हमेशा खर पतवार उखाड़ फेंकना ठीक नहीं

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, जॉर्जिना केन्यों
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
दुनिया में धार्मिक आस्था रखने वाले लोग मानते हैं कि ये दुनिया ऊपरवाले ने बनाई है. उसने हर ज़र्रे को किसी न किसी मक़सद से रचा-गढ़ा.
पर, तमाम जीवों में सबसे अक़्लमंद इंसान ने अपनी ज़रूरतों का दामन बहुत फैला लिया है. क़ुदरत की हर चीज़ वो अपने फ़ायदे-नुक़सान की नज़र से देखता है.
अब खरपतवार को ही लीजिए. खेती करने के लिए हम इन्हें उजाड़ देते हैं. खेती के लिए जंगल काटे जा रहे हैं. नतीजा ये कि कभी हरे-भरे रहे इलाक़े वीरान हो रहे हैं. फिर जब प्रकृति का प्रकोप होता है तो इसी बंज़र ज़मीन पर तूफ़ान क़हर बरपाता है. सूखी ज़मीन धूल बन कर उड़ती है.
ऑस्ट्रेलिया के किसान पीटर एंड्रयूज़ ने आज से क़रीब 60 साल पहले अपने जीवन की पहली धूल भरी आंधी देखी थी. उस दिन को याद करते हुए पीटर आज भी सिहर उठते हैं. वो भयंकर तूफ़ान था. पूरा आसमान स्याह पड़ गया था. अगले रोज़ तूफ़ान गुज़र जाने के बाद का मंज़र तो और भी भयानक था.
तूफ़ानी हवा ने सैकड़ों पेड़ उखाड़ डाले थे. पीटर के कई घोड़े और दूसरे जानवरों की दम घुटने से मौत हो गई थी. हवा में धूल की वजह से वो सांस नहीं ले पाए थे.
उस तजुर्बे के बाद से ही पीटर एंड्रयूज़ ऑस्ट्रेलिया में उजाड़ ज़मीन में नई जान डालने की कोशिश शुरू की थी.
धूल भरी आंधी उन्हीं इलाक़ों में आती है, जहां हरियाली नहीं होती. ज़मीन सूखी और वीरान होती है.
पीटर कहते हैं कि अपने जीवन के 6 दशकों में उन्होंने ये देखा है कि क़ुदरत ने हर जीव को एक मक़सद से बनाया है. हम भले ही ऊपर से नहीं देख पाते, मगर, घास-फ़ूस तक धरती का संतुलन बनाने में अहम रोल निभाते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
खेती करने का अलग तरीका
पीटर मानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय तरीक़े से खेती करने के नतीजे भयानक रहे हैं. जंगल के जंगल उजाड़ दिए गए. अब ज़रूरत है ज़मीन में घास-फूस और जंगल उगाकर नई जान फूंकने की.
1970 के दशक से पीटर एंड्रयूज़ ने खेती के ऐसे तरीक़े पर काम शुरू किया, जिससे उस इलाक़े को नुक़सान न हो. वो अपनी ज़मीन से गुज़रने वाले नदी-नालों और खरपतवार को बारीक़ी से देखने लगे.
उन्होंने खरपतवार साफ़ करने वाले कीटनाशकों का प्रयोग बंद कर दिया. रासायनिक खाद का इस्तेमाल रोक दिया. पीटर अब क़ुदरती तरीक़ों और संसाधनों से ही खेती करने लगे. वो सिंचाई के लिए मौसमी बारिश पर निर्भर होते थे.
पीटर के सामने सबसे बड़ी चुनौती सूखे से निपटने की होती थी. इसके अलावा जंगली घास-फूस भी बहुत उगते थे.
पीटर ने पाया कि ज़मीन का संतुलन बनाए रखने के लिए ये खरपतवार और पानी बहुत ज़रूरी हैं.
