वो महिला जिसके ट्यूमर ने उसे बहुत धार्मिक बना दिया

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    • Author, मेलिसा हेंजबूम
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

इंसान बुरे वक़्त में अक्सर आध्यात्म की ओर झुक जाता है. जो लोग लंबी बीमारी से जूझ रहे होते हैं उनका लगाव भी ईश्वर से बढ़ जाता है. कह सकते हैं कि बुरे वक़्त और बीमारी हमें ज़्यादा मज़हबी बना देते हैं.

लेकिन, क्या किसी का धर्म उसके लिए जानलेवा भी हो सकता है? क्या अपने ख़ुदा के कहने पर कोई ख़ुद को ज़ख़्मी भी कर सकता है? क्या कोई अपनी मज़हबी सोच की वजह से अपने आप को मारने की कोशिश भी कर सकता है?

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इमेज कैप्शन, प्रतीकात्मक तस्वीर

2015 में स्विटज़रलैंड के बर्न में एक ऐसा ही वाक़या सामने आया था. एक महिला बुरी तरह ज़ख़्मी हालत में अस्पताल पहुंची थी. उसने कहा कि उसने ख़ुद को ख़ंजर से ज़ख़्मी किया है. और ऐसा करने के लिए उसके भगवान ने ही उसे हुक्म दिया था.

डॉक्टर इस महिला का नाम सारा बताते हैं. क्योंकि वो महिला आज अपनी पहचान छुपाए रखना चाहती है. सारा के दिमाग़ में दुर्लभ क़िस्म का ट्यूमर है. इस ट्यूमर ने मरीज़ को पूरी तरह मज़हबी बना दिया है. उसे ईश्वर की आवाज़ सुनाई देती है. वो कहती है उसे ईश्वर से आदेश मिलते हैं. कभी कभी ये आदेश घातक भी होते हैं.

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सारा का धर्म पर यक़ीन घटता-बढ़ता रहा

हमारे दिमाग़ का एक हिस्सा हर तरह की आवाज़ पहचानता है. पहचानने के बाद दिमाग़ इन आवाज़ों को पैग़ाम पहुंचाने वाले हिस्से तक पहुंचाता है. 48 साल की सारा को उसी जगह पर ट्यूमर है. सेहतमंद दिमाग़ वाले बाहरी और अंदरूनी आवाज़ों में फ़र्क़ कर सकते हैं.

जिस वक़्त हम सोच में गुम होते हैं या अपने आपसे बातें करते हैं, उस वक्त भी दिमाग़ के अंदर आवाज़ पैदा होती है. लेकिन, वो आवाज़ें दिमाग़ के अंदर ही रहती हैं. जबकि बाहरी आवाज़ें कान के रास्ते होकर दिमाग़ तक जाती हैं. सारा के केस ने रिसर्चर्स को दिमाग़ के काम करने के तरीक़े पर एक बार फिर से रिसर्च करने का मौक़ा दिया है.

सारा की मौजूदा हालत समझने के लिए उसके अतीत में झांकना ज़रूरी था. लिहाज़ा रिसर्चरों ने उसकी पुरानी आदतें समझने की कोशिश की.

सारा का मज़हबी रूझान उसके लिए नई बात नहीं थी. 13 साल की उम्र से ही वो मज़बूत मज़हबी ख़यालत रखने वाली लड़की थी. लेकिन बढ़ती उम्र के साथ धर्म पर सारा का यक़ीन घटता बढ़ता रहा.

सारा की कैफ़ियत समझकर पहले तो डॉक्टरों को लगा कि वो पागलपन का शिकार है. लेकिन जब उसके बर्ताव की बारीकी से जांच की गई तो ये थ्योरी फेल हो गई.

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आध्यात्म की ओर झुकाव के साथ बढ़ा ट्यूमर

दरअसल ट्यूमर की वजह से आवाज़ों को पैग़ाम की शक्ल में बदलने वाली सारा के दिमाग की तंत्रिकाएं पूरी तरह से बिगड़ चुकी थीं. उनका दिमाग़ जो सोचता था वही आवाज़ें उन्हें सुनाई देती थीं.

रिसर्च में पता चला कि सारा के दिमाग़ में ट्यूमर उसी समय पनपने लगा था, जब 13 साल की उम्र में उनका आध्यात्म की तरफ़ झुकाव हुआ था. यही वजह थी कि ट्यूमर के बढ़ने के साथ साथ उनका वही आध्यात्मिक रूझान उन्हें आवाज़ों की शक्ल में सुनाई देने लगा.

