जीपीएस और वाईफाई को जन्म देने वाली महिला कौन हैं

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- Author, डेविड रॉबसन
- पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ़
अगर एक अभिनेत्री और पियानोवादक न होती, तो जीपीएस और वाईफ़ाई का अस्तित्व न होता.
1930 के दशक के आख़िर और 40 के दशक की शुरुआत में हेडी लमार हॉलीवुड की नामचीन हस्ती थी.
लेकिन उनके समय कुछ ही लोगों को पता था कि लमार को आविष्कार करने का जुनून था.
उन्होंने अपने प्रेमी और विमानन दिग्गज हावर्ड ह्यूजेस के लिए एक आलीशान हवाई जहाज़ डिज़ाइन किया था.
लमार को इसी तरह का जुनून जॉर्ज एंथिल में दिखा था, जो पियानोवादक, संगीतकार और उपन्यासकार थे, साथ ही इंजीनियरिंग में भी दिलचस्पी रखते थे.
जब उन दोनों को लगा कि कुछ दुश्मन ताक़तें उनके रेडियो संदेशों को रोक रही हैं तो उन्होंने नया समाधान ढूंढ़ना शुरू किया.
नतीजा सिग्नल ट्रांसमिशन के नए तरीक़े के रूप में सामने आया जिसे "फ्रीक्वेंसी-हॉपिंग स्प्रेड स्पेक्ट्रम" के नाम से जाना जाता है.
इसका पेटेंट लमार के विवाहित नाम मार्की पर किया गया था. आज भी वायरलेस टेक्नोलॉजी में इसका इस्तेमाल होता है.
लमार और एंथिल के मस्तिष्क को पोलीमैथ या बहुज्ञानी कहा जा सकता है.
कुछ लोग एक साथ कई क्षेत्रों में विशेषज्ञता कैसे हासिल कर लेते हैं? नए शोध से इसमें मददगार लक्षणों की पहचान होती है.
एक से ज़्यादा विषयों में दिलचस्पी रखने के कई फ़ायदे हैं जिनमें शामिल हैं ज़िंदगी से संतोष, उत्पादकता और रचनात्मकता में बढ़ोतरी.
हममें से ज़्यादातर लोग लमार या एंथिल को मिली क़ामयाबी की बराबरी भले न कर पाएं, लेकिन अपनी विशेषज्ञता से बाहर थोड़ा और वक़्त बिताने से हमें फ़ायदा ही होगा.


"पोलीमैथ" क्या है?
"पोलीमैथ" की परिभाषा बहस का विषय है. इस शब्द की जड़ें प्राचीन ग्रीस में हैं.
कई विषयों की जानकारी रखने वाले शख़्स के लिए इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार 17वीं सदी की शुरुआत में हुआ था.

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लेकिन यह तय करने का कोई तरीक़ा नहीं है कि इसके लिए कितने क्षेत्रों में और किस दर्जे की विशेषज्ञता ज़रूरी है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि सच्चा पोलीमैथ कहलाने के लिए कम से कम दो अलग-अलग क्षेत्रों में कोई औपचारिक उपलब्धि ज़रूरी है.
इसी साल छपकर आई वक़ास अहमद की किताब "द पोलीमैथ" में इस विषय पर विस्तार से विचार किया गया है.
उनके लिए यह कुछ हद तक निजी विषय है. वक़ास अहमद का करियर कई क्षेत्रों में फैला रहा है. वह अर्थशास्त्र में ग्रेजुएट हैं, अंतरराष्ट्रीय संबंध और न्यूरो साइंस में उनके पास मास्टर्स की डिग्री है.

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वह राजनयिक पत्रकार और निजी प्रशिक्षक (जिसे उन्होंने ब्रिटिश सेना के साथ सीखा था) का काम कर चुके हैं. इन दिनों वह दुनिया के सबसे बड़े कला संग्रहों में से एक के कला निर्देशक हैं और पेशेवर कलाकार का भी काम करते हैं.
इन उपलब्धियों के बावजूद अहमद ख़ुद को पोलीमैथ नहीं मानते. पोलीमैथ की उनकी सूची में सिर्फ़ वही शामिल हैं जिन्होंने कम से कम तीन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो.
उनकी सूची में शामिल हैं लियोनार्डो दा विंची (कलाकार, आविष्कारक और शरीर विज्ञानी), योहान वुल्फगांग फान गेटे (महान लेखक जिन्होंने जीव विज्ञान, भौतिकी और खनिज विज्ञान का अध्ययन किया) और फ़्लोरेंस नाइटिंगल (आधुनिक नर्सिंग की संस्थापक, सांख्यिकीविद और धर्मविज्ञानी).
उनकी जीवनियों से और मनोवैज्ञानिक साहित्य की समीक्षा के बाद अहमद ने उन गुणों की पहचान की जिनकी बदौलत ये शख्सियतें महान कहलाईं.
औसत से अधिक मेधावी होना निश्चित रूप से मददगार होता है. इससे और अधिक सीखने की ललक पैदा होती है.

