इस विषय के अंतर्गत रखें जून 2010

अगर फिर मौक़ा मिलता...

विनोद वर्माविनोद वर्मा|रविवार, 27 जून 2010, 21:09

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भारत के सफलतम वकीलों में से एक फाली एस नरिमन ने कहा है कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो वे भोपाल गैस के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड का मुक़दमा नहीं लड़ेंगे.

फाली एस नरिमन 1985 में यूनियन कार्बाइड की ओर से वकील थे. मानव इतिहास की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड को वे बचा रहे थे.

नरिमन साहब ने तो समय रहते बता दिया कि वे दोबारा ग़लती नहीं करेंगे.

जब हादसा हुआ तो अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और वहाँ का मीडिया उन्हें संवेदनशील मुख्यमंत्री कहा करता था. उनकी भूमिका को लेकर कई सवाल पूछे जा रहे हैं.

अभी अर्जुन सिंह ने कुछ नहीं कहा है कि उनकी सरकार ने यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन को निकल भागने में क्यों मदद की. शायद उनके ऐसे प्रायश्चित कथन के लिए उनकी आत्मकथा का इंतज़ार करना पड़े.

हो सकता है कि वे लिखें कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो वे वारेन एंडरसन को भागने नहीं देंगे. वे दोबारा दिल्ली में बैठे अपने आकाओं की बात नहीं सुनेंगे.

अभी वारेन एंडरसन ने भी कुछ नहीं कहा है. हो सकता है कि वे भी कहें कि अगर दोबारा मौक़ा मिले तो वे हादसे के बाद भारत जाने की ग़लती ही नहीं करेंगे या फिर यूनियन कार्बाइड के प्रमुख का पद ही स्वीकार नहीं करेंगे.

दो दिसंबर, 1984 को भोपाल में ज़हरीली गैस से हज़ारों लोग मारे गए थे और उसके बाद हज़ारों लोग बरसों-बरस धीमी-धीमी आती मौत के गवाह रहे. वे यह कहने को जीवित नहीं हैं कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो उस रात भोपाल में न रहें और अपने किसी परिजन को न रहने दें.

अब वे यह बताने के लिए दुनिया में नहीं हैं कि अगर दोबारा मौक़ा मिलता तो वे भोपाल में बसते भी या नहीं.

यह कहना किसी के लिए भी आसान हो सकता है कि वह अतीत की ग़लतियाँ नहीं दोहराएगा. किसी बौद्धिक और सोच-विचार वाले व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वह वर्तमान में ऐसे निर्णय ले कि भविष्य में उसे पछतावा न हो.

कहना कठिन है कि ऐसा होगा. लेकिन हो सकता है कि कल लालकृष्ण आडवाणी कह दें कि अगर दोबारा मौक़ा मिले तो वे रथयात्रा ही न निकालें और हो सकता है कि वे कारसेवकों को अयोध्या में इकट्ठा ही न करें,जिससे कि बाबरी मस्जिद बच सके.

या फिर नरेंद्र मोदी कह दें कि अगर फिर वही परिस्थितियाँ रहीं तो वे गोधरा के बाद दंगे नहीं होने देंगे.

इसी तरह भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे बहुत से नेता शायद फिर से वही हथकंडे न अपनाएँ जिसकी वजह से वे कटघरे में खड़े हैं. कुछ नया तरीक़ा सोच लें.

हो सकता है कि दाउद इब्राहिम और ओसामा बिन लादेन फिर वही दोहराना चाहें जो उन्होंने किया.

लेकिन आम सोच समझ वाला कोई भी व्यक्ति ज़रुर अपनी ग़लतियाँ सुधारना चाहेगा.

काश, ऐसा होता फाली नरिमन साहब! कि इतिहास में जाकर ग़लतियाँ सुधारने के मौक़े मिलते.

बिहार, जाति और राजनीति

सुशील झासुशील झा|शुक्रवार, 25 जून 2010, 22:35

टिप्पणियाँ (22)

बिहार में जनता दल (यू) और बीजेपी गठबंधन टूटते टूटते रह गया है. अक्तूबर में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह गठबंधन अभी और मुसीबतों का सामना कर सकता है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विकास पुरुष की छवि बनाने में लगे हैं लेकिन गुजरात के विकास पुरुष नरेंद्र मोदी को बिहार में देखना नहीं चाहते हैं. उन्हें डर है मोदी के कारण मुस्लिम वोट उनके पक्ष में नहीं आएगा..तो क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि नीतीश को अपने विकास के एजेंडा पर भरोसा नहीं है..

