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मूर्खता, समझदारी और मीडिया

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 12 सितम्बर 2010, 16:23 IST

लेखक रॉबर्ट हेनलिन ने लिखा था-- 'नेवर अंडरएस्टीमेट द पावर ऑफ़ ह्यूमन स्टुपिडिटी' यानी मानवीय मूर्खता की ताक़त को कभी कम नहीं आँकना चाहिए.

दुनिया भर के टीवी चैनलों, अख़बारों और बराक ओबामा समेत अनेक नेताओं ने टेरी जोंस के बारे में शायद यही महसूस किया.

पादरी कम और शिकारी अधिक दिखने वाले ईसाई धार्मिक नेता की धमकी से जो क्षति हो सकती थी वह टल गई, इस पर सबने राहत की साँस ली.

'डव आउटरीच वर्ल्ड सेंटर' में कुछ भी सही नहीं था, डव यानी शांतिदूत कपोत. वर्ल्ड आउटरीच सेंटर यानी दुनिया की ओर हाथ बढ़ाने वाला केंद्र, जिसके कुल जमा पचास अनुयायी थे.

सारे टीवी चैनलों ने अंदाज़ा लगाया कि कुरान के जलाए जाने पर दुनिया भर में क्या प्रतिक्रिया होगी मगर किसी ने यह नहीं सोचा कि जो आग लगाई जा रही है उसे प्रचार का ऑक्सीजन न दिया जाए.

सोचा भी होगा तो दूसरे चैनलों को देखकर अपनी क्षणिक समझदारी से डोल गए.

एक टीवी चैनल पर आए अमरीकी प्रशासन के सलाहकार से पूछा गया कि टेरी जोंस को ओबामा ने इतना भाव क्यों दिया, उनका जवाब था- 'मीडिया ने उन्हें मजबूर कर दिया.'

जिस अनजान पादरी को कल तक कोई नहीं पूछ रहा था वह 'ग्लोबल मीडिया सेलिब्रिटी' बन गया, हो सकता है कि अब टेरी जोंस कोई दूसरा हंगामा खड़ा करें तो आप ये भी नहीं कह सकेंगे कि उनके सिर्फ़ पचास सिरफिरे चेले हैं.

पागलपन के पुरज़ोर असर पर किसी को शक नहीं है, मगर समझदारी की ताक़त से सबका विश्वास उठता जा रहा है.

दुनिया भर में न जाने कितनी उत्पाती खोपड़ियों में किन-किन चीज़ों को तोड़ने और जलाने के मसूंबे बन रहे होंगे.

कितने ही उत्पाती-उन्मादी टेरी जोंस को एक झटके में मिली इतनी 'शोहरत' पर जल रहे होंगे, मन मसोस रहे होंगे कि यह जलाने वाला आइडिया उन्हें क्यों नहीं आया.

एक और सूक्ति- 'लीव इडियट्स अलोन सो दे हार्म देमसेल्व्स ओनली' यानी बेवकूफ़ों को अकेला छोड़ देना चाहिए ताकि वे सिर्फ़ अपना ही नुक़सान करें, दूसरों का नहीं.

लाइव टीवी के दौर में ऐसा संभव नहीं दिख रहा है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 23:01 IST, 12 सितम्बर 2010 harsh kumar:

    अमरीकी मीडिया को पीपली लाइव देखना चाहिए.

  • 2. 23:24 IST, 12 सितम्बर 2010 नीरज दीवान :

    इस्लामी मुल्क़ों में आए दिन अमरीकी और ब्रितानी परचम सुपुर्द-ए-खाक किए जाते हैं. इधर इंडिया में राजेश प्रियदर्शी और पूरा सेक्यूलर मीडिया तटस्थता की जम्हाई लेता हुआ गंगा-जमुनी तहज़ीब की लोरी सुनाकर हमें ‘सुला’ देते हैं. यहां ब्रॉडकास्ट मीडिया ने यह खबर पहले से ही बायकॉट कर रखी थी. वैसे मार्के की बात यह है कि टैरी जोंस और उनके समर्थकों का तो कुछ नहीं बिगड़ा, अलबत्ता ‘इस्लाम ख़तरे में है’ – ऐसा सुनकर आए दिन लाखों सड़कों पर निकलने वालों में दर्ज़नों लोग हफ़्ते भर में अलग-अलग प्रदर्शनों में मारे गए.

