भारत में ई-रिक्शे ला रहे हैं इलेक्ट्रिक क्रांति

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, लुओ डेल बेलो
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
दिल्ली के किसी भी मेट्रो स्टेशन के पास आपको ई-रिक्शा की लंबी कतारें दिख जाएंगी.
वो मेट्रो स्टेशन आने और वहां से अपने घर जाने वाले मुसाफ़िरों के 'लास्ट माइल' यानी सार्वजनिक परिवहन केंद्र से किसी यात्री की आख़िरी मंज़िल तक पहुंचाने वाले प्रमुख साधन बन गए हैं.
10-20 रुपये में कोई भी मेट्रो स्टेशन से अपने घर या किसी अस्पताल, स्कूल या दफ़्तर तक पहुंच सकता है. ये तिपहिया वाहन, भारत की राजधानी की ट्रैफ़िक से भरी सड़कों पर आपको जाम में फंसे बिना मंज़िल तक पहुंचा देते हैं.
लंबी दूरी जैसे पंद्रह से पच्चीस किलोमीटर तक का सफ़र तय करने के लिए आपको ऑटो या टैक्सी की मदद लेनी पड़ती है. दो-चार किलोमीटर दूरी तय करने में ई-रिक्शा और सामान्य रिक्शे काम आते हैं.
अगर हम ये कहें ये तिपहिया वाहन, यानी ई-रिक्शा भारत में बड़ी ख़ामोशी से इलेक्ट्रिक वाहन की क्रांति ला रहे हैं, तो ग़लत नहीं होगा.

इमेज स्रोत, Getty Images
कई समस्याओं का समाधान
यूरोप, अमरीका और चीन जैसे क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक वाहनों में लोगों की निजी इलेक्ट्रिक कारों का हिस्सा ज़्यादा है. इसके उलट, भारत में इलेक्ट्रिक क्रांति की अगुवाई ई-रिक्शा कर रहे हैं.
इसकी प्रमुख वजह ये है कि अमरीका में जहां हर एक हज़ार में से 800 लोगों के पास कारें हैं तो भारत में ये अनुपात हर एक हज़ार की आबादी में बस 20 कारों का है. भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों से आवाजाही से एक साथ कई समस्याओं का समाधान हो सकता है. पहली बात तो ये कि इससे प्रदूषण कम होता है.
स्टेट ऑफ़ ग्लोबल एयर रिपोर्ट के मुताबिक़, केवल 2017 में भारत में 12 लाख लोग प्रदूषण की वजह से समय पूर्व मौत के शिकार हो गए. भारत में आज पैदा होने वाले किसी भी बच्चे की औसत उम्र प्रदूषण की वजह से क़रीब ढाई साल कम हो जाती है. प्रदूषण से कैंसर, फेफड़ों और दिल की बीमारियां होने का डर बढ़ जाता है.
स्कूल वैन में जाने वाले बच्चे प्रदूषण के आसान शिकार होते हैं, क्योंकि इन गाड़ियों की ऊंचाई कम होती है. दिल्ली के रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट की रिसर्चर अक्षिता घाटे कहती हैं कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों से परिवहन बढ़ने से ऊर्जा सुरक्षा बढ़ती है.
अक्षिता कहती हैं, "भारत जैसा विशाल देश और इसकी विशाल अर्थवयवस्था, लंबे समय तक महंगे तेल के आयात पर निर्भर नहीं रह सकते."
अक्षिता कहती हैं कि अभी ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब इलेक्ट्रिक गाड़ियों को चार्ज करने के ठिकाने कम थे. अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव था. लेकिन भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए सुविधाएं तेज़ी से बढ़ी हैं और ये सस्ती भी हो रही हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
'ग़रीबों के लिए रोज़गार'
इससे ई-रिक्शा का चलन भी बढ़ा है. हालांकि, अभी भी ये स्वच्छ वाहन अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए कोयला या गैस से बनने वाली बिजली पर निर्भर हैं. फिर भी, इलेक्ट्रिक गाड़ियां प्रदूषण कम फैलाती हैं. एक मोटे अंदाज़े के मुताबिक़, दिल्ली में क़रीब 15 लाख ई-रिक्शा हैं. इनसे एक बार में चार सवारियों को ढोया जा सकता है.
परिवहन और शहरी प्रशासन के विशेषज्ञ श्री प्रकाश कहते हैं, "ई-रिक्शा, बहुत से शहरी ग़रीबों के लिए रोज़गार का अच्छा माध्यम बन गए हैं. ये हल्के होते हैं और कम बिजली से चलते हैं."
मुझे कई ई-रिक्शा चालकों ने बताया कि बहुत सी स्टार्ट-अप कंपनियां उन्हें किराए पर ई-रिक्शा चलाने को देती हैं. एक कंपनी रोज़ाना 15 रुपये के किराए पर ई-रिक्शा देती है. वहीं, एक कंपनी ई-रिक्शा चलाने वाले को रोज़ 800 रुपये देती है जो दिल्ली में किसी मज़दूरी की रोज़ की कमाई का दोगुना है.
इसी तरह कई लोग, ई-रिक्शा को चार्ज करने की सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं. जैसे कि एस के महापात्रा, जो स्मार्टई नाम की कंपनी चलाते हैं. यहां पर कोई भी 350 रुपये दे कर अपना ई-रिक्शा चार्ज कर सकता है. महापात्रा ने 20 ई-रिक्शा को चार्ज करने से शुरू किया था. आज उनके यहां एक बार में 140 ई-रिक्शा को चार्ज किया जा सकता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
सौर ऊर्जा से चार्ज होते रिक्शे
बहुत से उद्यमी ई-रिक्शा के बढ़ते चलन में अपने लिए अवसर देख रहे हैं. बेंगलुरु की रहने वाली रोज़मेरी पियर्स-मेसिक, थ्री व्हील्स यूनाइटेड कंपनी चलाती हैं जो ई-रिक्शा ख़रीदने के इच्छुक लोगों को सस्ती दरों पर क़र्ज़ देती है. फिर एक ऐप के ज़रिए उनकी निगरानी करती है, ताकि वो कंपनी का पैसा तय समय पर चुका दें.
ई-रिक्शा के साथ एक बड़ी चुनौती ये है कि इसे चार्ज होने में काफ़ी समय लग जाता है. कुछ कंपनियों ने इसका विकल्प भी ढूंढ निकाला है. सन मोबिलिटी के चेतन मैनी ऐसे ही शख़्स हैं. वो ई-रिक्शा के लिए पूरी तरह चार्ज बैटरियां उपलब्ध कराते हैं. इसके लिए वो देशभर में ई-रिक्शा निर्माताओं और बैटरी बनाने वालों के साथ साझेदारी कर रहे हैं.
जहां ई-रिक्शा को चार्ज करने में चार से छह घंटे लग जाते हैं. वहीं, बैटरी बदलने में महज़ कुछ मिनट लगते हैं. इससे बैटरी की भारी क़ीमत चुकाने से भी ड्राइवर बच जाते हैं. सन मोबिलिटी का एक केंद्र रोज़ाना क़रीब 150 ई-रिक्शा को बैटरी बदलने में मदद करता है.
वहीं, कुछ रिसर्चरों ने सोलर पैनल वाले ई-रिक्शा भी डिज़ाइन किे हैं. इनमें से देहरादून की वुमन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी की सुनीता चंदेल और अमरीका के इलिनॉय इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी की प्रिश्चिला मल्हाल के मॉडल को काफ़ी पसंद किया गया है.
इन के मॉडल में ई-रिक्शा के ऊपर ही सोलर पैनल लगाए जाने का प्रस्ताव है, जिससे ई-रिक्शा चलते हुए भी चार्ज होते रहें.

