अनलॉक 1: काम पर लौटने को लेकर हम इतने डरे हुए क्यों हैं?

काम पर लौटने को लेकर हम इतने असहज क्यों हैं?

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    • Author, पीटर रुबिन्स्टीन
    • पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ़

घर पर रहने के आदेश वापस लिए जाने लगे हैं और हममें से कई लोग काम पर लौटने लगे हैं.

भारत में भी सोमवार से कई आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू हो रही हैं. लेकिन सामान्य दिनचर्या को फिर से शुरू करने में आपको घबराहट क्यों है?

जब हमें पहली बार अपने घरों तक सीमित किया गया तब हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लौटने के ख़्वाब देखते थे.

हम अपने पसंदीदा पब, थिएटर और दुकानों में जाना चाहते थे. हमें ट्रेन में सफ़र की याद सताती थी. हम नये कपड़े खरीदना और हैंडशेक के बारे में भी सोचते थे.

लेकिन जैसे-जैसे दुनिया भर में लॉकडाउन उठाया जा रहा है और कारोबार धीरे-धीरे खुल रहे हैं, हममें से कई लोग जो स्वास्थ्य सेवा में नहीं हैं या ज़रूरी सेवाओं में काम नहीं करते, उनके सामने एक दुविधा खड़ी हो गई है.

हम आम दिनचर्या शुरू करने को लेकर चिंतित हो रहे हैं, भले ही घर में बंद रहते हुए हम इसी के बारे में सोचते रहते थे.

काम पर लौटने को लेकर हम इतने असहज क्यों हैं?

कोरोना वायरस के ख़तरे

हम ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा सकते कि हमारे ऑफिस और परिवहन के साधन कोरोना वायरस के ख़तरे से निपटने के लिए कितने तैयार होंगे.

फिर भी, जब हम घर से बाहर निकलकर सामान्य ज़िंदगी की तैयारी कर रहे हैं तब हमारी आशंकाओं के पीछे की वजह को समझना ज़रूरी है.

वह क्या चीज़ है जो काम पर लौटने को लेकर हमें असहज करती है?

बीबीसी वर्कलाइफ़ ने इस बारे में ग्रेटर शिकागो की मनोवैज्ञानिक डॉक्टर करेन कैसिडे और न्यूयॉर्क के मनोचिकित्सक डॉ. डेविड रोसमरीन से बात की.

डॉक्टर करेन कैसिडे शिकागो के सेंटर फ़ॉर एंक्जाइटी की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और डॉक्टर डेविड रोसमरीन न्यूयॉर्क के एंक्जाइटी ट्रीटमेंट सेंटर के संस्थापक और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के मनोचिकित्सा विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.

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लॉकडाउन खुल रहा है लेकिन मैं ख़ुश क्यों नहीं हूं?

डॉक्टर कैसिडे का कहना है कि महीनों तक अपने अस्तित्व को लेकर हम अनिश्चितता की स्थिति में रहे हैं, जिसकी वजह से हमने बहुत तनाव झेला है.

जब संक्रमण की दर घटती-बढ़ती है तो हमारे स्थानीय और राष्ट्रीय नेताओं के आदेश बदल जाते हैं.

ऐसे में हमें अपने प्रियजनों की सुरक्षा की चिंता सताती है. हम एक भ्रम की स्थिति में जीते हैं और यह चिंता स्थायी हो जाती है.

डॉक्टर कैसिडे कहती हैं, "हमारे शरीर तनाव प्रतिक्रिया की निष्क्रिय अवस्था में फंस गए हैं जिसका नतीजा थकान, उदासी और चिड़चिड़ाहट के रूप में दिखता है."

ये जज़्बात लॉकडाउन हटने से जादुई रूप से गायब नहीं हो जाते. निकट भविष्य में "हम इन्हीं चीज़ों से गुजरते रहेंगे जिसे हम आज महसूस कर रहे हैं."

यही वजह है कि सामान्य दिनचर्या शुरू करने को लेकर हममें से कई लोग कोई सकारात्मक उत्साह नहीं दिखा पा रहे.

किसी समस्या से निपटने में एक निश्चित भूमिका होने पर हमें ऐसा महसूस हो सकता है कि हम हालात को नियंत्रित करने की स्थिति में हैं. लेकिन महामारी की प्रकृति ऐसी है कि हम असहाय अवस्था में धकेल दिए गए हैं.

