जब यह तस्वीर बनी अमरीका-रूस के ग़ुस्से का प्रतीक

तस्वीरों में बहुत ताक़त होती है. ये इतिहास का हिस्सा भी होती हैं. और कई बार तस्वीरें इतिहास बनाती भी हैं.
मगर, कोई तस्वीर कब और कहां इतिहास बनाने वाली बन जाएगी, ये ख़ुद फ़ोटोग्राफ़र को भी पता नहीं होता.
आज हम ऐसी ही एक तस्वीर का क़िस्सा आप को बताते हैं.
ये तस्वीर है 58 साल पुरानी. 1959 में ली गई इस तस्वीर में सोवियत संघ नेता निकिता ख्रुश्चेव और उस वक़्त के अमेरिकी उप-राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन गर्मागर्म बहस करते दिख रहे हैं. ये तस्वीर ली थी अमरीकी फ़ोटोग्राफ़र इलियट एर्विट ने.
एर्विट ने ये तस्वीर मॉस्को में लगी नुमाइश के दौरान ली थी. ये प्रदर्शनी अमरीका ने पूंजीवाद के फ़ायदों के बारे में प्रचार के लिए लगाई थी.
सोवियत संघ और अमरीका की तनातनी
सोवियत संघ और अमरीका में वो दौर ज़बर्दस्त तनातनी का था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही दो खेमों में बंटी दुनिया भयंकर शीत युद्ध से जूझ रही थी.
एक तरफ़ सोवियत संघ की अगुवाई में साम्यवादी ताक़तें एकजुट थीं. वहीं दूसरा खेमा अमरीका की अगुवाई वाला पूंजीवादी ताक़तों का था.
शीत युद्ध के दौरान दोनों खेमे अपनी-अपनी विचारधारा का जमकर प्रचार करते थे.
मॉस्को में लगी इस प्रदर्शनी का मक़सद पूंजीवाद और साम्यवाद जैसी दो अलग-अलग विचारधाराओं के फ़ायदे गिनाना था.
इसी बीच फोटोग्राफर इलियट को भी इस प्रदर्शनी में जाने का मौक़ा मिला. उन्हों ने बहुत से यादगार लम्हे अपने कैमरे में क़ैद किए.
दोनों देशों के लीडर यहां सांस्कृतिक विरासत के लेन-देन पर बात कर रहे थे. निक्सन का कहना था कि उनका देश बेहतर हालत में है, क्योंकि उनके यहां खुलापन है.
साम्यवादी विचारधारा वाले के देशों में हालात इसीलिए ख़राब है कि यहां के लोग शाकाहारी हैं.
दूसरे शब्दों में निक्सन कहना था कि ताक़त के बल पर ही एक अच्छी ज़िंदगी बसर की जा सकती है और ये पूंजीवाद के चलते ही संभव हो सकता है.

इस तस्वीर पर जारी रही बहस
हालांकि कहा यही जाता है कि दोनों की ये बात-चीत पहले से तय नहीं थी. ये बातें अनौपचारिक तौर पर हुई थीं. लेकिन इस बात पर यक़ीन कर पाना थोड़ा मुश्किल है.
इन दोनों की ये गुफ़्तगू बाद में 'द किचन डिबेट' के नाम से मशहूर हो गई. और इसी लम्हे की कुछ तस्वीरें इलियट ने अपने कैमरे में उतारी थीं.
इस प्रदर्शनी में निक्सन ने पुरज़ोर तरीक़े से पूंजीवाद की वक़ालत की थी. कहा जाता है कि इससे अमरीका में निक्सन की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ गई थी.
आने वाले वक़्त में राष्ट्रपति चुनाव में भी निक्सन ने इसका फ़ायदा उठाया.
निक्सन और निकिता ख्रुशचेव की मुलाक़ात मई महीने में हुई थी. इसी महीने में मज़दूर दिवस भी मनाया जाता है.
इन दोनों नेताओं की बात-चीत के बाद ही वहां एक परेड शुरू हो गई. इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं. परेड में मिलिटरी ताक़त का मुज़ाहरा किया गया था.

