दुनिया में प्रलय का दिन कब आएगा?

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- Author, डेविड कॉक्स
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
ग्लोबल वार्मिंग से धरती की आबो-हवा बिगड़ रही है. तापमान बढ़ रहा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं. कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि यही तो क़यामत आने के संकेत हैं. जब ग्लेशियर पिघलने से समंदर में इतना पानी हो जाएगा कि शहर के शहर डूब जाएंगे. बहुत से देशों का तो नामो-निशान मिट जाएगा.
पर, कुछ लोग इस थ्योरी पर यक़ीन नहीं करते. वो कहते हैं कि इंसान कोशिश कर रहा है. जल्द ही ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती पर क़ाबू पा लिया जाएगा.
तो क़यामत आने का फिर दूसरा तरीक़ा क्या होगा?
इसके जवाब में कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि हो सकता है कि ज्वालामुखी विस्फ़ोट से धरती पर तबाही मच जाए. इंसानियत का ख़ात्मा हो जाए.
ज्वालामुखी विस्फोट भयानक होते हैं. इनसे बड़े पैमाने पर तबाही मचती है. मगर इंसानी तारीख़ में ऐसा कोई ज्वालामुखी विस्फोट नहीं दर्ज है, जो हमारी नस्ल का ही ख़ात्मा कर दे.

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पर, ज्वालामुखी विस्फोट से प्रलय आने का दावा करने वाले कुछ मिसालें देते हैं. वो ऐसे ज्वालामुखियों का नाम गिनाते हैं, जिनमें क़यामत लाने वाला विस्फोट हो सकता है.
इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, इटली के पास भूमध्य सागर में स्थित काम्पी फ्लेग्रेई ज्वालामुखी. इटली के नेपल्स शहर के क़रीब नेपल्स की खाड़ी में स्थित काम्पी फ्लेग्रेई कोई एक ज्वालामुखी नहीं.
ये कई ज्वालामुखियों का जाल है. इसे महाज्वालामुखी या सुपर वॉल्केनो कहा जाता है.
इसके आस-पास क़रीब पांच लाख लोग रहते हैं. कहा जाता है कि इस महाज्वालामुखी का मुंह क़रीब सात मील के दायरे में है. इसमें दो लाख साल पहले, 35 हज़ार साल पहले और 12 हज़ार साल पहले महाविस्फोट हो चुके हैं.
सुपर वॉल्केनो काम्पी फ्लेग्रेई
काम्पी फ्लेग्रेई का इटली में मतलब होता है जलती हुई ज़मीन. ये सुपर वॉल्केनो पिछले पांच सौ सालों से शांत रहा है.

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1538 के बाद से इसमें कोई विस्फोट नहीं हुआ है. लेकिन हाल के दिनों में काम्पी फ्लेग्रेई तेज़ हलचलें होती देखी गई हैं. इसके बाद इटली की सरकार ने इस ज्वालामुखी से ख़तरे के एलर्ट का स्तर बढ़ा दिया था.
ऐसे संकेत हैं कि काम्पी फ्लेग्रेई के सीने में दहकते लावा का तापमान इतना बढ़ गया है कि बहुत जल्द लावा और गैसों के दबाव से इसमें विस्फोट हो सकता है. ऐसा हुआ तो पिघली हुई चट्टानें विस्फोट के चलते आसमान में हज़ारो फिट ऊपर तक जा सकती हैं.
काम्पी फ्लेग्रेई ज्वालामुखी में विस्फोट की सूरत में इससे निकलने वाली राख हज़ारों मील दूर तक फैल सकती है. मगर ये विस्फोट कब होगा और कितना भयानक होगा, कहना मुश्किल है.
इटली के बोलोना शहर में ज्वालामुखी के विशेषज्ञ एंतोनियो कोस्टा कहते हैं कि काम्पी फ्लेग्रेई पिछले कई दशकों से भीतर ही भीतर दहक रहा है. इसमें भयानक विस्फोट के संकेत हैं.
यूरोप की तबाही ले कर आया काम्पी फ्लेग्रेई

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काम्पी फ्लेग्रेई ज्वालामुखी में पिछला भयानक विस्फोट 39 हज़ार साल पहले हुआ था. तब इस ज्वालामुखी के मुंह से 300 क्यूबिक किलोमीटर पिघली चट्टानें बाहर निकलकर फैल गई थीं.
विस्फोट इतना भयानक था कि लावा आसमान में सत्तर किलोमीटर ऊपर तक गया था. इस दौरान साढ़े चार लाख टन सल्फ़र डाईऑक्साइड भी निकली थी.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि काम्पी फ्लेग्रेई में उस विस्फोट के दौरान निकली राख के बादलों ने रूस के एक बड़े हिस्से को ढंक लिया था.
जब ये विस्फोट हुआ था तो यूरोप बेहद सर्द मौसम के दौर से गुज़र रहा था. ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से यूरोप के आसमान पर पांच सेंटीमीटर मोटी राख के बादल छा गए थे. सूरज की रौशनी का ज़मीन पर पहुंचना बंद हो गया था.