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महामारी में असहाय होने की भावना

डॉक्टर कैसिडे कहती हैं, "घर पर रहते हुए हमें कुछ भी नहीं करने को कहा गया."

"अगर हमारे पास कोई काम हो जिससे लगे कि हम हालात को बेहतर करने और समस्या हल करने के लिए कुछ कर रहे हैं तो हम अनिश्चितता से बेहतर तरीके से निपट सकते हैं."

काम पर लौटने से हमारी दिनचर्या वापस आ सकती है, लेकिन महामारी में असहाय होने की भावना दूर नहीं होगी.

डॉक्टर रोसमरीन का कहना है कि क्वारंटीन में रहने के कुछ फायदे छिन जाने पर काम पर लौटना और तनावपूर्ण हो जाएगा.

"कम आना-जाना और कम काम की वजह से हमें ज़्यादा नींद मिली, परिवार के साथ ज़्यादा वक़्त बीता और सामाजिक दबाव कम रहा. लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद हममें से कई लोग इसके लिए तरसेंगे."

रोसमरीन कहते हैं, "सामान्य ज़िंदगी में लौटने को लेकर यदि लोगों में मिली-जुली भावनाएं हैं तो यह अपेक्षित है."

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भावनात्मक रूप में थका हुआ महसूस करना ठीक है?

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर रोसमरीन का कहना है - यकीनन. लॉकडाउन उठाने के कई महीनों बाद तक अवसाद, चिंता, चिड़चिड़ाहट और गुस्सा हावी रह सकता है.

कई मामलों में यह रिश्तों की परेशानियों से भी पैदा होता है जो लंबे समय तक बंद दायरे में साथ रहने से पनपती हैं.

"वैवाहिक झगड़े और घरेलू बदसलूकियां बढ़ने के स्पष्ट संकेत हैं, ख़ासकर उन परिवारों में जो महामारी से पहले संघर्ष कर रहे थे."

लाखों लोगों की नौकरी चली गई या तनख्वाह नहीं मिली, उनकी वित्तीय असुरक्षा ने भावनात्मक थकान को और बढ़ा दिया है.

माता-पिता को तय करना है कि अगर स्कूल खुल रहे हैं तो उन्हें बच्चों को कब स्कूल भेजना चाहिए. वे यह भी देख रहे हैं कि आपके लिए और आपके प्रिय लोगों के क्या ठीक रहेगा.

इस बीच काम के दबाव कम नहीं होने वाले. जो लोग ज़ूम ऐप पर अंतहीन मीटिंगों में फंसे रहे हैं वे भी मानसिक थकान से अछूते नहीं हैं.

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लॉकडाउन में पैदा हुआ खालीपन

कैसिडे कहती हैं, "थोड़ी देर से आने वाली वीडियो फीड पर दूसरे लोगों के भावों को पढ़ना और उनसे बातचीत करना बहुत थकाऊ है."

"वीडियो कांफ्रेंसिंग पर बातचीत करने में आमने-सामने की बातचीत या फोन कॉल पर बातचीत करने से ज़्यादा कोशिश करनी पड़ती है."

इस तरह की बातचीत से पैदा होने वाला तनाव हमारे कार्टिसोल के स्तर को बढ़ा देता है, जिससे हमारी नींद और मिज़ाज पर बुरा असर पड़ता है.

कैसिडे और रोसमरीन दोनों इस बात पर सहमत हैं कि लॉकडाउन में पैदा हुए खालीपन को एक झटके में दूर करना आसान नहीं है. इसमें वक़्त लगना स्वाभाविक है.

रोसमरीन कहते हैं, "यह बड़े स्तर का अंतरराष्ट्रीय संकट है. कुछ समय तक हमारी भावनाओं पर इसका असर रहेगा."

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मैं अपने आसपास ज़्यादा लोगों को देखकर घबराता हूं- ऐसा क्यों?

कैसिडे का कहना है कि अपने घरों में बंद रहकर हम शांतिपूर्ण जीवन जी रहे थे, इसलिए हो सकता है कि भीड़-भाड़ वाली ट्रेनों या बसों में चलना अब अच्छा न लगे.

"सच्चाई यह है कि काम पर जाना और भीड़भाड़ वाली ट्रेनों में खड़े रहना तनावपूर्ण है और किसी भी व्यक्ति के लिए आदर्श स्थिति नहीं है."

