ऑफ़िस में दादागिरी झेल रहे लोगों को क्या-क्या ख़तरे हैं?

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    • Author, क्रिश्चियन जैरेट
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी वर्कलाइफ़

साल 2015 में 36 साल की सोमा घोष ने करियर सलाहकार की नई नौकरी शुरू की, लेकिन कुछ ही दिनों में उनको दफ़्तर जाने में डर लगने लगा.

एक सहकर्मी उनके काम में लगातार नुक्स निकालता था, दूसरों की ग़लतियों के लिए उनको दोषी ठहराता था और अपमानित करता था.

इस दादागिरी का असर हुआ और कुछ ही दिनों में घोष में चिंता और अवसाद के लक्षण दिखने लगे.

उनकी सेहत बिगड़ गई, नींद उड़ गई, सर्दी और बुख़ार सताने लगा, बांह के नीचे एक गांठ उभर आया.

पर्याप्त आराम के बिना लंबे समय तक काम करने के दबाव से उंगलियों, हाथों और कंधे में दर्द शुरू हो गया.

शोधकर्ताओं को बहुत पहले से मालूम है कि दफ़्तरों की दादागिरी का मानसिक सेहत पर बुरा असर पड़ता है.

हाल ही में स्कैंडिनेवियाई देशों के सार्वजनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड के अध्ययन के बाद ये जाहिर होने लगा है कि धौंस जमाने का शारीरिक सेहत पर भी गंभीर असर पड़ सकता है.

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दिल दहला देने वाला ख़तरा

2018 के एक रिसर्च पेपर के लिए कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी की तियानवेई शू की अगुआई में एक दल ने स्वीडन और डेनमार्क के 80 हज़ार पुरुष और महिला कर्मचारियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया.

शोधकर्ताओं ने देखा कि क्या पिछले साल दफ़्तर में उन पर धौंस जमाई गई थी. इसके बाद उन्होंने सेहत के आंकड़े देखे कि अगले चार वर्षों में कहीं उनको दिल की बीमारी तो नहीं हो गई.

पुरुषों और महिलाओं दोनों के आंकड़ों से एक साफ तस्वीर उभरकर आई.

सर्वेक्षण में शामिल 8 से 13 फीसदी लोगों ने माना कि उनके साथ दादागिरी हुई. उनमें दूसरे लोगों के मुक़ाबले दिल की बीमारी या हृदयाघात की संभावना 1.59 गुणा ज़्यादा पाई गई.

दूसरे शब्दों में, दादागिरी का शिकार होने पर दिल संबंधी समस्याएं होने की आशंका 59 फीसदी बढ़ गई.

शोधकर्ताओं ने बॉडी-मास इंडेक्स और धूम्रपान जैसे कारकों को शामिल करके देखा तो भी यही नतीजे दिखे.

जिन प्रतिभागियों पर ज़्यादा धौंसपट्टी जमाई गई थी, उनमें हृदय रोग का जोखिम ज़्यादा था.

शू इन नतीजों का दायरा बढ़ाकर देखती हैं. उनका कहना है कि अगर दफ़्तर की दादागिरी और दिल की बीमारी के बीच कोई रिश्ता है तो दादागिरी ख़त्म करने का मतलब होगा कि हम हृदय रोग के मामलों को 5 फीसदी कम कर सकते हैं.

वैसे शोध की डिजाइन इसे साबित नहीं करती, लेकिन इसके सच होने की संभावना काफी ज़्यादा होगी.

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डायबिटीज़ का ख़तरा

स्वीडन, डेनमार्क और फ़िनलैंड के प्रतिभागियों पर इसी तरह के अध्ययन में शू के शोधकर्ताओं ने पाया कि दफ़्तरों की दादागिरी के शिकार लोगों में टाइप 2 डायबिटीज़ होने की आशंका 1.46 गुणा अधिक थी.

वैसे यह सच है कि इन अध्ययनों के आधार पर पूरी तरह यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि दफ़्तरों में दादागिरी के कारण दिल की समस्याएं और डायबिटीज़ होती हैं.

मुमकिन है कि पहले से मौजूद मानसिक कमजोरियों के कारण किसी व्यक्ति के धौंसपट्टी का शिकार होने और बाद में उसमें शारीरिक समस्याएं पैदा होने का ख़तरा बढ़ जाए.

