क्या ये दुनिया कभी पूरी तरह शाकाहारी हो सकती है?

Tom Pilston/Panos Pictures

इमेज स्रोत, Tom Pilston/Panos Pictures

    • Author, वेरोनिका ग्रीनवुड
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

रिचर्ड बकले ब्रिटेन के बाथ में एकॉर्न रेस्तरां के मालिक हैं. यह एक शानदार जगह है, जहां मांस नहीं परोसा जाता. बकले खुद शाकाहारी हैं.

हाल में उन्होंने एक दिलचस्प चीज महसूस की. 80, 90 और पिछली सदी के आखिरी दशक में लोग उनसे पूछते थे कि आप बेकन के बिना कैसे ज़िंदा हैं. क्या आपने कभी हैमबर्गर नहीं खाया? आप क्रिसमस लंच पर क्या खाते हैं?

वह कहते हैं, "मुझमें कमी देखी जाती थी. ऐसा लगता था कि मैं अजीब हूं और वे सब सामान्य हैं."

"अब जब मैं लोगों से कहता हूं कि मैं शाकाहारी हूं तो वे बताते हैं : ठीक है, मैं भी ज़्यादा मांस नहीं खाता और मेरी बेटी शाकाहारी है."

मिशेलिन गाइड से मान्यता प्राप्त रेस्तरां के मालिक कहते हैं, "संतुलन पलट गया है. अब मैं सबसे अलग नहीं हूं."

शाकाहारी विकल्प बढ़ रहे हैं. खाद्य कंपनियों और मार्केट रिसर्च फर्म्स ने भी मांग में बदलाव को पहचान लिया है.

2018 में 1,68,000 लोगों ने वेगन्यूरी (Veganuary) अभियान के तहत एक महीने के लिए शाकाहार अपनाया. 2014 में जब यह कैंपेन शुरू हुआ था तब केवल 3,300 लोगों ने इसमें हिस्सा लिया था.

सैंडविच के लिए मशहूर प्रेट ए मॉन्जे ने 2016 में लंदन में एक महीने के लिए 'वेगी प्रेट' नाम से ब्रांच खोली. यह इतना लोकप्रिय हो गया कि अब इसके चार स्टोर हैं.

नेस्ले ने पिछले साल विश्लेषकों से कहा कि पौधों से मिलने वाले आहार की मांग हमेशा रहेगी. गोश्त की जगह लेने वाले ज़ायकेदार विकल्पों की मांग बढ़ी है. इसका बाज़ार 2025 तक 7.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.

एक मार्केट रिसर्च फर्म की रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी के 44 फ़ीसदी उपभोक्ता कम मांस वाले आहार खा रहे हैं. 2014 से अब तक इसमें 26 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है. अमरीका में पहले से ज़्यादा लोग अपनी पहचान शाकाहारी बता रहे हैं.

BBC

क्यों छोड़ा मांसाहार

ऐसे निजी फ़ैसलों की वजह अलग-अलग होते हैं. मेलबर्न की एलेना स्टेपको ने चार-पांच साल पहले ज़ूलॉजी की पढ़ाई के दौरान मांस खाना छोड़ दिया था.

वह कहती हैं, "यह सब इंटरनेट पर कुछ दुखद वीडियो को देखने से शुरू हुआ. उनमें जानवरों की फार्मिंग और उनके साथ होने वाले सलूक को दिखाया गया था."

एलेना जानवरों से प्रेम करती हैं और उनके प्रति चिंता ने ही उनको शाकाहार अपनाने को प्रेरित किया है. कुछ लोग पर्यावरण संरक्षण के लिए ऐसा करते हैं तो कुछ सेहत सुधारने के लिए.

मानवाधिकार संरक्षण के यूरोपीय समझौते के अनुच्छेद-9 में शाकाहार को मानव अधिकार के रूप में संरक्षित किया गया है.

मांस और अन्य पशु उत्पादों को छोड़कर दूसरे आहार अपनाने के आर्थिक प्रभाव क्या हैं? क्या यह किसी व्यक्ति के लिए सूझबूझ भरा आर्थिक फ़ैसला हो सकता है? यदि ज़्यादा लोग अपना खानपान बदलते हैं तो इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

यह कोई रहस्य नहीं है कि मांस उत्पादन में ढेरों संसाधन लगते हैं. चारा तैयार करने के लिए जमीन, खाद और पानी चाहिए. चारे और पशुओं की ढुलाई के लिए ईंधन भी जरूरी है.

