एक काले भालू की वजह से जब दुनिया तबाही के कगार पर पहुंची थी

परमाणु युद्ध

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    • Author, ज़ारिया गॉरवेट
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

जानवरों के घुस आने से लेकर एक डॉलर से भी कम क़ीमत वाली कंप्यूटर चिप के ख़राब होने जैसी ग़लतियां, उस लंबी सूची में शामिल हैं जिनके चलते परमाणु युद्ध युद्ध छिड़ने का संकट पैदा हो चुका है.

यक़ीन करना भले मुश्किल हो लेकिन ऐसा हुआ है जब मामूली ग़लतियों के चलते परमाणु युद्ध छिड़ने का संकट पैदा हो गया है.

25 अक्टूबर 1962 की आधी रात थी और विस्कॉन्सिन में एक ट्रक रनवे पर विमान रोकने के लिए दौड़ रहा था. एक उड़ान को रोकने के लिए हाथ में बस कुछ ही क्षण थे.

इसके कुछ ही मिनट पहले, दुलुथ सेक्टर डायरेक्शन सेंटर के एक गार्ड ने सेंटर की बाड़ पर चढ़ने का प्रयास करते हुए एक छायादार आकृति देखकर उस पर गोली चलाई और अलर्ट घोषित कर दिया था. उसे डर था कि यह सोवियत संघ-क्यूबा का संयुक्त मिसाइल हमला हो सकता है.

ऐसा लगा कि वो एक हमला ही था. इलाक़े के सभी हवाई अड्डे पर अलार्म बज रहे थे. तेज़ी से लोग चाक-चौबंद हो रहे थे. पास के वोल्क फ़ील्ड एयरबेस के हवाई अड्डे पर किसी ने ग़लत बटन दबा दिया, इसके चलते स्टैंडर्ड सिक्योरिटी वार्निंग की जगह पायलटों को आपातकालीन सायरन की आवाज़ें सुनाई देने लगीं, मानो उन्हें युद्ध के लिए तैयार होने को कहा जा रहा हो. और फिर पलक झपकते ही वे अपने विमानों में थे और परमाणु हथियार से भरे विमानों को हवा में उड़ाने के लिए मुस्तैद हो चुके थे.

यह वो वक़्त था जब हर कोई चौकन्ना था. इससे ठीक 11 दिन पहले एक ख़ुफ़िया विमान ने क्यूबा में गोपनीय ढंग से रखे गए लॉन्चर, मिसाइल और ट्रक की तस्वीरें ली थीं. इससे आशंका होने लगी थी कि सोवियत संघ, अमेरिका पर हमले की तैयारी कर रहा है. दुनिया भर के देशों को मालूम था कि दोनों देशों के बीच एक गोली से भी स्थिति बिगड़ सकती है.

लेकिन गार्ड को जिसकी आकृति नज़र आयी थी वह इंसान नहीं था. वह एक बड़ा काला भालू था और उसकी पहचान में गार्ड से ग़लती हो चुकी थी. लेकिन वोल्क फील्ड में स्क्वाड्रन अभी भी इस तथ्य से अनजान थे. उन्हें बताया गया था कि यह कोई प्रैक्टिस ड्रील नहीं है, जब वे अपने विमानों में चढ़ रहे थे तब वे पूरी तरह से आश्वस्त थे कि तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका है.

बहरहाल, बेस कमांडर को पता चला कि क्या हुआ था. पायलटों को उड़ान भरने से एक तेज़-तर्रार अधिकारी ने रोका, जिन्होंने रनवे पर अपना इंजन चालू कर चुके विमानों को रोकने के लिए रनवे पर ट्रक दौड़ा दिया.

अब लोग1960 के दौर के परमाणु युद्ध की चिंता को लगभग भूल चुके हैं. लेकिन अब एक बार फिर परमाणु युद्ध का ख़तरा बढ़ गया है.