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खुलापन और जिज्ञासा भी बहुत ज़रूरी है. आप किसी घटना में दिलचस्पी रखते हैं लेकिन आपकी खोज कहां जा रही है इसकी चिंता नहीं करते, भले ही आपकी खोज आपको अपरिचित क्षेत्र में ले जाए.


बहुज्ञानी बनने का रास्ता
लमार, एंथिल, विंची और गेटे जैसे पोलीमैथ आत्मनिर्भर थे. वे ख़ुद को पढ़ाकर ख़ुश थे. वे व्यक्तिवादी थे और निजी संतुष्टि को अहमियत देते थे. इन ख़ूबियों के साथ वे दुनिया को एक समग्र नज़रिए से देखते थे.
अहमद कहते हैं, "वे न केवल विभिन्न क्षेत्रों में जाते थे या विभिन्न विषयों पर ध्यान देते थे, बल्कि उनसे मौलिक रूप से भी जुड़ना पसंद करते थे ताकि उनको सभी विषयों के बारे में अंतर्दृष्टि मिले."
किसी भी शख्सियत की तरह पोलीमैथ की ख़ूबियों का भी कोई निश्चित आनुवांशिक आधार होगा, लेकिन वे हमारे परिवेश से भी आकार लेते हैं.
कई बच्चे अलग-अलग क्षेत्रों में दिलचस्पी रखते हैं लेकिन हमारे स्कूल, यूनिवर्सिटी और फिर रोजगार उनको एक ख़ास विशेषज्ञता की ओर ले जाते हैं.

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बहुत से लोगों में पोलीमैथ बनने की क्षमता होती है लेकिन ऐसा तभी हो पाता है जब उनको सही दिशा में आगे बढ़ाया जाए.
जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने वाली एंजेला कोटेलेसा के भी यही ख़याल हैं. कोटेलेसा ने आधुनिक पोलीमैथ्स से उनके तजुर्बों के बारे में बात की है.
पोलीमैथ के बारे में कोटेलेसा के मानदंड अहमद से थोड़े नरम हैं. उन्होंने दो क्षेत्रों, जिनमें एक कला क्षेत्र हो और दूसरा विज्ञान क्षेत्र, में सफल करियर बनाने और ख़ुद को पोलीमैथ मानने वालों को अपने इंटरव्यू में शामिल किया.
अहमद की तरह उन्होंने भी पाया कि जिज्ञासा जैसे लक्षण ज़रूरी हैं, साथ ही बाहरी अपेक्षाओं के दबाव का सामना करते हुए अपनी रुचियों को पूरा करने का संकल्प भी होना चाहिए.
"हम ऐसे समाज में रहते हैं जो विशेषज्ञता पर जोर देता है लेकिन ये लोग ऐसा नहीं करते. वे अपना रास्ता ख़ुद बनाते हैं."
बहुत से लोगों के पास इन मानदंडों से लड़ने के लिए आत्म-बल नहीं होता.


दूसरे विषयों से फायदा
कई रुचियों को पूरा करने में हम क्यों संकोच करते हैं इसके कुछ पुख्ता कारण हैं. हम डरते हैं कि यदि हमने कई जगह पैर पसारे तो कहीं भी कुछ ख़ास नहीं कर पाएंगे.
हक़ीक़त में, ऐसे सबूत हैं कि विविध विषयों में रुचि विकसित करने से रचनात्मकता और उत्पादकता दोनों को बढ़ावा मिलता है.
दूसरी और तीसरी रुचि के विषयों में आगे बढ़ना भले ही एक विचलन लगे, असल में यह प्राथमिक क्षेत्र में आपकी कामयाबी को बढ़ा सकता है.
डेविड एपस्टीन ने अपनी किताबों में लिखा है कि औसत वैज्ञानिकों के मुक़ाबले प्रभावशाली वैज्ञानिकों के विविध विषयों में रुचि रखने की संभावना ज़्यादा होती है.

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नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों में औसत वैज्ञानिकों के मुक़ाबले 25 गुना ज़्यादा संभावना होती है कि वे नाचे, गाएं और अभिनय करें.
उनमें दृश्य कला निर्माण करने की संभावना 17 गुना, कविता लिखने की संभावना 12 गुना और संगीतकार होने की संभावना 4 गुना होती है.
अहमद और इस क्षेत्र के अन्य लोगों का कहना है कि यह पार (क्रॉस) परागन की तरह काम करता है- एक क्षेत्र के विचार दूसरे क्षेत्र में नये आविष्कारों की प्रेरणा बनते हैं.
एंथिल ने पहले पियानो की स्वर लिपि पर काम किया था. बाद में उन्होंने और लमार ने उन यंत्रों के मैकेनिज्म का इस्तेमाल वायरलेस यंत्र बनाने में किया.
इतिहास के महान पोलीमैथ की जीवनियों में अहमद को भी यही बात दिखी. "यह रचनात्मकता का सबसे अच्छा मार्ग है क्योंकि इसके लिए अपने तजुर्बों और अपनी जानकारी में विविधता लाने की ज़रूरत होती है."
लियोनार्डो दा विंची जैसी विलक्षण प्रतिभा के मामले में यह स्पष्ट है- शरीर विज्ञान, गणित और ज्यामिति के ज्ञान ने उनके चित्रों को बेजोड़ बना दिया और उनकी दृश्य कल्पना ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में उनकी रचनात्मकता को समृद्ध किया.
अहमद कहते हैं, "ये चीज़ें एक दूसरे का पोषण करती हैं."


