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'दैत्य का सोना' निकालने वाले मज़दूरों की कहानी
- Author, मार्था हेनरिक्स
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
ज्वालामुखी जब अपना रौद्र रूप धारण करता है तो आस-पास के लोगों को इलाक़ा छोड़ दूर पनाह लेनी पड़ती है.
लेकिन इंडोनेशिया का कावा ईजेन ऐसा ज्वालामुखी है जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं और आएं भी क्यों न, ये ज्वालामुखी है भी तो बहुत ख़ास.
इसमें से लाल धधकती लपटें नहीं निकलतीं, बल्कि गहरी नीली लपटें निकलती हैं. रात के समय इसे देखने का अपना ही मज़ा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस ज्वालामुखी से सल्फ़र निकलता है, जो रात में बेहद ख़ूबसूरत लगता है.
सल्फ़र एक क़ीमती धातु है जिसका इस्तेमाल बहुत-सी चीज़ों को बनाने में होता है. इसे जावा, इंडोनेशिया की फ़ैक्ट्रियों की लाइफ़लाइन माना जाता है. ज्वालामुखी में ख़ास तरह की धातु से बने पाइप फ़िट किए गए हैं, जिनके ज़रिए सल्फ़र बाहर बहता है और ठंडा होकर सोने की रंगत वाला हो जाता है.
इन ख़ादानों में काम करने वाले इसे 'डेविल्स गोल्ड' कहते हैं. इसकी वजह से यहां के लोगों का रोज़गार चलता है. लेकिन इसे हासिल करने के लिए लोगों को भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है.
'डेविल्स गोल्ड' जमा करने के लिए मज़दूरों का सफ़र आधी रात से शुरू होता है. मज़दूर मोटर साइकिलों पर सवार होकर ज्वालामुखी के नज़दीक पहुंचते हैं.
फिर यहां से क़रीब 2800 मीटर ऊंचाई पर जाकर जमे हुए सल्फ़र को टुकड़ों में तोड़कर बांस की टोकरियों में कंधे पर लादकर नीचे लाते हैं.
कावा ईजेन दुनिया के उन चंद ज्वालामुखियों में से एक है जहां आज भी सल्फ़र की खुदाई का काम, हाथों से ही किया जाता है.
पहाड़ पर चढ़ाई के बाद सल्फ़र को टुकड़ों में तोड़ना जितना मुश्किल है, उससे ज़्यादा मुश्किल है इन्हें नीचे उतार कर लाना.
मज़दूरों के कंधों पर उनके अपने शरीर से कहीं ज़्यादा भार होता है.
इस वज़न की वजह से न सिर्फ़ इनके कंधों में तकलीफ़ होती है, बल्कि पैर और जोड़ों पर भी असर पड़ता है. साथ ही जब सल्फ़र हवा और पानी के साथ रिएक्ट करता है, तो उससे ज़हरीली गैस निकलती है जो हवा में मिलकर उसे ख़तरनाक बना देती है.
मज़दूर जितनी देर काम करते हैं उनकी आंखों से पानी बहता रहता है.
यहां काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूरों को सांस की परेशानी होती है. उनका सांस लेना मुश्किल होता है और वो हर समय खांसते रहते हैं. गला ख़राब रहता है.
कंधों पर बहुत ज़्यादा वज़न लादने के कारण वो छिल जाते हैं और कंधों पर धब्बे पड़ जाते हैं. बहुत से ख़दान मज़दूर समय से पहले काम छोड़ कर अस्पताल की लाइनों में लगने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जबकि बहुत से मज़दूर ग़रीबी की वजह से अपना इलाज ही नहीं करा पाते.
लेकिन जोखिम उठाने वाले इन मज़दूरों को अपनी सेहत दांव पर लगाने के बाद भी गुज़ारे भर की मज़दूरी भी नहीं मिल पाती. हर मज़दूर को एक दिन की मज़दूरी 10-15 अमरीकी डॉलर मिलती है.
जावा के दूर दराज़ इलाक़ों में रोज़गार के बहुत कम मौक़े हैं. ऐसे में इन मज़दूरों के पास कोई और विकल्प नहीं है. पहले खेती में रोज़गार की कुछ संभावना हुआ करती थीं. लेकिन, उसमें मज़दूरी और भी कम थी. लिहाज़ा लोगों ने सेहत को दांव पर लगाकर भी ख़ादान में मज़दूरी करना ही ज़्यादा बेहतर समझा.
दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ज्वालामुखी वाले इलाक़ों में सल्फ़र की ख़ुदाई का काम होता है. लेकिन वहां ये काम मशीनों से होता है. साथ ही वहां मज़दूरों की सुरक्षा का बंदोबस्त भी रहता है.
लेकिन ईजेन ज्वालामुखी के नज़दीकी इलाकों में ऐसा इंतज़ाम नहीं है. यहां काम करने वाले मज़दूरों का कहना है कि वो इतना पैसा कमाना चाहते हैं कि उनकी आने वाली नस्लों को इन खदानों में ज़िंदगी न गुज़ारनी पड़ी.
(ये बीबीसी फ़्यूचर की स्टोरी का शब्दश: अनुवाद नहीं है. भारतीय पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल कहानी पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर की बाकी कहानियां आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.)
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