अब परमाणु हथियारों के ठिकाने कुछ गिने-चुने देशों के पास हैं और इंसान को जलवायु परिवर्तन जैसे अन्य चिंताओं का भी सामना करना पड़ रहा है, लेकिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के रणनीतिक तौर पर अहम हथियारों को तैनात करने के बयान के बाद परमाणु युद्ध को लेकर चिंता बढ़ गई है.

भालू

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क़रीबी मामला

हम लोग आसानी से भूल जाते हैं कि दुनिया भर में लगभग 14 हज़ार परमाणु हथियार हैं जिनकी मिलीजुली ताकत पृथ्वी पर बसे लगभग तीन अरब लोगों के जीवन को ख़त्म कर देने की है- यानी यह युद्ध छिड़ा तो पूरी मानव प्रजाति भी ख़त्म हो सकती है.

हम जानते हैं कि किसी भी नेता द्वारा जानबूझकर परमाणु विस्फ़ोट करने की आशंका दूर-दूर तक नहीं है. लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि परमाणु युद्ध किसी दुर्घटनावश भी शुरू हो सकता है.

अब तक के इतिहास में कम से कम 22 मौक़े ऐसे आए हैं जब दुनिया में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होते-होते बचा है. हम कह सकते हैं कि कम ही बार ऐसा हुआ जब हमें उड़ने वाले हंसों चंद्रमा, कंप्यूटर की छोटी-मोटी समस्याओं और अंतरिक्ष के असमान्य मौसम जैसी घटनाओं से परमाणु युद्ध की कगार पर धकेल दिया गया.

1958 में एक विमान ने ग़लती से एक परमाणु बम एक घर के पीछे बने बगीचे में गिरा दिया. इस हादसे में किसी की मौत नहीं हुई लेकिन परिवार की मुर्गियां नष्ट हो गईं थीं. ऐसी एक दुर्घटना 2010 में भी हुई जब अमेरिकी एयरफ़ोर्स का लगभग 50 न्यूक्लियर मिसाइल से संपर्क अस्थायी रूप से टूट गया था. इसका मतलब यही था कि अगर उस वक़्त कोई मिसाइल अपने आप लॉन्च हो जाती तो मिसाइलों का ना तो पता चल पाता और ना ही उन्हें रोकना संभव होता.

आधुनिक परमाणु हथियारों की चौंका देने वाली लागत और तकनीकी तौर पर बेहतर होने के बावजूद अमेरिका 2019 से 2028 के बीच अपने परमाणु संयत्रों को बेहतर बनाने पर 497 अरब डॉलर ख़र्च कर रहा है. इस ऐतिहासिक ख़र्च से यह ज़ाहिर होता है कि मानवीय ग़लतियों और या फिर जीवों की हरकतों से दुर्घटना की आशंका आने वाले वक्त में भी रह सकती है.

बोरिस येल्तसिन

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येल्तसिन की वो ग़लती

25 जनवरी 1995 को, तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन "परमाणु ब्रीफ़केस" को सक्रिय करने वाले इतिहास के पहले नेता बने. परमाणु ब्रीफ़केस एक ऐसा ब्रीफ़केस होता है जिसमें परमाणु बम विस्फोट करने के निर्देश और तकनीक शामिल होते हैं.

येल्तसिन के रडार ऑपरेटरों ने तब देखा था कि नॉर्वे के तट से एक रॉकेट लॉन्च किया गया था और वे रॉकेट को आसमान की ओर बढ़ते हुए देख रहे थे. उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि वह रॉकेट कहां जा रहा है या किसे निशाना बना रहा है.

अपने हाथों में ब्रीफ़केस के साथ, येल्तसिन ने अपने शीर्ष सलाहकारों से इस बारे में बात की कि क्या जवाबी हमला शुरू किया जाए. जब वे कुछ ही मिनटों के अंदर फ़ैसला लेने वाले थे तभी उन लोगों ने महसूस किया कि यह रॉकेट समुद्र की ओर जा रहा है और इससे कोई ख़तरा नहीं है.

