You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्या छोटे परमाणु रिएक्टर ही होंगे ऊर्जा का भविष्य
- Author, लोइस पार्शले
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है. आने वाले समय में अगर इस समस्या को और बढ़ने से रोकना है, तो सभी देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा.
वाहनों के अलावा बिजलीघर कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत हैं. पारंपरिक बिजलीघर बड़ी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं.
इनसे बचने के लिए बड़े परमाणु ऊर्जा प्लांट लगाने की सलाह दी जाती है. मगर एक तो बड़े एटमी प्लांट लगाने में समय बहुत लगता है. दूसरी उनमें लागत भी बहुत आती है. एक औसत एटमी ऊर्जा प्लांट लगाने में लगभग दस अरब डॉलर का ख़र्च आता है.
अब छोटे-छोटे परमाणु रिएक्टर से बिजली पैदा करके इस मुश्किल का हल निकाल रहे हैं. अमरीका में न्यूस्केल पॉवर नाम की कंपनी ऐसे ही परमाणु रिएक्टर्स स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से काम कर रही है. कंपनी का दावा है कि अगर छोटे-छोटे कई मॉड्यूलर पावर रिएक्टर लगाए जाएं, तो ये पारंपरिक परमाणु संयंत्रों के बराबर ही ऊर्जा पैदा करने की क्षमता रखते हैं. एक प्लांट में पैदा होने वाली ऊर्जा से अमरीका के पांच लाख चालीस हज़ार घरों को बिजली उपलब्ध कराई जा सकती है.
न्यूस्केल ने एक स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तकनीक स्थापित करने में 90 करोड़ डॉलर से भी ज़्यादा पैसा ख़र्च किया है. अब कंपनी इसे बड़े पैमाने पर क़ायम करने के लिए काम कर रही है.
न्यूस्केल पावर का दावा है कि अगले दो साल में 720 मेगावाट बिजली बनाने वाला पावर प्लांट तैयार कर लिया जाएगा.
अमरीका के न्यूक्लियर रेगुलेटरी कमीशन ने न्यूस्केल के डिज़ाइन को मंज़ूरी दे दी है. उम्मीद है कि वर्ष 2020 के आख़िर तक सरकार की तरफ़ से ये एटमी बिजलीघर चलाने की इजाज़त मिल जाएगी.
वैसे, छोटे परमाणु रिएक्टर से बिजली बनाने वाला अमरीका इकलौता देश नहीं है. रूस ने भी आर्कटिक महासागर में 70 मेगावाट वाले तैरते हुए परमाणु बिजली घर की स्थापना की है. वहीं, चीन ने 2016 में ही स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर पर आधारित तैरते हुए परमाणु बिजली घर बनाने का एलान किया है. और, अमरीका के पड़ोसी कनाडा में तीन सूबों ने भी छोटे एटमी रिएक्टर स्थापित करने के क़रार किए हैं.
वहीं, ब्रिटेन में मशहूर कंपनी रॉल्स रॉयस 440 मेगा वॉट वाले परमाणु रिएक्टर तैयार करने पर काम कर रही है.
स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर के समर्थन में कई तरह की दलीलें दी जा रही हैं. पहली तो यही कि अगर दुनिया अगले तीस वर्षों में कार्बन उत्सर्जन कम करना चाहती है तो नई परमाणु ऊर्जा तकनीक का होना बहुत ज़रूरी है. दूसरे, मौजूदा प्लांट काफ़ी पुराने पड़ गए हैं. जिनमें कोई ना कोई गड़बड़ी होती ही रहती है. और बड़े पैमाने पर नए परमाणु ऊर्जा प्लांट बनाने में मोटी रकम की दरकार है.
अभी पानी, हवा और सूरज की रोशनी से भी बिजली बनाने की दिशा में काम बढ़ा है. सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के छोटे प्लांटों से बिजली की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सकता है.
हालांकि कुछ जानकार स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर की आलोचना भी करते हैं. उनके मुताबिक़ छोटे रिएक्टरों में भी बड़े रिएक्टरों की तरह समस्याएं होती हैं. और फिर इनके साथ सुरक्षा का मसला जुड़ा है.
साथ ही इन प्लांट से निकलने वाला रेडियोएक्टिव कचरा ठिकाने लगाना भी एक बड़ी समस्या है. जानकार कहते हैं कि छोटे प्लांट महंगे भी पड़ते हैं.
कुछ का ये भी कहना है कि परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा की क़ीमतों में भी कोई तुलना नहीं है. अमरीका में एक तिहाई से ज़्यादा न्यूक्लियर प्लांट घाटे में हैं और बंद होने के कगार पर हैं.
2015 में कुल बिजली की खपत का क़रीब 11 प्रतिशत ही परमाणु ऊर्जा से आता था. जबकि, 1996 में दुनिया के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा 17.6 प्रतिशत था. 2011 में जापान के फ़ुकुशिमा पावर प्लांट हादसे के बाद जर्मनी ने अपने यहां परमाणु बिजली घर पूरी तरह बंद कर दिए. बेल्जियम, इटली और स्विट्ज़रलैंड ने भी मौजूदा रिएक्टर बदलने या नए प्लांट लगाने से इनकार कर दिया है.
