'सिटी ऑफ़ जॉय' में पुरानी इमारतों की सुध लेने वाला कोई नहीं

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- Author, श्रेया चटर्जी
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
यादें रफ़्तगां की भी हिम्मत नहीं रही,
यारों ने कितनी दूर बसाई हैं बस्तियां
शहरों की बढ़ती भीड़ में रिश्तों का उधड़ता ताना-बाना बताने के लिए फ़िराक़ गोरखपुरी का ये शेर काफ़ी है. एक दौर था जब पूरा कुन्बा एक साथ एक घर में रहता था. एक ही रसोई में सबका खाना बनता था. सब साथ बैठकर खाते थे.
यही वो वक़्त होता था, जब घर के सभी मसलों पर बातचीत होती थी. एक दूसरे से चुहल होती थी. लेकिन रोज़गार की मजबूरी ने सबको बिखेर कर रख दिया.

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बड़े-बड़े मकानों से घर ख़त्म होते चले गए और ये मकान इमारत की शक्ल में बाक़ी रह गए. अब तो ये इमारतें भी बूढ़ी हो गई हैं. अपनी बुज़ुर्गी के साथ ख़ुद ही ख़त्म होती जा रही हैं. कुछ को ख़त्म किया जा रहा है.
बात चाहे दिल्ली की हो, बनारस, लखनऊ या कोलकाता की हो, सभी जगह नई इमारतों के साथ-साथ पुराने बड़े घर आज भी मौजूद हैं. जो अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हैं.
इन घरों में रहने वाली पीढ़ियों की यादें यहां दफ़न हैं. लेकिन आज इन पुरानी इमारतों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. यूं समझिए कि ये ज़ईफ़ (कमज़ोर) इमारतें किसी तरह सांसें गिन रही हैं.

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भवानीपुर की जर्जर इमारतें
कोलकाता भारत के पुराने शहरों में से एक है. ये 1911 से पहले तक देश की राजधानी हुआ करता था. लिहाज़ा यहां की इमारतों पर अंग्रेज़ी आर्केटेक्ट का असर ज़्यादा है. शहर में एक इलाक़ा है भवानीपुर.
यहां हरेक इमारत अलग अंदाज़ में बनी है. घरों में बड़े-बड़े सहन, रोशनदान, ऊंची छतें हैं. घर का फ़र्श लाल ईंटों के ख़रंजे से बना है. हरेक घर इतने बड़े रक़बे में फैला है कि कई पीढ़ियों के लोग इनमें रहते आए हैं.
हालांकि इन हवेलियों में आज भी लोग रहते हैं, लेकिन इनमें से ज़्यादातर वो हैं जो शहर से बाहर नहीं जा सके. वो गुज़ारे भर की कमाई के साथ इन्हीं हवेलियों के अलग-अलग हिस्सों में रहते रहे.