बाद में पता चला कि यह कोई परमाणु हमला नहीं था, बल्कि एक वैज्ञानिक जांच थी, जिसे नॉर्दन लाइट्स की जांच के लिए भेजा गया था. नॉर्वे के अधिकारी इस बात पर चकित थे कि इस पर ऐसा हंगामा मच गया था क्योंकि एक महीने पहले इस रॉकेट लॉन्च करने की सार्वजनिक घोषणा की जा चुकी थी.

येल्तसिन का न्यूक्लियर बम के बटन वाला ब्रीफ़केस

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वापसी का रास्ता नहीं

महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि परमाणु हमले की शुरुआत ग़लतफ़हमी से हुई या फिर किसी वास्तविक ख़तरे के कारण हुई- क्योंकि हमले के लिए रॉकेट को भेजने के बाद वापसी का रास्ता नहीं है.

अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन में रक्षा मंत्री रह चुके और जिमी कार्टर प्रशासन में उप रक्षा मंत्री रह चुके विलियम पेरी बताते हैं, "अगर राष्ट्रपति ने झूठे या ग़लत अलार्म पर रिएक्ट कर दिया तो इसका मतलब यही है कि उन्होंने परमाणु युद्ध शुरू कर दिया. वे इसके बाद कुछ नहीं कर सकते हैं. मिसाइल को ना तो वापस बुलाया जा सकता है और ना ही उसे नष्ट किया जा सकता है."

ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि कब-कब दुनिया परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंच गई और भविष्य में ऐसी स्थिति न आए, इसके लिए क्या किया जा सकता है.

मीटर

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कैसे होते हैंपरमाणु हमले?

हथियारों के लेकर ग़लतियों के मूल में वो प्रारंभिक चेतावनी सिस्टम है जो शीत युद्ध के दौरान बनाया गया था.

दरअसल परमाणु मिसाइलों के अपने लक्ष्य पर हमला करने से युद्ध की पुष्टि हो जाती है. लेकिन अब ऐसी तकनीक उपलब्ध है जिससे हमला करने से पहले ही मिसाइल का पता लगाया जा सकता है, और हमले से पहले जवाबी हमला किया जा सकता है.

जवाबी हमले जल्दी करने की कोशिश के चलते ही ग़लती होने की आशंका बनी रहती है. इस जानकारी को हासिल करने के लिए आपको डेटा की ज़रूरत होती है.

कई अमेरिकियों से अनजान, अमेरिका के पास वर्तमान में कई उपग्रह हैं जो हर समय चुपचाप दुनिया भर में इसी तरह की गतिविधियों पर नज़र रखे हुए हैं. इनमें चार उपग्रह पृथ्वी से 35,400 किलोमीटर ऊपर से संचालित हो रहे हैं. वे "जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट" में हैं - यानी एक स्थान पर स्थित हैं जहां से वे पृथ्वी के सापेक्ष अपनी स्थिति कभी नहीं बदलते हैं.

इसका मतलब है कि वे एक ही क्षेत्र पर कमोबेश निरंतर निगरानी रखने में सक्षम हैं यानी वे किसी भी संभावित परमाणु ख़तरे का पता लगा सकते हैं, सप्ताह में सातों दिन, दिन में चौबीसों घंटे.

लेकिन प्रेक्षपण के बाद मिसाइल पर उपग्रह नज़र नहीं रख पाएंगे, ऐसी स्थिति में उनपर नज़र रखने के लिए अमेरिका के पास सैकड़ों रडार स्टेशन मौजूद हैं. ये रडार स्टेशन, मिसाइल की स्थिति, उसकी गति और वह कितनी दूरी पर जाकर गिरेगी, इन सबका आकलन कर सकते हैं.

एक बार पर्याप्त संकेत मिलने पर कि हमला हो रहा है, राष्ट्रपति को सूचित किया जाता है. विलियम पेरी बताते हैं, "मिसाइल के दाग़े जाने के पांच मिनट से दस मिनट के अंदर राष्ट्रपति को इसके बारे में जानकारी मिल जाती है."