Getty Images

इमेज स्रोत, Getty Images

धरती और पर्यावरण पर बोझ

स्विट्जरलैंड के कृषि अनुसंधान संस्थान एग्रोस्कोप और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक अध्ययन में पाया कि प्रति 100 ग्राम पशु प्रोटीन उत्पादन के लिए 370 वर्ग मीटर भूमि और 105 किलो कार्बन डायऑक्साइड समकक्ष की जरूरत होती है.

इतना ही प्रोटीन अगर बीन्स, मटर या दूसरे पौधों से प्राप्त किया जाए तो केवल एक वर्ग मीटर भूमि और 0.3 किलो कार्बन डायऑक्साइड समकक्ष का इस्तेमाल होता है.

मांस की थोड़ी-सी मात्रा के उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में फसलों का इस्तेमाल होता है. इन्हीं वजहों से दूध, अंडे और चीज़ का उत्पादन बहुत संसाधन मांगता है. एक पाउंड चीज़ बनाने के लिए 10 पाउंड दूध की जरूरत होती है.

2015 के एक अध्ययन में सुझाव दिया गया था कि यदि सभी 9 अरब लोग शाकाहार अपना लें तो खेती के पारंपरिक तरीकों की जगह ऑर्गेनिक खेती अपनाकर उनका पेट भरा जा सकता है.

क्या इससे खाने का खर्च घट जाएगा? पौधों से मिले आहार पशुओं से मिले आहार से सस्ते हैं. खानपान पर मांसाहारियों के मुक़ाबले शाकाहारियों का खर्च कम है.

Tom Pilston/Panos Pictures

इमेज स्रोत, Tom Pilston/Panos Pictures

सस्ता है शाकाहार

स्वीडन के उपभोक्ताओं के खर्च की आदतों पर विस्तृत अध्ययन करने वाली अर्थशास्त्री जेनिना ग्राब्स ने पाया कि शाकाहार अपनाने पर खाने-पीने पर होने वाला खर्च 10 फ़ीसदी तक घट जाता है.

इससे पहले के अध्ययनों में भी पाया गया था कि कम मांस और कम संवर्धित उत्पाद खाने से लागत में 15 फ़ीसदी की कमी आती है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ऑक्सफोर्ड मार्टिन प्रोग्राम के अर्थशास्त्री मार्को स्प्रिंगमैन कहते हैं, "ऊंची आय वाले देशों में पौधों से मिलने वाले संतुलित आहार अन्य आहार से लगभग एक तिहाई सस्ते हैं."

शाकाहार अपनाने से आपका खर्च घटता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप इसे कैसे अपनाते हैं. एक अपवाद वे लोग हैं जो खुद को शाकाहारी बताते हैं, फिर भी मांस या मांस से बने उत्पाद खरीदते हैं क्योंकि उनके घर में किसी को बीफ़ बर्गर पसंद है.

पर्ड्यू यूनिवर्सिटी के जेसन लस्क और ओक्लाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी के बैले नॉरवुड के अध्ययन से पता चला कि ऐसे लोग घोषित मांसाहारियों और शुद्ध शाकाहारियों से अधिक खर्च करते हैं, भले ही उनका परिवार चाहे जिस आय वर्ग में हो.

एक और पेंच यह है कि यदि शाकाहारी उपभोक्ता ऑर्गेनिक उत्पाद खरीदते हैं तो वे परंपरागत मांसाहार करने वाले उपभोक्ताओं से ज्यादा खर्च करेंगे. संवर्धित आहार भी महंगे हो सकते हैं.

एलेना स्टेपको दो साल से शुद्ध शाकाहारी हैं. उनके लिए इसे अपनाना खर्चीला है और इसमें समय भी लगता है.

खाने-पीने की चीजें खरीदने के लिए एलेना को शाकाहारी उत्पाद बेचने वाले सुपरमार्केट तक जाना पड़ता है, जिनकी तादाद मेलबर्न में बहुत कम है.

"कई बार डिब्बाबंद शाकाहारी उत्पाद मांसाहारी उत्पादों के दोगुने, तिगुने, चौगुने दाम पर मिलते हैं. छोटी चीजें जैसे मक्खन वाला चाय बिस्कुट 2 डॉलर का होता है, लेकिन इसका शुद्ध शाकाहारी संस्करण 6 डॉलर में मिलता है."

