बेईमानों के बीच ईमानदार
मैं एक प्रशासनिक अधिकारी को जानता हूँ जिनकी ईमानदारी की लोग मिसालें देते हैं.
वे एक राज्य के मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव थे लेकिन लोकल ट्रेन की यात्रा करके कार्यालय पहुँचते थे. वे मानते थे कि उन्हें पेट्रोल का भत्ता इतना नहीं मिलता जिससे कि वे कार्यालय से अपने घर तक की यात्रा रोज़ अपनी सरकारी कार से कर सकें.
वे ब्रैंडेड कपड़े ख़रीदने की बजाय बाज़ार से सादा कपड़ा ख़रीदकर अपनी कमीज़ें और पैंट सिलवाते थे.
जिन दिनों वे मुख्यमंत्री के सचिव रहे उन दिनों सरकार पर घपले-घोटालों के बहुत आरोप लगे. उनके मंत्रियों पर घोटालों के आरोप लगे. लोकायुक्त की जाँच भी हुई. कई अधिकारियों पर उंगलियाँ उठीं.विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त भी हुई. कहते हैं कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अच्छा चंदा भी पहुँचता रहा.
लेकिन वे ईमानदार बने रहे. मेरी जानकारी में वे अब भी उतने ही ईमानदार हैं.
उनकी इच्छा नहीं रही होगी लेकिन वे बेईमानी के हर फ़ैसले में मुख्यमंत्री के साथ ज़रुर खड़े थे. भले ही उन्होंने इसकी भनक किसी को लगने नहीं दी लेकिन उनके हर काले-पीले कारनामों की छींटे उनके कपड़ों पर भी आए होंगे.
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सत्यनिष्ठा और ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहता. अगर कोई चाहे भी तो नहीं उठा सकता क्योंकि वे सच में ऐसे हैं. वे सीधे और सरल भी हैं.
राजीव गांधी के कार्यकाल को इतिहास का पन्ना मान लें और ओक्तावियो क्वात्रोची को उसी पन्ने की इबारत मान लें तो सोनिया गांधी पर भी कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं हैं. कम से कम राजीव गांधी के जाने के बाद वे त्याग करती हुई ही दिखी हैं. एक दशक तक राजनीति से दूर रहने से लेकर प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न करने तक.
लेकिन इन दोनों नेताओं की टीम के सदस्य कौन हैं? दूरसंचार वाले ए राजा, राष्ट्रमंडल खेलों वाले सुरेश कलमाड़ी और आदर्श हाउसिंग सोसायटी वाले अशोक चव्हाण.
अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती हमेशा बेहद ईमानदार नेताओं में होती रही है. लेकिन उनके प्रधानमंत्री रहते तहलका कांड हुआ, कारगिल में मारे गए जवानों के लिए ख़रीदे गए ताबूत तक में घोटाले का शोर मचा और पेट्रोल पंप के आवंटन में ढेरों सफ़ाइयाँ देनी पड़ीं. यहाँ तक के उनके मुंहबोले रिश्तेदारों पर भी उंगलियाँ उठीं.
ऐसे ईमानदार राजनीतिज्ञ कम ही सही, लेकिन हैं. लेकिन वो किसी न किसी दबाव में अपने आसपास की बेईमानी को या तो झेल रहे हैं या फिर नज़र अंदाज़ कर रहे हैं.
ऐसे अफ़सर भी बहुत से होंगे जो ख़ुद ईमानदार हैं लेकिन बेईमानी के बहुत से फ़ैसलों पर या तो उनके हस्ताक्षर होते हैं या फिर उनकी मूक गवाही होती है.
यह सवाल ज़हन में बार-बार उठता है कि इस ईमानदारी का क्या करें? अपराधी न होना अच्छी बात है लेकिन समाज के अधिकांश लोग अपराधी नहीं हैं. लेकिन ऐसे लोग कम हैं जिनके पास हस्तक्षेप का अवसर है लेकिन वे हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं. जो लोग अपराध के गवाह हैं उन्हें भी क्या निरपराध माना जाना चाहिए? क्या वे निर्दोष हैं?
एक तर्क हो सकता है कि बेईमानों के बीच ईमानदार बचे लोगों की तारीफ़ की जानी चाहिए. लेकिन यह नहीं समझ में नहीं आता कि बेईमान लोगों के साथ काम कर रहे ईमानदार लोगों की तारीफ़ क्यों की जानी चाहिए? बेईमानी को अनदेखा करने के लिए या उसके साथ खड़ा होने के लिए दंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?
कालिख़ के बीच झक्क सफ़ेद कपड़े पहनकर घूमते रहने की अपनी शर्तें होती हैं. और कितने दिनों तक लोग इन शर्तों के बारे में नहीं पूछेगें?

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आप इस पर क्या सोचते हैं मि. जेंटलमैन?