शू और उनके सहकर्मियों का मानना है कि ऐसा तरीका ढूंढ़ा जा सकता है जिससे पता चले कि दादागिरी कैसे शारीरिक बीमारी की ओर ले जाती है.

इनमें तनाव वाले हार्मोन का स्तर बढ़ना, दादागिरी के शिकार व्यक्ति के हानिकारक आदतें अपना लेना (जैसे ज़्यादा खाना खाना या बहुत ज़्यादा शराब पीना) शामिल हैं.

शोधकर्ताओं ने आगे की शोध परियोजनाओं में इन संभावनाओं का पता लगाने की योजना बनाई है.

शू कहती हैं, "नियोक्ताओं को दफ़्तरों में कर्मचारियों के साथ दादागिरी के बुरे नतीजों के बारे में पता होना चाहिए."

उनकी सलाह होती है कि दादागिरी के शिकार व्यक्ति को जितनी ज़ल्दी हो सके मदद लेनी चाहिए.

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सहकर्मी की भूमिका

नियोक्ता दफ़्तर में दादागिरी को रोकने के कार्यक्रम और व्यवस्था बनाएं, क्योंकि यह सिर्फ़ धौंसपट्टी के शिकार लोगों की भलाई के लिए नहीं है.

जो कर्मचारी अपने सहकर्मियों पर दादागिरी होते हुए देखते हैं उनकी सेहत पर भी बुरा असर पड़ सकता है.

शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ़ वर्क साइकोलॉजी के शोधकर्ताओं ने पाया कि जो स्टाफ अपने साथियों के साथ ऐसा सलूक देखते हैं, वे उदास रहने लगते हैं.

सिंगापुर मैनेजमेंट यूनिवर्सिटी में पहले हुए रिसर्च में भी यही नतीजे आए थे कि काम के दौरान हुए कटु अनुभव पास के व्यक्तियों की मानसिक सेहत पर बुरा असर डालते हैं, जिनका बाद में शारीरिक सेहत पर भी असर होता है.

शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी के दूसरे शोध से पता चला कि दादागिरी देखने भर से उन कर्मचारियों को नुकसान होता है जिनके पास सामाजिक समर्थन की कमी होती है या जो निराशावादी प्रकृति के होते हैं.

शोध के सह-लेखक प्रोफेसर जेरेमी डावसन की सलाह है कि यदि आपने दफ़्तर में दादागिरी देखी है तो आपको सबसे पहले इस बारे में बात करनी चाहिए.

यह बातचीत पीड़ित के साथ हो सकती है जिसमें यह पूछा जा सकता है कि वे अब कैसे हैं.

अन्य लोगों के साथ इससे निपटने के तरीके पर चर्चा हो सकती है या अपने तजुर्बे को साझा किया जा सकता है.

वह कर्मचारियों को किसी भी मुमकिन तरीके से दादागिरी की रिपोर्ट करने की सलाह देते हैं, चाहे वह आधिकारिक चैनल से हो, लाइन मैनेजर के जरिए हो या किसी भरोसेमंद सहकर्मी के जरिए हो.

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सहयोगी संस्कृति

दादागिरी के व्यापक और नुकसानदेह असर को देखते हुए ज़रूरी है कि एक सहयोगी संस्कृति बनाई जाए जिसमें दादागिरी वर्जित हो और जड़ जमाने से पहले ही उसे ख़त्म किया जाए.

अपने कटु अनुभव के बाद सोमा घोष करियर सलाहकार का अपना ख़ुद का व्यवसाय स्थापित कर रही हैं.

उनका कहना है कि नियोक्ताओं को अपने कर्मचारियों को दफ़्तर की दादागिरी से बचाने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए.

घोष के मुताबिक अगर उनको इन शोध नतीजों की जानकारी होती तो वह अपनी नौकरी बहुत पहले छोड़ चुकी होतीं.

दादागिरी से पीड़ित होने पर शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान हर व्यक्ति से वह गुजारिश करती हैं कि वह डॉक्टर से या सलाहकार से बात करें.

वह सावधान करती हैं, "यह कुछ ऐसा नहीं है जो ख़त्म हो जाएगा."

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