अगर फिर मौक़ा मिलता...
भारत के सफलतम वकीलों में से एक फाली एस नरिमन ने कहा है कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो वे भोपाल गैस के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड का मुक़दमा नहीं लड़ेंगे.
फाली एस नरिमन 1985 में यूनियन कार्बाइड की ओर से वकील थे. मानव इतिहास की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड को वे बचा रहे थे.
नरिमन साहब ने तो समय रहते बता दिया कि वे दोबारा ग़लती नहीं करेंगे.
जब हादसा हुआ तो अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और वहाँ का मीडिया उन्हें संवेदनशील मुख्यमंत्री कहा करता था. उनकी भूमिका को लेकर कई सवाल पूछे जा रहे हैं.
अभी अर्जुन सिंह ने कुछ नहीं कहा है कि उनकी सरकार ने यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन को निकल भागने में क्यों मदद की. शायद उनके ऐसे प्रायश्चित कथन के लिए उनकी आत्मकथा का इंतज़ार करना पड़े.
हो सकता है कि वे लिखें कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो वे वारेन एंडरसन को भागने नहीं देंगे. वे दोबारा दिल्ली में बैठे अपने आकाओं की बात नहीं सुनेंगे.
अभी वारेन एंडरसन ने भी कुछ नहीं कहा है. हो सकता है कि वे भी कहें कि अगर दोबारा मौक़ा मिले तो वे हादसे के बाद भारत जाने की ग़लती ही नहीं करेंगे या फिर यूनियन कार्बाइड के प्रमुख का पद ही स्वीकार नहीं करेंगे.
दो दिसंबर, 1984 को भोपाल में ज़हरीली गैस से हज़ारों लोग मारे गए थे और उसके बाद हज़ारों लोग बरसों-बरस धीमी-धीमी आती मौत के गवाह रहे. वे यह कहने को जीवित नहीं हैं कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो उस रात भोपाल में न रहें और अपने किसी परिजन को न रहने दें.
अब वे यह बताने के लिए दुनिया में नहीं हैं कि अगर दोबारा मौक़ा मिलता तो वे भोपाल में बसते भी या नहीं.
यह कहना किसी के लिए भी आसान हो सकता है कि वह अतीत की ग़लतियाँ नहीं दोहराएगा. किसी बौद्धिक और सोच-विचार वाले व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वह वर्तमान में ऐसे निर्णय ले कि भविष्य में उसे पछतावा न हो.
कहना कठिन है कि ऐसा होगा. लेकिन हो सकता है कि कल लालकृष्ण आडवाणी कह दें कि अगर दोबारा मौक़ा मिले तो वे रथयात्रा ही न निकालें और हो सकता है कि वे कारसेवकों को अयोध्या में इकट्ठा ही न करें,जिससे कि बाबरी मस्जिद बच सके.
या फिर नरेंद्र मोदी कह दें कि अगर फिर वही परिस्थितियाँ रहीं तो वे गोधरा के बाद दंगे नहीं होने देंगे.
इसी तरह भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे बहुत से नेता शायद फिर से वही हथकंडे न अपनाएँ जिसकी वजह से वे कटघरे में खड़े हैं. कुछ नया तरीक़ा सोच लें.
हो सकता है कि दाउद इब्राहिम और ओसामा बिन लादेन फिर वही दोहराना चाहें जो उन्होंने किया.
लेकिन आम सोच समझ वाला कोई भी व्यक्ति ज़रुर अपनी ग़लतियाँ सुधारना चाहेगा.
काश, ऐसा होता फाली नरिमन साहब! कि इतिहास में जाकर ग़लतियाँ सुधारने के मौक़े मिलते.