विनोद जी आपने ऐसी बात कह दी जो शायद भारत जैसे देश मैं मुमकिन नहीं जो २०० साल तक विदेशियों का गुलाम रहा है. आप कैसे कह सकते हैं कि एक अदना आदमी जो नौकरी कर अपने बाल बच्चों का पेट पाल रहा है इस भ्रष्टाचार की काल कोठरी की सफ़ाई कर सकता है या उसका जिम्मा उठा सकता है. इस देश में नैतिकता का इतना मापदंड अभी तक इतना ही परिमार्जित हो पाया है कि एक ईमानदार आदमी अपने को व्यवस्था की काली करतूतों से अपने को अलग रख सकता है. उससे इतनी उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अकेले जेहाद छेड़ने क़ी हिम्मत जुटा पाए. उसका यह कम दुस्साहस की श्रेणी में गिना जाएगा क्योंकि भ्रष्टाचार नामी हम्माम में अधिकांश नंगे हैं. काश कि इस देश में ऐसे योद्धा जन्म लेते जो आपके स्वप्नों को साकार करते.
विनोद वर्मा जी, आपकी आखिरी लाइन काफ़ी अर्थपूर्ण है. कहावत है कि 'काजल की कोठरी में कैसो भी जतन करो, काजल का दाग भाई लागे ही लागे'. कई बार ऐसा होता है कि वास्तव में ईमानदार लोगों पर भी उंगलियाँ उठ ही जाती हैं, क्योंकि रहते तो हैं कालिख़ पुते चेहरों के बीच ही! ये बेचारे अपनी निश्छल प्रवृत्तियों से लाचार कोई लाभ भी नहीं उठा पाते, और जीविका की मजबूरियों के कारण होठों को सी कर चुपचाप लांछन भी सहना पड़ता है. अधिक सफ़ाई देने के चक्कर में सच्चाइयों का पर्दाफ़ाश करना पड़ेगा, जो स्वयं व पारिवारिक अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सकता है. क्या करें, नौकरी या नेतागिरी छोड़ दें? तो फ़िर जाएंगे कहां? यहां तो पूरे कुएं में ही भंग पड़ी हुई है. लेकिन जहां तक सवाल मनमोहन सिंह या अटल जी जैसे कद्दावर नेताओं का है, ये काफ़ी कुछ करके राजा राममोहन राय की तरह भारतीय राजनीति के रिफ़ार्मर बन सकते थे, इतिहास पुरुष बन सकते थे. परन्तु यह सब कुछ इतना आसान भी नहीं है. चुनाव प्रणाली में काफ़ी सुधार के बावज़ूद वह आज भी काफ़ी खर्चीली है. पिछले आम चुनावों में आठ से दस हज़ार करोड़ रुपए खर्च होने का आकलन है, जिसमें अधिकांश पार्टी फ़ंड का ही रुपया रहा होगा. यह रुपया आता कहां से है? अपने फ़ंड मैनेजरों को आंख मूंदकर राशि जुटाने का प्रोत्साहन इन ईमानदार नेताओं को भी थक-हार कर देना ही पड़ता होगा. तो बन गए न पाप में भागीदार? जो प्रणाली है, उसमें काले पैसे के बिना काम चलने वाला नहीं है, और जब पैसा लेंगे तो जीतने के बाद जिससे लिया है, उसको उपकृत करने और अपनी रिकवरी का मौक़ा देने के लिये क्या-क्या करना पड़ेगा, कहां-कहां आंखें मूंदनी होंगीं, इसका हिसाब लगाना कठिन नहीं है । बहुत सी फाँस हैं ईमानदारों को लाचार करने के लिये वर्मा जी. अच्छे आलेख के लिये साधुवाद.
वाह विनोद जी, अगर आप मेरे सामने होते तो आपको सैल्यूट करता क्योंकि बीबीसी पर पहली बार किसी ने इतना शानदार सच लिखा है. आपकी हिम्मत को सलाम करता हूँ. मेरे ख़याल से राजा को नहीं मनमोहन सिंह को इस्तीफ़ा देना चाहिए था. दोषी तो मनमोहन सिंह हैं.
इस बहस का अंत तभी हो जाता है जब हम और आप मान लेते हैं कि भ्रष्टाचार एक सामाजिक सत्य बन चुका है. आप कोई भी चैनल देख लीजिए, मैग्ज़ीन देख लीजिए या समाचार पत्र की समीक्षा पढ़ लीजिए सब कह रहे हैं कि इसको सामाजिक मान्यता मिल चुकी है. अब कभी कुछ आप जैसे लोग इस मुद्दे को उठाते रहे हैं. मेरा तो सुझाव यही है कि सिर्फ़ बीमारी की बात करके न रह जाएँ अगर कोई इलाज है तो उस पर भी काम करें. अन्यथा यह दहेज की तरह हो जाएगा कि क़ानून ग़लती है लेकिन यह एक सामाजिक प्रथा बन चुकी है.
मैं आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूँ और शायद इसी सोच का हूँ. असल में प्रधानमंत्री का काम भ्रष्टाचार से बचे रहना ही नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार को रोकने का भी है. इस तरह से साफ़ है कि कौन दोषी है. कहावत है ना, अंधेर नगरी चौपट राजा...भारत का भगवान ही मालिक है.
कालिख़ के बीच झक्क सफ़ेद कपड़े पहनकर घूमते रहने की अपनी शर्तें होती हैं - यही पंक्ति तो सब कुछ कह जाती है, बहुत बढ़िया!!!