इसके बाद सबसे अहम और बेहद मुश्किल फ़ैसला लेना होता है कि क्या जवाबी हमला किया जाए या नहीं किया जाए? पेरी बताते हैं, "यह एक जटिल व्यवस्था है कि लेकिन हर वक़्त से काम करती है. हालांकि हम लोग अभी ऐसी बात कर रहे हैं जिसके होने की संभावना कम है लेकिन उसका नतीजा भयंकर होगा."

और यक़ीनी तौर पर, दुनिया ख़त्म होने के लिए ऐसा बस एक ही बार होने की ज़रूरत होगी.

परमाणु युद्ध

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तकनीक पर सवाल

इस तरह के मामले में ऐसी झूठी चेतावनी, दो ग़लतियों के कारण जारी हो सकती है- एक तो तकनीकी ग़लती और दूसरी मानवीय ग़लती. और अगर नसीब ख़राब हुआ तो दोनों ग़लती एक साथ भी हो सकती है.

इसका बेहतरीन उदाहरण, पहली बार 1980 में तब सामने आया था जब विलियम पेरी अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के प्रशासन में उप रक्षा मंत्री थे. वो याद करते हैं, "यह किसी सदमे से कम नहीं था."

इसकी शुरुआत हुई थी रात के तीन बजे एक फ़ोन कॉल से. अमेरिकी एयर डिफ़ेस कमांड के निगरानी ऑफ़िस ने पेरी को बताया कि सर्विलांस करने वाले कंप्यूटरों के मुताबिक़ सोवियत संघ से क़रीब 200 मिसाइलें सीधे अमेरिका की ओर आ रही हैं. हालांकि तब तक उन्होंने पता लगा लिया था कि यह वास्तविक ख़तरा नहीं, कंप्यूटर ने किसी गड़बड़ी के चलते ये जानकारी दी थी.

पेरी ने बताया, "उन लोगों ने मुझे फ़ोन करने से पहले व्हाइट हाउस फ़ोन कर दिया था. उन्होंने राष्ट्रपति को इसकी जानकारी दे दी थी, उन्हें उस वक़्त में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के ज़रिए फ़ोन किया गया था."

किस्मत अच्छी थी कि कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार उन्हें जगाने में कुछ मिनट की देरी की, इसी दौरान उन्हें जानकारी मिल गई की ये सूचना ग़लत थी. अगर सलाहकार ने कुछ मिनटों तक इंतज़ार नहीं किया होता, तत्काल राष्ट्रपति को जगाकर इसकी जानकारी दी होती तो शायद उस दिन दुनिया बदल जाती.

पेरी बताते हैं, "अगर राष्ट्रपति को सीधे फ़ोन जाता तो उनके पास फ़ैसला लेने के लिए उनके पास जवाबी कार्रवाई के लिए केवल पांच मिनट होते, तो क्या होता? आधी रात में वे शायद ही किसी से सलाह लेते."

इस वाकये के बाद पेरी ने ग़लती से परमाणु युद्ध शुरू होने की बात को कभी सैद्धांतिक समस्या नहीं माना, उनके लिए यह एक वास्तविक समस्या बन गई जो कभी अचानक सच साबित हो सकती थी. पेरी कहते हैं, "मैं यही कह सकता हूं कि उस दिन दुनिया परमाणु युद्ध के कगार तक पहुंच गई थी."

बहरहाल, जांच में पता चला कि वार्निंग सिस्टम वाले कंप्यूटर की ख़राब चिप के चलते यह स्थिति पैदा हुई थी और वह चिप एक डॉलर से भी कम लागत में बदली गई.

सर्किट

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इस वाक़ये से एक साल पहले पेरी ने एक और क़रीबी मामले का अनुभव किया था जब एक तकनीशियन ने अनजाने में एक प्रशिक्षण टेप को कंप्यूटर पर लोड किया था. इससे ग़लती से एक मिसाइल प्रक्षेपण के विवरण को मुख्य चेतावनी केंद्रों पर प्रसारित कर दिया था.

