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दुनिया को नई लोकतांत्रिक क्रांति की ज़रूरत है?
- Author, रोमन क्रिज़नॉरिक
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
लोकतांत्रिक सरकारों के बारे में स्कॉटलैंड के दार्शनिक डेविड ह्यूम ने साल 1739 में लिखा था कि 'जनता की सरकारों की शुरुआत इसलिए हुई क्योंकि इंसान अपनी संकुचित सोच की वजह से वर्तमान के बारे में ही सोचता रहता था, न कि भविष्य के लिए.'
डेविड ह्यूम का मानना था कि सरकारी संस्थाएं, संसदीय परंपरा और जनप्रतिनिधि हमारे स्वार्थ की उड़ान पर लगाम लगाएंगे और समाज को दूरदृष्टि देने का काम करेंगे.
पर दुनिया भर में आज के राजनीतिक माहौल को देखें, तो हालात इसके ठीक उलट लगते हैं. जो उम्मीद डेविड ह्यूम को लोकतंत्र से थी, वो टूटती हुई साफ़ दिखती है. आज हमारी राजनीतिक व्यवस्था फौरी चुनौतियों से निपटने का ज़रिया भर बन गई है.
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार में भविष्य को लेकर कोई दूरदृष्टि नहीं दिखती. वो आने वाली नस्लों के बारे में नहीं सोचते. नेता तो अगले चुनाव से आगे की सोच ही नहीं पाते. नियमित रूप से चुनाव होना लोकतंत्र का अभिन्न अंग है. लेकिन, इस बुनियादी व्यवस्था ने नेताओं को भविष्य की फ़िक्र करने से आज़ादी दे दी है.
वो बस अगला चुनाव जीतने की जुगत में लगे रहते हैं. यही वजह है कि अपराध बढ़ने पर अपराधियों के एनकाउंटर या गिरफ़्तार करने की खानापूर्ती होती है. इसके सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. अंतरराष्ट्रीय विवादों को हल करने में देशों के अपने स्वार्थ आड़े आते हैं.
इस धरती को बचाने और पर्यावरण को आने वाली पीढ़ियों के लिए साफ़ रखने की ज़िम्मेदारी आज कोई नहीं लेना चाहता. पृथ्वी से जीवों की नस्लें विलुप्त हो रही हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में अपने फौरी स्वार्थ का बलिदान कोई देश नहीं करना चाहता.
आधुनिक लोकतंत्र की ये संकुचित सोच भविष्य की पीढ़ियों को आज की ज़रूरतों का ग़ुलाम बना रही है.
भविष्य को गुलाम बनाने वालालोकतंत्र
इसकी समस्या की जड़ लोकतंत्र की बुनियाद में ही है. चुनाव जीतने की जुगत में लगे नेता, वोटर को लुभाने के लिए टैक्स में छूट, बड़े कारोबारियों को मनमानी करने की इजाज़त देने और पर्यावरण को लेकर समझौते करने को तैयार रहते हैं.
इसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाने के लिए छोड़ दिया जाता है. भविष्य के लिए शिक्षा में निवेश और पर्यावरण बेहतर करने की योजनाओं में निवेश से बचा जाता है. निकट भविष्य के ऐसे फ़ायदों के नुक़सान का बोझ आने वाली पीढ़ियों पर डाल दिया जाता है.
मौजूदा पीढ़ी की ज़रूरतों को देखते हुए न तो पर्यावरण की फ़िक्र होती है, न शिक्षा में निवेश होता है, न ही ऐसी तकनीक विकसित किए जाने पर ज़ोर होता है, जिससे आने वाली नस्लों के लिए हम सुरक्षित और साफ़-सुथरी धरती को छोड़ जाएं.
यही वजह है कि आज दुनिया भर में हज़ारों स्कूली छात्रा हड़ताल कर रहे हैं और विरोध प्रदर्शन से अपने बेहतर भविष्य की फ़िक्र करने की मांग कर रहे हैं. वो चाहते हैं कि अमीर देश अपने कार्बन उत्सर्जन को घटाएं ताकि धरती गर्म न हो.
आने वाली पीढ़ियों को भी साफ़ हवा में सांस लेने का मौक़ा मिले. पर, तमाम लोकतांत्रिक देश, भविष्य की चुनौतियों को दबाकर रखना चाहते हैं.
जानकार कहते हैं कि आज के लोकतंत्र भविष्य की पीढ़ियों को ग़ुलाम बना रहे हैं. वो पर्यावरण के ख़तरों, तकनीक के नुक़सान, परमाणु कचरे और सरकारों के क़र्ज़ का बोझ भविष्य पर डाल रहे हैं.
भविष्य की चिंता नहीं
जब ब्रिटेन ने साम्राज्यवाद के दौर में ऑस्ट्रेलिया पर क़ब्ज़ा किया था तो उसने इस ज़मीन को किसी की भी ज़मीन न होने का सिद्धांत देते हुए उस पर अपना हक़ जमा लिया था. अंग्रेज़ों का मानना था कि ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों का उस ज़मीन पर कोई अधिकार नहीं.
इसी तरह आज की पीढ़ियां आने वाली नस्लों की चिंता करने के बजाय भविष्य को शून्य मानकर फ़ैसले ले रही हैं. वो भविष्य को अपना ग़ुलाम ही मानती हैं, जो उनके ग़लत फ़ैसलों का बोझ उठाएगा.
इसीलिए आज ज़रूरत है कि लोकतंत्र अपने आप को नए नज़रिए से देखे. अपनी संकुचित सोच के दायरे से बाहर निकले. भविष्य को अपना ग़ुलाम समझने वाली सोच से आज़ाद हो. ये हमारे दौर की सबसे बड़ी चुनौती है.