बिहार में मतदान विकास के नाम पर होगा या समीकरणों के आधार पर ये मतदान के बाद ही पता चल सकेगा लेकिन यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि बिहार का पूरा जनमत नीतीश कुमार के साथ है. नीतीश कुमार भी इस बात को जानते हैं और शायद इसीलिए वो मुसलिम के वोटों को लेकर बीजेपी से अलग तक होने को तैयार दिखते हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि बिहार में विकास हुआ है. सड़कें बनी हैं.नौकरियां भी दी गई हैं लेकिन ये विकास ऊँट के मुंह में जीरे के समान है.

नीतीश इंजीनियर रहे हैं और अब वो चुनाव के लिए विभिन्न जातियों की सोशल इंजीनियरिंग करने में लगे हुए हैं.

बिहार में जितने लोगों से मेरी बातचीत हुई है उसके आधार पर मैं यही कह सकता हूं कि बिहार के चुनाव उतने सीधे और सपाट नहीं होंगे जितना अभी हमें लग रहा है.

अगर जातिगत समीकरणों को और स्पष्ट किया जाए तो शायद तस्वीर होगी. सवर्ण यानी ऊंची जातियां हमेशा बीजेपी का वोट बैंक रही हैं लेकिन वो इस बार नीतीश कुमार से नाराज़ हैं यानी ये वोट बंट सकते हैं.

नीतीश कुमार दलितों और महादलितों के वोट बैंक में सेंध लगाने का दावा कर रहे हैं लेकिन इस बात पर यक़ीन करना मुश्किल है कि लालू और रामविलास पासवान का वोट बैंक रहा ये समुदाय इतनी जल्दी नीतीश के साथ चला जाएगा.

वैसे भी नीतीश कुमार कुर्मी और कोइरी यानी ओबीसी जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और दलितों के शोषण में इस समुदाय का भी बड़ा हाथ रहा है.

रही बात मुसलमानों की तो उन्हें नीतीश कुमार से फ़ायदा हुआ है. निचले और ग़रीब तबके के मुसलमान नीतीश के साथ हैं लेकिन पढ़े लिखे मध्यवर्गीय मुसलमान नीतीश से काफ़ी नाराज़ हैं और ध्यान रहे कि चुनावों से पहले माहौल बनाने में इस वर्ग का बड़ा हाथ रहता है.

शहरों में क़ानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर होने के कारण शहरी मतदाता नीतीश के साथ हो सकता है लेकिन यह संख्या काफ़ी कम होगी..

हां इस पूरे जोड़ तोड़ में कांग्रेस को छोड़ देना उचित नहीं होगा. कांग्रेस अपने बूते सरकार तो नहीं ही बना सकती है लेकिन अगर मुसलिम और दलित वोट बैंकों में सेंध लगाए तो खेल बिगाड़ने की स्थिति में आ ही सकती है.

ऐसे में नीतीश कुमार बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ आने में शायद ही परहेज़ करेंगे.
वैसे इन जातिगत विश्लेषणों की सटीकता इस बात पर भी निर्भर करती है कि किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है और इस बारे में सटीक आकड़े किसी के पास नहीं है.

अभी बिहार में कहा जा सकता है कि कोई स्पष्ट विजेता नहीं है. पिछले बार लोगों ने लालू के ख़िलाफ़ वोट दिया था लेकिन इस बार क्या लोग नीतीश के समर्थन में वोट डालने निकलेंगे...ये सबसे बड़ा सवाल है...

एक दिन पिता का....

अभी इसी महीने दुनिया के 58 देशों में फ़ादर्स डे यानी पिता-दिवस मनाया गया. दुनिया के बाक़ी देश अपने अपने पिता के हिसाब से जनवरी से नवंबर तक विभिन्न तिथियों में यह दिवस मनाते हैं.

लेकिन जितने जोश और उत्साह के साथ दुनिया में मदर्स डे मनाया जाता है और जिस शिद्दत से बच्चे माता दिवस का इंतिज़ार करते हैं और जैसे-जैसे उपहार उस दिन संतान की ओर से मां को मिलते हैं वैसा उत्साह और जोश और इस प्रकार के उपहार बहुत कम पिता के हिस्से में आते हैं.

बल्कि ऐसा लगता है कि पूरे उत्साह और जोश के साथ मदर्स डे मनानी वाली संतान फ़ादर्स डे इसलिए मुरव्वत में मना लेती है कि पिता जी के वंचित रह जाने का भाव कुछ कम हो सके.

देहात और निम्न मध्यम वर्ग में तो आज भी पिता बड़ी हद तक एक डिक्टेटर का किरदार निभाता है. परिवार के दैनिक और दूरगामी फ़ैसले उसी के हाथों में होते हैं. इसलिए वहां अलग से पिता-दिवस मनाने की न तो ज़रूरत होती है और न ही हिम्मत.

ऐसे दिवस बनाने के चोंचेले मध्य वर्ग को बहुत अच्छे लगते हैं और इसके ठोस कारण भी हैं. जिस प्रकार लोकतंत्रिक देशों में राष्ट्रपति या राजा को राष्ट्र का प्रतीक मानकर सिर्फ़ इज़्ज़त दी जाती है और आधिकार प्रधानमंत्री और उसकी मंत्री मंडल के हाथों में होती है उसी प्रकार मध्य वर्ग परिवार में पिता की पारंपरिक और सांकेतिक हैसियत होती है.

उसे माँ का पति होने के नाते एक्स ऑफ़िशियो पिता का दर्जा मिल जाता है (जैसे मौसा, फूफा, ताई, मामी की पारिवारिक महत्ता होती है).

पिता की बुनियादी अहमियत सिर्फ़ तीन अवसरों पर माँ से ज़्यादा होती है. एक उस समय जब आईकार्ड और अन्य क़ानूनी दस्तावेज़ों में पिता का नाम लिखना हो. दूसरे उस समय जब बेटे या बेटी का रिश्ता तय करने में उसे प्रमुख रोल निभाने के लिए बैठना नसीब हो और तीसरे उस समय में जब संतान को घर से बाहर किसी झगड़े में अपने दुशमन को बहुत ही गहरी गाली देने के लिए न चाहते हुए भी दुश्मन के परिवार से अपने पिता का सांकेतिक रिश्ता जोड़ना पड़ जाए.

बाक़ी अन्य मौक़ों पर पिता के पास बिलों पर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई अधिकार नहीं होता.

कहने को इस दुनिया का समाज पिता प्रधान समाज है मगर इससे ज़्यादा ग़लत प्रोपैगैंडा संभव नहीं है. जिसे आप पैतृक समाज समझ रहे हैं ये वास्तविकता में आज भी माता प्रधान समाज है.

विश्वास न हो तो कहीं भी किसी भी दिन इस सवाल पर रेफ़्रेंडम करा कर देख लें कि अगर आपको माँ और पिता में से किसी एक के साथ रहने का मौक़ा मिले तो आप क्या करेंगे. 99 फ़ीसदी संतान किस के हक़ में फ़ैसला देगी ये आप भी जानते हैं.

ऐसे माहौल में अगर पिता के आंसू पोछने के लिए हर साल जून के तीसरे रविवार को फ़ादर्स डे मना भी लिया जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है. 364 दिन तब भी माँ और उसकी संतान के ही रहेंगे.

पानी काला, लोकतंत्र का बोलबाला

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|सोमवार, 21 जून 2010, 12:25

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सात साल तक विश्व के सब से बड़े जनतंत्र कहे जाने वाले देश भारत में पत्रकारिता करने के बाद जब इस महीने मैं दुनिया के सब से कामयाब कहे जाने वाले लोकतंत्र में से एक, यानी अमरीका पहुंचा तो काफी उत्साहित था.

अमरीका के बारे में अखबारों में पढने या टीवी चैनलों पर निर्भर करने के बजाये अब मैं यहाँ की राजनीति को खुद महसूस कर सकता था, यहाँ के सत्ताधारी डेमोक्रेट और विपक्षी रिपब्लिकन नेताओं के बीच तीखी नोक झोंक देख सकता था और यहाँ के लोगों की प्रतिक्रियाएं और मीडिया की रिपोर्टिंग भी अपनी आँखों से देख सकता था.

जब मैं यहाँ आया तो उस समय देश की सब से बड़ी घटना थी मेक्सिको की खाड़ी में तेल के रिसने से होने वाली तबाही. मैं ने इस खबर की चर्चा अख़बारों और टीवी चैनलों पर ज़रूर देखी लेकिन सुर्ख़ियों में थी राष्ट्रपति ओबामा की गिरती हुई रेटिंग की खबर.

