कोरोना से मिले कौन से सबक़ हम याद रखेंगे?

    • Author, मार्था हेनरिक्स
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

दुनिया भर में कोविड-19 की महामारी का शोर है. लोग घरों में बंद हैं. कारोबार बंद हैं. फ़ैक्ट्रियां बंद हैं. बाज़ार बंद हैं. हर तरफ़ एक वीरानी और उदासी है.

इस उदास, वीरान, सुनसान दुनिया में अगर कुछ अच्छा हुआ है तो वो है, निखरती प्रकृति. इन दिनों प्रकृति खुल कर सांस ले रही है. जंगली जानवर खुली सड़कों पर चहलक़दमी कर रहे हैं. समंदर किनारे दुर्लभ कछुओं की आमद तेज़ हो गई है. घरों के बाहर परिंदों का शोर बढ़ गया है. हवा साफ़ है. दिन में आसमान चटख़ नीला दिखता है, तो रात में तारे साफ़ नज़र आते हैं.

इसकी बड़ी वजह है कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी. ट्रैफ़िक और फ़ैक्ट्रियां बंद होने से धुआं और कचरा भी ख़त्म हो गया है. एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ न्यूयॉर्क में कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में 5 से 10 फ़ीसद कमी आई है.

इस साल के शुरुआत में ही चीन में कार्बन गैस उत्सर्जन में 25 फ़ीसद की कमी आई है. फ़ैक्ट्रियों में बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल होता है. लेकिन अब वो बंद हैं तो उनसे निकलने वाला धुआं भी बंद है.

यूरोप की सैटेलाइट तस्वीर देखने पर पता चलता है कि इटली में कितने बड़े पैमाने पर नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड वहां की हवा से ग़ायब हो गई है. इटली में सांस संबंधी बीमारियों की बड़ी वजह यही ख़तरनाक गैस है. और इसी गैस की वजह से यहां तेज़ाबी बारिश होती है.

कार्बन उत्सर्जन में कमी

लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि क्या ये बदलाव कोविड-19 महामारी के ख़ात्मे के बाद भी जारी रहेंगे?

सभी देशों ने कोरोनो वायरस का संक्रमण रोकने के लिए लॉकडाउन का तरीक़ा अपनाया है. जिसकी वजह से यात्राएं पूरी तरह बंद हैं. हवा में बड़ी मात्रा में कार्बन घोलने का काम हवाई जहाज़ ही करते हैं.

कार्बन उत्सर्जन में कमी की वजह कारख़ानों से निकलने वाला धुआं भी है. इन दिनों तमाम फ़ैक्ट्रियां बंद हैं. ये और बात है कि इसकी वजह से बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी भी फैल रही है.

ज़ाहिर है साफ़ हवा-पानी तो सभी चाहते हैं. लेकिन, बेरोज़गारी की क़ीमत पर नहीं. रिसर्च करने वालों का कहना है कि जब हम इस महामारी से उबरेंगे तो दुनिया में लगभग 0.3 फ़ीसद कार्बन उत्सर्जन में कमी आ चुकी होगी. लेकिन जैसे ही लॉकडाउन हटेगा, कारोबार शुरू होगा. लोगों के पास पैसा आना शुरू होगा तो फ़िर से बड़े पैमाने पर कारखानों में काम शुरू होगा. लोग छुट्टियां मनाने वर्ल्ड टूर पर जाएंगे. तो फिर क्या होगा?

ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी महामारी के बाद कार्बन उत्सर्जन में कमी आई हो. 2008 की मंदी के दौर में भी दुनिया की जलवायु में बदलाव देखा गया था. ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम हुआ था. मिसाल के लिए चीन ने सबसे ज़्यादा स्टील, सीमेंट वग़ैरह बनाने का काम किया जिसकी वजह से वहां बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैला. अभी कारख़ाने बंद होने से चीन की हवा भी काफ़ी हद तक साफ़ हो गई है. लेकिन जब फिर से काम शुरू होगा तो हालात कैसे होंगे, इसका अंदाज़ा तो सभी को है.

लॉकडाउन की वजह से एक बड़ा नुक़सान ये भी होगा कि पर्यावरण के संरक्षण के लिए होने वाली कांफ़्रेंस COP 26 रद्द हो सकती है. जिसमें पर्यावरण संरक्षण संबंधी कई बड़े फ़ैसले लिए जाने हैं.

पर्यावरण वैज्ञानिकों को चिंता है कि अपने काम पूरा करने के लिए जितना समय उन्हें चाहिए वो उन्हें नहीं मिल पाएगा. वैज्ञानिकों का ये भी कहना है कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी कार्बन उत्सर्जन को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.

कोविड-19 की महामारी ने हमें एक और चीज़ सिखाई है. अभी तक हम ये परवाह ही नहीं करते थे कि जो खाना हम खाते हैं वो आता कहां से है. खाने की बर्बादी बहुत करते थे. लेकिन अब हमें इसकी क़द्र होने लगी है. यही नहीं, अब लोग एक दूसरे का ख्याल करने लगे हैं. ज़रूरतमंदों की मदद करने लगे हैं. सच पूछें तो इस महामारी ने हम सभी को ज़िंदगी के असल मायने बता दिए हैं. उम्मीद है कि कोरोना वायरस के प्रकोप से मिले ये सबक़ हमें आगे भी याद रहेंगे.

(ये बीबीसी फ्यूचर की स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल कहानी देखने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं.)

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