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ऐसा नहीं था कि सारा हमेशा ही आध्यात्मिक आवाज़ें सुनती थीं. जब जब सारा का ट्यूमर ज़ोर पकड़ता था, वो ज़्यादा मज़हबी बातें करना शुरू कर देती थी. मज़हबी लोगों के साथ उनका जुड़ाव ज़्यादा हो जाता था. लेकिन दवाओं के ज़रिए जैसे जैसे उनका ट्यूमर कंट्रोल होता था, उनका रूझान भी कम होने लगता था. वैसे भी ये ट्यूमर कैंसर की तरह तेज़ी से फ़ैलने वाला नहीं था. बल्कि बहुत धीमी गति से बड़ा हो रहा था.

कभी कभी लंबे समय तक इसमें कोई हलचल नहीं होती थी. लिहाज़ा जब ट्यूमर शांत रहता था तो सारा भी ठीक रहती थीं. जब ट्यूमर में कोई हलचल होती थी तो सारा का दिमाग़ अलग तरह से काम करना शुरू कर देता था और उसमें आध्यात्म की ओर झुकाव वाले लक्षण नज़र आने लगते थे.

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दिमाग़ में कहां था ट्यूमर?

सारा के दिमाग़ में जिस जगह ट्यूमर था, वहां से वो दिमाग़ के उस हिस्से पर भी असर डाल रहा था, जिस जगह इंसानी दिमाग़ आध्यात्मिक सोच तैयार करता है. इसलिए कुछ रिसर्चर्स के मुताबिक़ साफ़ तौर पर ये कहना मुश्किल है कि ट्यूमर की वजह से सारा आध्यात्मिक प्रवृति को हो गई थीं.

60 साल की एक महिला पर इसी तरह की केस स्टडी की गई. पाया गया कि उस महिला का कभी भी आध्यात्म की ओर झुकाव नहीं था. इस महिला का ट्यूमर दिमाग़ के उस हिस्से में था जहां दिमाग़ में पढ़ाई लिखाई की बातें संरक्षित रहती हैं. लेकिन इसके बावजूद ट्यूमर होने पर इस महिला को साहित्य याद नहीं था. बल्कि उसे सारा कि तरह आध्यात्मिक आवाज़ें सुनाई देती थीं.

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इन दोनों ही केस स्टडी से एक बात तो साफ़ हो जाती है कि कभी कभी ब्रेन ट्यूमर की वजह से इंसान की शख़्सियत में कुछ अच्छे बदलाव आ जाते हैं. इंसान बेख़्याली में ही सही लेकिन आध्यात्म की ओर चला जाता है.

सारा का केस रिसर्चर्स के लिए बहुत ख़ास और अलग तरह का केस है. इस केस के ज़रिए रिसर्चर्स ये पहेली सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं कि आख़िर अंदरूनी और बाहरी आवाज़ें सुनाई देने का रहस्य क्या है.

ग़नीमत है कि सारा को आध्यात्मिक आवाज़ें सुनाई देती हैं. जो शायद उसके अतीत से भी जुड़ी हैं. लेकिन जिनका अतीत हिंसक प्रवृति का रहा हो या जिनके जीवन में नकारात्मकता ज़्यादा रही हो उनके लिए स्थिति बहुत गंभीर हो सकती है.

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धार्मिक सोच अचानक ही बेहद कट्टर हो गई

सारा के जैसा ब्रेन ट्यूमर होने पर उन्हें नकारात्मक और उकसाने वाली आवाज़ें सुनाई देंगी. हो सकता है इन आवाज़ों के प्रभाव में वो कोई ग़लत क़दम उठा लें.

सारा आज अपनी हालत पहचान गई हैं. उन्हें पता है कि उनका आध्यात्मिक रूझान किस वजह से. अब वो ख़ुद भी अपने आप को समझा लेती है. वो अब हालात बिगड़ने से पहले ही डॉक्टर की मदद से उन्हें क़ाबू में कर लेती हैं.

उनका इलाज करने वाले मनोवैज्ञानिक सेबेस्टियन वाल्थर कहते हैं कि ये अजीब तरह की दिमाग़ी बीमारी है. जिसमें किसी इंसान के दिमाग़ में बीमारी होने पर, उसकी धार्मिक आस्था और मज़बूत हो जाती है.

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सारा जैसा ही एक क़िस्सा कई साल पहले स्पेन में भी सामने आया था. स्पेन की 60 बरस की एक महिला की धार्मिक सोच अचानक ही बेहद कट्टर हो गई थी. पड़ताल में पता चला कि उस महिला के दिमाग़ में ट्यूमर होने की वजह से ऐसा हुआ था.

ये मामले बताते हैं कि दिमाग़ में ट्यूमर होने की वजह से किस तरह से हमारी सोच और आस्थाएं बदल जाती हैं. या कट्टर हो जाती हैं.

बहरहाल सारा के केस ने बताया है कि ऐसे मामलों में भी हम उम्मीद की किरण देख सकते हैं. आज सारा मनोवैज्ञानिकों की मदद से सामान्य ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रही है.

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