यहाँ मेरे एक भारतीय दोस्त से जब मैं ने कहा घर की याद आ रही है तो उसने सुझाव दिया यहाँ न्यूज़ चैनलों को देख लो पता ही नहीं चलेगा देश से बाहर हो.

दोस्त की बात कुछ अजीब लगी. लेकिन जब मैं ने यहाँ के कुछ लोकप्रिय चैनलों को देखना शुरू किया तो उसकी बात समझ में आई. वही हाव-भाव, सुर्ख़ियों की वही गूँज और वही ब्रेकिंग स्टोरी का सिलसिला.

हर दिन राजनीतिक रूप से घटनाएँ नया मोड़ ले रही थीं. कम से कम इन चैनलों पर. और यह भी देखा की भारत की तरह यहाँ भी नेतागण सुर्ख़ियों में रहना भी चाहते हैं और मीडिया के दबाव में आकर ही जागते हैं.

यहाँ के मीडिया ने एलान किया कि तेल के रिसने वाला मामला राष्ट्रपति ओबामा की अब तक की सब से बड़ी राजनैतिक चुनौती है.

आखिर दबाव ने असर दिखाया. ओबामा ने अपने ओवल ऑफ़िस से देश के नाम एक प्रसारण का एलान किया. यह किसी अमरीकी राष्ट्रपति का 11 सितंबर 2001 के चरमपंथी हमलों के बाद देश के नाम पहला संदेश था.

इस संदेश में राष्ट्रपति ओबामा ने तेल रिसने के लिए ज़िम्मेदार कंपनी बीपी को 20 अरब डॉलर मुआवज़ा देने के लिए राज़ी कर लिया. या कहें मजबूर किया.

इस के अगले दिन बीपी के एक उच्चाधिकारी टोनी हेवर्ड को कॉंग्रेस की एक कमेटी के सामने हाज़िर होना था और तिल रिसने के कारणों पर जवाबदेही करनी थी.

इस कमेटी के सदस्य चुनाव में चुन कर आते हैं और इस लिए कुछ विशेषज्ञों का कहना था कि कमेटी के सभी सदस्य इसमें दिलचस्पी नहीं रखते थे कि तेल के रिसने से नुक़सान कितना हुआ बल्कि वे इस प्रक्रिया से अपने क्षेत्र के लोगों को यह संदेश देना चाहते थे कि वे उनके लिए कितनी मेहनत से काम कर रहे हैं.

लोग भी खुश. नेता भी खुश और मीडिया भी ब्रेकिंग स्टोरी के सिलसिले के बाद ख़ुश. तेल के रिसाव से मेक्सिको की खाड़ी का पानी काला, लेकिन वाह रे लोकतंत्र तेरा फिर भी बोल बाला.

दक्षिण अफ्रीका के भारतीय

वैसे तो देश-दुनिया में भारतीय लोगों को ढूँढ़ निकालना मुश्किल काम नहीं होता और जब बात दक्षिण अफ़्रीका की आती है, तो इस देश के इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं भारतीय.

रंगभेद के ख़िलाफ़ आंदोलन में खड़े हुए भारतीय और आज इस देश की अर्थव्यवस्था में भी वे अहम भूमिका निभा रहे हैं. नेल्सन मंडेला के साथ जेल भी गए भारतीय और दक्षिण अफ़्रीकी क्रिकेट टीम का हिस्सा भी रहे हैं भारतीय.

कहने की बात नहीं कि यहाँ भारतीयों की उपस्थिति किसी स्थानीय लोग की उपस्थिति से कम अहम नहीं. वैसे तो आबादी के हिसाब से सबसे ज़्यादा भारतीय डरबन में रहते हैं, लेकिन आर्थिक केंद्र होने के कारण जोहानेसबर्ग में उनकी उपस्थिति कम नहीं.

किसी भारतीय इलाक़े में जाने की ललक मुझे जोहानेसबर्ग के मेफ़े इलाक़े में खींच ले गई. ऐसा लगा दिल्ली में आ गए हों. हर ओर चहल-पहल. वातावरण में भारतीय मसाले से युक्त खाने की सुगंध. भारतीय कपड़ों की दूकाने, भारतीय फ़िल्मों की सीडी और भी बहुत कुछ.