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वैज्ञानिक मानते हैं कि काम्पी फ्लेग्रेई में हुआ ये विस्फोट यूरोप के लिए तबाही लेकर आया था. जंगल तबाह हो गए थे. इटली से लेकर पूर्वी यूरोप के एक बड़े हिस्से को राख की मोटी परत ने ढंक लिया था. इससे यूरोप के एक बड़े हिस्से में रेगिस्तान सा बन गया था.
ज्वालामुखी से भारी तादाद में सल्फर डाई ऑक्साइड निकलने की वजह से सर्दी बढ़ गई थी. माना जाता है कि इससे यूरोप के तापमान में चार डिर्गी सेल्सियस तक की गिरावट आई होगी.
कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि इस ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से ही निएंडरथल मानवों की नस्ल का ख़ात्मा हो गया था. जब ये विस्फोट हुआ था तो भयंकर सर्दी की वजह से निएंडरथल मानव पहले ही बड़ी मौसमी चुनौती झेल रहे थे.
विस्फोट से यूरोप में जंगल तबाह हो गए. इस वजह से खाने-पीने की चीज़ों की भी कमी हो गई. आसमान में राख फैलने से ठंड और बढ़ गई. ऐसे में जान बचाना मुश्किल हो गया होगा.

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हालांकि इस दौर के बाद भी फ्रांस और स्पेन मे निएंडरथल मानवों के रहने के सबूत मिले हैं.
इस बारे में वैज्ञानिक कहते हैं कि चूंकि विस्फोट के वक़्त हवा पूरब की तरफ़ बह रही थी. इसलिए फ्रांस और स्पेन में रहने वाले निएंडरथल मानव बच गए.
वहीं कुछ वैज्ञानिक ये कहते हैं कि ज्वालामुखी विस्फोट से निएंडरथल मानव को फ़ायदा हुआ होगा. क्योंकि आज की नस्ल वाले इंसानों के अफ्रीका से यूरोप पहुंचने में देर हुई.
ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से अफ्रीका से यूरोप के रास्ते में भारी तबाही हुई होगी. जिसके चलते आज के इंसानों के पूर्वजों को यूरोप तक पहुंचने में कुछ सौ साल और लग गए होंगे.
काम्पी फ्लेग्रेई ही एक सुपर वॉल्कैनो नहीं है, जो धरती पर पाया जाता है.
कोलोराडो की विशाल खाई

अमरीका के कोलोराडो में एक विशाल खाई है. ये सौ किलोमीटर चौड़ी और एक किलोमीटर गहरी है.
कहा जाता है कि ला गारिटा नाम का ये ज्वालामुखी का कुंड क़रीब तीन करोड़ साल पहले हुए एक ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से बना था. उस दौरान हुए विस्फोट से पांच हज़ार क्यूबिक किलोमीटर लावा निकलकर धरती पर फैल गया था.
राहत की बात ये है कि कोलोराडो के उस इलाक़े में अब धरती के भीतर की चट्टानें इस तरह से बैठ गई हैं कि उनमें हलचल नहीं होती. इससे वहां एक और ज्वालामुखी विस्फोट का डर कमोबेश ख़त्म हो गया है.

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एक और विशाल ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया में 75 हज़ार साल पहले हुआ था.
ये ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पर स्थित लेक टोबा सुपर वॉल्केनो में हुआ था.

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आज इसके कुंड और आस-पास के इलाक़े की क़ुदरती ख़ूबसूरती देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी आते हैं. उन्हें नहीं पता कि जो लेक टोबा आज है वो असल में ज्वालामुखी का मुंह है.
इसमें 75 हज़ार साल पहले इतना भयंकर विस्फोट हुआ था कि इसकी राख और लावा उड़कर हज़ारों किलोमीटर दूर अफ्रीका तक पहुंच गए था.
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के क्लाइव ओपेनहाइमर कहते हैं कि ये विस्फोट ठीक उस वक़्त हुआ था जब आदि मानव अफ्रीका से निकलकर एशिया के तमाम इलाक़ों में फैल रहे थे.
हालांकि माउंट टोबा में हुआ विस्फोट कितना भयानक था और इसका क्या असर हुआ था, इसे लेकर काफ़ी विवाद है.
अफ्रीका की झील में मिले माउंट टोबा के लावा के टुकड़े
90 के दशक में वैज्ञानिकों ने टोबा ज्वालामुखी से निकले लावा और राख के टुकड़े हिंद महासागर में खोज निकाले थे.
इस ज्वालामुखी की राख दक्षिणी चीन सागर में भी मिली थी और सात हज़ार किलोमीटर दूर, अफ्रीका में स्थित मलावी झील में भी पाई गई थी.

