दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है. आने वाले समय में अगर इस समस्या को और बढ़ने से रोकना है, तो सभी देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा.
वाहनों के अलावा बिजलीघर कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत हैं. पारंपरिक बिजलीघर बड़ी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं.
इनसे बचने के लिए बड़े परमाणु ऊर्जा प्लांट लगाने की सलाह दी जाती है. मगर एक तो बड़े एटमी प्लांट लगाने में समय बहुत लगता है. दूसरी उनमें लागत भी बहुत आती है. एक औसत एटमी ऊर्जा प्लांट लगाने में लगभग दस अरब डॉलर का ख़र्च आता है.
अब छोटे-छोटे परमाणु रिएक्टर से बिजली पैदा करके इस मुश्किल का हल निकाल रहे हैं. अमरीका में न्यूस्केल पॉवर नाम की कंपनी ऐसे ही परमाणु रिएक्टर्स स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से काम कर रही है. कंपनी का दावा है कि अगर छोटे-छोटे कई मॉड्यूलर पावर रिएक्टर लगाए जाएं, तो ये पारंपरिक परमाणु संयंत्रों के बराबर ही ऊर्जा पैदा करने की क्षमता रखते हैं. एक प्लांट में पैदा होने वाली ऊर्जा से अमरीका के पांच लाख चालीस हज़ार घरों को बिजली उपलब्ध कराई जा सकती है.
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न्यूस्केल ने एक स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तकनीक स्थापित करने में 90 करोड़ डॉलर से भी ज़्यादा पैसा ख़र्च किया है. अब कंपनी इसे बड़े पैमाने पर क़ायम करने के लिए काम कर रही है.
न्यूस्केल पावर का दावा है कि अगले दो साल में 720 मेगावाट बिजली बनाने वाला पावर प्लांट तैयार कर लिया जाएगा.
अमरीका के न्यूक्लियर रेगुलेटरी कमीशन ने न्यूस्केल के डिज़ाइन को मंज़ूरी दे दी है. उम्मीद है कि वर्ष 2020 के आख़िर तक सरकार की तरफ़ से ये एटमी बिजलीघर चलाने की इजाज़त मिल जाएगी.
वैसे, छोटे परमाणु रिएक्टर से बिजली बनाने वाला अमरीका इकलौता देश नहीं है. रूस ने भी आर्कटिक महासागर में 70 मेगावाट वाले तैरते हुए परमाणु बिजली घर की स्थापना की है. वहीं, चीन ने 2016 में ही स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर पर आधारित तैरते हुए परमाणु बिजली घर बनाने का एलान किया है. और, अमरीका के पड़ोसी कनाडा में तीन सूबों ने भी छोटे एटमी रिएक्टर स्थापित करने के क़रार किए हैं.
वहीं, ब्रिटेन में मशहूर कंपनी रॉल्स रॉयस 440 मेगा वॉट वाले परमाणु रिएक्टर तैयार करने पर काम कर रही है.
स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर के समर्थन में कई तरह की दलीलें दी जा रही हैं. पहली तो यही कि अगर दुनिया अगले तीस वर्षों में कार्बन उत्सर्जन कम करना चाहती है तो नई परमाणु ऊर्जा तकनीक का होना बहुत ज़रूरी है. दूसरे, मौजूदा प्लांट काफ़ी पुराने पड़ गए हैं. जिनमें कोई ना कोई गड़बड़ी होती ही रहती है. और बड़े पैमाने पर नए परमाणु ऊर्जा प्लांट बनाने में मोटी रकम की दरकार है.
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अभी पानी, हवा और सूरज की रोशनी से भी बिजली बनाने की दिशा में काम बढ़ा है. सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के छोटे प्लांटों से बिजली की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सकता है.
हालांकि कुछ जानकार स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर की आलोचना भी करते हैं. उनके मुताबिक़ छोटे रिएक्टरों में भी बड़े रिएक्टरों की तरह समस्याएं होती हैं. और फिर इनके साथ सुरक्षा का मसला जुड़ा है.
साथ ही इन प्लांट से निकलने वाला रेडियोएक्टिव कचरा ठिकाने लगाना भी एक बड़ी समस्या है. जानकार कहते हैं कि छोटे प्लांट महंगे भी पड़ते हैं.