वहीं, छोटे एटमी रिएक्टर की हिमायत करने वाले इनके फ़ायदे गिनाते नहीं थकते.
वो कहते हैं, ये रिएक्टर बड़े प्लांट की तुलना में कम गर्म होते हैं. इन प्लांट का डिज़ाइन इस तरह बनाया गया है कि इसमें मरम्मत की ज़रूरत बहुत कम रह जाती है. ना ही इनसे कोई बड़ा हादसा हो सकता है. साथ ही छोटे प्लांट एक जगह से दूसरी जगह लाना ले जाना आसान होता है और इनके बनाने में लागत भी कम आती है. ख़ास तौर से विकासशील देशों के लिए तो ये बहुत ही किफ़ायती हैं.
किसी पारंपरिक एटमी प्लांट के बराबर की बिल्डिंग में क़रीब 125 छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर रखे जा सकते हैं. साथ ही प्लांट के जनरेटर, फ्यूल कंटेनर आदि एक साथ ही रखे जा सकते हैं. इससे पाइप की फिटिंग बहुत ज़्यादा नहीं करनी पड़ती और हादसे का ख़तरा भी कम होता है. सभी रिएक्टरों को ठंडा रखने के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे लागत भी कम हो सकती है.
पारंपरिक न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखना आसान नहीं है. अगर उसे ठंडा रखने वाला सिस्टम ख़राब हो जाता है तो रिएक्टर की पूरी प्रक्रिया ही रुक जाती है. रिएक्टर का तापमान बढ़ने से उसकी कोर पिघल भी सकती है. इसकी मिसाल हम फ़ुकुशिमा में देख भी चुके हैं. लेकिन SMR में ऐसे वॉल्व लगाए गए हैं जो बिजली न होने पर भी रिएक्टर को भाप से ठंडा रखेंगे.
ब्रिटेन में रॉल्स-रॉयस और कई अन्य कंपनियां मिल कर 440 मेगावाट के रिएक्टर पर काम कर रही हैं. हालांकि इसके लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार से ज़रूरी फंड नहीं मिल पाया है.
छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर को और फ़ायदेमंद बनाने का एक और तरीक़ा हो सकता है. इनका इस्तेमाल न सिर्फ़ ग्रिड के लिए बिजली पैदा करने में किया जाए, बल्कि इनसे एडवांस रिएक्टर भी विकसित किए जाएं जिनसे ईंधन के लिए हाइड्रोजन तैयार की जा सकती है.
लेकिन, अभी भी कई जानकार छोटे रिएक्टर की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहे हैं. अभी तक कई कंपनियां छोटे रिएक्टर के डिज़ाइन पर काम कर चुकी हैं. मोटी रक़म खपाने के बाद भी नतीजे तसल्ली बख़्श नहीं रहे और प्रोजेक्ट बंद करने पड़े.
आलोचक ये भी कहते हैं कि इन छोटे रिएक्टरों से निकलने वाला रेडियोएक्टिव कचरा ठिकाने लगाने का फ़ॉर्मूला भी अभी तक किसी कंपनी के पास नहीं है.
आलोचनाएं अपनी जगह, मगर भविष्य में कार्बन मुक्त ऊर्जा हासिल करने में ये छोटे रिएक्टर मददगार हो सकते हैं.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना वायरस से बचने के लिए मास्क पहनना क्यों ज़रूरी है?
- अंडे, चिकन खाने से फैलेगा कोरोना वायरस?
- कोरोना वायरस: बच्चों को कोविड-19 के बारे में कैसे बताएं?
- कोरोना वायरस: संक्रमण के बाद बचने की कितनी संभावना है
- कोरोना वायरस: क्या करेंसी नोट और सिक्कों से भी फैल सकता है?
- ‘फ़्लू’ जो कोरोना वायरस से भी ज़्यादा जानलेवा था
- कोरोना वायरस कैसे आपका धंधा-पानी मंदा कर रहा है?
- कोरोना वायरस: क्या मास्क आपको संक्रमण से बचा सकता है?
- क्या लहसुन खाने से ख़त्म हो जाता है कोरोना वायरस?
- कोरोना वायरस अभी की दुनिया को पूरी तरह से यूं बदल देगा
- कोरोना वायरस: बच्चों को कोविड-19 के बारे में कैसे बताएं?
- कोरोना वायरस: क्या गर्भ में ही मां से बच्चे को हो सकता है?
- कोरोना के बाद की दुनिया में राष्ट्रवाद, निगरानी और तानाशाही बढ़ेगी
- कोरोना काल में कैसे बनाए रखें अपनी रोमांटिक लाइफ़
- कोरोना वायरस: वो महिला जिन्होंने घरेलू मास्क घर-घर पहुंचाया
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)