स्टेपको के मुताबिक मांस-युक्त खाद्य उत्पादों के शाकाहारी संस्करण ढूंढ़ने या डिब्बाबंद उत्पाद खरीदने की जगह यदि सामान्य सब्जी करी को अपनाया जाए तो सस्ता पड़ेगा. लेकिन यह सबको पसंद नहीं आ सकता.

bbc

बचत कहां खर्च करेंगे

ग्राब्स कहती हैं कि पशु उत्पादों को छोड़ना कुछ मामलों में थोड़े पैसे बचा सकता है, लेकिन पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए लोगों को सोचना होगा कि बचे हुए पैसे कहां खर्च हो रहे हैं.

"अगर आपकी आमदनी में एक डॉलर जुड़ जाए तो आप उस पैसे को कहां खर्च करेंगे?"

यदि आपका जवाब कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने वाले प्लेन टिकट या कार खरीदने का है तो सिर्फ़ शाकाहारी बन जाने से आपका व्यक्तिगत कार्बन उत्सर्जन कम नहीं होने वाला.

ग्राब्स ने स्वीडन के उपभोक्ताओं पर किए गए अध्ययन में पाया कि यदि लोग शाकाहारी बन जाएं लेकिन दूसरी आदतें पहले जैसी रखें तो वे 16 फ़ीसदी कम ऊर्जा खर्च करेंगे और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 20 फ़ीसदी कम करेंगे. लेकिन यदि वे बचाए हुए पैसे को अमीरों की तरह खर्च करें तो ऊर्जा की कोई बचत नहीं होगी और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन सिर्फ़ 2 फ़ीसदी घटेगा.

"खपत के तौर-तरीके में बदलाव से कार्बन उत्सर्जन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है. लेकिन बात इतनी भर नहीं है. किसी की जीवनशैली के बड़े फलक को देखना महत्वपूर्ण है."

मांसाहार छोड़कर शाकाहार अपनाने के बारे में ग्राब्स कहती हैं, "यह अच्छा विचार है, लेकिन यही पूरी रणनीति नहीं होनी चाहिए."

कम मांस खाने से देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा, जैसे कि स्वास्थ्य सेवाओं पर?

रेड मीट कम खाने और फल-सब्जियां ज़्यादा खाने से हृदय रोग, कैंसर और अन्य बीमारियों से होने वाली मौतें कम होंगी. मोटे लोगों की तादाद भी घटेगी.

रिचर्ड बकले कहते हैं कि हम 80 के दशक से आगे बढ़े हैं. उनके बचपन में बाल कल्याण की वकालत करने वालों ने उनके माता-पिता से कहा था कि शाकाहारी भोजन बच्चे का उत्पीड़न है, और उसका विकास रूक जाएगा. बकले 6 फीट से ज्यादा लंबे हैं और उनका 100 किलो से ज्यादा है.

पीएनएएस (PNAS) में 2016 के एक अध्ययन में स्प्रिंगमैन और उनके सहयोगियों ने गणना की थी कि खानपान में बदलाव का दुनिया भर में क्या असर पड़ेगा.

कुछ देशों में लोग ज्यादा सब्जियां खाने लगेंगे. कुछ अन्य देशों में लोग ज्यादा सब्जियां खाएंगे और कम रेड मीट खाएंगे.

शोधकर्ताओं ने उन मॉडल्स को देखा जिसमें लोग वर्तमान आहार मानकों को पूरा करते हुए मांसाहार से शाकाहार और फिर पूर्ण शाकाहार में चले गए.

Getty Images

इमेज स्रोत, Getty Images

बचत ही बचत

यदि लोग शाकाहार अपना लें और दुनिया की आर्थिक तरक्की मौजूदा दर से ही चलती रहे तो 2050 तक वैश्विक मृत्यु दर 6 से 10 फ़ीसदी तक घट जाएगी.

स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में 28 हजार अरब डॉलर की बचत होगी. उत्पादकता में होने वाली कमी 30 हजार अरब डॉलर तक कम होगी. यह अनुमानित वैश्विक जीडीपी के 12 से 13 फ़ीसदी है.