  • 3. 03:10 IST, 13 सितम्बर 2010 braj kishore singh:

    राजेश जी आपने सही कहा है कि टीआरपी के चक्कर में कई बार मीडिया अपने बुनियादी फ़र्ज़ को भी दरकिनार कर देती है. जोंस ने जो कुछ भी किया उसे सिवाय मूर्खता के और कोई दूसरा नाम नहीं दिया जा सकता, लेकिन हमारी मीडिया ने भी उन्हें अहमियत देकर और भी बड़ी मूर्खता कर दी. इस घटना से यह भी पता चलता है कि मीडिया ने अपना विवेक ताक पर रख दिया है और वह बुरी तरह भेड़चाल की शिकार है.

  • 4. 06:38 IST, 13 सितम्बर 2010 N.K.Tiwari:

    बिलकुल ठीक कहा आपने. आशा है मीडिया ऐसी गलती आगे नहीं करेगा.

  • 5. 10:01 IST, 13 सितम्बर 2010 vipul mudgal:

    मैंने कहीं पढ़ा था कि 'आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस इज नो मैच टू नेचुरल स्टूपीडिटी'. ..मुझे लगता है कि तेज़ी से मूर्खों के जमघट में बदल रही इस दुनिया में मीडिया अकेला नहीं है.

  • 6. 10:51 IST, 13 सितम्बर 2010 susheel mishra:

    मीडिया को भद्रजन कब सुधारेंगे पता नहीं.

  • 7. 12:31 IST, 13 सितम्बर 2010 Mohammad Alamgir, Kapia Hatta, Siwan, Bihar:

    अगर हम लोग ऐसे लोगों को बढ़ावा देंगे तो एक दिन इस जैसे कई और पैदा हो जाएँगे. इस लिए मीडिया को ऐसी लोगों की बातों को हवा नहीं देनी चाहिए. आपने ठीक लिखा है कि बेवकूफों को अकेले छोड़ देना चाहिए.

  • 8. 17:07 IST, 13 सितम्बर 2010 शशि सिंह :

    ऐसे ही एक और मीडिया उत्पादित सेलिब्रिटी हैं श्री राज ठाकरे.

  • 9. 23:33 IST, 13 सितम्बर 2010 Chandan, Fairfax USA:

    राजेश जी, आप मीडिया को क्यों दोष रहे हैं. मीडिया यहाँ वहीं दिखाता है जो लोग देखना चाहते हैं. यदि किसी दूसरे धर्म की किताबों को जलाने की बात हो तो मीडिया में शायद ही खबर बने.

  • 10. 03:03 IST, 14 सितम्बर 2010 Gautam Sachdev:

    राजेश भाई, गधे के सिर पर सींग होते तो नहीं, लेकिन कभी-कभी अदृश्य रूप से उग आते हैं और तब उसे जो पब्लिसिटी मिलती है उससे पन्द्रह मिनट के लिये संसार का आठवाँ अजूबा बन जाने में देर नहीं लगती.

  • 11. 12:00 IST, 14 सितम्बर 2010 himmat singh bhati:

    खाली बैठे मीडियाकर्मियों के पास समाचारों का अकाल है, ऐसे में वो करे तो करे क्या۔

  • 12. 15:34 IST, 14 सितम्बर 2010 bhootnath:

    राजेश....आदमी की मूर्खताओं का कोई अंत नहीं. और मज़ा यह कि जो सबसे ज्यादा मूर्ख, वही सबसे ज्यादा समझदार....!! और एक राज की बात बताऊँ राजेश.... मीडिया ही है सबसे ज्यादा समझदार....यानी कि यानी कि यानी कि.....आगे तुम खुद ही समझ लो ना....मेरा मुहं क्यूँ खुलवा रहे हो........खैर तुम्हें इतने दिनों बाद पढ़ा और वह भी एक इंसान के रूप में....अच्छा लगा भाई....सच.....!!

  • 13. 15:43 IST, 14 सितम्बर 2010 dr.k.n.dinesh:

    दूसरे महायुद्ध के बाद से दुनिया भर में सामाजिक ढाँचा और ज़िम्मेदारियाँ नाटकीय ढंग से बदल गई हैं. पूंजीवादी सभ्यताएँ होड़ को बढ़ावा दे रही हैं जिसकी वजह से समाज में स्वार्थपरता बढ़ रही है.

  • 14. 23:19 IST, 14 सितम्बर 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह राजेश जी आप और आपकी बीबीसी भी उस मीडिया में शामिल है जो हर मुद्दे में आग में घी डालने का काम करती है. ऐसा महसूस होता है कि दुनिया में इंसानियत मीडिया की नज़र में बची ही नहीं है. लेकिन ज़िम्मेदार कौन मीडिया ख़ुद या समाज. मेरा दावा है फ़िल्मों, नेताओं, कलाकारों को मीडिया दिखाना बंद कर दे दुनिया में शांति और अमन पैदा हो जाएगा. लेकिन राजेश जी लिखने से पहले आप भी अपने गिरेबान में झांक कर देखते कि आप कितने पवित्र हैं इस मामले में.

