पवन चक्की, जो लड़ाकू विमानों की जांच करती थी

'मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहे जिस वक़्त, मैं गया वक़्त नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं.'

ग़ालिब का ये शेर बताता है कि गुज़रा हुआ वक़्त दोबारा नहीं आता. वक़्त की दीवार इतनी ऊंची होती है कि उसे फांदा नहीं जा सकता.

गुज़रा वक़्त भले न आ सके, मगर जाते हुए हर लम्हा अपनी एक ताबीर लिखता जाता है. इंसानियत की तारीख़ के हर्फ़ पर दर्ज होता जाता है समय.

और ऐसा ही तारीख़ का पन्ना है, ब्रिटेन के हैम्पशायर शहर के फार्नबोरो में. फार्नबोरो, विमानन उद्योग के लिए मशहूर है. पिछली सदी से ही यहां विमान बनाने, उनकी टेस्टिंग और नई तकनीक के विकास का काम होता आया है.

मशीन से निकलती तूफ़ानी हवा

बदलते वक़्त के साथ फार्नबोरो में बहुत सी ऐसी मशीनें, कारखाने बंद होते गए, जो बदलते दौर के साथ क़दमताल नहीं मिला सके थे.

ऐसी ही जगह है रॉयल एयरक्राफ्ट एस्टैब्लिशमेंट. जहां पर अपने दौर की सबसे ताक़तवर पवन चक्कियों में से एक लगी है. इस विंड टनल से एक दौर में एक सौ बीस मील, यानी, 192 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से तूफ़ानी हवा निकला करती थी.

इस विंड टनल के ज़रिए नए विमानों पर हवा के दबाव का असर मापा जाता था. इस पवनचक्की को 1935 में बनाया गया था. यहां शुरुआत में लड़ाकू जहाज़ों की मज़बूती की पड़ताल हुआ करती थी.

इसी जगह पर एक वक़्त ब्रिटिश रॉयल एयरफ़ोर्स की ताक़त रहे हॉकर हरीकेन लड़ाकू विमान को जांचा-परखा गया था. ये विमान बैटल ऑफ़ ब्रिटेन में जर्मनी के हमले से ब्रिटेन को बचाने में बहुत कारगर साबित हुआ था.

इस विंड टनल में जो रिसर्च हुआ करती थी, उसे बहुत ख़ुफ़िया तरीक़े से किया जाता था. देश की नज़रों से भी छुपाकर रखा जाता था.

हालांकि 1992 में इसे बंद कर दिया गया. इसके बाद भी इस जगह को आम लोगों की नज़रों से छुपाकर ही रखा गया. इन दिनों फार्नबोरो एयर साइंस ट्रस्ट, गिने-चुने लोगों को यहां की सैर कराता है.

गुफ़ा सरीख़ी विंड टनल

केन ओजर्स ने यहां 27 बरस काम किया था. बीबीसी की टीम ने उनके साथ रॉयल एयरक्राफ्ट एस्टैब्लिशमेंट का दौरा किया.

केन ने यहां पर 27 साल काम करने का अपना तजुर्बा बताया. उन्होंने बताया कि कैसे वो लोग गुफ़ा सरीख़ी इस विंड टनल के अंदर जाया करते थे. वो जब टेस्टिंग प्लेटफॉर्म पर चहलक़दमी करते थे, तो कैसा लगता था.

केन ओजर्स जब इस सुरंग के अंदर दोबारा गए तो उन्हें घर वापसी जैसा तजुर्बा हुआ. केन ने कहा कि इस जगह काम करने वाले लोगों में से एक होने का उन्हें गर्व है. जब वो इस विशाल विंड टनल के सामने खड़े हुआ करते थे, तो एकदम बौना महसूस करते थे.

इस कारखाने में इस बात की पड़ताल की जाती थी, कि भयंकर तूफ़ान में फंसने पर विमान पर क्या असर होगा. हवा इतनी तेज़ चलाई जाती थी कि असली तूफ़ान जैसा लगे. हालांकि ये ख़याल रखा जाता था कि इससे विमान को नुक़सान न हो.

अगर टेस्ट के दौरान कोई विमान टूट जाता था तो उसे नए सिरे से बनाने के लिए भेज दिया जाता था. या फिर उसे ख़ारिज कर दिया जाता था.

केन ने बताया कि दूसरे विश्व युद्ध से पहले जब हॉकर हरीकेन विमान की जांच हो रही थी, तो इंजीनियर इस बात से परेशान थे कि विमान में गोला-बारूद लादने पर उसकी रफ़्तार बीस मील प्रति घंटे कम हो जाती थी.

वजह समझ में नहीं आ रही थी, इसलिए हॉकर हरीकेन को पड़ताल के लिए यहां लाया गया. ऐसा विमान के इंजन के गर्म होने की वजह से हो रहा था. इस कमी का पता चलने पर इसे दूर किया गया. बाद में हॉकर हरीकेन ने 1941 में जर्मनी के लंदन पर हवाई हमले का जवाब देने में अहम रोल निभाया था.

रेसिंग कार का भी होता था टेस्ट

केन बताते हैं कि यहां पर एक बार ड्रोन का भी टेस्ट किया गया था. हालांकि वो टेस्ट नाकाम रहा था. केन बताते हैं कि आज के ड्रोन के मुक़ाबले वो विमान तो एकदम कचरा था.

इस विंड टनल के सामने रेसिंग कारों का भी टेस्ट किया जाता था. जगुआर कारों का परीक्षण भी यहां किया गया. केन ओजर्स ने इन परीक्षणों की तस्वीरें भी दिखाईं. वो बताते हैं कि कारों की तेज़ रफ़्तार को संभालने के लिए ब्रेक का ताक़तवर होना बहुत ज़रूरी है. जगुआर जैसी कारों का यहां इसीलिए टेस्ट किया जाता था, ताकि ये पता लग सके कि हवा जैसी रफ़्तार से चलते वक़्त उसके ब्रेक ठीक से काम करेंगे कि नहीं.

आज ये कारखाना बंद पड़ा है. लेकिन अगर आप चाहें तो फार्नबोरो एयर साइंस ट्रस्ट की मदद से यहां की सैर कर सकते हैं.

तब आप गुज़रे हुए ज़माने की यादें देखकर रोमांचित हो उठेंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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