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सफल आयोजन से जुड़ी टीस

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मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|रविवार, 14 नवम्बर 2010, 00:39 IST

ग्वांगजो ने जितने बेहतरीन ढंग से उदघाटन समारोह आयोजित किया उसने एक बार फिर दिखा दिया कि अगर समय से और योजनाबद्ध तरीक़े से काम हो तो मुश्किल कुछ भी नहीं.

इसमें कोई शक़ नहीं कि चीन के पास 1990 के बीजिंग एशियाड और 2008 के ओलंपिक आयोजित करने का अनुभव है मगर जिस ख़ूबसूरती से चीन ने ग्वांगजो को ये आयोजन देकर इस शहर का विकास किया वो देखने लायक़ है.

भारत ने राष्ट्रमंडल खेल आयोजित किए दिल्ली में और वो भी उसके पहले से ही विकसित क्षेत्रों में. भारतीय ओलंपिक संघ के अधिकारी अब 2019 के एशियाड का आयोजन हासिल करने की कोशिश में लगे हैं मगर एक बार फिर मेज़बानी दिल्ली को ही मिलेगी.

इधर ग्वांगजो ने एशियाड के आयोजन के तहत शहर के उस हिस्से को विकसित किया जो कभी पूरी तरह बंजर था. 2012 के ओलंपिक के लिए लंदन भी पूर्वी हिस्से को विकसित कर रहा है.

भारत में भी आयोजकों को अब दिल्ली से बाहर निकलकर सोचना चाहिए.

एशियाड के इस आयोजन को देखकर जो दूसरी बात ध्यान में आती है वो ये कि समय से अगर तैयारियाँ पूरी कर ली जाएँ तो लोगों में उत्साह पैदा करने की कोशिश की जा सकती है.

आयोजकों ने स्टेडियम समय से तैयार कर दिए और अन्य सुविधाएँ भी तैयार कर दीं इसके बाद शहर को एशियाडमय करने की कोशिश हुई.

राष्ट्रमंडल खेलों में तो जब भारतीय एथलीट्स का प्रदर्शन बेहतर हुआ तब कहीं जाकर लोगों का उत्साह जगा था मगर चीन में तो पहले से ही लोग उत्साहित हैं कि एक बार फिर दुनिया की नज़रें उनके शहर पर लगी हैं.

सुरेश कलमाड़ी भारतीय दल के साथ ग्वांगजो में हैं और जब मैंने पहले दिन उनसे इस आयोजन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा था कि अच्छा दिख रहा है और अभी तो आए हैं देखते हैं आगे.

ऐसा लगा मानो एकतरफ़ ओलंपिक संघ के अध्यक्ष होने के नाते आयोजन की तारीफ़ करना उनकी मजबूरी है तो दूसरी ओर भारत की जितनी आलोचना हुई उसे देखते हुए वे चाह रहे हों कि यहाँ की भी कुछ ख़ामियाँ सामने आएँ.

यहाँ का आयोजन देखने के बाद तुलनात्मक रूप से मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं कि जितने दिन खेल हुए उन दिनों भारत ने काफ़ी अच्छे ढंग से खेलों का आयोजन किया, दुनिया के बेहतरीन खेल स्टेडियमों को चुनौती देने वाले स्टेडियम भी बने मगर यही सब अगर समय रहते कर लिया गया होता तो समय रहते लोगों में भी खेलों के प्रति उत्साह जगाया जा सकता था.

ये टीस शायद हर भारतीय के मन में दुनिया में कहीं भी हो रहे सफल खेल आयोजन के बाद उठेगी ही.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:30 IST, 14 नवम्बर 2010 ZIA JAFRI:

    इस समय सुरेश कलमाड़ी का वही हाल है कि तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे. हमें चीन से यह सबक लेना चाहिए कि सफ आयोजन कैसे करें. देश के पिछड़ों भागों को इन खेलों के माध्यम से कैसे विकसित करें. हमें 'भारत दिल्ली, और दिल्ली भारत' से ऊपर उठना होगा.

  • 2. 10:07 IST, 15 नवम्बर 2010 shailendra :

    अधिक लोकतंत्र, अधिक नौकरशाही और कम भ्रष्टाचार.

  • 3. 10:23 IST, 15 नवम्बर 2010 braj kishore singh:

    मुकेशजी चीन हमसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अलावा हर मामले में कोसों आगे है.वहां सार्वजानिक क्षेत्रों में भ्रष्टाचार नहीं है जबकि अपने यहाँ हर जगह भ्रष्टाचार है.अपने यहाँ कानून है लेकिन व्यवस्था नहीं है और वहां कानून नहीं है परन्तु व्यवस्था है.चीन ने किसी भी मामले में पश्चिम की नक़ल नहीं की और अपने तरीके का अलग-सा तंत्र विकसित किया.जबकि हमारे कुछ भी मौलिक नहीं है और हमने संविधान से लेकर प्रत्येक मामले में आँख मूंद कर पश्चिम की नक़ल की है जिससे कई तरह की विकृत्तियां उत्पन्न हो गयी हैं.

  • 4. 11:28 IST, 15 नवम्बर 2010 Ankiet:

    आप कि बात सही है,पर कार्यक्षमता के मामले पर टीस नहीं है. राष्ट्रमण्डल खेलों ने भ्रष्टाचार से लेकर एक तरफ़ा प्रचार तक हर मुसीबत को पार किया था,जो कि एशियाड इन मुसीबतों से नहीं गुज़र रहा है. पर टीस तो रहेगी, भारत में फल-फूल रहे भ्रष्टाचार से! मुझे कमल हसन की एक फ़िल्म का संवाद याद आ रहा है, जिसमें वो कहते हैं कि "भ्रष्टाचार हर देश में होता है, पर वहाँ मर्यादा और कानून तोड़ने के लिये होता है, जब कि यहाँ भारत में मर्यादा और कानून को निभाने के लिये भी भ्रष्टाचार होता है." और ये टीस आगे भी हमेशा खलेगी.

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