यही वजह है कि दुनिया भर के शहरों को समतल बनाने की ताक़त रखने वाले इन हथियारों के इस्तेमाल और उससे जुड़ी सुरक्षा का मुद्दा उभरता रहता था. अनाड़ी तकनीशियनों के अलावा हमारी चिंता का मुख्य केंद्र वे वैश्विक नेता भी हैं जो परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का वास्तविक अधिकार रखते हैं.

न्यूक्लियर कोड वाले ब्रीफ़केस लेकर जाती हुई एक अमेरिकी सैनिक

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सबसे बड़ा जोख़िम

विलियम पेरी कहते हैं, "अमेरिकी राष्ट्रपति के पास परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार है और वह अकेले शख़्स हैं जिनके पास ऐसा करने का पूरा अधिकार है."

यह अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के दिनों से सच रहा है. शीत युद्ध के दौरान, निर्णय सैन्य कमांडरों को सौंप दिया गया था. लेकिन ट्रूमैन का मानना था कि परमाणु हथियार एक राजनीतिक हथियार हैं और इसलिए उन्हें एक राजनेता के नियंत्रण में होना चाहिए.

अपने पूर्ववर्तियों की तरह डोनाल्ड ट्रंप जहां-जहां जाते थे, उनके साथ एक सहयोगी न्यूक्लियर फुटबॉल (न्यूक्लियर ब्रीफ़केस) लेकर चला करता था, जिसमें राष्ट्र के सभी परमाणु हथियारों के लॉन्च कोड होते हैं. यही स्थिति जो बाइडन के साथ भी है.

चाहे वह पहाड़ की यात्रा पर हों, हेलीकॉप्टर में यात्रा कर रहे हों या समुद्र में नौकायन कर रहे हों, अमेरिकी राष्ट्रपति किसी भी वक्त परमाणु हमला करने में सक्षम होते हैं. इसके लिए उन्हें बस आदेश देना है और कुछ हद तक विनाश के लिए तैयार होना है, क्योंकि यह ऐसा हमला है जिसमें हमला करने वाले और जिस पर हमला हुआ दोनों का विनाश कुछ ही मिनटों में तय है.

कई संगठनों और विशेषज्ञों ने बताया है कि इस ताकत का एक शख़्स के हाथ में रहना, एक बड़ा जोख़िम है.

रिचर्ड निक्सन

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शराब, ड्रग्स और भावनात्मक अस्थिरता

विलियम पेरी कहते हैं, "ऐसा कई बार हुआ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को शराब की लत रही हो या वो दवाईयां ले रहे हों. या फिर वह एक मनोवैज्ञानिक बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं. ये सभी चीज़ें अतीत में हुई हैं."

"जितना अधिक आप इसके बारे में सोचते हैं, उतनी ही अधिक परेशान करने वाली संभावनाएं सामने आती हैं. और फिर सवाल ये भी है कि क्या रात में राष्ट्रपति सो जाते हैं? क्या करना है जब यह फ़ैसला मिनटों में लेना है, तो नींद से उठने के बाद स्थिति सोचने-समझने में कितना वक्त लगेगा. वो एक कप कॉफ़ी के साथ खुद को तरोताज़ा करने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि वे उस वक्त अपने उच्चतम स्तर पर काम करेंगे."

अगस्त 1974 में, जब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन वॉटरगेट मामले में फंसे थे और पद से इस्तीफ़ा देने की कगार पर थे, तब वे चिकित्सकीय तौर पर अवसाद की चपेट में थे और उनका व्यवहार अस्थिर हो गया था.

उनके बारे में अफ़वाह भी थी वे जल्दी थक जाते थे, नियमित तौर पर शराब पीते रहते थे और आम तौर पर अजीब व्यवहार किया करते थे. एक बार सीक्रेट सर्विस के एजेंट ने उन्हें कुत्ते का बिस्किट खाते हुए देखा था.

कथित तौर पर निक्सन हमेशा क्रोध करने, शराब पीने और यौन क्षमता बढ़ाने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया करते थे, लेकिन इन सबसे अधिक गंभीर बात यह थी कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल करने की शक्ति उनके पास ही थी.