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कुछ का ये भी कहना है कि परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा की क़ीमतों में भी कोई तुलना नहीं है. अमरीका में एक तिहाई से ज़्यादा न्यूक्लियर प्लांट घाटे में हैं और बंद होने के कगार पर हैं.
2015 में कुल बिजली की खपत का क़रीब 11 प्रतिशत ही परमाणु ऊर्जा से आता था. जबकि, 1996 में दुनिया के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा 17.6 प्रतिशत था. 2011 में जापान के फ़ुकुशिमा पावर प्लांट हादसे के बाद जर्मनी ने अपने यहां परमाणु बिजली घर पूरी तरह बंद कर दिए. बेल्जियम, इटली और स्विट्ज़रलैंड ने भी मौजूदा रिएक्टर बदलने या नए प्लांट लगाने से इनकार कर दिया है.
वहीं, छोटे एटमी रिएक्टर की हिमायत करने वाले इनके फ़ायदे गिनाते नहीं थकते.
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वो कहते हैं, ये रिएक्टर बड़े प्लांट की तुलना में कम गर्म होते हैं. इन प्लांट का डिज़ाइन इस तरह बनाया गया है कि इसमें मरम्मत की ज़रूरत बहुत कम रह जाती है. ना ही इनसे कोई बड़ा हादसा हो सकता है. साथ ही छोटे प्लांट एक जगह से दूसरी जगह लाना ले जाना आसान होता है और इनके बनाने में लागत भी कम आती है. ख़ास तौर से विकासशील देशों के लिए तो ये बहुत ही किफ़ायती हैं.
किसी पारंपरिक एटमी प्लांट के बराबर की बिल्डिंग में क़रीब 125 छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर रखे जा सकते हैं. साथ ही प्लांट के जनरेटर, फ्यूल कंटेनर आदि एक साथ ही रखे जा सकते हैं. इससे पाइप की फिटिंग बहुत ज़्यादा नहीं करनी पड़ती और हादसे का ख़तरा भी कम होता है. सभी रिएक्टरों को ठंडा रखने के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे लागत भी कम हो सकती है.
पारंपरिक न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखना आसान नहीं है. अगर उसे ठंडा रखने वाला सिस्टम ख़राब हो जाता है तो रिएक्टर की पूरी प्रक्रिया ही रुक जाती है. रिएक्टर का तापमान बढ़ने से उसकी कोर पिघल भी सकती है. इसकी मिसाल हम फ़ुकुशिमा में देख भी चुके हैं. लेकिन SMR में ऐसे वॉल्व लगाए गए हैं जो बिजली न होने पर भी रिएक्टर को भाप से ठंडा रखेंगे.
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ब्रिटेन में रॉल्स-रॉयस और कई अन्य कंपनियां मिल कर 440 मेगावाट के रिएक्टर पर काम कर रही हैं. हालांकि इसके लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार से ज़रूरी फंड नहीं मिल पाया है.
छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर को और फ़ायदेमंद बनाने का एक और तरीक़ा हो सकता है. इनका इस्तेमाल न सिर्फ़ ग्रिड के लिए बिजली पैदा करने में किया जाए, बल्कि इनसे एडवांस रिएक्टर भी विकसित किए जाएं जिनसे ईंधन के लिए हाइड्रोजन तैयार की जा सकती है.
लेकिन, अभी भी कई जानकार छोटे रिएक्टर की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहे हैं. अभी तक कई कंपनियां छोटे रिएक्टर के डिज़ाइन पर काम कर चुकी हैं. मोटी रक़म खपाने के बाद भी नतीजे तसल्ली बख़्श नहीं रहे और प्रोजेक्ट बंद करने पड़े.
आलोचक ये भी कहते हैं कि इन छोटे रिएक्टरों से निकलने वाला रेडियोएक्टिव कचरा ठिकाने लगाने का फ़ॉर्मूला भी अभी तक किसी कंपनी के पास नहीं है.
आलोचनाएं अपनी जगह, मगर भविष्य में कार्बन मुक्त ऊर्जा हासिल करने में ये छोटे रिएक्टर मददगार हो सकते हैं.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.