यह भी एक वजह है कि कई लोगों ने महामारी से पहले घर से पार्ट-टाइम काम करना पसंद किया था.

जब हम सार्वजनिक परिवहन सेवाओं और दफ्तरों में लौट रहे हैं तो हम इन साझा स्थानों में नये तरीके से मेल-मुलाकात करने के लिए मजबूर होंगे.

वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि सोशल डिस्टेंसिंग के दिशानिर्देश अभी बरकरार रहेंगे जब तक कि वैक्सीन न बन जए या हर्ड इम्युनिटी न विकसित हो जाए.

कैसिडे का कहना है कि इसमें वक़्त लग सकता है. तब तक सार्वजनिक जगहों पर वही प्रक्रियाएं अपनानी पड़ेंगी जो हमें असहज लगती हैं.

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क्वारंटीन के कुछ फायदे

वह कहती हैं, "हमें उन दफ़्तरों में भी लौटना होगा जहां के कुछ कर्मचारी कोविड-19 की वजह से हमसे बिछुड़ गए और हम उनका सही से मातम भी नहीं मना सके."

हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी. यह वायरस लंबे समय तक साथ रहने वाला है, यह सोचकर चलना होगा.

रोसमरीन के मरीज़ों ने उनको बताया है कि क्वारंटीन के कुछ फायदे काम पर लौटते ही ख़त्म हो सकते हैं.

शर्मीले स्वभाव वाले कई लोगों ने लॉकडाउन में "अच्छा" काम किया क्योंकि इस दौरान वे सामाजिक मेल-मुलाकातों के डर से बचे हुए थे.

अवसाद से ग्रस्त लोगों के लिए रोज़ सुबह उठकर काम पर जाने और वहां काम करने का तनाव घटना बहुत बड़ी राहत थी.

वह कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि हमें काम पर लौटने की मिली-जुली भावनाओं के आधार पर किसी के बारे में कोई फ़ैसला करना चाहिए."

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घबराहट से निपटने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

जब हम अपनी दिनचर्या फिर से शुरू करते हैं तो हमें याद रखना चाहिए कि अपनी बेचैनी को कम करने का प्रयास करना इसे और मुश्किल बना देगा.

रासमरीन का कहना है कि सामान्य होने का दिखावा करना या सामान्य होने की तरफ दौड़ लगा देने से बात नहीं बनेगी, बल्कि यह मानना होगा कि कुछ चिंताएं हैं और हमने उन चिंताओं से पार करने का निश्चय किया है.

वह लंबे समय तक अकेले रहने वाले लोगों को प्रेरित करते हैं कि लॉकडाउन हटने पर वे अजनबियों से बातचीत करें, अपने बॉस से बातचीत करें और ऐसे काम करें जिसमें वे सहज नहीं हैं.

उनका कहना है कि बेचैनी किसी की जान नहीं लेती लेकिन इस पर हमारी प्रतिक्रियाएं यह निर्धारित करती हैं कि हम आगे कहां तक जा सकते हैं.

"जैसे ही हम मानते हैं कि बेचैनी आ रही है तो यदि उसी समय हम ख़ुद को तैयार करें तो यह घटने लगती है."

वीडियो कैप्शन, कोरोना संक्रमित मामलों की संख्यां में भारत दुनिया में पांचवें स्थान पर

कैसिडे का कहना है कि हमें यह भी समझना होगा कि दिमाग और शरीर ख़तरे के ग़लत अलार्म और सही अलार्म के बीच का अंतर नहीं बता सकते.

ये किसी डरावनी फ़िल्म और बेकाबू बस से आपके बाल-बाल बचने की स्थिति में एक जैसी प्रतिक्रिया देते हैं.

बेचैनी को संभावित ख़तरे का एक संकेत समझकर हम योगा, ध्यान या प्रार्थना जैसी तकनीकों का इस्तेमाल शुरू करके इसे दूर कर सकते हैं.

जब हम सार्वजनिक परिवहन, दफ्तर और बाहरी दुनिया में आते हैं तो रोसमरीन का कहना है कि असहज महसूस करना कुछ समय के लिए सामान्य बात है.

"इस संकट ने हमें सिखाया है कि सामान्य होने का मतलब यह है कि हम इंसान हैं. हम चुनौतियों से संघर्ष करते हैं और यह ठीक है."

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