अमेरिका में परमाणु शस्त्रागार की रक्षा करने वाले सैन्य कर्मियों के बीच नशा भी एक समस्या है. 2016 में, मिसाइल बेस पर काम करने वाले कई अमेरिकी एयर-क्रू ने कोकीन और एलएसडी सहित ड्रग्स लेने की बात स्वीकार की और चार को बाद में दोषी ठहराया गया था.

न्यूक्लियर सबमरीन

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भीषण दुर्घटना से कैसे बचें

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए, पेरी ने परमाणु अप्रसार चैरिटी प्लॉशेयर्स फंड की नीति निदेशक टॉम कोलिना के साथ एक पुस्तक 'द बटन: द न्यू न्यूक्लियर आर्म्स रेस एंड प्रेसिडेंशियल पावर फ्रॉम ट्रूमैन टू ट्रम्प' का सह-लेखन किया है. इसमें, दोनों लेखक हमारे वर्तमान परमाणु सुरक्षा उपायों की अनिश्चितता को रेखांकित करते हैं और कुछ संभावित समाधान सुझाते हैं.

सबसे पहले, वे परमाणु हथियार के इस्तेमाल पर एकमात्र अधिकार का अंत देखना चाहते हैं - ताकि सामूहिक विनाश के इन हथियारों को लॉन्च करने के बारे में निर्णय लोकतांत्रिक तरीके से किए जाएं और निर्णय पर किसी की मानसिक दुर्बलता का प्रभाव कम से कम हो. अमेरिका में, इसका मतलब कांग्रेस में मतदान के ज़रिये इसका फ़ैसला करना होगा.

पेरी कहते हैं, "ऐसा करने पर लॉन्च करने के निर्णय प्रक्रिया धीमी हो जाती है."

आमतौर पर माना जाता है कि परमाणु हमले की प्रतिक्रिया जल्दी होनी चाहिए, ताकि जवाबी हमला करने की क्षमता ना ख़त्म हो जाए. लेकिन ऐसे हमले की सूरत में अगर अमेरिका के कई शहरों और सभी ज़मीन पर मौजूद मिसाइलों को परमाणु हथियारों से मिटा दिया गया हो, तो भी सरकार के पास सैन्य पनडुब्बियों से हमला करने की ताक़त होगी.

कोलिना बताती हैं, "आपको एक ही सूरत में जवाबी हमला करना चाहिए जब आपको ये मालूम हो कि आप पर हमला हो रहा है. हमें ऐसे अलार्म पर कोई रिएक्शन नहीं करना चाहिए, जो ग़लत हो सकता है. हमला वास्तविक है या नहीं यह तभी पता चलेगा जब किसी इमारत, शहर को निशाना बनाया जाएगा."

अगर ऐसी चेतवानियों पर धीमी गति से आगे बढ़ा जाए तो पारस्परिक विनाश से बचा जा सकता है. परमाणु युद्ध की चेतावनी में गड़बड़ी की आशंका बहुत ज़्यादा नहीं होती लेकिन हमने कहानी की शुरुआत में देखा है कि भालू को लेकर गॉर्ड की ग़लतफहमी से क्या स्थिति उत्पन्न हो सकती है.

भारत और चीन के झंडे

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इमेज कैप्शन, चीन और भारत ऐसे दो मुल्क हैं जिन्होंने पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने के प्रति समर्पित हैं

पहले इस्तेमाल नहीं

इसके अलावा विलियम पेरी और कोलिना, परमाणु संपन्न देशों से अपील करते हैं कि वे केवल जवाबी कार्रवाई में इसका इस्तेमाल करें, पहले इसका इस्तेमाल नहीं करें.

कोलिना बताती हैं, "चीन एक दिलचस्प उदाहरण है. वे पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने की नीति को लागू कर चुके हैं. उन्होंने घोषणा की है कि वे संकट के समय में परमाणु हथियार का इस्तेमाल पहले नहीं करेंगे. चीन की इस घोषणा में थोड़ी विश्वसनीयता दिखती है क्योंकि उसने परमाणु हथियारों को मिसाइल आपूर्ति व्यवस्था से अलग रखा है."