इमेज स्रोत, Getty Images
अफ़्रीका और एशिया में भी लोकप्रिय
अमरीका के सैन फ्ऱांसिस्को स्थित इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन के भारत के प्रमुख अनूप बांदिवाडेकर कहते हैं, "ई-रिक्शा का चलन इसलिए बढ़ा कि ये सस्ता है, ग़रीबों का साधन है. और लोगों ने ख़ुद से इसे बढ़ाया है. इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है."
अनूप बांदिवाडेकर कहते हैं, "ई-रिक्शा के संदर्भ में भारत में जो हो रहा है, वो एकदम अनूठा है. बहुत से विकासशील देशों में ये मॉडल अपनाये जाने की संभावना है. अमीर देशों में तो इलेक्ट्रिक कारों का चलन ज़्यादा है. मगर, विकासशील देश, ई-रिक्शा के भारतीय मॉडल को अपना सकते हैं."
रिक्शे से सफ़र करना एक भारतीय साधन भर नहीं है. दक्षिणी पूर्वी एशिया और अफ्रीका के कई देशों में रिक्शा और तिपहिया वाहनों का ख़ूब चलन है. कई देशों में तो इसे बनाने वाली भारतीय कंपनी बजाज के नाम से भी जाना जाता है.
अनूप बांदिवाडेकर कहते हैं, "अभी तो ये तिपहिया वाहन पेट्रोल से चलते हैं पर आगे चल कर ये देश भी भारत की तरह ई-रिक्शा के चलन को आगे बढ़ा सकते हैं. इस तरह भारत दुनिया में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की क्रांति लाने में बड़ा योगदान करेगा."
बीबीसी फ़्यूचर का मूल लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.
ये भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