सिर न खपाएं, विषय बदल लें
यदि आप भी पोलीमैथ बनना चाहते हैं तो अहमद का सुझाव है कि अपने समय का कुशलता से इस्तेमाल करके विभिन्न अभिरुचियों के लिए जगह बनाएं.
किसी जटिल प्रयास में ध्यान केंद्रित करने पर दिमाग कई बार एक सैचुरेशन प्वाइंट पर पहुंच जाता है. उसके आगे ध्यान नहीं लगता और अतिरिक्त प्रयास का कोई फायदा नहीं होता.
लेकिन जब आप किसी अलग गतिविधि में लग जाते हैं तो आप पहले काम को करने का कोई दूसरा तरीका पा सकते हैं. इस तरह आपकी समग्र उत्पादकता बढ़ती है.
इसके कुछ प्रमाण शिक्षा क्षेत्र में हुए शोध से मिले हैं. शिक्षा से लेकर खेल और संगीत तक अलग-अलग विषयों के छात्रों पर हुए अध्ययन से पता चला है कि एक निश्चित मात्रा में अभ्यास या पढ़ाई के बाद हम प्रभावी तरीके से सीखना छोड़ देते हैं.
यदि हम नियमित रूप से अपने कौशल या विषय को बदलते रहें तो अपने समय का सदुपयोग कर सकते हैं.
समस्या निदान में भी यही बात सामने आती है. किसी समस्या पर अधिक समय खर्च करने की बजाय यदि आप कुछ बिल्कुल अलग काम करें तो दोबारा उस समस्या की ओर लौटने पर ज़्यादा निदान पाएंगे.
पोलीमैथ बनने के इच्छुक लोग अपनी रुचि के कामों में बारी-बारी से लगकर इसका फायदा उठा सकते हैं. ध्यान रखना होगा कि वे हर क्षेत्र में दिमाग का पूरा इस्तेमाल करें और जब कोई हल न मिल रहा हो तो निरर्थक प्रयासों से बचें.
अहमद कहते हैं, "आप एक बिंदु तक पहुंचने से पहले बहुत उत्पादक रहते हैं और फिर आपको गतिविधियां बदलने की ज़रूरत होती है."
अल्बर्ट आइंस्टाइन भौतिकविद होने के साथ-साथ एक कुशल वायलिनवादक और पियानोवादक भी थे. उन्होंने इसका उपयोग किया था.
आइंस्टाइन जब वह भौतिकी या गणित की किसी समस्या पर उलझते तो संगीत बजाने लगते थे और अक्सर यह कहते हुए संगीत बंद करते थे कि "मुझे जबाव मिल गया". यह उस समस्या पर लगातार सिर खपाने की तुलना में समय का बेहतर उपयोग था.


अंदर के पोलीमैथ का पोषण करें
पोलीमैथ बनने की क्षमता बहुत से लोगों में हो सकती है. लियानार्डो दा विंची की ऊंचाई भले न छू पाएं लेकिन अपनी दिलचस्पी का दायरा बढ़ाकर हम फायदे में हो सकते हैं.
पहले के मुक़ाबले आज हमें कई तरह की सुविधाएं हैं. इंटरनेट पर कई विषयों के मुफ्त पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं. स्काइप जैसे ऐप के ज़रिए हम विशेषज्ञों से जुड़ सकते हैं भले ही वे हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे हों.
रियो डी जेनेरो की पोंटिफ़िकल कैथोलिक यूनिवर्सिटी में पोलीमैथ पर रिसर्च कर रहे माइकल अराकी कहते हैं, "हमारे पास पोलीमैथ बनाने का अनूठा अवसर है, ख़ासकर उन जगहों पर जहां पहले ऐसा बिल्कुल संभव नहीं होता."
अहमद का कहना है कि समय उन संभावनाओं को अपनाने का है. समाज की कई प्रमुख चुनौतियां- जैसे जलवायु परिवर्तन- को रचनात्मक समाधान की ज़रूरत है. पोलीमैथ उन समाधानों को खोजने में सबसे बेहतर हो सकते हैं.
कई लोग पोलीमैथी को पुनर्जागरण के लोगों से जोड़ते हैं. लेकिन आज यह सबसे ज़्यादा प्रासंगिक है.
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