कोई महापंडित है, दयावान है, धार्मिक है, दानपुण्य करने वाला है, आशावादी और ईमानदार है लेकिन सड़क पर दुर्घटना हो जाने पर घायल व्यक्ति को इसलिए उठाकर अस्पताल नहीं पहुँचाता क्योंकि पुलिस परेशान करेगी और बाद में कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे. तो ऐसी मानवता वाले को स्वार्थी ही कहना ठीक होगा. बेईमान लोगों के बीच रहना और उनकी बेईमानी पर नहीं बोलना या गुनाह में शामिल नहीं होना पर गुनाह करते ख़ामोशी से देखना बेईमानी करना या गुनाह करने जैसा ही है. यह किसी की मजबूरी भी हो सकती है? करे तो क्या करे, नौकरी जो करनी है. हर पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए चंदा चाहिए. चंदा चाहे जो भी ले दोषी तो वो सभी लोग हैं जो इस चंदे का उपयोग करके चुनाव जीतते हैं. नेता अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं कर सकते क्योंकि वे ख़ुद भी तो अधिकारियों की मदद से पैसे कमाते हैं. नेता तो पैसा कमाकर चले जाते हैं लेकिन अधिकारियों को तो 30 साल तक नौकरी में रहना पड़ता है. कह सकते हैं कि जो भ्रष्ट है उस नेता को वोट मत दो, अगर दूसरे को वोट दिया और वो भी भ्रष्टाचार करने लग गया तो जनता क्या करे? जनता अगर कुछ न कर सके तो काली पट्टी लगाकर विरोध प्रदर्शन तो करे. और कुछ नहीं तो मीडिया की नज़र तो जाएगी. आख़िर कुछ घोटालों का पर्दा तो फ़ाश हो ही रहा है और मीडिया की वजह से मजबूरी में कुछ कार्रवाई तो करनी ही पड़ रही है हमारी सरकार बेचारी को.
बहुत सही लिखा है आपने. सिर्फ हमारे ईमानदार होने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा. उसे खत्म करने के लिए हम जिस सिस्टम का हिस्सा हैं उसके अंदर के करप्शन को भी रोकना होगा और इसके लिए विरोध करना होगा.
विनोद जी, आपका ब्लॉग पढ़कर ख़ुशी हुई. हमें इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. लेकिन मैं आपके इस विचार से सहमत नहीं हूँ कि हमारे देश में अधिकांश लोग भ्रष्ट नहीं हैं. मैं समझता हूँ कि भारतीय लोग बड़े पैमाने पर भ्रष्ट हैं और जो पैसा नहीं बना रहे हैं उन्हें अब तक ऐसा करने का मौक़ा नहीं मिला है. ऐसी स्थिति में हमारे समाज में परिवर्तन धीरे-धीरे ही आएगा. इस बात को मान लेगा सुधार की दिशा में पहला क़दम होगा.
विनोद वर्मा जी, पहली बार मुझे ऐसा लग रहा की आपने आधा सोच कर निष्कर्ष दे दिए हैं. एक ईमानदार व्यक्ति के पास कितने विकल्प बचते हैं गलती के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए? और वो कहाँ-कहाँ जाकर लड़े और कितनों से लड़े? यहाँ चारों ओर भ्रष्टाचार फैला हुआ है और कोई एक व्यक्ति इसे ख़त्म नहीं कर सकता चाहे वो प्रधानमंत्री ही क्यों ना हो. आप शायद विश्वास ना करें लेकिन हम भी ईमानदार हैं. कभी किसी के लिए ग़लत नहीं सोचे और ना किए. लेकिन जब जाति प्रमाण पत्र बनाने की बारी आई तो हर टेबल पर नज़राना देना पड़ा. ऐसा नहीं है की हम शिकायत नहीं कर सकते थे लेकिन अगर ऐसा करते तो कुछ दिन बाद जो साक्षात्कार देना था वो नहीं दे पाते. और फिर अगर हम शिकायत कर भी देते तो इसकी क्या गारंटी है की मेरा काम हो ही जाता. इस तंत्र में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों की कमी नहीं है लेकिन समाज उसे क्या इनाम देता है, एक कफ़न जिसके सहारे उसे सत्येंद्र दुबे के पास भेज दिया जाता है. क्या सचमुच में वो इस इनाम के हक़दार हैं??
विनोद जी क्या बताऊँ कितना दुष्कर होता है दुष्टों के बीच संत बने रहना. माननीय मनमोहन सिंह जी की विवशताएँ जग ज़ाहिर हैं पर किसी कठोर क़दम की उम्मीद भी सिर्फ़ उन्हीं से की जा सकती है. आपने एक अंदर बैठे अकर्मण्य का चित्रण तो किया है परंतु मुझे लगता है कि हम बेईमानों से इतने आहत हैं कि उनकी ईमानदारी को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.
मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि ईमानदार लोगों को सज़ा होनी चाहिए क्योंकि वह बेईमानों की अनदेखी करते हैं. अब साहब ऐसा है कि ईमानदार लोग तो उँगलियों पर गिने जा सकते हैं और आप फिर भी उन्हीं लोगों के पीछे पड़े हैं. दरअसल समस्या यह नहीं है कि लोग ईमानदार हैं या बेईमान, समस्या हमारे सरकारी विभागों के सिस्टम की है जो इतनी जटिल है कि आप चाह कर भी कोई काम नहीं करवा सकते और अगर कोशिश की तो काम किसी न किसी लूप में फँसकर रह जाएगा. सरकार को चाहिए कि वह सिस्टम को सरल बनाए. जब तक सिस्टम सरल और पारदर्शी नहीं होगा इसी तरह थूक-पॉलिश से काम चलता रहेगा.
अगर बात ईमानदारी की है तो कई बेईमानों को छिपाने वाला ईमानदार कैसे हो सकता है? माना की हो सकता है ये लोग बेईमान ना हो लेकिन फिर इन्होंने बेईमानों को रोका क्यों नहीं? आख़िर नेता तो यही हैं, पूरी कमान तो इन्हीं के हाथ में है. मैं तो कहता हूं कि सबसे बड़े बेईमान यही हैं.
वाह ! लिखें तो इस तरह से - कमालकर दिया आपने , ऐसे ही एक ईमानदार नौकरशाह को मै भी जानता हूँ जो निहायत ईमानदार अफसर माने जाते रहे है, उनकी मुलाक़ात एक बार स्वामी अग्निवेश के 7 जंतर मंतर वाले आवास पर हुई मैंने उनका अभिवादन किया, उनको विदाकर स्वामी जी ने मुझसे पूछा इन्हें कैसे जानते हो मैंने उन्हें बताया, इस पर स्वामी जी की टिप्पणी थी, "यह ऐसी गाय है जो न बछड़ा देती है और न ही दूध'. आज के जिन राजनेताओं की ईमानदारी की बात आप ने की है उस गाय से काफ़ी मेल खाते नज़र आते है. पुनः आपको और बीबीसी को बधाई.
इस सरकार के कई मंत्री भ्रष्ट हैं.
प्रधानमंत्री कि चुप्पी पर दिनकरजी की पंक्तियाँ याद आती हैं
"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध"
सही है कि तटस्थ रहना हमेशा सही नहीं होता.
विनोद जी का ब्लॉग वास्तव में तर्क संगत है कि अगर ईमानदार व्यक्ति बेईमानी पर शांत रहता है तो यह बेईमानी का साथ देने वाली बात है. यहाँ पर जिस ईमानदार व्यक्ति की बात हो रही है वह कोई कमज़ोर इंसान नहीं बल्कि भारत का सबसे बड़े पद पर बैठा सबसे मज़बूत इंसान है. अगर ताक़त होते हुए भी उसका उपयोग न किया जाए तो उस पर रहने का फ़ायदा ही क्या है? अगर देश की जनता बदलाव टॉप लेवल से देखे तो उसमें उम्मीद भी बढ़े कि वो अगर आवाज़ उठाएगी तो उसकी सुनवाई होगी. जिस तरह हम न्याय प्रणाली में निचली अदालत से होते हुए सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ़ की आस में जाते हैं अगर वहाँ भी पता चले कि सभी ऊँचे पदों पर बैठे लोग सिर्फ़ ईमानदार हैं लेकिन अन्याय के ख़िलाफ़ कुछ नहीं करते तो देश कैसे चलेगा? सुप्रीम कोर्ट की गई टिप्पणी अभी भी कमज़ोर को न्याय दिलाने की उम्मीद दिलाती है. पद की इज़्ज़त उस पर बैठे व्यक्ति के कर्तव्यों के पालन से होती है न कि सिर्फ़ मौन व्रत लेकर तमाशा देखने से. सच ये है कि कोई ख़रा और साफ़ बोले तो उसके हज़ारों दुश्मन पल में बन जाते हैं पर दोस्त बमुश्किल मुठ्ठी भर. जो होता है, होने दो मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है की नीति से सिर्फ़ शोषण ही बढ़ता है.
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध.
विनोद जी ईमानदारी कोई ऐसी चीज नहीं होती, जिसमें बहुत कुछ नज़रअंदाज करने की गुंजाईश रहती हो. ऐसी ईमानदारी की कड़ी निंदा होनी चाहिए जो ख़ुद ईमानदार रहते हुए बेईमानों के साथ खड़ा दिखता हो, या फिर बेईमानी भरी करतूतों को नज़रअंदाज़ करता हो. मनमोहन सिंह हों, सोनिया गांधी या फिर वाजपेयी, यदि अधिकार संपन्न होते हुए भी वे भ्रष्टाचार और बेमाईमानी को रोक नहीं पाए तो वे भी परोक्ष रूप से बेईमान कहे जाएंगे. फिर आप जिस अधिकारी की बात कर रहे हैं, उसकी स्थिति तो हास्यास्पद है. हर चीज़ उनकी नजरों से होकर गुज़री होगी और उन पर आपत्ति जताने का अधिकार भी उन्हें रहा होगा, लेकिन वे चुप रहे. इसे मौन सहमति भी कहा जा सकता है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.
बहुत बढ़िया लिखा है विनोद जी. तब कौन प्रधानमंत्री था जब 10-12 साल पहले रतन टाटा को एक एयरलाइन शुरु करनी थी और उनसे 15 करोड़ की रिश्वत मांगी गई. जहां तक मुझे याद है रतन टाटा 1999-2000 में एयरलाइन शुरु करना चाहते थे. उस समय जो प्रधानमंत्री थे उनसे सवाल जवाब क्यों नहीं किए जाते.