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150 साल पुराने हज़ारों घर
आज उनके पास इन के रख रखाव के लिए पैसा नहीं है. लिहाज़ा भवानीपुर की कई पुरानी इमारतें ढहने की कगार पर पहुंच चुकी हैं.
इन हवेलियों की दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं. जिन्हें परिंदों ने अपना आशियाना बना लिया. इन्हीं दरारों में पीपल की शाखें फूट आई हैं. ये नींव को कमज़ोर कर रही हैं. बरसात के मौसम में ये पुरानी हवेलियां और भी ख़ौफ़नाक हो जाती हैं.
भवानीपुर में पिछले साल जुलाई की बरसात में एक पुराना घर गिरा था जिसकी चपेट में आकर दो लोगों की मौत हो गई थी. इसी तरह 2016 में एक इमारत गिरने से क़रीब 20 लोग ज़ख़्मी हो गए थे.
पूरे कोलकाता शहर में ऐसे हज़ारों घर हैं जो करीब 150 साल पुराने हैं. इन सभी को तुरंत मरम्मत की ज़रूरत है.
तीन हज़ार घर असुरक्षित
2016 में किए गए सर्वे के मुताबिक़ कोलकाता में करीब तीन हज़ार घर असुरक्षित हैं. इनमें लगभग पचास हज़ार लोग रहते हैं.
हालांकि कोलकाता नगर निगम ने इन घरों में रहने वालों को नोटिस भेज दिया है लेकिन फिर भी यहां रहने वाले किराएदार इन्हें खाली करने के लिए राज़ी नहीं हैं.
ये घर खाली नहीं करने की भी वजह है. इन घरों में एक साथ कई परिवार कई साल से मामूली किराया अदा करके रह रहे हैं. एक परिवार महज़ सौ रुपये महीना किराया देता है.
इस किराए से मकान मालिक को ना के बराबर कमाई होती है. लिहाज़ा उसके लिए मकान की मरम्मत कराना मुमकिन नहीं होता.
चूंकि किराएदार पुराने हैं इसीलिए उन्हें आसानी से बाहर निकाला भी नहीं जा सकता. लिहाज़ा मकान मालिक बिल्डर्स को ये मकान बेच कर माक़ूल क़ीमत वसूल रहे हैं.
सबसे पुराना नीलाम घर
दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू जैसे शहरों के मुक़ाबले कोलकाता में रिहाइशी इमारतों की क़ीमत काफ़ी कम हैं. हाल के कुछ बरसों में तो प्रॉपर्टी के दाम और भी नीचे आए हैं.
जो लोग दूसरे शहरों में बस गए हैं, उनके लिए ये बड़े और पुराने मकान बोझ बन गए हैं. अगर इनकी मरम्मत करके किराए पर दे भी दिया जाए तो भी फ़ायदे का सौदा नहीं बनता, क्योंकि किराया बहुत ही कम है.
ये बड़े-बड़े घर पैसे वालों के थे. लिहाज़ा इन घरों में बहुत सा पुराना क़ीमती सामान भी है जो अब नीलाम हो रहा है. पुरानी चीज़ों को जमा करने वाले इन्हें मोटी क़ीमत देकर ख़रीद रहे हैं.
कोलकाता में बोली लगाने का रिवाज बहुत पुराना है. एक दौर में यहां क़रीब बीस ऐसे घर थे जहां सामान की बोली लगाई जाती थी. लेकिन अब सिर्फ एक ही बचा है जिसका नाम है 'रसेल एक्सचेंज'. कुछ जानकार इसे भारत का सबसे पुराना नीलाम घर बताते हैं.

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छोटे पिन से जहाज़ तक की बोली
1940 में इसे अनवर और अर्शद सलीम नाम के दो भाईयों ने किसी अंग्रेज़ से ख़रीदा था. यहां हर हफ़्ते बोली लगती है.
अर्शद सलीम 18 साल की उम्र से यहां पुरानी चीज़ों की बोली लगाते आ रहे हैं. वो कहते हैं कि उन्हों ने यहां छोटे पिन से लेकर जहाज़ तक की बोली लगाई है. पुराना फर्नीचर और दीगर सामान फिल्में बनाने वालों और नाटक कंपनी वालों को किराये पर दिया जाता है.
बढ़ती आबादी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए बड़े मकान तोड़कर फ्लैट बनाए जा रहे हैं, ताकि कम जगह में ज़्यादा लोगों को घर मिल सके.
पुराना कोलकाता शहर तेज़ी से मॉडर्न शहर बन रहा है. ज़्यादातर लोग पुराने घरों के रखरखाव से घबराते हैं. वो ज़्यादा सुख सुविधाओं के साथ आधुनिक फ्लैट में रहना पसंद करते हैं.
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें अपने पुरखों की विरासत से दिली लगाव है. वो नहीं चाहते कि जिन घरों में उनकी पीढ़ियों ने ज़िंदगी बसर की, उन्हें इतनी आसानी से मिट्टी के ढेर में तब्दील कर दिया जाए. लिहाज़ा वो अपनी विरासत को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

इन्हीं में से एक हैं अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन.
वो कहते हैं कि ये पुरानी इमारतें कोलकाता की विरासत हैं. इन्हें इसी रूप में आने वाली पीढ़ियों के लिए संजो कर रखना ज़रूरी है. लेकिन कोलकाता के दूर दराज़ में तेज़ी से तरक़्क़ी हो रही है. अब अपनी विरासत को संभालना कोलकाता के लोगों और इससे जुड़ी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है.
अब वो कैसे आधुनिकीकरण के साथ-साथ पुरानी इमारतों को बचाते हैं, ये एक चुनौती है.
अगर कोलकाता के पुराने रूप को बचाए रखना है तो इस चुनौती को स्वीकर करना ही होगा. वरना सिटी ऑफ़ जॉय की असली ख़ूबसूरती हमेशा के लिए खो जाएगी.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)














