ओबामा देने नहीं लेने आए हैं !
अभी तक भारत आए अमरीका के छह राष्ट्रपतियों में से किसी ने अपनी यात्रा की शुरुआत मुंबई से नहीं की है. हालांकि ओबामा ये दिखाना चाहते हैं कि उनकी यात्रा का मक़सद मुंबई हमलों के शिकार लोगों को श्रद्धांजलि देना है, लेकिन वो वास्तव में मंदी से जूझ रहे अमरीका वासियों के लिए रोज़गार खोजने आए हैं.
अमरीका की बेरोज़गारी दर नौ फ़ीसदी के आसपास मँडरा रही है, जबकि भारत की विकास दर इस समय लगभग यही आँकड़ा छू रही है. सुनने में ये बात आश्चर्यजनक लग सकती है कि हाल में अमरीका में भारत के निवेश की वजह से 65 हज़ार नौकरियाँ या तो बनीं हैं या बचाई गई हैं. फ़िक्की और अर्नेस्ट एंड यंग की संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त अरब अमीरात के बाद भारत का अमरीका में निवेश सबसे तेज़ गति से बढ़ रहा है और ये निवेश ज़्यादातर दवाओं और सूचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्रों में हुआ है. मंदी से घिरा अमरीका उच्च तकनीक के निर्यात में छूट देकर नाटकीय रूप से भारत के निवेश को बढ़ाना चाहता है ख़ासकर रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में.
सवाल ये उठता है कि इसके बदले में क्या अमरीका कुछ देने की स्थिति में है? ओबामा दिवाली के मौक़े पर भारत आए ज़रूर हैं लेकिन उनसे ये उम्मीद मत रखिए कि वो आप के लिए दिवाली के उपहार भी साथ लेकर आएँ. उदाहरण के लिए ये उम्मीद पालना कि अमरीका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के भारत के दावे का समर्थन करेगा, फ़िज़ूल होगा.
ओबामा ज़्यादा से ज़्यादा वीटो रहित सुरक्षा परिषद सदस्यता के लिए कोशिश करने का आश्वासन भर दे सकते हैं. भारत को इन लुभावने आश्वासनों से बचना चाहिए. ओबामा आतंकवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ ज़रूर उठाएँगे लेकिन अपने कारणों और अपनी गरज़ की वजह से. इसके बाद अगर आप उम्मीद करें कि वो पाकिस्तान को हथियार ख़रीदने के लिए दो अरब डॉलर के पैकेज पर पुनर्विचार करें तो आप बहुत बड़े मुग़ालते में हैं. अमरीका भारत से चाहता तो बहुत है लेकिन बदले में ख़ास ज़्यादा दे नहीं सकता.
शायद यही वजह है कि मनमोहन सिंह बराक ओबामा से वो कहने की स्थिति में नहीं हैं जो उन्होंने उनके पूर्ववर्ती से कहा था कि 'सारा भारत आपको प्यार करता है' !

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आप मुझे ये बताएं कि अमरीका से हमें आज तक क्या मिला है जिसने हमें लाभ पहुंचाया हो. अगर आप आईटी आउटसोर्सिंग की बात करते हैं तो ये इसलिए नहीं कि अमरीका या दूसरे देश हमारे समर्थन में ऐसा कर रहे हैं. वो इसलिए ऐसा कर रहे हैं कि हम सस्ते हैं. आप मुझे बताएं कि आईआईटी जैसे संस्थान से निकले लोगों का अधिकतम लाभ किसे मिला है. इसी अमरीका और इसके साथ में रहने वाले यूरोपीय देशों को. अगर हम पिछले 40 साल को देखें तो पाएंगे कि अमरीका ने हमसे हमेशा लिया है और देने की बारी आने पर पाकिस्तान को ही मदद दी है. चाहे वह 1961 का पैटन टैंक हो या आज की तारीख़ में दी जाने वाली नक़द मदद. मैं तो मानता हूं कि इस मामले में पाकिस्तान काफ़ी बेहतर स्थिति में है. उसने हमेशा अमरीका से मदद ली है और बदले में उसको ही बेवक़ूफ़ बनाया है और इस पर भी अमरीका ख़ुश है.