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शायद निकिता ख्रुशचेव निक्सन को ये जताना चाहते थे कि साम्यवादी देश भी ताक़त के मामले में पूंजीवादी देशों से कम नहीं हैं.
हालांकि इस परेड के बारे में भी यही कहा गया कि ये पहले से तय नहीं थी. लेकिन एर्विट कहते हैं कि जिस तैयारी से ये परेड निकाली गई थी, उसे देखकर इस बात पर यक़ीन करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.
इस परेड की तस्वीरें भी एर्विट ने अपने कैमरे में क़ैद की थीं.
इस साल रूस की अक्टूबर क्रांति के 100 साल पूरे हुए हैं. एर्विट ने सोवियत संघ में लंबे समय तक फोटोग्राफी की थी.
दो ताक़तों में तू-तू, मैं-मैं
अपने अनुभव साझा करते हुए वो बताते हैं कि उन्होंने दुनिया की दो बड़ी ताक़तों के नेतों को आपस में तू-तू, मैं-मैं करते देखा है.
1964 में एर्विट 10 दिन के क्यूबा दौरे पर गए. हवाना में उन्हें फिदेल कास्त्रो की तस्वीरें खींचने का मौक़ा मिला.
एर्विट फिदेल कास्त्रो की शख़्सियत से काफ़ी ज़्यादा प्रभावित हुए. वो कास्त्रो को एक कैमरामैन की नज़र से देख रहे थे.
वो बताते हैं कि कास्त्रो ग़ज़ब के इंसान थे. उनका चेहरा बहुत फोटोजेनिक था. एर्विट के मुताबिक़ कास्त्रो की स्मार्टनेस और ख़ूबसूरती को मर्लिन मुनरो की ख़ूबसूरती और शख़्सियत के बराबर आंका जा सकता है.
एर्विट कहते हैं कि उनसे मुलाक़ात करके कास्त्रो भी बहुत मुतासिर हुए थे.

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फिदेल कास्त्रो एक दिलचस्प इंसान
फिदेल कास्त्रो ख़ुद सिगार के शौक़ीन थे. उन्होंने एर्विट को भी सिगार का एक पैकेट तोहफ़े में दिया था.
लेकिन क़ानूनी बंदिशों के सबब वो उसे अपने साथ ला नहीं पाए. इस बात का उन्हें आज भी मलाल है.
एर्विट कहते हैं कि फिदेल कास्त्रो के बारे में लोग चाहे जो कहें लेकिन वो एक दिलचस्प, ख़ुशमिज़ाज और मिलनसार आदमी थी.
एर्विट कहते हैं कि क्यूबा दौरे में राजधानी हवाना में उन्होंने एक बेसबॉल मैच भी देखा था.
कास्त्रो भी मैच देखने गए थे. फिदेल को अपने दरमियान पाकर लोगों ने कास्त्रो से बॉल फेंकने को कहा.
कास्त्रो ने भी लोगों को मायूस नहीं किया और बॉल फेंक दी. हालांकि वो पूरी ताक़त से बॉल नहीं फेंक पाए.
लेकिन लोगों का दिल रखने के लिए उन्होंने बॉल फेंकी. इसी से अंदाज़ा हो जाता है कि कास्त्रो कितने बिंदास मिज़ाज के थे.
एर्विट कहते हैं कि एक फोटोग्राफ़र सिर्फ़ दर्शक होता है. वो तो बस उस लम्हे का इंतज़ार करता है, जब उसे एक मनचाही तस्वीर मिल जाए.
माहौल में जो कुछ हो रह है वो उसका हिस्सा नहीं बनता. एर्विट कहते हैं कि इसीलिए वो भी सिर्फ तस्वीरें ही ले रहे थे.
ये इत्तेफ़ाक़ है कि उनकी तस्वीरें इतिहास का हिस्सा बन गईं.
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