कोरोना वायरस लॉकडाउन ने बदल दिया है वीकेंड का मतलब मगर कैसे?

    • Author, कॉरिन पर्टिल
    • पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ़

ज़िंदगी में काम के साथ-साथ आराम और सुकून भी बेहद ज़रूरी है - खासकर जब माहौल इतना तनावपूर्ण हो.

कोरोनावायरस के कारण लॉक डाउन में रहते हुए भी क्या हम अपने वीकेंड में ये आराम और सुकून के पल हासिल कर सकते हैं?

ब्रिटिश धारावाहिक डाउन टाउन एबे में एक दृश्य है जब जमींदार क्रॉले परिवार के शानदार रात्रिभोज में एक मेहमान बताता है कि वह अपने जॉब के अलावा बाकी काम वीकेंड में कर सकता है.

इस पर परिवार की बुजुर्ग वायलेट क्रॉले (अभिनेत्री मैगी स्मिथ) हैरान होकर पूछती है कि आखिर वीकेंड होता क्या है?

आज हममें से कई लोग यही सवाल पूछ रहे हैं, क्योंकि कोरोना वायरस के संक्रमण के डर से अनिवार्य सेवाओं को छोडकर सभी संस्थान, स्कूल, ऑफिस और हर तरह के सार्वजनिक स्थल बंद हैं.

अपने-अपने घरों में कैद और अपने रूटीन से वंचित लोगों के लिए अब समय एक अनंत विस्तार है जिसे कैलेंडर की तारीखों और दिनों से परिभाषित नहीं किया जा सकता.

अपने घर के कपड़ों में टीवी देखते हुए और लैपटाप पर काम करते हुए क्या सचमुच कोई फर्क पड़ता है कि समय क्या है?

वर्क फ्राम होम और बच्चों की जरूरतों के बीच तालमेल बिठाते पता ही नहीं चलता कि सोमवार है या रविवार?

लगता ही नहीं कि वीकेंड का कोई अर्थ भी है और क्या इस क्वारंटीन दुनिया में वीकेंड का सुकून महसूस करना मुमकिन भी है?

वीकेंड क्या होता है?

येल यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर लॉरी सांटोस कहते हैं, "चुनौती यह है कि हमारे ज़्यादातर शेड्यूल गड़बड़ा गए हैं. इंसान अपनी आदतों से बंधे होते हैं, इसलिए अपने काम के समय और आराम के समय के लिए एक दिनचर्या तय करने से अनिश्चितिता के माहौल में कमी आती है".

आम दिनों में हमारी दिनचर्या बाहरी वजहों से नियंत्रित होती हैं, जैसे: स्कूल का समय, काम से जुड़ी बैठकें और अपॉइंटमेंट वगैरह. इन सब के बिना दुनिया भर में लोगों को नियमित कामकाज और आराम के लिए अलग-अलग समय तय करने के रचनात्मक तरीके ढूँढने हैं.

ट्रैवल कंपनी रिक स्टीव्स यूरोप की मार्केटिंग डायरेक्टर चेने कोरोनियोटिस आजकल घर से काम कर रही हैं, लेकिन अब भी वह अलार्म लगा कर ही सोती हैं और अपने नियमित समय पर काम शुरू कर देती हैं. देर तक सोने का आनंद वह सप्ताहांत में ही उठाती हैं.

बच्चों वाले परिवारों में तो सप्ताह के किसी भी दिन सुबह देर से नहीं उठा जा सकता.

पेरिस की एमिली सेफटेल एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के प्रशासनिक विभाग में काम करती हैं, उनके पति टेक्नालजी के क्षेत्र में हैं, उनका बेटा 6 साल का है और पति-पत्नी को इन दिनों घर पर अपने-अपने ऑफिस के काम और बेटे की स्कूलिंग का भी ध्यान रखना होता है.

अपने वीकेंड का आनंद उठाने के लिए दोनों ने एक नियम बनाया है: वीकेंड के हर दिन पति और पत्नी दोनों को अलग-अलग 3-3 घंटे सुकून के मिलेंगे, जिसे वे घर के किसी भी कोने में अपने हिसाब से बिता सकेंगे, उस दौरान उन्हें कोई तंग नहीं करेगा.

सेफटेल कहती हैं, "हम सुबह और दोपहर को एक-दूसरे को छुट्टी देते हैं. एक सुबह और दूसरे दिन की दोपहर एक को और पहले दिन की दोपहर और दूसरे दिन की सुबह दूसरे को. पिछले वीकेंड बाल्कनी में किताबें पढ़ने और अपना कमरा बंद कर नेट्फ़्लिक्स देखने यानि जो चाहूँ सो करने के लिए मुझे शनिवार की सुबह और रविवार की दोपहर को छुट्टी मिली थी".

मानव निर्मित हैं वीकेंड की छुट्टियाँ

दिन-रात होने या वर्ष बदलने के पीछे एक वैज्ञानिक वजह है. धरती के अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक चक्कर लगाने से दिन और धरती के ही सूरज के चारों ओर चक्कर लगाने से वर्ष बदलते हैं. लेकिन जैसा कि पत्रकार कैटरीना ऑनस्टेड ने अपनी किताब 'द वीकेंड एफेक्ट: द लाइफ चेंजिंग बेनिफिट ऑफ टेकिंग टाइम ऑफ एंड चैलेंजिंग द कल्ट ऑफ ओवर वर्क' में ज़िक्र किया है, "वीकेंड का पूरा विचार ही मानव-समाज की देन है".