रेहान फजल साहब आप अमरीका से दीवाली के तोहफों की अपेक्षा ही क्यों करते है 'बनिया' तोहफे बेचता है बांटता नहीं है; ओबामा साहब दीवाली के बाद आये है दिवाली के बाद आपके यहाँ कौन आते है? जरा जोर डालिए दिमाग पर याद आ जायेगा. दूसरी बात ओबामा साहब अश्वेत राष्ट्रपति है, हिंदुस्तान में भी कई अमेरिका है लगभग हर महानगर की कोई न कोई गली अमेरिका है, उन्हें जिस अमेरिकी राष्ट्रपति से लगाव है शायद उस तरह के ओबामा साहब नहीं है कारण हेतु विस्तार में न जाते हुए केवल इतना की ओबामा मूलतः भारत के मूल निवासियों से मेल खाते है पीछे से 'इस्लाम' से भी ताल्लुक रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में एक कुटनीतिक नेता की बजाय आम आदमी की तरह नजर आ रहे है और इस देश के आम आदमी को, भारत की ही 'आर्थिक नीतियों' से क्या मिला है आप भारत की विकासदर को बता कर खुश हैं पर आम आदमी की दशा (जो संभवतः) सरकारी आंकड़ों में नहीं होता की दशा और दिशा दोनों तरह से काले कूप की ओर ही ले जा रही है.
अमरीका क्या देगा जिसको देना है वो अपने बाप दादाओ के नाम पर 'योजनायें लांच' करते है और बकौल स्व.राजीव गाँधी 100 में से 85 खा जाते है. तभी तो कई बार याद आता है. ......बाबा के नाम दे दे .........माता के नाम दे दे .....पीर के नाम दे दे ? और अंत में जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला.
मुझे अब तक यह नहीं समझ में आया कि हमारे नेताजी लोगों को अमरीका क्यों रास आता है जबकि इस देश से दोस्ती की वजह से हमारे पुराने साथी हमसे नाराज़ हैं या फिर हमसे रिश्ता तोड़ डालना चाहते हैं. अब तो इस देश को अल्लाह ही बचाए.
सेंट ज़ेवियर के छात्रो को जो प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई थी वे आमतौर पर सामान्य ही थे. जैसेकि बीबीसी हिंदी पर आफ़शीन ईरानी का सवाल छपा है. अन्य सवाल खाड़ी में तेल के रिसाव पर मुआवज़े या भोपाल गैस त्रासदी से संबद्ध थे. हम लगता है झुक गए हैं.
रेहान भाई पश्चिमी दुनिया ने आज तक भारत से कुछ-न-कुछ लिया ही है दिया कुछ भी नहीं है. अंग्रेजों ने हमें दो सौ सालों तक लूटा. अमेरिका आज बेबस है. ओबामा राष्ट्रपति बनने के बाद चीन से मित्रता बढ़ाने में लगे थे. अभी पिछले साल ही वे चीन की यात्रा पर आकर बिना भारत आए ही लौट गए थे. उन्हें लग रहा था कि वे चीन को मुद्रा-अवमूल्यन सहित सभी विवादित मुद्दों पर ढील देने के लिए मना लेंगे. चीन नहीं माना, उलटे उसने अमेरिका को नुकसान पहुँचानेवाले कदम उठाने शुरू कर दिए. अब ओबामा उन देशों में झोली लेकर मदद मांगने चले हैं जिनसे चीन की नहीं बनती है. ये लोमड़ी की तरह चालाक हैं. इन्हें पैग़म्बर समझना हमारी भूल होगी.
दो देशों के बीच यह सामान्य बात है. मेरे विचार से ये लेने और देने का सवाल नहीं है. यह सही समय है कि हम अमरीका के साथ अपने संबंधों को बढ़ाएं. अमरीका एक डेमोक्रेटिक देश है और अमरीकी अपनी पॉलिसी 50 पहले बनाते हैं. इसलिए हमें चीन जैसा सलूक करना चाहिए. हम लोग भिखारी नहीं हैं.
कृषि से जुड़ी 65 फ़ीसदी आबादी और असंगठित क्षेत्र के कामगारों वाले भारत को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस यात्रा से क्या हासिल होगा? ओबामा की यात्रा के दौरान होने वाले क़रारों से अमेरिका में 50 हज़ार से अधिक लोगों को रोज़गार मिलने 'अमरीकियों की बेरोज़गारी की हमें बेहद फ़िक्र है लेकिन हमारी बेरोज़गारी की चर्चा क्यों नहीं हो रही.'
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत और अमेरिका के बीच 10 अरब डॉलर (करीब 44 हज़ार करोड़ रुपए) के अनेक सौदों का ऐलान किया. इससे अमेरिका में क़रीब 50 हज़ार नौकरियों का सृजन हो सकेगा. उन्होंने भारत से व्यापार बाधाएं दूर करने को कहा और साथ यह भी भरोसा दिलाया कि अमेरिका भी ऐसे ही क़दम उठाएगा. उन्होंने उम्मीद जताई की भारत-अमेरिकी साझेदारी 21 वीं सदी में अहम साबित होगी.
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़ देश में इस समय क़रीब डेढ़ लाख अमरीकी नागरिक विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी कर रहे हैं. यह बात अलग है कि अमरीकी प्रशासन भारतीय आईटी कंपनियों की आउटसोर्सिग को लेकर सख़्त नज़रिया रखता है. अमेरिकी जब यहां काम करते हैं तो अपनी आय का एक हिस्सा अपने देश भी भेजते हैं जिससे उनकी अर्थव्यवस्था में भी सहयोग होता है. ऐसे में यह कहना कि सिर्फ़ भारतीय ही अमेरिका में कमा रहे हैं, सौ फ़ीसदी सही नहीं है.