पीटर ने अपनी ज़मीन पर पानी के किसी भी सोते को निकलने के साथ ही बांधने के बजाय उसे धीरे-धीरे ढलान की तरफ़ लाने का काम शुरू किया. वो पानी को अपनी ज़मीन पर खुलकर फैलने देते थे. इससे ज़मीन पर तरह-तरह की घास-फ़ूस उग आती थी.
- यह भी पढ़ें | क्या आप कभी-कभी लगातार छींकने लगते हैं?

इमेज स्रोत, Mulloon Institute
पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में भयंकर गर्मी पड़ी. लंबे वक़्त तक पूरे ऑस्ट्रेलिया में गर्म हवाओं की आंधियां आती रहीं. जंगलों में भयंकर आग भड़कती रही.
जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया कि ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप लगातार गर्म हो रहा है. पिछले चार साल ऑस्ट्रेलिया के इतिहास के सबसे गर्म साल थे. इसका नतीजा ये हुआ है कि लोग न तो खेती कर पा रहे हैं और न ही जानवर पाल पा रहे. बहुत से लोग ग्रामीण इलाक़े छोड़कर भाग रहे हैं.
ऑस्ट्रेलिया की नेचर कंज़र्वेशन काउंसिल यानी एनसीसी का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया में बड़ी तेज़ी से जंगल काटे जा रहे हैं. पिछले बीस साल में इनकी रफ़्तार बहुत तेज़ हो गई है.
इससे पर्यावरण में मौजूद प्रदूषण और कार्बन को सोखने के लिए बहुत कम पेड़ रह गए हैं.
इन्हीं हालात से बचने के लिए पीटर एंड्रयूज़ ने क़ुदरती चक्र के हिसाब से खेती शुरू की थी. वो अपनी ज़मीन पर घास-फ़ूस उगने देते हैं. पानी का बेतहाशा दोहन नहीं करते. बारिश के पानी को ज़्यादा से ज़्यादा रोकने का इंतज़ाम करते हैं. किसी ख़ास इलाक़े में उगने वाले पेड़-पौधों को संरक्षण देने का काम भी पीटर करते हैं.
पीटर ये काम पिछले कई दशक से कर रहे हैं. लेकिन, बहुत से वैज्ञानिक उनके प्रयोगों से सहमत नहीं थे. लेकिन, 2013 में कुछ वैज्ञानिकों ने पीटर के लंबे वक़्त से चल रहे क़ुदरती प्रयोगों की पड़ताल की, तो पाया कि पीटर ने जो तजुर्बे किए हैं वो बंज़र ज़मीन में नई जान फूंकने में काफ़ी कारगर हैं.
हालांकि कई जानकार अभी भी खरपतवारों को उगने देने के पीटर के नुस्खे से सहमत नहीं हैं. उनको लगता है कि इससे तो ज़मीन में जितना उपजाऊपन है, वो ये खरपतवार खींच लेंगे. फिर, असल फसलों के लिए क्या बचेगा? वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि किसान ऑस्ट्रेलिया में ही उगने वाले दूसरे पौधों की खेती करें.

इमेज स्रोत, Getty Images
नुस्खे कितने कारगर
पीटर एंड्र्यूज़ के नुस्खे कितने कारगर हैं, ये परखने के लिए ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा के क़रीब ही एक प्रयोग चल रहा है.
एक छोटी सी बरसाती नदी मुलून क्रीक को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश की गई है. ये नदी जंगलों की कटान की वजह से सूख गई थी. इसके आस-पास की ज़मीन भी बंजर हो गई थी.
अब इस नदी के आस-पास खरपतवार उगाए गए हैं. फिर इसमें पानी डालकर नदी में नई जान फूंकी गई है. इस बरसाती नदी को आस-पास के ऑर्गेनिक फार्म से गुज़ारा गया है.
इस प्रयोग के अगुवा हैं गैरी नेयर्न. वो मुलून नदी के नाम पर एक संस्थान चलाते हैं, जो लोगों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और बिना नुक़सान किए खेती करने की ट्रेनिंग देता है.