वे कहती हैं, "दो दिन का वीकेंड तो 1930 की आर्थिक मंदी के दौरान ही पूरी तरह अपनाया गया. उस समय जिन उद्योगों ने तब तक सप्ताह में 40 घंटे काम की नीति नहीं अपनाई थी, उन्होंने कर्मचारियों के लिए सप्ताह में पाँच दिन काम का शेड्यूल तय किया ताकि ज़्यादा कर्मचारियों में कम काम के घंटे बांटे जा सकें. 1938 तक तो सप्ताह में 40 घंटे काम के कानून ही बनने लगे'.

मौजूदा संकट भी ऐसे दीर्घावधि परिवर्तनों को जन्म दे सकता है.

पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर ब्रेड बीवन कहते हैं, "कोरोना वायरस के प्रसार से पहले से ही वर्क वीक (कामकाजी सप्ताह) का पारंपरिक ढांचा बादल रहा था". वे रिमोट वर्किंग और स्व-रोजगार के मामलों और गिग इकोनोमी की नौकरियों में वृद्धि का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "स्व-एकांतवास (सेल्फ -आइसोलेशन) से कर्मचारी अपने उत्पादकता चक्र (प्रोडक्टिविटी साइकिल), ब्रेक और दिनचर्या का निर्धारण अपने हिसाब से कर पा रहे हैं".

सामान्य माहौल बनाने के लिए ज़रूरी

अभी यह देखना बाकी है कि इस संकट के बाद समाज के आचार-व्यवहार में क्या बदलाव आते हैं.

लेकिन इस दौरान निजी स्तर पर सप्ताह और दिन के ढांचे को किसी प्रकार का व्यवस्थित रूप देना बेहद ज़रूरी है ताकि हम इस अनिश्चितता और तनाव के माहौल से कुछ हद तक निपट सकें.

प्रोडक्टिविटी कंसल्टेंट और 'इंडिस्ट्रेक्टेबल: हाउ टु कंट्रोल योर अटेन्शन एंड चूज योर लाइफ" पुस्तक के लेखक नीर एयल कहते हैं, "अगर आप कुछ नहीं करना चाहते तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर आप कुछ करना चाहते हैं, तो इसके सिवा कोई चारा नहीं है. हम एक नियमित दिनचर्या चाहते हैं और हम जानते हैं कि तय दिनचर्या के बिना लोग पागल हो सकते हैं. जिन हालात में लोगों का नियंत्रण कम होता है और अपेक्षाएँ ज़्यादा, वहाँ अवसाद और चिंता की समस्या बढ़ जाती हैं".

एयल 2006 के एक अध्ययन का हवाला देते हैं जिससे पता चला कि जिन नौकरियों में लोगों का अपने कामकाज की स्थितियों पर नियंत्रण बहुत कम नियंत्रण है, सामाजिक सहायता का अभाव होता है और बहुत अधिक मनोवैज्ञानिक अपेक्षाएं रहती हैं, वहाँ अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याओं के होने की ज़्यादा संभावना होती है".

इस संदर्भ में आज की स्थितियों पर गौर कीजिये, जब हम सब घरों से काम करने के लिए मजबूर हैं, अपने दोस्तों, मित्रों और सहकर्मियों के साथ समय नहीं बिता सकते और महामारी के बीच काम, घर और बच्चों के स्कूल की विभिन्न मांगों के बीच एक साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं.

आज की स्थितियों पर हमारा बहुत ज़्यादा नियंत्रण नहीं है. इसलिए ज़रूरी चीजों पर अपना फोकस बनाए रखें के लिए एक दैनिक शेड्यूल तय करने और समय के अनुसार उसका पालन करना ज़रूरी है.

सांटोस कहते हैं, "मेरी सलाह है कि आप वीकेंड पर जो कुछ भी करते थे, उसे आज के दौर में करने का कोई रचनात्मक विकल्प तलाशें. जैसे यदि आप हर रविवार दोस्तों के साथ ब्रंच करते थे, तो अब भी ज़ूम या स्काइप पर उसी समय उनसे वीडियो मुलाक़ात करें और अपने-अपने घरों में, लेकिन मिल-जुलकर ब्रंच करें. अगर शनिवार की सुबह आप दौड़ लगाते थे तो अब भी सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए अपने आस-पास जॉगिंग करें. बात यह है कि जितना ज़्यादा मुमकिन हो उतना ज़्यादा लॉक डाउन से पहले का रूटीन बनाए रखें तभी इन विपरीत परिस्थितियों को कुछ हद तक सामान्य (नॉर्मल) बनाया जा सकता है.

रूटीन कैसा हो यह इतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना कि यह कि कोई न कोई रूटीन हो.

एयल के मुताबिक मौजूदा संकट एक ऐसा मौका हो सकता है जब हम अपने शेड्यूल नियोक्ता के बजाय अपने हिसाब से तय करें. और हो सकता है आपको यह भी पता चले कि कई चीजों में आप कोई परिवर्तन नहीं चाहते.

लंदन में बुजुर्गों के लिए सेवाएँ मुहैया कराने वाली चैरिटी में काम करने वाली कैरोल होम ने अपने नौ और सात साल के बच्चों से बुधवार से रविवार तक पढ़ने को कहा ताकि शनिवार और रविवार को वह उनकी पढ़ाई में ज़्यादा मदद कर सके.

लेकिन उनकी बेटी ने यह प्रस्ताव मानने से इंकार कर दिया. बच्ची का कहना था कि वह शनिवार और रविवार को ही वीकेंड चाहती है. ऐसे में होम को लगा कि जब माहौल वैसे ही सामान्य नहीं तो कम से कम बच्ची का कुछ तो पसंदीदा रूटीन बना रहे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)