कुछ लोगों का मानना है कि लोकतंत्र के लिए ये संभव नहीं. इसलिए मार्टिन रीस जैसे ब्रिटिश खगोलशास्त्री तो नरमदिल तानाशाही की वक़ालत करते हैं. मार्टिन रीस का मानना है कि लंबे वक़्त की चुनौतियों से निपटने के लिए हमें ऐसे तानाशाह की ज़रूरत है, जो हम सबकी बिनाह पर भविष्य के लिए फ़ैसले ले सके.
वो इसके लिए चीन की मिसाल देते हैं, जिसने भविष्य को देखते हुए सौर ऊर्जा में भारी निवेश किया है. लेकिन, नरमदिल तानाशाही की वक़ालत करने वाले रीस ये भूल जाते हैं कि चीन का मानवाधिकार का रिकॉर्ड बुरा है. फिर, स्वीडन जैसा देश बिना तानाशाही के भी आज अपनी ज़रूरत की 60 प्रतिशत बिजली ऐसे स्रोत से हासिल करता है, जिन्हें फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीं, चीन में ये अनुपात महज़ 26 प्रतिशत है. इसी तरह इसराइल में 2001 से 2006 तक भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक लोकपाल नियुक्त किया गया था. हालांकि बाद में ये पद ख़त्म कर दिया गया.
फिर कोई तानाशाह हमेशा नरमदिल रहेगा, इसकी गारंटी कौन लेगा.
बच्चों ने अमरीकी सरकार पर किया मुकदमा
लंबी दूरी की सोच रखने का सबसे अच्छा उदाहरण ब्रिटेन के राज्य वेल्श ने पेश किया है. यहां पर भविष्य की पीढ़ियों की बेहतरी के लिए एक कमिश्नर नियुक्त किया गया है.
साल 2015 में इसके लिए क़ानून बनाया गया था. ये कमिश्नर योजनाएं बनाने वालों के साथ बैठकर भविष्य की फ़िक्र करता है.
उन्हें सिर्फ़ फौरी समस्याओं के बारे में सोचने से रोकता है और भविष्य को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाने के लिए प्रेरित करता है. अब ये फॉर्मूला पूरे ब्रिटेन में लागू करने की मांग हो रही है.
अमरीका के मूल निवासियों के बीच एक सिद्धांत सातवीं पीढ़ी का था. जिसमें 150 साल बाद आने वाले लोगों के बारे में सोचकर क़दम उठाए जाते थे. अब वही सोच आधुनिक लोकतंत्र में लाने की कोशिश हो रही है.
अमरीका में तो ऑवर चिल्ड्रेन ट्रस्ट ने भविष्य की पीढ़ियों के क़ानूनी अधिकार की लड़ाई शुरू की है. इस ट्रस्ट ने अमरीकी सरकार के ख़िलाफ़ मुक़दमा कर दिया है.
वादियों में ज़्यादातर छात्र और किशोर शामिल हैं. उनका कहना है कि अमरीकी सरकार ऐसी नीतियों पर काम कर रही है जो भविष्य की पीढ़ियों को नुक़सान पहुंचाएंगी.
लॉस एंजेलेस की कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एन कार्लसन कहती हैं कि इस मुक़दमे को बच्चों ने दाख़िल किया है.
ये अच्छी बात है कि बच्चे भविष्य की सोच रहे हैं. अगर वो सरकार के ख़िलाफ़ ये मुक़दमा जीत जाते हैं, तो ये दुनिया भर के लिए बड़ी मिसाल होगी.
हालांकि कुछ लोग इसका विरोध ये कहकर कर रहे हैं कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव नहीं आएगा.
तो कनाडा के डेविड सुज़ुकी जैसे पर्यावरणविद ये सलाह देते हैं कि राजनीतिक दलों और राजनेताओं के बजाय आम जनता के बीच से कुछ लोगों को चुनकर संसद भेजा जाए, जो 6 साल तक वहां रहें और नीतियां बनाएं.
ये राजनीतिक दलों की निकट भविष्य वाली संकुचित सोच से आज़ाद रहेंगे. उन्हें चुनाव की भी चिंता नहीं करनी होगी.
जापान में फ्यूचर डिज़ाइन नाम से एक आंदोलन शुरू हुआ है. इसके अगुवा तत्सुयोशी सैजो हैं. जो क्योटो के रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमेनिटी के अर्थशास्त्री हैं.
वो छात्रों को दो गुटों में बांटते हैं. इनमें से एक आज के लिए नीतियों पर चर्चा करता है, तो दूसरा गुट भविष्य के बारे में सुझाव देता है. इस आंदोलन का मक़सद जापान की सरकार को भविष्य का मंत्रालय बनाने के लिए तैयार करना है.
इन सभी प्रयासों से क्या होगा?
हम ये कह रहे हैं कि इस वक़्त दुनिया बड़े राजनीतिक बदलाव की गवाह बन रही है. ऐसे आंदोलन आगे चलकर और भी तेज़ होंगे.
क्योंकि जलवायु परिवर्तन और तकनीक के बढ़ते ख़तरों से भविष्य की पीढ़ी ख़तरा महसूस कर रही है.
लोकतंत्र ने अपनी शुरुआत से लेकर कई बार ख़ुद में बदलाव किए हैं. अपने आप को फिर से खोजा है, तराशा है. हो सकता है कि नई लोकतांत्रिक क्रांति बस आने ही वाली हो.
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