नदी को सूखने से बचाने और पानी के संरक्षण के लिए आस-पास के ब्लैकबेरी के झाड़ काट कर नदी में डाले गए हैं, ताकि पानी बहकर निकल न जाए. पानी ठहरा हुआ है तो तमाम परिंदे इसके आस-पास आशियाना बना रहे हैं. मुलून नदी में पानी होने की वजह से पास की ज़मीन पर घास भी बड़ी तादाद में उग रही है.
मुलून नदी के इर्द-गिर्द का ये प्रयोग छह किलोमीटर के दायरे में फैला था. अब इसकी कामयाबी से उत्साहित गैरी, इसका दायरा पूरी नदी की लंबाई यानी क़रीब 43 किलोमीटर के दायरे में फैलाने में जुटे हैं. नदी का पानी बर्बाद होने से रोकने के लिए जंगली झाड़ियों और खरपतवारों की मदद ली जा रही है. छोटे-छोटे पत्थरों से कई जगह बांध बनाकर पानी बर्बाद होने से रोका जा रहा है. दरारों में ब्लैकबेरी के झाड़ काट कर भरे जा रहे हैं. इससे नदी के पानी बहने की रफ़्तार भी धीमी हुई है. ठहरा हुआ पानी आस-पास घास-फूस उगाने में मदद करता है.
इस इलाक़े में कम बारिश के बावजूद नदी में पूरे साल पानी रहने लगा है. ज़मीन का कटान कम हो गया है. घास उगने की वजह से पूरे इलाक़े में हरियाली दिखती है. धूल भरी आंधी कम चलती है.
गैरी कहते हैं कि उन्होंने पीटर से ये सीखा है कि किसी भी खरपतवार को बेवजह उखाड़ कर नहीं फेंकना हैं. कहीं से घास-फूस उखाड़ने पर उसकी जगह नए पौधे लगाए जाते हैं.
- यह भी पढ़ें | एयरपोर्ट डिज़ाइन करना कितना मुश्किल

इमेज स्रोत, Getty Images
कार्बन सोखने वाले पौधे
इंसानी गतिविधियों की वजह से कार्बन पैदा होता है. ये पौधे और खरपतवार हवा में मौजूद कार्बन को सोखकर हवा साफ़ करते हैं. कार्बन कम होने से धरती का तापमान भी तेज़ी से नहीं बढ़ता.
अमरीकी वैज्ञानिक और वर्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर के क्रिस्टा एंडर्सन कहते हैं कि, 'जंगल, समुद्र और मिटी सब मिलकर हवा में मौजूद कार्बन डाई ऑक्साइड सोखते हैं और अपने अंदर जमा करते हैं.'
जंगलों में ऐसा करने की क्षमता सबसे ज़्यादा होती है. इसके अलावा पीटर जैसे किसान जिस तरह से संरक्षण वाली खेती करते हैं, उससे भी कार्बन डाई ऑक्साइड कम होती है.
अब कुछ वैज्ञानिक ये सोच रहे हैं कि मुलून नदी जैसे छोटे-छोटे प्रयोग जलवायु परिवर्तन रोकने में बड़ा रोल निभा सकते हैं.
इसके लिए जंगलों को काटने की रफ़्तार धीमी करनी होगी. खरपतवार साफ़ करने से बचना होगा. घास-फ़ूस उगते रहें इसलिए नदियों और बरसाती नालों का संरक्षण ज़रूरी है. ज़मीन में छोटे पौधे और हरियाली रहेगी, तो कटान कम होगा. धूल भरी आंधियां नहीं चलेंगी.
जितने पौधे होंगे, उतना ही इंसान का भी फ़ायदा होगा.
गैरी और पीटर मानते हैं कि ऐसे छोटे-छोटे प्रयोग भी काफ़ी असरदार हैं. इस तरीक़े से हर इंसान धरती के संरक्षण में अपना योगदान कर सकता है.
जब तक दुनिया के बड़े देश और नेता इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कैसे कम किया जाए, तब तक पीटर एंड्रूयज़ जैसे किसान अपने छोटे योगदान से बदलाव ला रहे हैं.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















