कचरे के ढेर में तब्दील होती धरती, कौन देश आगे

इमेज स्रोत, Edward Burtynsky, courtesy Flowers Gallery, London
इंसान क़रीब सवा तीन लाख साल से धरती पर रह रहे हैं.
आज से क़रीब 50 हज़ार साल पहले इंसानों के दिमाग़ में आज वाले बर्ताव के बदलाव आए. इसके बाद आदि मानव अफ़्रीका से निकल कर पूरी दुनिया में फैल गया. मानव जाति के इस विस्तार और बढ़ती आबादी ने धरती की आबो-हवा से लेकर भौगोलिक रूप पर गहरा असर डाला है.
इंसानों ने धरती को कभी न भर पाने वाले घाव दिए हैं. कनाडा के फ़ोटोग्राफर एडवर्ड बर्टिंस्की औद्योगिक क्रांति के असर को दिखाने वाली तस्वीरें खींचने के उस्ताद हैं.
उनकी तस्वीरें जो कभी हेलिकॉप्टर तो कभी सैटलाइट से ली गई हैं. वो हमें धरती पर ही एक ऐसी दुनिया होने का अहसास कराती हैं, जो शायद हैं ही नहीं.
इन तस्वीरों से जो क़िस्से उभर कर सामने आते हैं, वो इंसान के इस धरती को दिए ज़ख़्मों के गवाह हैं.
उत्खनन, जंगलों की सफ़ाई, औद्योगिक कचरे और क़तरा-क़तरा गल रही चीज़ों की ऐसी तस्वीरें एडवर्ड बर्टिंस्की ने खींचीं हैं कि कुछ को देखने पर तो दूसरी दुनिया का एहसास होता है.
उनकी तस्वीरों में कचरे के पहाड़ हैं. प्लास्टिक के ढेर हैं. रबर के जंगल हैं और बंद हो चुके कारखानों और खदानों की झांकी दिखती है. कुल मिलाकर इंसान की गतिविधियों से धरती पर जो सड़न फैल गई है, एडवर्ड बर्टिंस्की ने उसे सबसे बढ़िया तरीक़े से अपनी तस्वीरों में क़ैद किया है.

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जहां इंसानों का है राज
ये धरती के उस युग की दास्तान है, जो इंसानों के राज का है.
बर्टिंस्की कहते हैं, ''कचरे के ढेर के बगल से निकलते हुए ज़्यादातर लोगों को उसमें कोई तस्वीर नहीं नज़र आती. मगर, हर क़दम पर एक तस्वीर है. आप को बस वहां पर जा कर उसे तलाशना है.''
एडवर्ड बर्टिंस्की की बेहद मशहूर फ़ोटो में से एक है, अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में लगा बेकार पड़े टायरों का ढेर. एक और तस्वीर में उन्होंने शिकार किए गए हाथी दांत को जलाते हुए क़ैद किया है.
वहीं खनिजों की खुदाई से चट्टानों को मिले घावों की तस्वीरें अलग ही दास्तां बयां करती हैं. जैसे चिली की चुक़ीकामटा खदान की तस्वीर, जो दुनिया की सबसे बड़ी तांबे की खुली खदान है.

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नोबेल पुरस्कार विजेता, जोज़ेफ़ क्रटज़ेन ने इंसानों के धरती पर राज के इस दौर को एंथ्रोपोसीन युग का नाम दिया था. ये वो भौगोलिक दौर है, जब इंसान धरती के सर्वेसर्वा बन गए.
हाल ही में एंथ्रोपोसीन युग के एक नए मल्टीमीडिया प्रोजेक्ट के लिए पिछले पांच सालों में 20 देशों में जाकर इंसान के क़ुदरत को दिए जख़्मों की ऐसी ही तस्वीरें खींची हैं.
एडवर्ड बर्टिंस्की कहते हैं, ''हम एक बड़ी क़यामत के मुजरिम बनने के मुहाने पर खड़े हैं.''
इसकी मिसाल अमरीका के फ्लोरिडा में फॉस्फोरस निकालने के लिए बनाए गए तालाबों की तस्वीर से मिलती है. प्रदूषण की वजह से ये फॉस्फोरस दोबारा उस तालाब में नहीं जा पाता.
एडवर्ड बर्टिंस्की ने 2016 में अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में सवाल पूछा था, ''मुझे बताइए कि आख़िरी बार आप ने कब फॉस्फोरस का जिक्र किया या सुना था?''