लंबे समय से भारतीय खाना न मिलने की भड़ास निकालने मैं भी एक रेस्तरां में घुस गया. खाना खाया, लोगों से बात की और चलने को हुआ. तभी कुछ भारतीय युवकों को देखा..लगा कुछ बात करनी चाहिए.

उनके पास पहुँचा और पहला सवाल यही किया- क्या आप भारतीय हैं? दुआ-सलाम तक तो बात ठीक थी, लेकिन जवाब टका सा मिला- नहीं हम भारतीय नहीं. मैंने अपने को दुरुस्त किया और पूछा- आप भारतीय मूल के तो होंगे....बोले- पता नहीं, हमारे दादे-परदादे होंगे....हम तो दक्षिण अफ़्रीकी हैं.

मन में एक टीस सी उठी. अपने मूल देश के प्रति इतनी अनभिज्ञता...लेकिन फिर सोचा....वे ग़लत कहाँ हैं. जिन लोगों की पैदाइश वहाँ हुई है, जो वहाँ की मिट्टी में खेलना-कूदना सीखे हैं और ख़ालिस वहीं के हैं....तो इसमें बुरा क्या.

हम जहाँ रहते हैं....वहाँ के होने में कोई बुराई तो नहीं...

पुलिस, प्रशासन और आलोचना

भाषण अक्सर उबाऊ होते हैं क्योंकि सुनने वालों को मालूम होता है कि बोलने वाला अपनी ही बातों पर यक़ीन नहीं करता.

अगर लिखित भाषण की कॉपी पढ़नी हो तो यह और भी बोझिल काम है मगर कुछ दिन पहले पुलिस की भूमिका पर केंद्रीय गृह मंत्री का पूरा भाषण पढ़ गया.

गृह मंत्री पी चिदंबरम की एक बात ने मेरी दिलचस्पी जगा दी, उन्होंने पुलिस वालों से कहा-'अपनी वर्दी गर्व से पहनिए.'

पता नहीं, कितने पुलिस वाले होंगे जिन्होंने गर्व और रौब का अंतर समझा होगा, कितने होंगे जिन्होंने दाग़दार वर्दी को गर्व करने लायक़ बनाने के बारे में सोचा होगा.

गर्व करने की वजह बताते हुए गृह मंत्री ने उनसे कहा--"भले ही आप लोगों को हर तरफ़ से आलोचना का सामना करना पड़ता है, आम नागरिक, वकील, जज, पत्रकार, टीवी एंकर, एनजीओ वाले सभी आपकी निंदा करते हैं लेकिन मुसीबत पड़ने पर हर किसी की पुलिस की ज़रूरत महसूस होती है".

उन्होंने कहा कि "पुलिस की मौजूदगी से ही लोग आश्वस्त हो जाते हैं, पुलिस की तैनाती से क़ानून-व्यवस्था क़ायम हो जाती है क्योंकि पुलिस वाले मददगार दोस्त और रक्षक हैं".

आम जनता गृह मंत्री से कितनी सहमत होगी इस पर शायद बहस की भी गुंजाइश नहीं है, न जाने कितने पुलिस वाले उनकी बातों को सच मान रहे होंगे.

उन्होंने पुलिस वालों से कहा-"आप आलोचनाओं से न घबराएँ, जो कई बार सही, लेकिन अक्सर ग़लत होते हैं."

गृह मंत्री का काम ही है पुलिस का मनोबल बढ़ाना, चिदंबरम साहब से उम्मीद भी नहीं की जा रही थी कि वे पुलिस की वैसी ही आलोचना करें, जैसी दूसरे करते हैं.

चिदंबरम चिंतित हैं कि देश में पुलिस वालों और थानों की भारी कमी है, उन्होंने ये भी कहा कि एक अरब से अधिक वाले देश की 'पुलिसिंग' बहुत कठिन काम है जबकि देश में माओवादी हिंसा जैसी बड़ी चुनौती सामने खड़ी है.

देश के गृह मंत्री को पुलिस से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि पुलिस उनकी बात मानती है, पुलिस के तौर-तरीक़ों में किसी बदलाव की ज़रूरत उन्हें नहीं महसूस हो रही है.

जो लोग पुलिस की मौजूदगी में सुरक्षित और आश्वस्त महसूस नहीं करते, यह उनकी निजी समस्या है, देश के गृह मंत्री उनके लिए कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनकी नज़र में तो ऐसी कोई समस्या है ही नहीं.

