जिस तेज़ी से कीटाणु और अन्य रोगजनक जीव, एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहे हैं, उससे एंटीबायोटिक दवाएं, कई बीमारियों से लड़ने में बेअसर साबित हो जाएंगी. और इससे आगे चल कर हर साल एक करोड़ लोगों की जान जाने का अंदेशा है.
अभी तक हर साल दुनिया भर में 7 लाख लोग ऐसे रोगों से मर जाते हैं, जिन पर दवाओं का असर नहीं होता. पिछले एक दशक में हानिकारक बैक्टीरिया के ख़िलाफ़ जिन एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा सकता था, उनका असर अब कम होता जा रहा है.
इसी दौरान, अन्य रोग पैदा करने वाले वायरस, फफूंद और अन्य परजीवी भी इन दवाओं से लड़ने की शक्ति विकसित कर रहे हैं. मतलब ये कि इनकी वजह से जो बीमारियां होती हैं, उनका इलाज करना और भी मुश्किल हो रहा है. जानकारों का कहना है कि जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो दुनिया भर में हर साल एक करोड़ लोगों की मौत ऐसे रोगाणुओं से होगी, जिन पर मौजूदा दवाओं का असर नहीं होता.
हम सभी दिन भर में न जाने कितनी चीज़ें छूते हैं. उन सभी पर कई प्रकार के कीटाणु, जीवाणु और वायरस चिपके रहते हैं. वो किसी ना किसी सूरत में हमारे शरीर में दाखिल हो जाते हैं और हमें बीमार करते हैं.
जानकार कहते हैं, अब जबकि हम जान चुके हैं कि किस प्रकार की सतह पर कौन-सा कीटाणु या बैक्टीरिया कितनी देर तक ज़िंदा रह सकता है तो क्यों ना हम एंटी बैक्टीरियल परत के लेप का इस्तेमाल शुरू कर दें. तांबे की मिश्रित धातुओं को इसके लिए सबसे अच्छा विकल्प माना गया है.
ये धातु महज़ 2 घंटे में 99.9 फ़ीसद बैक्टीरिया मारने की क्षमता रखती है. प्राचीन काल में भारत और यूनान के लोग तो खाना तांबे के बर्तनों में ही बनाते थे. भारत में तो आज भी तांबे के बर्तनों को सेहत के लिए अच्छा माना जाता है.
यूनान में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए भी तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल होता था. लेकिन आज ये धातु महंगी होने की वजह से कम इस्तेमाल होने लगी हैं. इसकी जगह स्टील और प्लास्टिक ने ले ली है.
तांबे के बर्तनों की साफ़-सफ़ाई भी आसान काम नहीं है. इसीलिए कुछ लोग इसे नापसंद करते हैं. महंगा होने की वजह से अगर हम तांबे के बर्तन इस्तेमाल नहीं कर सकते तो इसकी कलई चढ़ाकर तो इस्तेमाल किया ही जा सकता है.
मिसाल के लिए डोर बेल या लिफ्ट के बटन, दरवाज़ों के हैंडल कॉपर कोटिंग वाले बनाए जा सकते हैं. इससे कीटाणुओं और वायरस का असर बहुत हद तक कम हो सकता है.
वैज्ञानिक एंटीबैक्टीरियल सरफ़ेस तैयार करने के लिए प्रकृति से भी प्रेरणा ले रहे हैं. मिसाल के लिए सिकाडा कीड़ा अपने पंखों से अपनी सफ़ाई के लिए मशहूर है. उनके पंख सुपरहाइड्रोफ़ोबिक हैं. मतलब ये कि वो अपने पंखों पर पानी टिकने नहीं देते.
जैसे ही पानी की बूंदे उस पर गिरती हैं, वो फिसल जाती हैं और अपने साथ पंखों पर चिपके कीटाणु भी बहा ले जाती हैं. अब इसी तर्ज़ पर नई तरह की सतहें तैयार करने पर काम किया जा रहा है.
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रिसर्चर टाइटेनियम और टाइटेनियम मिश्रित धातुओं के बारे में ज़्यादा उत्साहित हैं. इन्हें हाई टेंपरेचर पर आसानी से पिघलाया जा सकता है. और तेज़ किनारों के साथ एक महीन चादर बनाई जा सकती है. जिनसे विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं को मारा जा सकता है.
इसके अलावा, पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आने पर टाइटेनियम डाइऑक्साइड ऐसे पराक्साइड का उत्पादन करता है जो रोगाणुओं को निष्क्रिय करता है. कोरोना वायरस को कमज़ोर करने के लिए भी इसी तरह की कोटिंग वाली सतहों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
ख़ुद को बीमारियों से बचाने और रोगाणु ख़त्म करने के लिए हम प्रकृति से और भी कई तरह की प्रेरणाएं ले सकते हैं. मिसाल के लिए चाय के पेड़ से निकलने वाले तेल में एंटीवायरल एरोसॉल होते हैं. इनके संपर्क में आने पर 5-15 मिनट के भीतर 95 फ़ीसद से अधिक रोगाणु नष्ट हो सकते हैं.
रोगाणुरोधी पौधों के अर्क़ से कोटिंग वाली सतह तैयार करने पर रिसर्च अभी शुरूआती चरण में है. उम्मीद है कि कामयाबी भी मिल जाएगी. लेकिन इसके लिए ज़रूरी अवयवों की मात्रा और रोगाणुओं के टारगेट के बारे में अधिक जानकारी होना भी ज़रूरी है.
एंटीमाइक्रोबियल सरफ़ेस पर रोगाणु मर कर वहीं चिपके रह जाते हैं. इनकी लगातार सफ़ाई होना बहुत ज़रूरी है. दुनिया में ऐसे बहुत से देश हैं जहां पानी की भारी क़िल्लत है. ऐसे में एंटीमाइक्रोबियल सतहों का आइडिया सभी देशों के लिए कारगर नहीं है.
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आज दुनिया नए कोराना वायरस का सामना कर रही है. इसे काबू में करने के लिए अभी तक के सभी प्रयास नाकाम रहे हैं. ऐसे में एंटीमाइक्रोबियल सरफ़ेस की ज़रूरत और भी ज़्यादा महसूस होती है. इसके अलावा अस्पतालों से जितना कचरा निकलता है वो भी संक्रमण फैलाने की वजह बनता है.
इसमें शक नहीं कि हम तरह-तरह के जीवाणुओं से घिरे रहते हैं. बहुतों के ख़िलाफ़ तो हमारा शरीर ख़ुद ही लड़ लेता है और बहुतों को ख़त्म करने के लिए दवाएं लेने पड़ती हैं. लेकिन, जिस तरह कोविड-19 वायरस हमारी ज़िंदगी में नासूर बनकर घुस गया है, उससे और उस जैसे अन्य रोगी बनाने वाले जीवों से लड़ने के लिए हमें जल्द ही अन्य विकल्प तलाशने होंगे.
रोगाणु मारने वाली सतह का लेप, इसका एक अच्छा विकल्प हो सकता है.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.
(ये बीबीसी फ्यूचर की स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल कहानी देखने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं. आप बीबीसी फ्यूचर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं)