पाकिस्तान में कंजूसी से दौलतमंद बने ये लोग कौन हैं?

इमेज स्रोत, Asif Hassan/Getty Images
- Author, आयशा इम्तियाज़
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
कराची के एक संपन्न मोहल्ले में जब मैं गाड़ी पार्क करने की जगह ढूंढ़ रही थी तो एक शानदार हवेली को देखकर ठिठक गई.
मेरी भाभी ने बताया कि सड़क के दूसरी तरफ़ भी बिलकिस सुलेमान दीवान की ऐसी ही एक बड़ी हवेली है. वह मेमन (सुन्नी मुसलमानों की उप-जाति) हैं और भाभी के साथ काम करती थीं. हम उन्हीं से मिलने आए थे.
हवेली के अंदर विशाल लॉन, करीने से कटी झाड़ियां और अंग्रेजों के जमाने का वास्तुशिल्प संपन्नता का संकेत दे रहा था. लेकिन अंदर वैसा वैभव नहीं था.
हम मुख्य दरवाज़े से सीधे अंदर चले गए. वहां हम एक साधारण से कमरे में पहुंचे जिसमें सिलाई मशीन, सोफ़ा और पुराने रेफ्रिजरेटर समेत कई ज़रूरी चीज़ें भरी थीं.
दीवान और उनकी बहन के पास अकूत दौलत है. वे बोतल बनाने वाले एक प्लांट के मालिक हैं. उनके मरहूम पिता फल-निर्यात कंपनी की विरासत छोड़ गए थे. लेकिन यह परिवार अपना समय हवेली के विशाल हॉल में नहीं बिताता, बल्कि वे एक छोटी रिहाइश में रहते हैं.
हवेली का बड़ा हिस्सा एक प्राइवेट स्कूल को किराये पर दे दिया गया है जहां दीवान और मेरी भाभी ने दो दशक से ज्यादा समय तक काम किया था.
मैं सोच में पड़ गई- इतनी दौलत होने के बावजूद इतनी कंजूसी क्यों?
दीवान और उनका परिवार ही ऐसा नहीं है. कराची का पूरा मेमन समुदाय बहुत कम में गुज़ारा करता है और इस पर फ़ख्र भी करता है.

इमेज स्रोत, Aysha Imtiaz
पैसे से पहचान
मेमन समुदाय के लिए पैसा ताक़त और रसूख का ज़रिया है और वे जी-जान से इसकी हिफाजत करते हैं. यह उनकी पहचान से जुड़ी चीज़ है.
कराची के मेमन भारत में रहने वाले मेमन समुदाय से 1947 के बंटवारे के समय अलग हुए थे. भारत में रहने वाले मेमन अपने पुरखों के कारोबार और उद्योग-धंधे चलाते रहे.
लेकिन अपनी जड़ों से विस्थापित होकर कराची में बसे मेमन समुदाय के लोगों को नये सिरे से शुरुआत करनी पड़ी. बंटवारे ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को कई साल पीछे कर दिया.
मरहूम मेमन उद्योगपति और समाजसेवी अहमद दाऊद की पोती अनिला पारेख कहती हैं, "मेरे दादा नंगे पैर पाकिस्तान पहुंचे थे. उन्होंने पहले मज़दूरी की. फिर धीरे-धीरे अपना साम्राज्य बनाया और फैलाया. बचपन से ही हमें मेहनत की कमाई की अहमियत समझाई गई."
अनिला कहती हैं, "यह हमारे जीवन का हिस्सा है. हम इसी तरह बचे हैं और हम (समाज को) वापस देना जानते हैं."