  • 15. 09:45 IST, 15 सितम्बर 2010 BALWANT SINGH PUNJAB :

    ऐसे मूर्खों की कमी थोड़े न है? पादरी साहब न सही तो ऑस्ट्रेलिया के एक वकील साहब तो कागज़ के टुकड़ों के धुएं के छल्ले उड़ाते नज़र आए? शिक्षा के स्तर का यह भी एक पहलू है? दुनिया नाहक़ ही अशिक्षित लोगों को दोष देती रहती है? बढ़ते सामाजिक दायरों , वैश्वीकरण के पसरते क़दमों को ऐसे ही कुछ मुट्ठी भर लोगो ने बेड़ियाँ पहनाने की कोशिश हमेशा से की है! अगर ऐसे लोगों के मंसूबे कामयाब हो जाने लगे तो पहले से ही सुलगते हुए ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठी दुनिया का भला क्या होगा?

  • 16. 22:05 IST, 17 सितम्बर 2010 arun kumar pandey:

    टेरी जोंस लोकप्रिय नहीं हो रहे थे बल्कि लाइव मीडिया चैनल लोकप्रिय हो रहा था जो उन्हें पेश कर रहा था. ये मीडिया ही है जो ख़बरों को धड़ाधड़ बेच रहा है. जो लोग आम जनता के बारे में सोचते हैं वे मूर्ख हैं. कहने की ज़रूरत ही नहीं कि मीडिया जागरुक है.

  • 17. 15:42 IST, 19 सितम्बर 2010 निमिष कुमार, मुंबई:

    सही कहा, मानवीय मूर्खता की ताकत को आंकना आसान नहीं..और यदि ये बात हम टेलिविजन पत्रकारों के लिए कहा जा रहा है..तो हम इसमें कुछ नहीं कर सकते. क्योंकि ये ही हमारी यूएसपी है. न्यूज़ चैनल अपनी तेज़ी के लिए जाने जाते है और जब आप जेट की स्पीड से चलना चाहते है, तो सोचने का वक्त थोड़ा कम ही होता है. ज़रा सोचिए, क्या न्यूज़ चैनल बिना तेज़ी के जी सकते हैं. नहीं तो हम न्यूज़ चैनल वालों को गाली देना बंद कीजिए. हम किसी को सेलेब्रिट्री नहीं बनाते..जो समाज है वही हम दिखा रहे हैं.

  • 18. 22:26 IST, 21 सितम्बर 2010 satish sharma:

    मीडिया में आज से नहीं अर्से से भेड़चाल चल रही है. जो गोली मार सकता है उसके बारे में चुप्पी साध लेने की मीडिया की अदा भी निराली है. झूठी धर्मनिरपेक्षता का लबादा भी तो मीडिया ने ओढ़ रखा है.

  • 19. 22:38 IST, 21 सितम्बर 2010 satish sharma:

    निमेश, क्या आपने समाज देखा है. आपको ऐसे दाग दिख गए और वे नहीं जिनसे इंसानियत शर्मसार है.

  • 20. 12:17 IST, 22 सितम्बर 2010 Sabir:

    बहुत सटीक विषय है. इसमें मीडिया का बहुत सा फ़ायदा है लेकिन इसके साथ ही उसकी ज़िम्मेदारी भी बहुत है. कई बार हम लोग देखते हैं कि एक्शन का सही उपयोग न हो तो उसका रिएक्शन बहुत नुक़सानदायक होता है. ठीक उसी तरह मीडिया के लिए कहा जा सकता है.

  • 21. 14:28 IST, 26 सितम्बर 2010 anadi kumar singh:

    भारतीय मीडिया को मैच्योर होना चाहिए. मानवीय नज़रिए से चीज़ों को देखना चाहिए.

  • 22. 10:34 IST, 14 अक्तूबर 2010 amar:

    सब कुछ ख़ुद को बेचने के लिए हो रहा है.

  • 23. 13:08 IST, 27 अक्तूबर 2010 Mohd Saleem, U.A.E. :

    मुझे लगता है कि इस मुद्दे को टिरी जोनस की वजह से लोकप्रियता नहीं मिली लेकिन यह एक समुदाय के विश्वास और उसके पवित्र पुस्तक से जुड़ा मामला है.

  • 24. 23:52 IST, 14 नवम्बर 2010 Naina:

    बहुत अच्छे.

  • 25. 14:01 IST, 25 दिसम्बर 2010 saifuddin saify:

    विनोद जी आज पत्रकार बचे ही कहा है कि जो हैं उनमें से कुछ सरकार के दलाल हैं. आपकी बेबाक पत्रकारिता के लिए आभार.

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