कोई नेता दूध का धुला नहीं है. ये चोर-चोर मौसेरे भाई वाला हिसाब है. जो पकड़ा गया वो चोर जो बच गया वो सिपाही.
दिनकर ने कहा था- समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध. गाँव से लेकर केंद्रीय स्तर पर असामाजिक तत्व हावी हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अच्छे लोग तटस्थ हैं और कायर हैं. प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का कर्ता-धर्ता होता है, केंद्र होता है और मंत्री उसकी नहीं सुने और वह मूकदर्शक बना रहे तो ऐसा प्रधानमंत्री किस काम का?उ सकी ईमानदारी किसके काम की? इससे न तो देश का फायदा हो रहा है न ही समाज का. ईमानदारी लाभकारी होनी चाहिए अन्यथा इसका कोई मतलब नहीं.
अंग्रेज़ी में एक कथन है दुनियाँ में दुख बुरे लोगों की हिंसा के कारण नहीं बल्कि अच्छे लोगों की ख़ामोशी की वजह से है. महाभारत में भी कृष्ण ने कहा है अगर आप धर्म और अधर्म की लड़ाई में चुप हैं तो आप अधर्म का साथ दे रहे हैं. इसीलिए लोगों को बुरे होते हुए देखकर अपनी आँखे नहीं बंद कर लेनी चाहिए बल्कि उसका विरोध करना चाहिए.
आज स्थिति ऐसी हो गई है कि एक ईमानदार आदमी चाहकर भी सिस्टम को नहीं बदल सकता. यदि वह बदलना चाहे तो वह ख़ुद और उसका परिवार सकुशल नहीं रह सकता. इस सिस्टम को ठीक ऊपर से किया जा सकता है लेकिन अफ़सोस है कि वह भी ऐसा ही है.
अब भ्रष्टाचार को पारंपरिक तरीक़ों से मिटाना संभव नहीं है. मेरे ख़याल से सिर्फ़ एक उपाय बचा है, अब भ्रष्टाचार को इतना बढ़ावा देना चाहिए कि अपने बोझ तले ही दबकर ख़त्म हो जाए. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ छोटी-छोटी लड़ाइयों से कुछ नहीं होने वाला. सिर्फ़ वक़्त और पैसे की बरबादी होने वाली है.
विनोद जी, भ्रष्टाचार का जवाब अपने देश में हर ईमानदार को देना पड़ता है. मैं अपना उदाहरण देता हूँ. मेरी माँ की पेंशन की फ़ाइल अटकी पड़ी थी. शिक्षा विभाग के चक्कर काटकर थक गया पर पेंशन की फ़ाइल आगे नहीं बढ़ रही थी. मजबूर होकर हमें चपरासी से लेकर बाबू तक को पैसा खिलाना पड़ा तब जाकर फ़ाइल आगे बढ़ी. आप मीडिया वालों से अनुरोध है कि आप लोग हर सरकारी दफ़्तर में स्टिंग ऑपरेशन करके लोगों को जागरुक करें. तभी कुछ हद तक भ्रष्टाचार कम हो सकेगा.
अबतक का सबसे बेहतरीन ब्लॉग है. धन्यवाद.
हम सब चाहते हैं कि भगत सिंह हमारे पड़ोस में पैदा हो. हम और हमारा परिवार उन जैसों की क़ुर्बानी से समाज में आए सकारात्मक बदलाब का आंख मूंद कर इंद्रीय सुख लेते हैं.
व्यवस्था को आप बदल दें, ये व्यवहारिक नहीं, मारे जाएंगे
व्यवस्था के आगे सर झुका लें, ये तो सभी करते हैं. जो मूल कारण है कि छोटी बीमारी माहमारी बन जाती है.
व्यवस्था आपको बदल ना पाए, ये सबसे व्यवाहारिक है और ज़रूरी भी
अगर हर आदमी ये सोच ले कि वो ख़ुद के हिस्से की ईमानदारी नहीं छोड़ेगा तो सब बदल जाएगा.
जैसा कि गांधी ने कहा और ओबामा ने दोहराया भी कि, "जो परिवर्तन आप दुनिया में देखना चाहते हैं वो पहले स्वयं में लाइए."
विनोद जी, सारा खेल व्यवस्था एवं कार्यप्रणाली का है.अगर व्यवस्था ठीक होगी तो सारे काम अपनेआप ठीक होते चले जाएँगे.लोग क़ानून का पालन तभी करते हैं जब क़ानून से सज़ा मिलने का डर रहता है.जितनी कड़ी सज़ा होगी, उसका उतना ही पालन होगा.जिस समाज में क़ानून सज़ा नहीं दे पाता, वहाँ सभी प्रकार की गड़बड़ियाँ शुरू हो जाती हैं.अटल बिहारी ईमानदार थे लेकिन उन्होंने भी कहा था कि सत्ता पाने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद अपनाए गए.मनमोहन सिंह भी इसी का पालन कर रहे हैं.वैसे भी राजनीति में लोग देश सेवा से ज़्यादा स्वयं सेवा के लिए आते हैं.