बिहार के रास्ते पर झारखंड

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 03 जून 2010, 18:53

टिप्पणियाँ (34)

टूटा हुआ हाईवे...... आती जाती ट्रकें......घुप्प अँधेरा.....और पास में ट्रक वालों से पैसा वसूलते नौजवान.....

हाइवे का ढाबा.....तेज़ आवाज़ में बजता संगीत...कारों में नशा करते अधेड़ उम्र के लोग (हथियारों से लैस)......

ये दो चित्र किस राज्य के हो सकते हैं......बिहार कहने से पहले ज़रुर सोचें.. ये नज़ारा बिहार का नहीं बल्कि बिहार से सटे झारखंड का है. वहां लंबे समय से पत्रकारिता में रहे लोग कहते हैं कि अब राज्य में इस तरह के नज़ारे आम हो गए हैं.

पिछले दिनों झारखंड से बस के रास्ते बिहार गया. क़रीब 14 घंटों के सफ़र में जो देखा जो सुना और जो समझा वो दुखद और परेशान करने वाला था.

पहले जब मैं इसी रास्ते पर बस से बिहार जाता था तो रात में ख़राब सड़कों पर नींद टूटती थी तो बस के लोग कहते थे. अरे चलो बिहार की सीमा में आ गए. इस बार बिहार की सीमा में प्रवेश करने के बाद ही सड़कें ठीक मिलीं.

कहते हैं 2004 के बाद सड़कों का निर्माण और रख रखाव ठप्प पड़ता जा रहा है याद आया पश्चिमी सिंहभूम के एक इलाक़े में सड़क के ठेके को लेकर मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा काफ़ी परेशान हुए थे.

ढाबों पर नशा करते लोग संभवत: छोटे ठेकेदार थे जो हथियारों से लैस भी थे यानी जान माल सुरक्षित नहीं. इनमें से एक भी आदिवासी नहीं था. महिलाओं के प्रति इन लोगों की भावना को घटिया ही कहा जा सकता था.

रास्ते में बस ख़राब हुई और अंधेरे में पांच घंटे रहने पड़े. बगल में नौजवान ( अधिकतर ग़रीब आदिवासी) ट्रक वालों से लूटपाट करने में लगे थे. इन पाँच घंटों में कभी पुलिस का कोई वाहन दिखाई नहीं दिया.

सड़कें नहीं.....क़ानून व्यवस्था नहीं और शायद रोज़गार भी नहीं. यह नवगठित राज्य जा कहां रहा है...

शायद बिहार के साथ भी यही हुआ होगा सालों पहले जब उसका गठन हुआ होगा. बर्बाद होते होते बिहार की यह हालत हो गई है कि अब थोड़ा सा भी विकास लोगों को बहुत अच्छा लगता है.


वैसे बिहार बदला है. झारखंड से बाहर निकलते ही सड़कें पहले से बहुत अच्छी हालत में मिलीं. समस्तीपुर से दरभंगा की सड़क इतनी अच्छी तो मैंने 30 वर्ष में कभी नहीं देखी थी.

दरभंगा जो पहले बहुत ही गंदा शहर था.. इस बार थोड़ा साफ-सुथरा लगा.. सच में यह सुखद आश्चर्य था.

ख़राब सड़कों के कारण दरभंगा से मुझे अपने गांव की दूरी तय करने में हमेशा तीन-साढ़े घंटे लगते थे लेकिन इस बार यह दूरी बस सवा घंटे में पूरी हो गई.

मेरे गांव में बिजली का कनेक्शन है लेकिन बिजली आती नहीं थी. पिताजी कहते हैं अब दिन में दो चार घंटे बिजली रहती है. शाम के कुछ घंटे लोग जेनरेटर की बिजली से काम चलाते हैं.

मेरा रिश्ता दोनों राज्यों से बराबर का है. किशोरावस्था से ही बिहार के बारे में बुरा सुनता रहा और बिहार में बुरा देखा भी लेकिन अब बिहार में स्थितियां बदल रही हैं और झारखंड बिहार (कुछ साल पहले) के रास्ते पर चल पड़ा है.

अगर किसी को ये शोध करना हो कि कोई राज्य कैसे बर्बाद होता है उसे झारखंड आना चाहिए. ये राज्य उदाहरण है कि कोई राज्य कैसे धीरे धीरे बर्बाद किया जाता है.

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