इमेज स्रोत, Reuters
रसूखदार तबका
कराची के मेमन के लिए जमा किया हुआ एक-एक पैसा कीमती है. वे पाकिस्तान के कई उद्योगों को नियंत्रित करते हैं- जैसे कपड़ा उद्योग, शिक्षा क्षेत्र, खाद उद्योग और वित्तीय प्रतिभूतियां.
लेकिन पैसे के प्रति उनका सम्मान कम नहीं हुआ है. इस विरासत की हिफाजत करके वे गर्व महसूस करते हैं.
कराची के मशहूर एकेडेमिया सिविटास एंड निक्सर कॉलेज के डीन नदीम गनी कहते हैं, "ख़र्च करो लेकिन बर्बाद मत करो."
गनी भी मेमन हैं. वह कहते हैं, "सादगी में विनम्रता होती है. इसमें आदर का भाव होता है. हम अपने आराम के लिए पैसे ख़र्च करने में कतराते नहीं हैं."
कराची के मेमन या तो कम में गुजारा करते हैं या ग़ैरज़रूरी ख़र्च करने में सावधानी बरतते हैं. बचत उनके लिए आने वाले कठिन समय के लिए बीमे की तरह है और पिछली कठिनाइयों के प्रति श्रद्धांजलि.
समुदाय के सभी सदस्य अपने संसाधनों को श्रद्धा से रखते हैं. उनके पास जो है उस पर गर्व करते हैं और जहां तक मुमकिन हो उसे बढ़ाने की कोशिश करते हैं.
कराची में रहने वाली मेमन हीरा खत्री का कहना है कि ज़्यादातर मेमन घरों में पुराने कपड़े परिवार और रिश्तेदारों को देने की परंपरा है.
रिश्ते के भाई-बहन यहां तक हम उम्र चाचा और मामा भी एक-दूसरे के पुराने कपड़े पहन लेते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
फ़िज़ूलख़र्ची पर जुर्माना
कमरे से बाहर जाने पर सभी घरों में बत्तियां और पंखे बंद किए जाते हैं, लेकिन मेमन परिवारों में ऐसा न करने वाले को सज़ा मिलती है.
बच्चों को जवाबदेह बनना और हिसाब-किताब दुरुस्त रखना सिखाया जाता है. हीरा खत्री अपने परिवार के नियमों के बारे में बताती हैं, "महीने के राशन के पैसे सिर्फ़ स्नैक्स पर ख़र्च करने के लिए नहीं थे."
"उनके लिए हमें अपने जेब ख़र्च से पैसे देने पड़ते थे. ग़लती करने पर हमने जुर्माना भी भरा है."
"टॉयलेट फ्लश करना या बत्ती बंद करना भूल जाने पर 15 पाकिस्तानी रुपये देने पड़ते थे. जुर्माने की इस रकम से इंटरनेट कनेक्शन का भुगतान होता था."

इमेज स्रोत, Asif Hassan
ज़ीरो-वेस्ट आंदोलन
मेमन जीवनशैली आज के नये ज़ीरो-वेस्ट आंदोलन की तरह है, जिसका मूलमंत्र है- कम ख़र्च करो, दोबारा इस्तेमाल करो और रीसाइकल करो.
यह आंदोलन कुछ ही दशक पहले मुख्यधारा में आया है लेकिन मेमन परंपराओं में यह सदियों से है. गनी कहते हैं, "बस इसके पास कोई नारा नहीं था."
मेमन घरों में मौसमी और स्थानीय फल-सब्जियां खायी जाती हैं. खाना ज़रूरत के मुताबिक ही बनता है जिससे बर्बादी न हो.
पारेख रात के खाने में एक सब्जी और मांस का कोई एक व्यंजन बनाती हैं. इससे ज़्यादा कुछ हो तो उनको खाना बर्बाद करने का जवाब देना पड़ता है.
पारेख और वीडियो फोटोग्राफर मनाहिल अशफ़ाक के मुताबिक़ सावधानी से सब्ज़ियों के पतले छिलके उतारना गर्व की बात होती है, क्योंकि उससे बर्बादी कम होती है.

इमेज स्रोत, Rizwan Tabassum/Getty Images
सस्ते और टिकाऊ कपड़े
गनी कहते हैं, "मेमन कभी दिखावे पर ख़र्च नहीं करते. उनके पैर ज़मीन पर रहते हैं."
वह एक हफ्ते के लिए विदेश में थे. 18 साल के बेटे को वह अमरीकी आईवी लीग स्कूल दिखाने ले गए थे. प्रिंस्टन में भी उन्होंने वॉल-मार्ट से खरीदे कपड़े पहने थे क्योंकि वे टिकाऊ थे और पूरी कीमत वसूल कराने वाले थे.
मेमन समुदाय के खाने-पीने की परंपराओं में सादगी की मिसाल देते हुए गनी कहते हैं, "हम अपनी इमेज की फिक्र न करके अधिकतम उपयोग की सोचते हैं.
हमारे लिए भूख बढ़ाने वाले मुफ्त कूपन का इस्तेमाल न करना असामान्य होगा. दिन चाहे पहले डेट का हो या शादी के वर्षों बाद."