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बर्टिंस्की कहते हैं, ''वैज्ञानिक सबसे गंदे तरीक़े से कहानियां सुनाते हैं. उनके मुक़ाबले जब कलाकार क़िस्सागोई करते हैं, तो ये कहानियां सब लोगों की पहुंच में आ जाती हैं.''
अपनी नई किताब 'एंथ्रोपोसीन' में बर्टिंस्की ने लिखा है कि इंसान की भूख शांत करने के लिए 60 अरब टन चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है.
इनमें खान-पान से लेकर इमारतें बनाने में इस्तेमाल होने वाले मटीरियल और कारखाने-कारोबार चलाने के लिए ज़रूरी चीज़ें शामिल हैं. यानी हम धरती को बड़ी तेज़ रफ़्तार से निगल रहे हैं.
इस से निकलने वाला कचरा भी हम ही दोबार धरती पर फेंक रहे हैं. कभी ये कचरा खाई, तो कभी नदी, झील या समंदर में फेंका जा रहा है.

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एरिज़ोना की मोरेंसी खदान में गलते हुए तांबे और पास ही कचरे जमा करने के तालाबों की तस्वीर के ज़रिए एडवर्ड बर्टिंस्की ऐसी कहानी सुनाते हैं, जो कोई और नहीं कहता.
आसमान से ली गई उनकी तस्वीरें, मुख्यधारा के मीडिया का हिस्सा नहीं बन पाने वाले क़िस्से बयां करती हैं.
जैसे अफ़्रीकी देश नाइजीरिया की मिसाल लें. यहां ग़रीब लोग पाइपलाइनों से तेल चोरी करते हैं. इसे 'बंकरिंग' कहा जाता है. जिसे छोटी-छोटी रिफाइनरी में साफ़ कर के चोरी से बेचा जाता है. मगर, तेल के इस अवैध धंधे की वजह से उपजाऊ ज़मीन और जंगलों को भारी नुक़सान पहुंच रहा है. नदियां और झीलें तबाह हो रही हैं.

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एडवर्ड बर्टिंस्की ख़ुद को पर्यावरणवादी कहते हैं.
उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी, धरती को इंसान के दिए जख़्मों का हिसाब-किताब लगाने के नाम कर दी है. उद्योगों और इंसानी लालच ने दुनिया में जो तबाही मचाई है, बर्टिंस्की उसकी तस्वीरें लेते हैं.
ऐसी ही एक तस्वीर है रूस के समुद्री इलाक़े बेरेंजनिकी की. जहां समुद्र की तलहटी से नीचे सदियों से दबी चट्टानों को खोद कर सुरंगें बनाई गई हैं.

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बर्टिंस्की हमें ये भी बताते हैं कि ये 18वीं, 19वीं या 20वीं सदी भर में आई तबाही नहीं है.
उन्होंने रोमन साम्राज्य में संगमरमर की खुदाई के लिए मशहूर कर्रारा की तस्वीरें भी ली हैं, जहां ऐतिहासिक संगतराश माइकल एंजेलो, साल के तीन महीने संगमरमर की चट्टानें कटवाने के लिए जाया करते थे.

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संगमरमर निकालने की वजह से जो खदान बनी है, वो इतनी विशाल है कि उसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है.
ऐसा नहीं है कि बर्टिंस्की केवल तबाही की तस्वीरें खींचते हैं. उनके कैमरों ने उम्मीदें जगाने वाली तस्वीरें भी क़ैद की हैं. जैसे कि विशाल सोलर या विंड फॉर्म. जिनसे पर्यावरण को कम नुक़सान पहुंचाकर बिजली बनाई जा रही है.

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इसी तरह, उन्होंने चिली के अटाकामा रेगिस्तान में लीथियम की सफ़ाई के अभियान को क़ैद किया है. जो इस बात का संकेत है कि भविष्य में हमारी कारें लीथियम की बैटरियों से चला करेंगी, न कि पेट्रोल-डीज़ल से.
उनकी तस्वीरों में जन्नत के वो टुकड़े भी हैं, जो इंसान की पहुंच से अछूते रहे हैं. जैसे कि कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया के बरसाती जंगल. या फिर इंडोनेशिया के पेनगाह स्थित मूंगे की चट्टानें. जलवायु परिवर्तन से ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ़ तो तबाह हो रही है. लेकिन, पेनगाह की अछूती मूंगे की चट्टानें एक उम्मीद भी जगाती हैं.
एडवर्ड बर्टिंस्की की तस्वीरें देखकर अंतरात्मा हिल जाती है. वो हमें ये याद दिलाती हैं कि इस वक़्त धरती का कोई ऐसा कोना नहीं है, जिस पर तबाही का ख़तरा न मंडरा रहा हो.
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