इसका मतलब है कि चीन को परमाणु हमला करने से पहले, परमाणु हथियार और मिसाइलों को एक जगह लाना होगा और जब इतने उपग्रह लगतार नज़र रख रहे हों तो कोई ना कोई इसको नोटिस कर लेगा.

यहां यह ध्यान देने की बात है, रूस और अमेरिका के पास ऐसी कोई नीति नहीं हैं- परमाणु हथियार का इस्तेमाल कब और कैसे करना है, ये अधिकार उनके पास ही है और वे परंपरागत युद्ध में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. ओबामा प्रशासन ने परमाणु हथियार का पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति पर विचार किया था लेकिन वे किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके.

पेरी और कोलिना मानते हैं कि देशों को ज़मीन स्थित इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल को पूरी तरह से नष्ट कर देना चाहिए. क्योंकि किसी भी परमाणु हमले में ये नष्ट हो जाएंगे और संभावित हमले में इसी मिसाइल के ज़रिए हमला किया जाएगा.

परमाणु हथियार छोड़ने के लिए चलाए गए अभियान का प्रतीक

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परमाणु हमले को निरस्त करना

क्या परमाणु हथियार वाले मिसाइलों को निरस्त नहीं किया जा सकता? अगर चेतावनी ग़लत निकल आए तो क्या हमले को बीच में कैंसल किया जा सकता है.

कोलिना बताती हैं, "यह दिलचस्प सवाल है, जब हम मिसाइल टेस्ट करते हैं, तो हम ऐसा करते हैं. अगर वे रास्ते से हट जाते हैं, तो वे खुद को नष्ट कर सकते हैं. लेकिन हम सक्रिय मिसाइलों के साथ ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि हमें डर होता है कि कोई विरोधी किसी तरह रिमोट कंट्रोल हासिल कर लेगा और उन्हें निष्क्रिय कर देगा."

ऐसे और भी तरीके हैं जिनसे किसी देश की अपनी तकनीकों का इस्तेमाल उसके ख़िलाफ़ किया जा सकता है.

जैसे-जैसे हम अत्याधुनिक कंप्यूटरों पर अधिक से अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, यह चिंता बढ़ती जा रही है कि हैकर्स, वायरस या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस बॉट, परमाणु युद्ध शुरू कर सकते हैं. कोलिना बताती हैं, "हम मानते हैं कि साइबर हमलों के बढ़ते ख़तरे के साथ झूठे अलार्म की आशंका बढ़ गई है."

वो कहती हैं कि एक कंट्रोल सिस्टम को यह सोचकर धोखा दिया जा सकता है कि मिसाइल हमले के लिए आ रही है, इसका अर्थ ये हुआ कि एक राष्ट्रपति को जवाबी हमले के लिए धोखा दिया जा सकता है. बहरहाल, व्यापक समस्या यह है कि राष्ट्र चाहते हैं कि उनके परमाणु हथियार कम से कम वक्त में प्रतिक्रिया दे सकें और इस्तेमाल करने में आसान हों - यानी एक बटन दबाने पर उपलब्ध हों.

यह अनिवार्य रूप से उनके उपयोग पर नियंत्रण की कोशिशों को कठिन बनाता है.

हालांकि शीत युद्ध को ख़त्म हुए लंबा वक़्त बीत चुका है. कोलिना बताती हैं कि हम अभी भी अकारण हमले की तैयार कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता में हम सब अब एक अलग दुनिया में रह रहे हैं.

विडंबना यह है कि कई विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि मानव प्रजाति के लिए अब तक का सबसे बड़ा ख़तरा उन लॉन्च सिस्टम से उत्पन्न हो रहा है जिनके बारे में माना जाता है कि वो मानव की रक्षा के लिए बनाए गए हैं.

लाइन

(ये बीबीसी फ़्यूचर की स्टोरी का शब्दश: अनुवाद नहीं है. भारतीय पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल कहानी पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर की बाकी कहानियां आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.)

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