इमेज स्रोत, Saqib Rafique
महंगी शादी
मेमन समुदाय की शादियां तड़क-भड़क वाली होती हैं जिनमें आम तौर पर 10-कोर्स वाला मेन्यू होता है. दुल्हन की ड्रेस 10 लाख पाकिस्तानी रुपये (करीब 5,000 पाउंड) तक हो सकती है.
ये शादियां उनकी कंजूसी से मेल नहीं खातीं. इन शादियों में वे अपने मेहमानों का ख़याल रखते हैं इसलिए इसमें कोई कंजूसी नहीं बरतते.
मेमन शादी समारोहों में मेहमानों की तादाद हज़ारों में हो सकती है. इस विरोधाभास के बारे में पूछने पर मेमन प्रोफेशनल फ़ोरम के अध्यक्ष मोशिन अदी कहते हैं, "शादियां संबंध बनाने और ब्रैंडिंग करने के मौके होते हैं."
तो क्या शादी के मेहमानों को यह सब देखकर न्योता दिया जाता है? शायद हां. लेकिन वहां उदारता भी दिखती है.

इमेज स्रोत, Aysha Imtiaz
पैसे से पैसे बनाना
मेमन जिस ईमानदारी और खुलेपन से बचत और पैसे के बारे में बातें करते हैं वह उनको सबसे अलग करता है. पारेख कहती हैं, "हमारे घरों के मर्द जब खाने बैठते हैं तो पैसे के बारे में बातें करते हैं."
"पुरुष कारोबार में निवेश करके बचत करते हैं. महिलाएं सोना या बचत प्रमाण-पत्र खरीदकर पैसे बचाती हैं. हम सभी बचत करते हैं क्योंकि हम नहीं जानते कि भविष्य में क्या होगा."
पारेख के बच्चे 32 और 27 साल के हैं. फिर भी वह महीने की पहली तारीख को उनके दरवाजे पर खड़ी रहती हैं ताकि उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा लेकर (उनके लिए) निवेश कर सकें."

इमेज स्रोत, Asif Hassan/Getty Images
आदत में है बचत
बिलकिस सुलेमान दीवान के घर पर उस दिन का शब्द था, "बर्बादी".
मेरी भाभी हज से लौटी थीं और वहां से प्रार्थना की चटाई, खजूर और तसबीह की माला लेकर आई थीं. दीवान ने उनको देखते ही कहा कि दो चटाइयों की ज़रूरत नहीं थी.
बालों की मेंहदी की चर्चा हुई तो मेरी भाभी ने बताया कि रंग गहरा करने के लिए वह तीन चम्मच चाय की पत्ती डालती हैं.
दीवान बोलीं, "बिना इस्तेमाल की हुई चाय की पत्ती? ये तो बर्बादी है."
लेकिन जब विदा लेने का वक़्त आया तो मेज़बान ने मेहमानों को खाली हाथ लौटने नहीं दिया.
उन्होंने मुझे एक स्टायरोफ़ोम कप में भरकर इमली की जड़ दी, जो मेरी खांसी ठीक करने के लिए थी. यह जड़ थोक में खरीदी गई थी ताकि सस्ती पड़े.
बड़ी हवेली को किराये पर देकर उन्होंने अपने लिए घर का छोटा सा हिस्सा रखा है. वहां टेबल को खिसकाकर हम दरवाज़े की ओर बढ़े.
उनके आख़िरी शब्द एकदम सपाट थे, "कमरे से निकलने से पहले बत्ती बुझा दें."
(बीबीसी ट्रैवल पर इस स्टोरी को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी ट्रैवल को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