यह उचित नहीं है कि आज़ादी के 65 साल पूरे करने वाला भारत जैसा विशाल देश अमेरिका से घुटने टेक कर कहे कि पाकिस्तान से हमें बचाओ. क्या हमारे अंदर स्वाभिमान जैसी कोई चीज़ नहीं है.
ओबामा को प्राग में दिए गए भाषण के कारण ही नोबेल शांति पुरस्कार मिला. उन्होंने तक़रीबन वही कहा जो राजीव गांधी ने 1988 में कहा था. बीस साल के बाद भारत को ऐसा क़दम उठाना चाहिए कि दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु शक्ति अमेरिका और सबसे छोटी परमाणु शक्ति भारत मिलकर दुनिया को निरस्त्रीकरण की ओर अग्रसर कर सकें.
माफ़ कीजिए जनाब रेहान फज़ल मैं ओबामा की इतनी कटुता से बुराई को सही नहीं मानता. एकतरफ़ा ना हों. ज़रा दूसरे पहलू पर विचार करें. अमरीकी राष्ट्रपति सारी दुनिया के सामने हिंदुस्तान के आगे नतमस्तक हो गया. वैश्विक परिदृश्य में भारत को लेकर समीकरण बदलने शुरु हो गए हैं. हमें लेकर दूसरे देशों का नज़रिया बदलेगा. दुनिया जान गई है कि अमेरिका को भारत की ज़रुरत है. अमेरिका ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में भारतीयों की और ज्यादा इज़्जत मिलेगी. हमें अब एक ऐसे देश के रुप में जाना जाएगा जो अमेरिका को भी झुका सकता है.
मेरा सिक्का (राजनेता) खोटा तो सोनार को क्या दोष दें!
मुझे भारतीय समझ में नहीं आते. उनका विचार है कि वह पहले से ही आत्मनिर्भर हैं और फिर भी अमरीका से कुछ न कुछ लेना चाहते हैं. यह दोहरा स्तर है. मेरे विचार से ओबामा भारत को ख़ुश करना चाहता है. वह भारत का मन से आदर करता है. तो फिर नकारात्मक शब्द क्यों. आख़िर भारत के लोग अमरीका से क्या चाहते हैं? डॉलर, रोज़गार या दोस्ती? क्या कुछ लेना चाहते हैं या उस जैसी हैसियत चाहते हैं. आख़िर क्या-क्या चाहते हैं? मैं एक नेपाली नागरिक हूं और अमरीका में रहता हूं मैं भारत के बारे में सकारात्मक भावना रखता हूं लेकिन वे इसे नहीं समझते. मेरा मानना है कि अगर कोई आपसे अच्छे से बात करे है तो आप भी अच्छे से बात करो. नुक़ते मत निकालो.
रेहान साहब बराक ओबामा भारत आए, और चले भी गए. आपका आकलन काफ़ी हद तक सटीक है. उन्होंने पाकिस्तान से अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के अंतरसंबंधों का कोई जिक्र नहीं किया और न ही मुम्बई हमलों पर उसकी भूमिका के खिलाफ़ ही कोई एक शब्द कहा. इस मसले पर अपने पूरे दौरे में ओबामा बचाव की मुद्रा में ही दिखे, यहां तक कि बच्चों के सामने भी. सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता के विषय में उनका समर्थन अवश्य मुखर रहा, परन्तु खुद चीन के एक अखबार ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में उनके इस आश्वासननुमा समर्थन को ओबामा द्वारा दिया गया एक ऐसा चेक करार दिया है, जिसे भुना पाना भारत के लिये आसान नहीं होगा. जी-20 की ओर आशा भरी नज़रों से देखना ही भारत को अपने अभीष्ट तथा ओबामा को अपने समर्थन की सार्थकता, दोनों के लिये मजबूरी है. ले देकर भारत को जो कुछ भी हासिल करना है, अपने बूते ही हासिल करना होगा और भारत निर्विवाद रूप से उस दिशा की ओर अग्रसर भी है. अब हमें भारत के याचक वाली छवि के आग्रहों से ऊपर उठकर ही कुछ लिखना चाहिए. बेहतरीन ब्लाग-पोस्ट के लिए साधुवाद.
ओबामा एक पर्यटक नहीं एक राजनेता है. हमें उनका स्वागत करना चाहिए, पूरे सम्मान के साथ. हमें उनकी भाषा को ठीक से पढ़ना होगा. उनसे जितना फायदा हो लेना चाहिए और साथ में अपनी ओर से देना चाहिए.