बेइमानों के बीच ईमानदारी का जो पर्दा डाले हुए हैं, वही तो बेइमानों को बेइमानी करने का रास्ता दिखाते हैं क्योंकि वो ख़ुद तो कुछ करते नहीं, बेइमानी करनेवालों को बचाकर अपनी फ़ीस मोटी ज़रूर वसूलते हैं! यही कारण है कि देश का बंदाधार हो रहा है!जब बाहुबलियों से पैसे लेकर नेता चुनाव जीतते हैं, और बाहुबली ख़ुद चुनाव में खड़े होकर चुनाव जीत रहे हैं, और विधायिका में अपनी हिस्सेदारी निभा रहे हैं, वहीं ईमानदारी का जामा पहनने से क्या हो सकता है. और क्या हो रहा है, हम ही नहीं, दुनिया देख रही है.
विनोद जी, आपका ब्लॉग पढ़ा, बहुत ही सटीक है.आज के भारत के नेताओं की आँख खुल जानी चाहिए. कहाँ, किससे अपनी दुर्दशा का रोना रोएँ. " मैंने सोचा कि हाकिम से करेंगे फ़रियाद, वो भी कमबख़्त तेरा चाहनेवाला निकला."
आज के दौर में ईमानदारी जैसे लफ्ज़ के लिए सिर्फ़ कागज़ों पर और कैमरों के सामने ही जगह मिल सकती है. जैसे धर्म स्थल की और जाने वाला हर शख्स पुजारी नहीं होता वैसे ही ईमानदारी का ढोल पीटने से कोई ईमानदारी का प्रमाण पत्र थोड़े मिल जाता है. कौन कितना ईमानदार है सब तो साफ़ साफ़ दिख रहा है. किसी कुनबे में सैंकड़ों बईमानों के बीच एक ईमानदार कोई मायने नहीं रखता है.
विनोद जी, बहुत अच्छा लिखा है. बीबीसी से तो यही आशा है कि सच को लिखे . "अनाचार बढ़ता है कब, सदाचार चुप रहता जब."
प्रधानमंत्री आर्थिक दृष्टि से भ्रष्ट नहीं हैं लेकिन यदि अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए यदि वे भ्रष्टाचार को अनदेखा कर रहे हैं तो वे भी किसी ने किसी तरह से वे भी भ्रष्ट हैं क्योंकि इसके बदले उन्हें कुछ मिल तो रहा ही है. इस मामले में वह लाभ उनकी कुर्सी है. सिर्फ़ पैसा नहीं कोई कार्यकारी पद मिलना भी तो भ्रष्टाचार माना जाना चाहिए.
मैं आज के राजनीतिज्ञों को याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे नेताओं गांधी, नेहरु, अबुल कलाम आज़ाद और नेताजी ने क्या इसी भारत की कल्पना की थी जो भ्रष्टाचार के लिए बदनाम हो. हम गांधी के आदर्शों को तिरस्कृत नहीं कर रहे हैं तो और क्या कर रहे हैं? मैं मनमोहनजी से अपील करता हूँ कि वे अपनी ग़लती के लिए जनता से माफ़ी माँगें क्योंकि वे जनता के ही प्रतिनिधि हैं. उन्हें आगे आकर तमाम भ्रष्ट लोगों के ख़िलाफ़ ख़ुद आवाज़ उठानी चाहिए इसी से हमारे देश की साख वापस आ सकती है. जहाँ तक कांग्रेस पार्टी की बात है तो अगर वो खुलकर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए तो हम उस भारत को पा सकते हैं जिसकी कल्पना 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना के समय व्योमेश चंद्र बैनर्जी ने की थी. मैं कह सकता हूँ कि अगर मनमोहन सिंह इसकी शुरुआत करें तो कांग्रेस बहुमत में आ सकती है और उसे सरकार बनाने के लिए किसी क्षेत्रीय पार्टी की ज़रुरत नहीं होगी.
विनोद जी, आज के परिवेश को देख कर लगता है कि ईमानदारी कुछ सौ सालों के बाद किताबों के पन्नों पर देखने को मिलेगी. अधिकांश लोग ईमानदार इसलिए हैं क्योंकि उनको बेईमानी का अवसर नहीं मिला. ईमानदार होना एक सफल प्रयास है पर ये बेईमानी ख़तम करने के लिये काफ़ी नहीं है. बेईमानी करने का कोई सही तरीक़ा नहीं होता पर ईमानदारी तो सही तरीके से की जाए. लेकिन अगर आप ईमानदार नहीं हैं तो दूसरों से ये उम्मीद भी न करें.
बात बस इतनी सी होती तो भी मान लेते कि चलो कुछ लोग तो ईमानदार हैं. लेकिन बात इससे बहुत आगे निकल चुकी है...मिस्टर ईमानदार सब कुछ देखते रहे, समझते रहे. यहाँ तक कि लाख हाय तौबा मचने के बाद भी ज़ुबान नहीं खुली. और खुली भी तब जब यह एहसास हो गया कि डीएमके के जाने के बाद एआईएडीमके का साथ तो मिल जाएगा.