आधे से ज़्यादा बचत विकसित देशों में होगी, जहां स्वास्थ्य सेवाएं महंगी हैं. आशंकित मौतों में आधे से ज़्यादा कमी विकासशील देशों में होगी.

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ये मॉडल विचारों के प्रयोग की तरह हैं जो दिखाते हैं कि क्या-क्या संभव हो सकते हैं.

हम अभी जरूरत के मुताबिक सब्जियों और फलों का उत्पादन नहीं कर रहे हैं. स्प्रिंगमैन का अनुमान है कि फलों और सब्जियों की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए 2050 तक इनका उत्पादन 50 फ़ीसदी बढ़ाना होगा.

यदि उपभोक्ता मांस-युक्त आहार को छोड़ते हैं तो उत्पादन की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर बदल जाएगी. स्प्रिंगमैन का अनुमान है कि फल और सब्जियों के क्षेत्र में ज्यादा रोजगार मिल सकते हैं, लेकिन रोजगार मौसमी होंगे.

मांस उत्पादक किसानों के लिए शाकाहार बढ़ना एक बड़ी चोट होगी. जेसन लस्क कहते हैं, "पशु प्रोटीन मूल्य वर्धित उत्पाद हैं. उत्पादक चारे जैसे अपेक्षाकृत कम लागत वाले उत्पादों को मांस में बदलते हैं, जिसे वे ज्यादा कीमत पर बेचते हैं."

स्वीडन में भोजन के पर्यावरण पर प्रभाव का अध्ययन करने वाली एनिका कार्लसन-कन्यामा कहती हैं कि मांस की मांग थोड़ी कम होने से उत्पादकों की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही है.

"स्वीडन में किसानों के संगठन इसे ख़तरा समझते हैं. वे इस बारे में ज्यादा बातें नहीं करते, लेकिन वे ऐसे विज्ञापन बना रहे हैं, जिनमें मांस के विकल्पों को नकारात्मक रूप में दिखाया जा रहा है."

स्वीडन में ज़रूरत के मांस का आधा हिस्सा आयात किया जाता है, इसलिए खपत घटने का घरेलू उत्पादकों पर असर पड़े ही, यह जरूरी नहीं.

वह यह भी बताती हैं कि मांस के विकल्पों और बीन्स के आटे से बनने वाले पास्ता जैसे उच्च प्रोटीन वाले नये खाद्य पदार्थों का उद्योग बढ़ रहा है.

"मैं इसे स्वीडन के किसानों के लिए एक मौके के रूप में देखती हूं कि वे नये उत्पादों का उत्पादन करें."

उदाहरण के लिए, स्वीडिश जई (oats) से बनने वाला वेज़न दूध, जिसे ओटली नाम की कंपनी बनाती है, ना सिर्फ स्थानीय बाज़ार में, बल्कि विदेशों में भी बिकता है.

चीजें आज जैसी हैं, वैसी हमेशा नहीं रह सकतीं. खेती और पशुपालन में ग्रीन हाउस गैसों का एक तिहाई उत्सर्जन होता है. चीन जैसे देशों में मांस की खपत बढ़ने से इसके और बढ़ने की आशंका है.

कार्लसन-कन्यामा कहती हैं, चीजें बदलने लगी हैं. बकले की तरह वे भी महसूस करती हैं कि लोगों के नजरिये बदल रहे हैं.

वह कहती हैं, "90 के दशक के दौरान जब मैं अपने रिसर्च के बारे में बात करती थी तो कुछ लोग चिढ़ जाते थे. वे मुझसे ख़फ़ा हो जाते थे, मुझे बुरा-भला कहते थे. लेकिन आज कोई वैसा नहीं करता."

"इस बात के बहुत सबूत हैं कि पशु प्रोटीन कम खाने से ना सिर्फ़ हम पर्यावरण को बचा रहे हैं, बल्कि अपनी सेहत भी सुधार रहे हैं. मुझे लगता है कि हम बहुत आगे बढ़े हैं."

कार्लसन-कन्यामा कहती हैं, "यकीनन यह मांस और डेयरी उत्पादों के उत्पादकों के लिए चुनौती है. लेकिन धरती के लिए और अपनी सेहत के लिए इस पर विचार होना चाहिए."

(बीबीसी कैपिटल पर इस स्टोरी को इंग्लिश में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी कैपिटल को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)