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कहा जाता है कि टोबा में इतना ज़बरदस्त विस्फोट हुआ था कि इसकी राख पूरी दुनिया में फैल गई होगी.
कुछ वैज्ञानकों का दावा है कि टोबा से निकली राख और गैसों की वजह से कुछ सालों के लिए धरती का तापमान बहुत कम हो गया होगा.
इस दौरान इंसानों की आबादी बढ़ने पर रोक लगने के भी संकेत मिले हैं. हालांकि ये सबूत पुख़्ता नहीं हैं.
टोबा ज्वालामुखी से निकली राख की वजह से इंडोनेशिया, मलेशिया और भारत के आसमान पर उस वक़्त राख के घने बादल छा गए होंगे. लेकिन, ऐसे सबूत मिलते हैं कि उस दौर के इंसान ने इस चुनौती का मज़बूती से सामना किया था.
आंध्र प्रदेश की जुरेरू घाटी में खुदाई के दौरान पाषाण युग के इंसानी हथियार मिले हैं. इससे साफ़ है कि टोबा ज्वालामुखी में हुए विस्फोट का इंसानों पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ा था.
माना जाता है कि टोबा से निकले लावा और राख का ज़्यादातर हिस्सा समंदर में जा गिरा था. इस वजह से इंसानों पर इसका ज़्यादा असर नहीं पड़ा. लेकिन आज के दौर में अगर टोबा में विस्फोट हुआ तो इसके भयानक नतीजे देखने को मिल सकते हैं.
टोबा के नीचे धरती के भीतर आज भी हलचल मची हुई है. अगर चट्टानों के पिघलने का दबाव बढ़ा तो टोबा में फिर से महाविस्फोट हो सकता है. पर ये कब और कितना बड़ा होगा, कहना मुश्किल है.
यलोस्टोन नेशनल पार्क में भी है ज्वालामुखी

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इसी तरह अमरीका में यलोस्टोन नेशनल पार्क के नीचे भी एक ज्वालामुखी सोया हुआ है. इसकी हलचलों की लगातार निगरानी होती रहती है.
कहते हैं कि यलोस्टोन ज्वालामुखी में पिछली बार भयंकर विस्फोट क़रीब 21 लाख साल पहले हुआ था. इस विस्फोट में 1980 में माउंट हेलेन में विस्फोट से निकली राख की ढाई हज़ार गुना ज़्यादा राख निकली थी.
अगर यलोस्टोन में फिर से विस्फोट होता है तो टोबा के मुक़ाबले इससे ज़्यादा तबाही मच सकती है. क्योंकि इसका ज़्यादातर लावा ज़मीन पर ही गिरेगा. अगर विस्फोट हुआ तो दोनों अमरीकी महाद्वीपों में ज़्यादातर लोग मारे जाएंगे.
विस्फोट की वजह से ज़हरीली गैस हवा में घुल जाएगी. सांस लेने पर लोग मरेंगे. फिर पानी-बिजली की सप्लाई बंद होने से भी बड़ी तादाद में लोगों की मौत होगी.
ओपेनहाइमर कहते हैं कि काम्पी फ्लेग्रेई, टोबा या यलोस्टोन में विस्फोट होता है तो इंसानियत पर इसका गहरा असर होगा.
आज की तारीख़ में अर्थव्यवस्था इस कदर जुड़ी है कि कोई एक देश नहीं, पूरी दुनिया पर ज्वालामुखी विस्फोट का असर होगा.
छोटे से विस्फोट का असर पूरी दुनिया पर होगा

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वो 2010 में आइसलैंड के इजाफजल्लाजोकुल ज्वालामुखी विस्फोट की मिसाल देते हैं. एक छोटे से विस्फोट की वजह से कई यूरोपीय देशों को हवाई उड़ानों पर असर पड़ा था.
जर्मनी की फॉक्सवैगन ऑटोमोबाइल कंपनी को जापान से पुर्जों की सप्लाई बंद हो गई थी.
अगर किसी ज्वालामुखी में महाविस्फोट होता है तो इसका असर मौसम पर पड़ेगा. ज़्यादा बारिश हो सकती है, या सूखा पड़ सकता है. इससे दुनिया में अनाज का उत्पादन घट सकता है. अकाल पड़ने का भी डर है.
हालांकि किसी एक महाविस्फोट से पूरी इंसानियत के सफाए की आशंका से वैज्ञानिक इनकार करते हैं.
इसके बजाय लावा की बाढ़ से क़यामत आ सकती है. लाखों साल पहले चट्टानों में दरार पड़ने से ज़मीन से पिघलता लावा निकलकर धरती के एक बड़े हिस्से पर फैल गया था.
भारत में भी इसके सबूत मिलते हैं. दक्षिणी-पश्चिमी भारत का एक बड़ा हिस्सा इसी लावा से बना हुआ है.

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पिछले 25 करोड़ सालों में लावा की बाढ़ आने की ऐसी 11 घटनाएं होने का अंदाज़ा वैज्ञानिक लगाते हैं.
मगर दिक़्क़त ये है कि किसी को नहीं पता कि ज्वालामुखियों में ये महाविस्फोट कब होगा, या लावा की बाढ़ कब आएगी.
इतना तय है कि ऐसा होगा. लेकिन इसका अंदाज़ा लगाना नामुमकिन है.
यानी क़यामत या प्रलय आनी तय है. मगर वो दिन कब आएगा, ये कोई नहीं बता सकता.
( बीबीसी फ्यूचर पर अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
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