क्या एक ईमानदार व्यक्ति बेईमानी को सही ठहराता है. कैग की 150वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों को नसीहतें देने के बदले, कैग अधिकारियों को नसीहतें दी. जाहिर है कि वो भ्रष्ट लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे है. उनकी मजबूरियों को कौन गिनता है कि उन्होंने मजबूरी में ऐसा किया. क्या मजबूरी में चोरी करना चोरी नहीं है?
आपकी प्रतिक्रिया पर चर्चा होनी चाहिए. चर्चा ये नहीं कि आपने सही लिखा या गलत कहा ! चर्चा ये भी नहीं कि कोई आपसे सहमत है या असहमत ! लेकिन आपने जो लिखा है वो राजनीति से ताल्लुक रखता है . चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि क्या इस देश में मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी ही राजनीतिक ईमानदारी के प्रतीक हैं? दरअसल कहा आपने वही है जो मैं सवाल उठा रहा हूँ , लेकिन मेरा सवाल तो यहाँ से शुरू होता है ! मैं ये समझना चाहता हूँ कि बीबीसी हो या इस देश का तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया, उनको हमेशा ये क्यों सुविधाजनक लगता है कि ईमानदारी कि बात की जाये तो ध्यान रहे कि मुद्दा सिर्फ़ व्यक्तियों की ईमानदारी तक ही सीमित रहे ! भूल कर भी उस राजनीतिक धारा की चर्चा न हो जो शुचिता की हर कसौटी पर हमेशा से खरी रही है ! क्योंकि जब भी आप ऐसा कर देंगे तो वो तारीफ़ इस देश के कम्युनिस्टों की हो जाएगी. वहां अपवाद नहीं होंगे ये नहीं कहा जा सकता, लेकिन ये दर्ज है कि सवाल पूछने के लिए रिश्वतखोरी करने वाले माननीय सदस्यों में कोई कम्युनिस्ट नहीं था. कम्युनिस्ट आन्दोलन ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है. राजनीतिक सहमति-असहमति अलग बात है, लेकिन मीडिया को भाता यही है कि ऐसा कुछ न लिखे कि जिससे साम्यवाद जनता के सामने एक स्वस्थ राजनीतिक धारा के रूप में प्रस्तुत हो जाए . मीडिया को भाता यही है कि जब भी ईमानदारी की चर्चा की जाए तो प्रतीक के रूप में कांग्रेस-बीजेपी जैसे दलों के कुछ नेताओं को चुन लिया जाए और कहा जाए कि जो ईमानदार हैं वो भी दोषी हैं, ...कहा जाये कि जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी इतिहास ! पर ये कभी न कहा जाए कि इस देश में ऐसी भी राजनीति है जो मूल्यों से ईमानदारी की पोषक है , शुचिता जिसका चरित्र है और वो उस जनता की प्रतिनिधि है जो मेहनतकश और ईमानदार है. क्योंकि कम्युनिस्ट तो चीन के एजेंट हैं! गद्दार हैं! क्योंकि कम्युनिस्ट तो नक्सली भी खुद को कहते हैं इसलिए कम्युनिस्ट तो हिंसक हैं! दरअसल भाई पत्रकारिता और पत्रकारों की एक विडम्बना ये भी है कि उस ईमानदार जनता तक तो उसकी पहुँच है ही नहीं. आप लोग जैसे मेहनती पत्रकार कार्पोरेट मीडिया के बुने उस वैचारिक जाल में ऐसे फंसे हैं जिसमे विकल्प या तो कांग्रेस है या बीजेपी ! इसे कहते हैं साम्राज्यवाद परस्ती राजनीति और पत्रकारिता और वर्गीय दृष्टि के अभाव में या (शायद) अनजाने में या नौकरी की मजबूरी में आप जैसे पत्रकार टूल बन कर रह जाते हैं . ऐसे टूल कि जब लिखेंगे यही लिखेंगे या इसी के इर्दगिर्द लिखेंगे !
भाई ज़रा तलाश करिए कि ईमानदार जनता की, आप निराश नहीं होंगे. जो बईमान है वो सरकारी दफ्तरों में या शॉपिंग मॉल में विराजे हैं , वो कांग्रेस-बीजेपी के दफ्तरों में हैं. आप सोनिया, मनमोहन या अटल को यह कहकर कोसते हैं कि वे ईमानदार तो हैं लेकिन बेईमानों के पोषक हैं या उनके साथ खड़े हैं. नहीं भाई नहीं! ईमानदारी और बेईमानी का रिश्ता जब देश से हो, सार्वजनिक जीवन से हो तब केवल निजी ईमानदारी से काम नहीं चलेगा. आपको उस धारा, उस समूह, उस संगठन के साथ खड़ा होना पड़ेगा जो ईमानदार है और ईमानदारी के साथ जनता के साथ है. जिसकी नीतियाँ बेईमानों को फायदा पहुँचाए, जिसकी नीतियाँ राजनीतिक चंदा हासिल करने के लिए बनें, जो सांसदों-विधायकों की हर ख़रीद फरोख़्त का गवाह हो वो निजी तौर पर भी ईमानदार नहीं हो सकता. दरअसल आपके मीडिया में ईमानदारी को फिर से परिभाषित करने की ज़रुरत है!
