज़र आ रहा है कि कहीं लोग अपनी-अपनी पूंछ न बढ़ाना शुरू कर दें.

  • 22. 10:25 IST, 07 नवम्बर 2010 Niranjan kumar:

    मुझे ये लेख काफ़ी पसंद आया. इसके लिए धन्यवाद.

  • 23. 19:35 IST, 07 नवम्बर 2010 artesh kumar:

    आपने बिलकुल सही लिखा है. आपने जिस तरह से भाषा में शब्दो का प्रयोग किया है वह क़ाबिले-तारीफ़ है. आपने एक पूंछ के सहारे समाज को आईना दिखा दिया.

  • 24. 08:50 IST, 08 नवम्बर 2010 Chiranji Lal Chowdhary:

    मुझे विनोद वर्मा का लेख पसंद आया. मेरी राय में पूँछ हिलाने का एक और सबूत दिया जा सकता है. जैसे अमरीका के आगे भारत का पूँछ हिलाना.

  • 25. 17:31 IST, 09 नवम्बर 2010 Gautam Kumar:

    बेहद सुन्दर विश्लेषण एवं व्यंग विधा का एक बेहतरीन नमूना. मैं भी इस आर्टिकल पर आपके लिए पूँछ हिलाता हूँ. किसी ने देखा तो नहीं!

  • 26. 13:27 IST, 10 नवम्बर 2010 Abdul Rashid:

    बेहतरीन!

  • 27. 14:18 IST, 10 नवम्बर 2010 आर.एन. शाही:

    वर्मा जी, पूंछ हिलाऊ संस्कृति का बेहद सजीव चित्रण … बधाई. दरअसल इस संस्कृति का प्रवर्तक देश भारत ही है. रजवाड़ों के दरबार से लेकर गोरे प्रभुओं की जी-हुज़ूरी तक यह संस्कृति पुष्पित पल्लवित हुई. आज तो हम मात्र अपभ्रंश ही देख पा रहे हैं. आपने ठीक ही कहा, चूंकि कांग्रेस का जन्म और विकास गोरी सरकार के ज़माने में ही परवान चढ़ा था, अत: उक्त संस्कृति के मामले में यह पार्टी थोड़ी अधिक समृद्ध है. बाक़ी इस पार्टी से निकल कर इसके बीज जहां तक छितरा पाए, वहां भी इसका दिया जलाकर रखने वाले मौज़ूद हैं. इस संस्कृति के बड़े फ़ायदे भी हैं. किसी के पक्ष में माहौल बनाकर अपने जैसी पूंछ हिलाऊ ज़मात खड़ा करना इस संस्कृति के पुरोधाओं के ही ज़िम्मे होता है और वे खूब लाभान्वित होते हैं.

  • 28. 08:27 IST, 13 नवम्बर 2010 cpsingh:

    शिक्षाप्रद व्यंग्य है यह.

  • 29. 00:08 IST, 26 नवम्बर 2010 सौरभ कुमार वर्मा ,जमशेदपुर इंडिया :

    विनोद जी, आपकी बात में दम है. पूँछ हिलाने की भाषा तो सभी लोगों की समझ में आने लगी है. पूँछ हिलाना तो सभी जानवरों (इंसानों) की फितरत है. पूँछ को हिलने दीजिए और हम सब इस भाषा की मधुरता का आनंद लेते हैं.

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