भारत में अगर कोई ईमानदारी से जीता है तो उसे समाज जीने नहीं देता. मैं अपनी बात बताता हूँ. मैं एमबीए कर रहा हूँ और मुझे एजुकेशन लोन की ज़रुरत थी. मैं बैंक में गया तो मैंनेजर ने कहा कि लोन हो जाएगा लेकिन आप कल शाम आइए. अगले दिन मैनेजर ने मुझसे पूछा कि काम तो हो जाएगा लेकिन इतना बड़े काम के बदले मुझे क्या मिलेगा? जब मैंने कहा कि इतने पैसे होते तो मैं एजूकेशन लोन ही क्यों लेता, इस पर मैनेजर ने कहा कि तब तो फिर मुश्किल है. अब सच और ईमानदारी से जीने वाले लोग बताएँ कि मैं क्या करुँ? यहाँ सिर्फ़ पैसा चलता है और हर काम पैसे से ही होता है. ईमानदारी काम नहीं आती.
विनोद जी, मैं आपसे सहमत हूँ. लेकिन हमें क्या करना चाहिए. हमें ईमानदारी नहीं करना चाहिए या फिर हमें उसका विरोध करना चाहिए.आपकी पहली पंक्ति में वो अधिकारी अगर उन लोगों का विरोध करता है तो उसे या उसके परिवार को हानि हो सकती है. इसलिए हमें सिर्फ़ इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए कि ईमानदारी का पालन करने के लिए क्या सही तरीका है. अगर आज किसी ने बेईमानों का समर्थन नहीं किया तो उसे या उसके परिवार को मारा जा सकता है. आजकल भारत में सीधा सपाट होना बहुत मुश्किल है.
विनोदजी, आप सोनियाजी द्वारा प्रधानमंत्री का पद ठुकराये जाने को बहुत बड़ा त्याग मान रहे हैं. इसके पहले भी कुछ लोग ऐसा कर चुके हैं जिसमें ज्योति बसु का नाम प्रमुख है. अनायास ही आप लोग सोनियाजी को त्याग की देवी बनाने पर तुले हैं. रही बात प्रधानमंत्री महोदय की तो उनकी ईमानदारी पर अँगुली नहीं उठाई जा सकती ये सत्य है. परन्तु पीएम महोदय को दलालों एवं घोटालेबाजों से दूर रहना चाहिए. पार्टी हाईकमान के बीच ये बात उठाना चाहिए कि फलाँ मंत्री या नेता ग़लत है उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए. अगर पीएम महोदय ऐसा नहीं करते हैँ तो वो भी उतने ही दोषी हैं. संविधान में लिखा है कि सरकार के किसी मंत्री द्वारा लिया गया फ़ैसला पूरी सरकार का फ़ैसला माना जाएगा और अगर पार्टी उन नेताओं के ख़िलाफं क़दम नहीं उठाती है तो पार्टी सुप्रीमो भी कम दोषी नहीं है.
विनोद जी आपकी भावनाओं को में सांष्टांग प्रणाम करता हूँ. शुचिता या ईमानदारी का जो वास्तविक पैमाना बताया है वह वाकई काबिले तारीफ़ है. पूरी व ठोस ईमानदारी के प्रति आपकी खरी व तेजस्वी वाणी को बल देते हुए में भी एक बात जोड़ना चाहूँगा. समाज और पूरी मानवीयता को जितना नुक़सान व ख़तरा बुरों की बुराइयों से नहीं है उससे कहीं बहुत ज्यादा हानि तथाकथित ईमानदारों तथा अच्छों की निष्क्रियता, समाधिनुमा जड़ता या दर्शकमुद्रा से पहुंचती है. विनोद जी एक तल्ख सवाल आपसे भी पूछने की उत्कट इच्छा उबल-उफन रही है कि आप भी मीडिया से जुड़े हैं जिसे की कभी तीसरी आंख समझा जाता था. जबकि आज मीडिया में मिर्च-मसाला, मनोरंजन, बॉलीवुड, हॉलीवुड या फ़िल्मी दुनिया के नाम पर कितनी अश्लीलता, झूठ, बनावटी व प्रायोजित खबरें तथा सूचनाएं परोसी जाती हैं. इस तरह की खबरें देश की नई पीढ़ी को किस दिशा में ले जाएंगी? ज़रा आप ही सोचकर बताएं?
सिर्फ रूपयों का हेर-फेर ही भ्रष्टाचार नहीं है जनाब. मीडिया का अश्लीलता फैलाना और झूठी खबरें छापना भी साफ़-साफ़ भ्रष्ट आचरण है. लाखों-करोंड़ों लोग इससे प्रभावित होते हैं. जिन युवाओं के दम पर भारत को विश्व की महाशक्ति बनने का दंभ भरा जा रहा है, वह युवा इस तरह की अश्लील सामग्री को पचाकर किस दिशा में झंडे गाड़ेगा यह सोचने की बात है. जो भी ऐसे किसी संगठन का सहयोगी हिस्सा है वह भी इस भ्रष्टाचार में बराबर का भागीदार है.
ये बहुत ही बढ़िया पोस्ट है. सचमुच भ्रष्टाचार और ईमानदारी को दोबारा परिभाषित करने की ज़रुरत है.